




2026-10-04 12:55:38
भारत एक बहुसांस्कृतिक देश है, यहाँ पर लगभग सभी धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के लोग निवास करते है। जिस कारण यहां के लोगों का सामाजिक धरातल समान नहीं है। किसी का धरातल बहुत ऊंचा है तो किसी का नीचा। जिसके कारण सामाजिक समुदायों में एकता, समता और समानता का भाव नहीं है। सभी सामाजिक घटक अपने आपको एक-दूसरे से अलग समझते हैं तथा उनमें उंच-नीच की भावना है। समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता की भावना नहीं है। इन सभी कारणों से देश में बौद्धिक चेतना को पुर्न:स्थापित करने की जरूरत है। जिसके कारण आज देशभर में पिछड़े वर्ग के अंदर आने वाले सभी जातीय घटक अपनी हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं, जो सैद्धांतिक और तार्किक आधार पर सही भी है।
भारतीय समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) संख्याबल के दृष्टिकोण से सर्वाधिक और उत्पादन प्रणाली का मुख्य आधार है। खेत-खलियान, दस्तकारी, शिल्प निर्माण और लघु उद्योग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अर्थव्यवस्था की वास्तविक धड़कन यही श्रमजीवी वर्ग है। परंतु ऐतिहासिक और समकालीन यथार्थ यह है कि बहुसंख्यक होने के उपरांत भी यह समाज नीति-निर्माण, उच्च शिक्षा, न्याय पालिका, मीडिया और बौद्धिक विमर्श के केन्द्र से बाहर है जबकि वह इसका प्राकृतिक हकदार है। यदि पिछड़ा वर्ग अपने वास्तविक पुरोधाओं जैसे-राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहुजी महाराज, पेरियार ई.वी.रामासामी, ललई सिंह यादव और बी.पी. मंडल की वैचारिकी को आत्मसात कर लें तो देश में अभूतपूर्व बौद्धिक क्रांति का सूत्रपात हो सकता है। इस बौद्धिक जागरण के लिए अनिवार्य है कि ओबीसी समाज के अन्य शोषित, वंचित, दलित व आदिवासी समुदायों के साथ केवल संख्यात्मक समझौता न करें, बल्कि वह एक साझा, पारदर्शी और परस्पर समानता पर आधारित नेतृत्वकारी सहभागिता का निर्माण करें।
महात्मा ज्योतिबा फुले ने उन्नीसवीं सदी में ही स्पष्ट कर दिया था कि किसी भी वर्ग का पतन शास्त्रों से नहीं, बल्कि ज्ञानता के कारण हुआ है। उनका इस संबंध में कथन था कि ‘विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र लाचार हुए; इतने सारे अनर्थ केवल एक अविद्या ने किए।’
सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की पहचान: पिछड़े वर्ग की सबसे बड़ी ऐतिहासिक कमजोरी रही है कि उसने जाने-अनजाने में उसी रूढ़िवादी, सामंतवादी और गैर बराबरी वाले सांस्कृतिक ढांचे को अपना गौरव मान लिया, जिसने उसे व्यवस्थागत रूप से दोयम दर्जे का नागरिक बनाया। वर्तमान समय में भी वह अपने उसी ढर्रे पर चल रहा है।
पेरियार का तर्कवाद: पेरियार रामासामी ने सिखाया कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के अंधविश्वास, रूढ़ियों और पाखंड का त्याग नहीं करता, तब तक वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होकर भी मानसिक गुलाम है। वहीं छत्रपति शाहूजी महाराज ने 1902 में कहा था कि प्रतिनिधित्व (आरक्षण) केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि सत्ता और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में वंचितों की हिस्सेदारी का वैधानिक हथियार है।
पिछड़े समाज के जातीय घटक जैसे- मल्लाह, बिंद, बेलदार, केवट, कानू, धानुक, कहार, कुम्हार, नाई, तमोली, भड़भुजा, तेली, हलवाई, सुनार, ठठेरा, दर्जी, रंगरेज, जुलाहा, मनिहार, कश्यप, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी, मछुआ, बढ़ई, गड़रिया, लौहार आदि अपने पुरोधाओं के असली दर्शन को समझेंगे, तब वे प्रतिकात्मक राजनीति के जाल से निकलकर नीतिगत, शैक्षणिक और वैज्ञानिकता की ओर अग्रसर होंगे।
ओबीसी, एससी और एसटी के बीच एक स्वाभाविक ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध रहा है। ये सभी जातीय घटक मूलत: उत्पादन और श्रम से जुड़े हुए हैं। परंतु जाति व्यवस्था के सूक्ष्म और विभाजनकारी तंत्र ने इन्हें बाँटकर रखा है। श्रेणीबद्ध गैर बराबरी को बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अच्छी तरह से रेखांतिक किया कि जाति-व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि यह श्रमिकों का विभाजन है, जिसमें प्रत्येक जाति दूसरे को ऊंचा-या-नीचा मानकर संतुष्ट रहती है। इस ऊंच-नीच के जाल ने शोषितों को अपने एक साझा शत्रु (मनुवाद व ब्राह्मणवाद) के विरुद्ध एकजुट होने से रोका है।
जमीनी टकराव बनाम व्यापक हित: भूमि सुधारों की विफलता और संसाधनों की कमी के कारण अक्सर पिछड़े वर्ग और दलित-आदिवासी समाज के बीच स्थानीय स्तर पर टकराव की स्थितियाँ उत्पन्न होती रहती है। इन स्थानीय विवादों का लाभ सदैव उन वर्चस्ववादी शक्तियों ने उठाया, जिनका इन दोनों वर्गों के वास्तविक सशक्तिकरण से कोई सरोकार नहीं था। आज के समय में जब सार्वजनिक क्षेत्र सुकड़ रहे हैं, नौकरियों में ठेका-प्रथा बढ़ रही है और शिक्षा का निजीकरण हो रहा है, तब यह समझना अनिवार्य है कि सत्ता की नीतियों की मार ओबीसी, एससी और एसटी तीनों पर समान रूप से पड़ रही है। इस आर्थिक और सामाजिक संकट से निपटने के लिए इन तीनों वर्गों को एक साझा मंच पर आना होगा।
संसाधनों के अहंकार का त्याग: पिछड़े समाज के बहुत सारे जातीय घटकों में इस बात का अहंकार है कि उनके पास खेती की जमीन व संसाधन अन्य पिछड़े जातीय घटकों की अपेक्षा अधिक है। इस अहंकार के कारण वे अन्य पिछड़े जातीय घटकों से ऊंच-नीच की मानसिकता रखते हैं। चूंकि अन्य समुदायों के लोग इनके खेतों-खलियानों में काम करते हैं। इन समुदायों में जाट, गुर्जर, यादव, पटेल इत्यादि आते हैं। इनकी मानसिकता पूर्णत: सामंतवादी होती है और उसी मानसिकता के आधार पर ये सभी जातीय घटक अन्य पिछड़े जातीय घटकों का शोषण भी करते हैं। ये सामंती सोच वाले पिछड़े जातीय घटक ब्राह्मणवादी और मनुवादी संस्कृति के लठैत भी हैं। इसी सोच के कारण उन्हें आजतक लोकतंत्र में कोई संवैधानिक हिस्सेदारी नहीं मिल पाई है। इसलिए इन जातीय घटकों को अपनी मानसिकता से ऊंच-नीच की भावना के अहंकार व सामंती सोच को त्यागना होगा, सभी को एक साथ समतामूलक आधार पर इकट्ठा होकर अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा।
साझा नेतृत्व का सिद्धांत: साझा नेतृत्व के लिए केवल सभी जातीय व धार्मिक घटकों का एक साथ चलना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि सभी को सम्मान देना और सभी के साथ बराबरी का भाव रखना भी आवश्यक है। अक्सर देखा गया है कि जब भी बहुजन एकता या सामाजिक गठबंधन की बात होती है, तो बड़ा वर्ग जिनके पास खेती की जमीन का मालिकाना अधिकार है वह छोटे वर्गों को केवल मतदाता या भीड़ के रूप में देखता है। यही दृष्टिकोण पिछड़े वर्ग के सामाजिक आंदोलन को कमजोर करता है। व्यवहारिक रूप में बराबरी का भाव सबसे पहले खेती-किसानी से जुड़े समुदायों को दिखाना होगा और उसके तकनीकी व श्रमिक जातीय घटकों को उनका अनुसरण करना होगा, तभी जाकर बहुजन समाज के जातीय घटकों में एक अबाध्य गठबंधन बन सकेगा।
समान और सम्मानजनक हिस्सेदारी: राजनीतिक, सामाजिक और संगठनिक स्तर पर दलित और आदिवासी समाज के युवाओं को न केवल आगे बढ़ाना होगा, बल्कि उनके नेतृत्व को सहर्ष स्वीकार भी करना होगा। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, बिरसा मुंडा, मान्यवर साहेब कांशीराम, कोमराम भीम के वैचारिक नेतृत्व को बिना किसी हिचकिचाहट के आत्मसात करना होगा।
सामाजिक अत्याचारों का मुखर विरोध: जब किसी दलित या आदिवासी पर जातिगत हिंसा, भूमि हड़पने या सामाजिक बहिष्कार की घटना घटती है, सबसे पहले उनके बचाव में ओबीसी समाज को सशक्त तरीके से खड़ा होना चाहिए। यदि उत्पीड़न करने वाला व्यक्ति पिछड़े वर्ग का भी हो, तो भी पिछड़े समाज को न्याय और कानून का साथ देना चाहिए। जब तक पीड़ित को यह विश्वास नहीं होगा कि उसका भाई (पिछडा जातीय घटक) उसके स्वाभिमान का रक्षक है, तब तक देश में वास्तविक सामाजिक बंधुत्वता स्थापित नहीं हो सकेगी।
जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों का साथ: आदिवासी समाज आज कारपोरेट लूट, विस्थापन और पर्यावरण विनाश के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। पिछड़े वर्ग को यह समझना होगा कि आदिवासी केवल जंगलों में रहने वाला एक अलग समूह नहीं, बल्कि प्रकृति और संसाधनों के सह-अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाला सहोदर है। पैसा, कानून और वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वन में पूरे बहुजन समाज को आदिवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना होगा।
बौद्धिक क्रांति की रूपरेखा: अलगी पीढ़ी के लिए कार्य योजना सड़क के संघर्षों के साथ-साथ वर्तमान समय की लड़ाई ज्ञान, तकनीक और संस्थागत विमर्श की है। इस बौद्धिक क्रांति को साकार करने के लिए बहुजन समाज को चार प्रमुख मोर्चो पर काम करना होगा:
1. परंपरागत डिग्रियों से आगे बढ़कर बहुजन युवाओं को विज्ञान, तकनीक, विधि, डेटा साइंस, अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति जैसे विषयों में विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। उच्च शिक्षण संस्थानों और न्यायपालिका में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बौद्धिक रूप से स्वयं को तैयार करना होगा।
2. स्वतंत्र मीडिया और प्रकाशन संस्थानों का निर्माण: जब तक अपना मीडिया अपने प्रकाशन और अपने शोध संस्थान नहीं होंगे, तब तक बहुजन समाज के विमर्श को दूसरे लोग अपने स्वार्थ के हिसाब से तय करते रहेंगे। समाज के साधन-सम्पन्न लोगों को, युवाओं के स्वतंत्र मीडिया पोर्टल्स, यू-ट्यूब चैनलों और अकादमिक पत्रिकाओं को वित्तीय व सामाजिक संबल देना चाहिए और अपने संसाधन पैदा करने चाहिए।
3. संविधान की रक्षा को प्राथमिकता: भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि वह समाज के दबे-कुचले वर्गों का वास्तविक सुरक्षा कवच है। आरक्षण, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और व्यस्क मताधिकार ये सब संविधान की देन हैं। संविधान की प्रस्तावना शब्द में लिखे न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना प्रत्येक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।
4. सांस्कृतिक विकल्पों की स्थापना: शोषित व वंचित जातियों को उन प्रतिकों, त्यौहारों और आख्यानों का पुन: मूल्यांकन करना चाहिए, जो ऐतिहासिक रूप से उनके पराजय और हीनता के प्रतीक बने हुए हैं। उनके स्थान पर बुद्ध, कबीर, रविदास, फुले, अम्बेडकर, पेरियार और बिरसा मुंडा के समतावादी और वैज्ञानिक दर्शन को देश के घर-घर में स्थापित करना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, वह कभी अपना इतिहास रच नहीं सकता। ओबीसी समाज के अहंकारी घटक आज एक ऐसे ही दोराहे पर हैं- एक मार्ग उसे संकीर्ण जातिगत पहचान जैसे भावनात्मक मुद्दों और दूसरों की राजनीतिक पालकी उठाने की ओर ले जाता है जिसमें आज गुर्जर समाज के युवा बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं; जबकि दूसरा मार्ग उसे फुले अम्बेडकर-पेरियार की बौद्धिक मशाल थामकर सामाजिक न्याय का मार्ग दिखाता है। जिसकी तरफ पिछड़े वर्ग के मध्यम दर्जे के अति पिछड़ी जातीय घटकों के लोग आकर्षित होते दिख रहे हैं।
यदि पिछड़ा वर्ग जाग्रत होकर अपने दलित व आदिवासी भाइयों के हाथों में हाथ डालकर आगे बढ़ता है, उन्हें सत्ता और संगठन में सम्मानजनक हिस्सेदारी देता है तो भारत में किसी भी प्रकार का सामाजिक अन्याय टिक नहीं सकेगा!
यह एकता का मंत्र केवल सता हथियाने का अंकगणित नहीं, बल्कि इस देश को एक सच्चे समतामूलक और लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलने की वैचारिक और सांस्कृतिक क्रांति है। समय की मांग है कि बहुजन समाज अपनी सामूहिक शक्ति को पहचाने, अपनी बौद्धिक क्षमता को तरासे और समता के नए युग की शुरूआत करें। इसके साथ ही बहुजन समाज के जातीय घटकों को ब्राह्मणवादी षडयंत्रों से भी सावधान रहना होगा। चूंकि वे किसी भी कीमत पर नहीं चाहेंगे कि भारत में दलित, शोषित, वंचित और पिछड़े वर्ग के सभी जातीय घटक व अल्पसंख्यक एकजुट होकर एक मजबूत सांगठनिक संस्था का निर्माण करें।





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