2024-11-23 11:40:43
चुनाव आयोग एक स्वतंत्र निकाय है जिसे भारत के संविधान ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया है। भारत का चुनाव आयोग लोकसभा चुनावों की मेजबानी का प्रभारी है। संविधान ने चुनाव आयोग को संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति और भारत के उपराष्ट्रपति के कार्यालय के चुनावों को निर्देशित करने, पर्यवेक्षण करने और नियंत्रित करने का अधिकार दिया है। भारत का चुनाव आयोग एक ऐसा निकाय है जो केंद्र सरकार और राज्य सरकारों दोनों के लिए समान है। चुनाव आयोग विभिन्न राज्यों में नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनावों से संबंधित कार्य नहीं करता है। इन चुनावों के लिए, भारत के संविधान द्वारा एक अलग चुनाव आयोग प्रदान किया गया है।
भारत निर्वाचन आयोग की नियुक्ति: भारत का चुनाव आयोग 1950 में स्थापित किया गया था और 1989 तक यह एक सदस्यीय निकाय था जिसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त शामिल थे। 16 अक्टूबर 1989 को मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। इस प्रकार, चुनाव आयोग पर लगातार बढ़ते दबाव को कम करने के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों को शामिल किया गया। तब से, चुनाव आयोग तीन सदस्य निकाय है। 1990 में इन दोनों पदों को समाप्त कर दिया गया। हालाँकि, 1993 में फिर से चुनाव आयोग को तीन सदस्य निकाय बना दिया गया। तीनों चुनाव आयुक्तों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही शक्ति, पारिश्रमिक और वेतन मिलता है। चुनाव आयुक्तों के बीच समय का अंतर होने की स्थिति में, आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय लेता है। चुनाव अधिकारी 6 साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, अपने पद पर बने रह सकते हैं।
चुनाव आयोग की शक्तियां: भारत का निर्वाचन आयोग एक स्थायी संवैधानिक निकाय है। संविधान ने चुनाव आयोग को देश में चुनावों के सम्पूर्ण संचालन को निर्देशित एवं नियंत्रित करने की शक्ति प्रदान की है। आयोग राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, राज्य विधायकों और संसद के चुनावों की देख-रेख करता है। इसे तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है - प्रशासनिक, सलाहकार और अर्ध-न्यायिक। चुनाव आयोग राष्ट्रपति को सलाह देता है कि क्या किसी राज्य में चुनाव कराए जाने चाहिए, जहां वर्तमान में राष्ट्रपति शासन लागू है। चुनाव आयोग की शक्तियों में महत्वपूर्ण शक्तियाँ शामिल हैं, परंतु इन्हीं तक सीमित नहीं हैं-संसद के परिसीमन आयोग अधिनियम के आधार पर पूरे देश में निर्वाचन क्षेत्र के प्रादेशिक क्षेत्रों का चयन करना। मतदाता सूची तैयार करना और उसमें संशोधन करना तथा सभी पात्र मतदाताओं को पंजीकृत करना। चुनाव की तिथि और कार्यक्रम तय करना तथा नामांकन पत्रों की जांच करना। विभिन्न राजनीतिक दलों को मान्यता देना तथा उन्हें उनके चुनाव चिन्ह आवंटित करना। चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को मान्यता देने और उन्हें चुनाव चिन्ह आवंटित करने से संबंधित सभी विवादों को समाप्त करने के लिए एक न्यायालय के रूप में कार्य करता है। चुनावी व्यवस्था से संबंधित विवादों की जांच के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करना। जो चुनावों के दौरान टीवी और रेडियो जैसे विभिन्न मीडिया प्लेटफार्मों पर सभी राजनीतिक दलों से संबंधित नीतियों का समान प्रचार कर सकें। सांसदों की अयोग्यता से संबंधित मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देना, तथा विधायकों की अयोग्यता से संबंधित मुद्दों पर राज्यपाल को सलाह देना। चुनाव आयोग बूथ कैप्चरिंग, धांधली, हिंसा आदि मामलों में चुनाव रद्द कर सकता है। यह आयोग राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, राज्य विधायकों और संसद के चुनावों की देख-रेख करता है। सामान्य और उप-चुनावों के लिए आवधिक और समय पर चुनाव कराने के लिए चुनाव समय का निर्धारण करना। मतदान केन्द्रों का स्थान तय करना, मतदाताओं को मतदान केन्द्र आवंटित करना, मतगणना केन्द्रों के लिए स्थान निर्धारित करना, मतदान केन्द्रों और मतगणना केन्द्रों में व्यवस्था करना तथा अन्य संबंधित मामले। इलेक्ट्रॉनिक फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) जारी करना और मतदाता सूची तैयार करना। परंतु वर्तमान मोदी-संघी सरकार में चुनाव आयोग ऐसा करने में हिचकता है और इस संबंध में कोई सटीक कार्रवाई नहीं करता है सिर्फ लीपापोती करता नजर आता है।
चुनाव आयोग की संरचना: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग की संरचना के प्रावधान किए गए हैं। जो निम्न प्रकार हंै- भारत के राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के प्रभारी हैं; यदि किसी अन्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की जाती है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के अध्यक्ष की भूमिका निभाता है; राष्ट्रपति आयोग की सहायता के लिए क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति भी कर सकते हैं, जैसे कि कर्नाटक चुनाव आयोग की देख-रेख के लिए मुख्य रूप से एक आयुक्त की नियुक्ति की जा सकती है।
25 नवम्बर 1949 को बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण देते वक्त भारत की जनता को चेतावनी दी थी कि ‘संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर इसे अमल में लाने वाले लोग खराब निकले तो संविधान निश्चित रूप से अच्छा साबित नहीं होगा। वहीं, अगर इसे अमल में लाने वाले लोग अच्छे निकले तो संविधान अच्छा साबित होगा’ बाबा साहेब द्वारा दी गई यह चेतावनी आज 75 साल की आजादी के बाद मोदी-संघी सरकार की कार्यशैली को देखते हुए शत-प्रतिशत खरी उतर रही है। वर्तमान मोदी-संघी सरकारों में संवैधानिक प्रावधानों को धता बताकर मनमानी हो रही है। मोदी-संघी सरकार जबसे केंद्र की सत्ता में हैं तभी से चुनाव आयोग में आयुक्तों की नियुक्तियों में मनमर्जी की चेष्टा करती आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों के लिए जब तीन सदस्य कमेटी बनाने का निर्णय दिया था तो मनुवादी मोदी-संघी सरकार ने उसे संसद द्वारा कानून बनाकर पलट दिया था। इससे साफ दिखता है कि मोदी-संघी सरकार संवैधानिक संस्थाओं पर एक छत्र कब्जा चाहती है। मोदी-संघी सरकार का अभी तक का लक्ष्य यह परिलक्षित करता है कि अपना चुनाव आयोग हो, अपने नियुक्त किये हुए चुनाव आयुक्त हो ताकि वे सभी मोदी-संघी सरकार के इशारे पर काम करें। मोदी-संघी सरकार ने ऐसा करके स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को खत्म किया है। भारत की वर्तमान परिस्थितियों में चुनाव कहीं न कहीं किसी न किसी प्रदेश में हर वर्ष हो रहे हैं। इन सभी चुनावों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को सोशल मीडिया पर देखने से लगता है कि चुनाव आयोग अब पूर्णतया मोदी-संघी चुनाव आयोग बन चुका है।
चुनाव आयोग पर खड़े होते सवाल: कुछेक महीने पहले हरियाणा प्रदेश में विधान सभा के चुनाव सम्पन्न हुए हैं। जिनके दौरान देखा जा रहा था कि बीजेपी-संघी प्रत्याशियों को जनता गाँव-शहरों में घुसने भी नही दे रही थी, उन्हें बाहर से बाहर भगाया जा रहा था और उनके साथ कई स्थानों पर मार-पीट की घटनाएँ भी देखी गई थी। इस प्रकार पूरे हरियाणा प्रदेश में मोदी-संघी भाजपा के खिलाफ पूरा माहौल था परंतु फिर भी चुनाव सम्पन्न होने के बाद जो एजिट पोल दिखाये गए, उनमें भी भाजपा परास्त होती दिखाई गई थी और हरियाणा प्रदेश में मतगणना के बाद जो चुनाव परिणाम घोषित किये गए वे भी एजिट पोल के विपरीत निकले। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मतगणना के दौरान चुनाव आयोग ने कुछ न कुछ घालमेल किया है। इसके अलावा हरियाणा के चुनाव में जातिवादी, धार्मिक वक्तव्यों व भाषणों का खुलकर प्रदर्शन हुआ। जिसे सुनकर व देखकर चुनाव आयोग मौन बना रहा। चुनाव आयोग ने ऐसे गैर जिम्मेदार प्रत्याशियों विशेषकर भाजपा संघी व नागरिकों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। आयोग का यह प्रदर्शन उसकी मानसिकता का जनता के सामने भांडाफोड़ करता है जिसके कारण जनता का चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से भरोसा उठता जा रहा है। अब जनता कहने लगी है कि जनता चाहे कुछ भी कर ले, चुनाव में तो वही जीतेगा जिसे केंद्र में बैठी मोदी-संघी सरकार चाहेगी? क्योंकि चुनाव आयोग तो पंगु बना बैठा है।
एजिट पोल पर उठते सवाल: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी ने दावा किया है कि एजिट पोल पूरी तरह से अवैध हैं और ये सब गतिविधियाँ चुनाव आयोग की नजरों के सामने चल रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पहले चरण के मतदान से लेकर अंतिम चरण के मतदान के आधे घंटे बाद तक एजिट पोल जारी करने पर प्रतिबंध है तो फिर ये एजिट पोल कैसे और क्यों आयोजित किए गये हैं?
भारत का त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र: कुरैशी जी ने भारत को एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र बताने वाली रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि शुरूआत में वे इससे नाराज थे और इसे पश्चिमी देशों की साजिश समझते थे। लेकिन अब जब उन्होंने इस रिपोर्ट का अध्ययन किया तो समझ आया कि रिपोर्ट सही है। खासकर महिलाओं की कम हिस्सेदारी और सांसदों में बढ़ते अपराधिक इतिहास की संख्या को लेकर। इसके साथ ही कुरैशी ने कहा कि हम एक दोषपूर्ण लोकतंत्र का हिस्सा है हमें इसके लिए खुद को भी दोषी मानना चाहिए?
वोट डालने से रोका: अम्बेडकर नगर की कटेहरी, मुरादाबाद की कुंदरकी, गाजियाबाद की गाजियाबाद, मिजार्पुर की मजूहा, मैनपुरी की करहल, अलीगढ़ की खैर, प्रयाग की फूलपुर, मुजफ्फर नगर की मीरापुर, समेत 9 विधान सभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्षी समाजवादी पार्टी ने सत्तारूढ भाजपा पर सपा समर्थकों, खासकर बुर्खा पहनी महिलाओं को वोट डालने से रोकने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। अखिलेश यादव ने मुजफ्फर नगर के मीरापुर विधान सभा क्षेत्र में मतदातों पर पिस्तौल तानने वाले एक पुलिस अधिकारी का पोस्ट सोशल मीडिया पर डाला जो यह दाबा करता है कि यह पोस्ट मीरापुर के ककरोली पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी का है। वीडियों में एक पुसिल अधिकारी एक हाथ में डंडा और दूसरे हाथ में पिस्तौल लिए हुए है जो मतदान के लिए निकल रही महिलाओं को गोली मारने की धमकी दे रहा है। जिसके बाद चुनाव आयोग ने हल्की-फुल्की कार्रवाई करते हुए करीब 5 पुलिस कर्मियों को निलंबित करने का आदेश देकर दिखावा मात्र किया।
मुस्लिम व दलित वोटरों को डराया-धमकाया: कुछ जगहों पर पहचान पत्र होने के बावजूद मुस्लिम व दलित मतदाताओं को मतदान करने से रोका गया। हिंदुत्व वॉच की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में मुजफ्फर नगर के ककरोली में पुलिस ने वोट देने के लिए जा रही मुस्लिम महिलाओं को गोली मारने की धमकी दी और उनके पास आवश्यक दस्तावेज होने के बावजूद भी मतदान करने के लिए जाने नहीं दिया गया और मतदान के अधिकार से वंचित किया गया। पुलिस के इस प्रकार के रवैये के कारण विरोध प्रदर्शन होने के बाद भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज और पत्थराव किया। आरोप यह भी है कि मुस्लिम मतदाताओं की पर्चियों की जांच भाजपा कार्यकत्तार्ओं के द्वारा कराई जा रही थी जिसे देखकर भी चुनाव आयोग की टीम ने कोई संज्ञान नहीं लिया।
संविधान के तहत भारत का चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है। आज चुनाव आयोग सच्चे लोकतंत्र की रीढ़ न बनकर संघी-मनुवादियों की तान पर नाच रहा है। उपरोक्त चुनाव से जुड़ी ये सभी घटनाएँ यह बताने के लिए पर्याप्त है कि वर्तमान समय में चुनाव आयोग मोदी-संघी सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। जनता का लोकतंत्र से भरोसा दिन प्रतिदिन उठता जा रहा है।
शायद भाजपा-संघी शासनकर्ता अंदर से भी यही चाहते हैं कि संविधान को किसी-न-किसी प्रकार से फेल दिखया जाये। ताकि वे अपनी संघी मानसिकता के अनुसार मनुस्मृति के अमानवीय प्रावधानों को संविधान में घुसेड़ सकें। मगर अब जनता भी उनके इन मंसूबों को भांप चुकी है और उनकी नजर हर वक्त इनके षड्यंत्रों पर रहती है।
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