2025-03-13 12:25:11
भारतीय समाज में त्यौहारों का लंबा इतिहास है त्यौहारों के समय को देखते हुए लगता है कि भारत के सभी त्यौहार प्रकृति से घटित होने वाली घटनाओं व फसलों से संबंधित है। प्रकृति में जब भी जलवायु परिवर्तन होता है, तब खेतों में बोई व उगाई जा रही फसलों व उनको काटने व संवारने के समय में ऋतु परिवर्तन के साथ उत्सव (त्यौहार) मनाने का चलन भी प्राचीन काल से मौजूद है। भारतीय समाज में देखा जा सकता है कि प्रकृति में बदलाव के समय प्रत्येक माह में दो उत्सवी घटनाएँ आमतौर पर अतीत से चली आ रही है, जैसे अमावस्या और पुर्णिमा। भारत के कुछ एक परिवारों में ये दोनों घटनाएँ छोटे स्तर के रूप में निरंतरता के साथ मनाई जाती रही है। भारत में मनाये जा रहे सभी उत्सव (त्यौहार) प्रकृति परिवर्तन से जुड़े हैं। आमतौर पर भारत में तीन मौसम होते हैं और इन तीनों मौसमों के प्रारंभ और उत्तरार्ध में किसी न किसी प्रकार का त्यौहार मनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर वर्षा ऋतु के बाद जब शरद ऋतु प्रारंभ होती है तो बरसात के महीने में उगाई गई फसल की कटाई होती है। नई फसल का आगमन समाज में खेती करने वाले परिवारों के घरों में होता है तो परिवार और समाज में एक उत्साह का माहौल होता है। नई फसल आने से समाज में आर्थिक समृद्धि और नई ऊर्जा का सर्जन भी होता है। जिस खुशी को स्थानीय जनता त्यौहार के रूप में मनाती है। दशहरा या दीपावली का संबंध भी प्राकृतिक और ऋतु आधारित घटनाओं से संबंधित ही लगता है। परंतु कुटिल ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने इन्हें अपने स्वार्थ हेतु पौराणिक कथाओं पर आधारित गढ़कर और उसे जनता को ऐसे बताया जैसे यह कोई देवीय व अवतारित घटना है। भारतीय जनता को यह जानना चाहिए कि न तो यह देवीय व अवतरित घटना है, ये सभी घटनाएँ समाज और प्राकृतिक घटनाओं व जलवायु से जुड़ी हुई हंै। भारतीय समाज उसी आधार पर त्यौहारों का सृजन व संचालन करता आ रहा है। अब सभी त्यौहारों का संचालन समाज में परम्परागत रूप ले चुका है परंपरा के आधार पर सभी भारतीय लोग अपने-अपने क्षेत्र में सदियों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चले आ रहे हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, भारतीय समाज भी परिवर्तन से अछूता नहीं है, समाज में बौद्धिक और वैज्ञानिक विकास के आधार पर त्यौहारों में भी परिवर्तन की जरूरत है।
होली का त्यौहार: होली का त्यौहार भी पौराणिक कथाओं पर आधारित है, इन पौराणिक कथाओं का कोई तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार नहीं है। जिसके बिना इन घटनाओं को सत्यापित नहीं किया जा सकता। इसलिए इन पौराणिक कथाओं पर आधारित त्यौहारों और उत्सवों का आधुनिकीकरण करना जरूरी है, जैसे होली के त्यौहार पर हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है जिसमें वातावरण और अन्य संसाधनों की भी बड़े पैमाने पर क्षति होती है। ऐसी अप्रमाणिक अमानवीय पौराणिक कथाओं पर आधारित परंपराओं को प्रतिवर्ष जनता द्वारा दहन कराने की आवश्यकता भी नहीं है। आज समाज में मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति के कारण बढ़ते दुराचार, व्यभिचार और अन्य अपराधिक मान्यताओं को दहन करना प्रासंगिक लगता है। आज समाज में उगाई जा रही मनुष्य विरोधी गतिविधियों का दहन (त्याग) करना अति आवश्यक हो गया है। जातिवादी मानसिकता गहराई तक जड़ जमाएँ हुए हैं, धार्मिक आधार पर नफरत और विषमता बढ़ रही है, वैज्ञानिक सोच को ब्राह्मणी संस्कृति की मानसिकता के लोगों द्वारा ध्वस्त किया जा रहा है। ऐसी सामाजिक कुरीतियों का दहन (त्याग) करना समाज के लिया आज आवश्यक है। समाज के जागरूक व बौद्धिक लोगों से आग्रह है कि वे समाज में पनपती विषमताओं और असंवैधानिक गतिविधियों का सामाजिक रूप में दहन करें और ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी करें।
पौराणिक कथाओं पर आधारित त्यौहार असंवैधानिक: भारतीय समाज में त्यौहारों व उत्सवों का चलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। प्राचीन काल से चले आ रहे त्यौहार अब समाज में प्रथा का रूप धारण कर चुके हैं। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और उसके अनुच्छेद-13 के अनुसार जो प्रथाएँ और रीतियाँ समाज में चल रही है और वे अब जनकल्याण और समाज उपयोगी नहीं है तो ऐसी सभी प्रथाएँ और रीतियाँ 26 जनवरी 1950 से ध्वस्त (दहन) हो चुकी है। आज जो व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह प्राचीन काल से चली आ रही अमानवीय कथाओं और रीतियों, प्रथाओं का संदर्भ देकर बात करता है, और उसे लगातार अग्रसर करने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करता है तो वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह संविधान विरोधी कार्य का दोषी है। इसलिए ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के खिलाफ संवैधानिक अवमाना का अभियोग उचित न्यायालय में चलना चाहिए और उसे दंडित भी करना चाहिए। चूंकि देश में संवैधानिक सत्ता है। देश के सभी कानून व व्यवस्था संविधान से ही नियंत्रित होते हैं इसका मतलब साफ है कि संविधान सर्वोपरि है, देश के सभी कानून व अन्य कानूनी प्रक्रियाएँ संविधान के अधीन आती हैं। संविधान के विरुद्ध व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा बनाया गया कोई भी प्रावधान कानून का रूप नहीं ले सकता।
पौराणिक त्यौहारों का संवैधानिककरण: भारत त्यौहारों व उत्सवों का देश है। यहां हर समय कोई न कोई त्यौहार व उत्सव चलता ही रहता है। भारतीय त्यौहारों का आधार क्षेत्रीयता, कृषि और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। दक्षिण भारत के लोगों के त्यौयाहर उत्तर भारत के त्यौहारों से भिन्न है चूंकि दोनों क्षेत्रों की जलवायु और ऋतुएं अलग-अलग हैं। फसलों को बौने और काटने का समय भी अलग-अलग है। इसी आधार पर त्यौहारों के आयोजनों के समय में भी भिन्नता है। इसी तरह पूर्व और पश्चिम के क्षेत्रों के आयोजनों में भी भिन्नता है। इन भिन्नताओं के आधार पर यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत में त्यौहार व उत्सवों का आयोजन प्रकृति और जलवायु से जुड़ा रहा है। भारत के त्यौहारों का किसी अवतरित देवी-देवता या भगवानों से कोई संबंध नहीं है। पौराणिक कथाओं से संबंध सिर्फ ब्राह्मणी संस्कृति के मनुवादी ब्राह्मणवादियों ने ही बनाया है और उसे जनता में अपने स्वार्थ के अनुसार प्रचारित-प्रसारित भी किया है। जिसके कारण इन त्यौहारों के मौकों पर मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति के धनाढ्य लोगों से दान दक्षिणा लेकर देश का ब्राह्मण समुदाय अपनी जीविका बिना शारीरिक और बौद्धिक श्रम के करता है। भारत की जनता उनके ऐसे कृत्यों से लगातार मूर्ख बनती रहती है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि मूर्ख बनने की प्रवृति भारत के अजागरूक लोगों की आंतरिक संरचना में पूर्णतया रच-बस गई है। चूंकि जनता के पढ़े-लिखे और अपने आपको विद्वान समझने वाले लोग भी ब्राह्मणी संस्कृति के छलावों से भय खाकर उन्हीं को आत्मसात करके चल रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि भारत में मूर्ख और धूर्त लोगों की संख्या उनकी मानसिकता में व्याप्त अतार्किकता और अवैज्ञानिकता के अभाव में अधिक बढ़ी है।
संवैधानिक व्यवस्थाओं पर भारी ब्राह्मणी संस्कृति: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (एच) में वैज्ञानिक सोच व आधार को जनता में बढ़ाना सरकार का दायित्व है। परंतु जनता में हर रोज अवैज्ञानिक रीति-रिवाजों का प्रचार-प्रसार संवैधानिक पदों पर बैठे मनुवादी लोग हर रोज करते हुए देखे जा सकते हैं। देश में जबसे मनुवादी संघी सत्ता है तब से खुलेआम मनुस्मृति आधारित हिदुत्व की वैचारिकी को लगातार स्थापित किया जा रहा है। भारत एक धर्म और एक मान्यता वाले व्यक्तियों का देश नहीं हैं यहाँ पर विभिन्न समुदायों, धर्मों के मानने वाले व्यक्ति हर प्रदेश व शहर में पाये जाते हैं। उनकी धार्मिक मान्यताएं भी भिन्न है और उसी आधार पर उनकी आस्थाएं भी स्वाभाविक रूप से भिन्न है। परंतु जबसे देश में मोदी-संघी शासन सत्ता में हैं तब से संविधान का खुला उल्लंघन हो रहा है। मोदी-संघी मनुवादी शासन समय-समय पर देश की जनता को बरगलाता है कि देश के हिंदू खतरे में हैं मगर वे देश की जनता को यह नहीं बताते कि जब मनुवादियों के कथनानुसार हिंदू बहुसंख्यक हैं और देश का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति भी हिंदू है, भारतीय सेनाओं में जो लोग हैं वे हिंदू हैं तो फिर देश को खतरा किससे और कैसे हैं? पूछने पर भी ब्राह्मणी संस्कृति के लोग इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं देते। वे भारतीय लोगों को सिर्फ बरगलाने और भड़काने का ही कम करते हैं। जिसके कारण देश में नफरत और भेदभाव बढ़ रहा है।
हिंदुत्ववादी वैचारिकी से मुक्ति जरूरी: भारत की जनता किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक समूह से नहीं बनी है। यहाँ की जनता में धार्मिक और सांस्कृतिक विषमता है, यहाँ की जनता में धार्मिक और राजनैतिक विषमता के अलावा क्षेत्रीय विषमता भी है, जलवायु विषमता भी है, भाषाई विषमता भी है, इन सभी विषमताओं के आधार पर किसी एक विषमता के कारक से जुड़ा अगर कोई व्यक्ति अपने आपको दूसरे विषमता कारक से श्रेष्ठ व उच्च मानता है तो वह व्यक्ति संविधान विरोधी ही कहलाएगा। हिंदुत्व की वैचारिकी में हर समूह अपने आपको दूसरे समूह से श्रेष्ठ या ऊँचा-नीचा मानता है। यही ऊँच-नींच की भावना भारतीय सामाजिक ताने-बाने को निरंतरता के साथ कमजोर कर रही है। ऊपर से जिस मानसिकता के लोगों के हाथों में राजनैतिक सत्ता है उससे भी देश की सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होती है। वर्तमान समय में देश में नफरत का भाव दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। देश में दलित और मुस्लिम वर्तमान समय में सबसे ज्यादा पीड़ित और उपेक्षित है। यह सब कुछ अपने आप नहीं हो रहा है इसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत संघी मानसिकता द्वारा निर्मित किया जा रहा है। जिसके कारण देश के सामाजिक ताने-बाने में नफरत और तनाव दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। जनता को लगता है यह सब कुछ अपने आप हो रहा है। लेकिन इस सबके मूल का आधार संघी मानसिकता की किताब ‘बँच आॅफ थोट्स’ में दिये गए संघी प्रावधान हैं, मनुवादी संघी लोग उसी के आधार पर निरंतरता के साथ आगे बढ़ रहे हैं। चुनाव प्रणाली को मोदी-संघी सरकार ने अपने मन-माफिक नियंत्रण में कर लिया है और अब सरकार में बैठे संघी कर्णधारों को चुनाव में हारने की भी चिंता नहीं है। वर्तमान समय में भारत का लोकतंत्र मनुवादी संघी वर्चस्व और नियंत्रण के कारण खतरे का सामना कर रहा है। ऐसे हालात को देखकर देश के जागरूक और बौद्धिक लोगों को सामने आकर लोकतंत्र को बचाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। भारत में लोकतंत्र और सभी नागरिकों के लिए व्यस्क मताधिकार बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के असीम ज्ञान और परिश्रम से नागरिकों को मिला है, उसकी रक्षा करना सभी का कर्तव्य होना चाहिए। लोकतंत्र के लिए भारत के दलितों, मुस्लिमों, और अत्यंत पिछड़े समुदायों को हर कीमत पर उसे बचाना चाहिए और देश को कभी भी हिंदू राष्ट्र नहीं बनने देना चाहिए। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का हम सभी के लिए यही संदेश था जिसे आत्मसात करके उस पर हमें चलना होगा।
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