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पाखंडी होड में बहुजन समाज की महिलायें आगे

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2026-11-02 15:57:50

बहुजन समाज के जातीय घटक अपनी अतीत की संस्कृति को त्यागकर मनुवादी संस्कृति को अधिक अपनाते हुए दिख रहे हैं। मनुवादी संस्कृति देश में हर रोज कोई न कोई षड्यंत्रकारी किस्म के पाखंडी त्यौहार खड़े करती रहती है और फिर उस पाखंड का जोर-शोर से बहुजन समाज के अंदर प्रचार-प्रसार करती है। मनुवादी संस्कृति ने भारत की सभी महिलाओं को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित किया हुआ था। जिसके कारण बहुजन समाज की महिलाओं का और भी बुरा हाल था, उनसे सवर्ण समाज के लोग अपने खेतों-खलियानों में मुफ्त में काम कराकर उनका शोषण करते थे। मनुस्मृति में भारतीय महिलाओं का जितना अपमानजनक और शर्मनाक वर्णन है, वैसा और कहीं देखने को नहीं मिलता। शर्म की बात यह है कि जब मनुस्मृति में ब्राह्मणों ने ये प्रावधान बनाए थे तब भारत में किसी भी महिला को पढ़ने और लिखने का अधिकार नहीं था। महिलाओं के पास अपने इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने और न्याय मांगने का कोई तंत्र नहीं था। मनुवादी संस्कृति के लोग महिलाओं को देवी कहकर उनका अदृश्य रूप से शोषण करते थे।

1947 में भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ और देश में संविधान सत्ता स्थापित हुई, तब भारत के सभी नागरिकों को समता, समानता और मानवतावादी अधिकार मिले। महिलाओं को बराबरी व हक दिलाने में बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की अहम भूमिका रही। चूंकि वे स्वयं भारत के संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे। उन्होंने भारत में रहने वाली सभी महिलाओं के लिए संविधान में समतामूलक अधिकारों को समाहित किया। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाते वक्त रूढ़िवादी, दकियानूसी संस्कृति के लोगों का पुरजोर विरोध किया। भारतीय महिलाओं के लिए उन्होंने समतावादी अधिकारों को संविधान में समाहित किया। बहुजन समाज के अधिकांश जातीय घटक और उनकी महिलाएं बिना असलियत और इतिहास जाने उस पाखंड में शामिल हो जाती हैं जिसके तहत उन्हें गुलाम बनाया गया है। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने महिलाओं को पुरुषों की गुलामी से आजाद कराने के लिए संविधान लिखने के तुरंत बाद ‘हिन्दू कोड बिल’ लिखकर देश की पहली लोकसभा में पेश किया। अंग्रेजों से मिली आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के समय तक भी कथित हिन्दू धर्म के लोगों ने महिला व पुरुष की शादी संबंधी व शादी के बाद के पारिवारिक संबंधों के विषय में कोई भी लिखित कानून नहीं था। समाज में उस वक्त तक केवल तथाकथित धार्मिक कथाएँ थी, जो महिलाओं के विरुद्ध थी। हिन्दुत्व की अंधी वैचारिकी वाला समाज रामचरितमानस को अपना श्रेष्ठ धार्मिक ग्रंथ मानता है। उसमें महिलाओं के लिए लिखा है ‘ढ़ोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़न के अधिकारी’ जिसका मतलब है पशु, शूद्र और नारी को सिर्फ पिटते रहने का अधिकार है।

माता सावित्रीबाई फुले और उनके पति महात्मा ज्योतिबा फुले व लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति आने के बाद से महिला व शोषित-वंचित समाज के लिए शिक्षा के द्वार खुलने आरंभ हुए। जिसके उपरांत भारत के संभ्रांत परिवारों की महिलाओं में शिक्षा का प्रचार-प्रसार पहले शुरू हुआ। संभ्रांत परिवारों की इन पढ़ी-लिखी महिलाओं ने महिला विरोधी तथाकथित धर्मग्रंथों में वर्णित अमानवीय प्रावधानों का विरोध क्यों नही किया। जिसे देखकर लगता है कि भारत की महिलाओं की मानसिकता में मनुवादी और ब्राह्मणवादी संस्कृति का बहुत गहरा प्रभाव था जिसके कारण उन्हें अपने सम्मान और अपमान में फर्क नजर नहीं आया, क्योंकि तथाकथित धार्मिक ग्रंथो में अपमानजनक शब्दों के विरुद्ध उन्होंने कभी आवाज नहीं उठाई।

अहोई करे सब कोई, करवा चौथ करे कोई-कोई: करवा चौथ और अहोई अष्टमी उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पंजाब) में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकपर्व है। अहोई अष्टमी का चरित्र वैदिक/ब्राह्मणी अनुष्ठानों से भिन्न और विशुद्ध रूप से प्रकृति-पूजक एवं लोक-परंपरा से जुड़ा रहा है। वैदिक संहिताओं, उपनिषदों या आरंभिक स्मृति ग्रंथों में अहोई अष्टमी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसमें किसी वैदिक मंत्र, यज्ञ, आहुति या संस्कृत के कर्मकांड की अनिवार्यता नहीं है। यह विशुद्ध रूप से स्थानीय स्त्रियों और लोक-समाज द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ाया गया पर्व है। भारत की मूलनिवासी या आदिवासी परंपराएं सदैव प्रकृति, जल-जंगल-जमीन और जीव-जंतुओं की उपासना पर केंद्रित रही हैं। अहोई अष्टमी की कथा का मूल तत्व भी यही है।

वहीं अगर करवा चौथ की बात करें तो इसके ऐतिहासिक कारणों में दो मुख्य पहलू नजर आते हैं। पहला, पश्चिमोत्तर भारत सदियों तक विदेशी आक्रमणों और युद्धों का मुख्य प्रवेश द्वार रहा। इस क्षेत्र के पुरुष (सैनिक और योद्धा) अक्सर लंबे सैन्य अभियानों और सीमाओं की रक्षा के लिए महीनों तक घर से दूर रहते थे। महिलाएं अपने पतियों की सुरक्षा, दीघार्यु और युद्ध से सकुशल लौटने के लिए प्रार्थना करती थीं। जिसके कारण यह दिन उनके त्याग और मानसिक संबल का प्रतीक बनकर परंपरा के रूप में विकसित हुआ। दूसरा, कार्तिक माह रबी की फसल की बुवाई का समय होता है। बुवाई के समय मिट्टी के बड़े-बड़े बर्तनों जिनमें से कुछेक को ‘करवा’ भी कहा जाता है, इन्हीं बड़े-बड़े मिट्टी के बर्तनों में गेहूं और अनाज का संचयन और भंडारण किया जाता था।

90 के दशक में जब भारत में फिल्मों और टीवी का दौर आया तो इस करवा चौथ का प्रचार-प्रसार अधिक बढ़ा जिसमें वैश्य और ब्राह्मण गठजोड़ था। इससे वैश्यों का माल बिक रहा था और ब्राह्मणों को भरपूर दान मिल रहा था। इस प्रकार जो पर्व कभी सीमित भूगोल में सैनिकों की पत्नियों या ग्रामीण समुदाय तक सीमित था, उसे बॉलीवुड के रोमांस, टीवी सीरियलों के मेलोड्रामा और कॉरपोरेट बाजार की मार्केटिंग ने मिलकर पूरे देश के शहरी समाज में एक अनिवार्य चलन बना दिया। ग्रामीण परिवेश के लोगों में आज से 40-50 साल पहले तक बुजुर्गों द्वारा कहा जाता था कि ‘अहोई करे सब कोई, करवा चौथ करे कोई-कोई’ लेकिन अब इसका उलटा हो गया है।

बहुजन समाज की महिलाओं में कथित सवर्ण समाज की महिलाओं से आयातित होकर पाखंडी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। बहुजन समाज मूल रूप से भारत का मूलनिवासी समुदाय है, जो हमेशा से वैज्ञानिक मानसिकता और तार्किक तथ्यों पर विश्वास करता आया है और आज भी वे इसी परंपरा को सर्वोपरि मानता है, वे सभी मनुवादी व पाखंडवादी व्यवस्था में विश्वास नहीं रखते। देश में पाखंड और छलावामयी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले लोग अधिक विश्वास रखते हैं। मनुवादी संघी संस्कृति के लोग देश की जनसंख्या में कम होने के कारण जनता में अपनी उपस्थित दिखाने के लिए पाखंडी प्रतिस्पर्धाओं का निर्माण करके समाज में उन्हें प्रचारित करते है। हिन्दुत्व की वैचारिकी एक गमले के पौधे की तरह है जिसे हर रोज पाखंडी ढ़ोल मजीरा बजाकर जीवित रखा जाता है यदि इस गमले के पौधे में दो-तीन दिन ढ़ोल मजीरा आदि का खाद-पानी न दिया जाये तो यह पौधा स्वत: ही मर जाएगा। आज जो बहुजन समाज की महिलाओं को ब्राह्मणवादी संस्कृति के लोग अपने पाखंड में शामिल कर रहे हैं, उनका इसके पीछे का मन्तव्य पाखंडी षडयंत्र है कि वैश्य समाज के व्यापार को जिंदा और लगातार सशक्त करते रहना है। बहुजन समाज की महिलाओं को मनुवादी संस्कृति की भेड़ चाल में नहीं फंसना चाहिए। मनुवादी संस्कृति के लोग बहुजन समाज की महिलाओं को पहले भी उपेक्षित रखते थे, और वर्तमान में भी उन्हें उपेक्षित मानते हैं। लेकिन बहुजन समाज की महिलाओं में गहराई तक व्याप्त अज्ञानता और अतर्किकता अब घुस चुकी है, जिसका फायदा हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले लोग उठा रहे हैं।

संविधान सत्ता आने के बाद मनुवादी ब्राह्मणवादियों ने अपने षड्यंत्रकारी पैतरे बदले, उन्होंने अपने हित के अनुसार बहुजन समाज के जिन पुरुष और महिलाओं को अतीत में वर्जित किया हुआ था। संविधान की आड़ लेकर उन्होंने सभी के लिए अपने सार्वजनिक स्थान खोल दिये। हालांकि कुछेक संकीर्ण विचारधारा वाले क्षेत्रों में वंचित-शोषित समाज के लोगों को आज भी प्रवेश नहीं दिया जाता है और न ही उन्हें किसी प्रकार का सम्मान दिया जाता है। इन सारे अपमानों को सहकर भी बहुजन समाज के अज्ञान व भेड़ प्रवृति के लोग मनुवादियों के धार्मिक स्थानों पर जाकर अपने आपको गौरान्वित महसूस करते हैं और अपनी गाढ़ी कमाई से उन्हें दान-दक्षिणा भी देते हैं। बहुजन समाज की महिलाओं को अतीत की इन सभी घटनाओं का आंकलन करना चाहिए और इन सभी प्रकार की मान्यताओं को त्यागना चाहिए।

आज के समाज को देखकर लगता है कि बहुजन समाज आज से 60-70 वर्ष पूर्व अधिक तार्किक और वैज्ञानिक मानसिकता का था। जिसके मुकाबले में वह आज अधिक रूढ़िवादी और हिन्दुत्ववादी वैचारिकी में घुसता नजर आ रहा है। जिसका केवल और केवल एक ही कारण है कि बहुजन समाज के व्यक्तियों की जेब में आज पहले के मुकाबले अधिक पैसा दिखाई दे रहा है। जिसके कारण उन्हें मनुवादी जाल में फँसाकर उनकी जेब के धन को ब्राह्मणों और वैश्यों की जेबों में पहुंचाया जा रहा है।

बहुजन समाज की महिलाओं को अपने दिमाग से सोचना चाहिए कि क्या किसी भी पाखंडी प्रक्रिया से किसी व्यक्ति (पति) की उम्र लंबी हो सकती है? यह एकदम झूठ और मनुवादी छलावा है, अतार्किक महिलाओं को ठगने का भी यह एक माध्यम है। किसी भी प्रकार का व्रत रखने से न किसी की उम्र बढ़ती है और न घटती है। मनुष्य की उम्र प्रकृति के नियमों के अनुसार तय है उसमें किसी भी मनुष्य का कोई भी हस्तक्षेप नहीं है।

बहुजन समाज की महिलाएं श्रमजीवी समाज का हिस्सा है, वे अधिकांशतया सभी मेहनत मजदूरी करके अपना जीवन यापन करती है। बहुजन समाज की महिलाओं के पतियों में ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग व्यापक स्तर पर उनमें नशाखोरी की लत लगाकर बहुजन समाज की महिलाओं को पहले आर्थिक रूप से कमजोर करते है, बुरी आदतों के कारण घर परिवार में हर रोज झगड़े होते हैं। इन कुरुतियों के कारण आर्थिक कमजोरी और अपराधिक मानसिकता अधिक बढ़ रही है जिसके कारण बहुजन समाज की महिलाएं पति से अधिक प्रताड़ित रहती है।

बहुजन समाज की महिलाओं को जिनके पति नशेड़ी, भंगेड़ी और उत्पीड़ित करने की मानसिकता रखते हैं उनके लिए बहुजन समाज की सुसंस्कृत और वैज्ञानिक सोच रखने वाली महिलाओं को कामना करनी चाहिए कि अगर उनका पति दुराचारी और उत्पीड़नकर्ता है, परिवार की शांति भंग करता है, परिवार के विकास में अपना कोई सकारात्मक योगदान नहीं देता तो उनका पति जितनी जल्दी इस दुनिया के चला जाये तो परिवार उतना जल्दी ही सुखी और समृद्ध बन जायेगा। देश में ऐसे हजारों जीवंत उदाहरण हैं। बहुजन समाज की महिलाओं को अपने पति को परमेशवर नहीं मानना चाहिए, अगर बहुजन समाज की कोई भी महिला इस प्रकार की ब्राह्मणी संस्कृति में विश्वास रखती है और उसका समाज में प्रचार करती है तो ऐसी महिला अपने ही परिवार के लिए नहीं बल्कि वह पूरे समाज के लिए अहितकारी और दुखदायी है।

पाखंड छोड़ो, तार्किक बनो

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02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

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