2025-03-28 13:00:31
देश की व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए संविधान निर्माताओं ने उसे तीन भागों में विभाजित किया हुआ है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। न्यायपालिका को संविधान निर्माताओं ने सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों, प्रभावों से मुक्त रखने का प्रावधान देकर उसे संरक्षित किया हुआ है। संविधान निर्माताओं की मानसिकता में यही था कि न्यायपालिका जनता के साथ न्याय करने के लिए पूर्णरूप से स्वतंत्र रहे, वह किसी भी आंतरिक और बाह्य दबाव में आकर उसके न्यायिक फैसलों में प्रलक्षित न हो। लेकिन भारत की हिंदुत्ववादी सोच में ब्राह्मणी संस्कृति का संक्रमण गहराई तक समाया हुआ है। जजों की नियुक्ति का प्रावधान जो इस देश में ‘कोलिजियम सिस्टम’ के तहत है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिस्टम कोई भी हो, वह कितना भी पारदर्शी और स्पष्टता के साथ बनाया गया हो लेकिन उसके द्वारा नियुक्त किए जा रहे उच्च व उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों द्वारा दिये जा रहे फैसले कितने न्यायिक हैं? और कितने वे जनहित व देशहित में हैं? मुद्दा बहुत गंभीर है चूंकि सिस्टम को दोष रहित बनाया जा सकता है परंतु उसके चलाने वाले दोषयुक्त मानसिकता के लोग कहाँ से आयें? अगर उनकी मानसिकता में दोष है तो वह दोष अवश्य ही परिलक्षित होगा। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने संविधान सभा के आखिरी भाषण में देश की जनता को आगाह किया था कि ‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो वो अंतत: बुरा साबित होगा अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे हों।’ वर्तमान समय में देश की शासन व्यवस्था मनुवादी संघी सरकार के हाथों में हैं। संघी मानसिकता के अधिकांश लोग अपने चरित्र और संस्कारों में गहराई तक जातिवाद के जहर को समाये हुए हैं। देश की न्यायपालिका में भी लोग कहीं ओर से नहीं आ रहे हैं, न्यायधीश बनने वाले लोग भी इसी देश की संस्कृति में ही पले और बड़े हुए हैं। उनकी मानसिकता भी ब्राह्मणी संघी मानसिकता से ही निर्मित है। जो उनके न्यायिक फैसलों में यदा-कदा प्रतिबिंबित होती रहती है। आजादी के पहले कलकत्ता की प्रीवि काउंसिल बैंच ने एक केस को सुनकर व्यवस्था दी थी कि ‘ब्राह्मण समुदाय के लोगों को न्यायधीश न बनाया जाये चूंकि ये लोग न्याय और न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का पालन न करके इनके फैसले में जातिवाद और ब्राह्मणी संस्कृति परिलक्षित होती है।’ यूँ तो शत-प्रतिशत लोग किसी भी जाति या समुदाय के न तो बुरे होते हैं और न ही अच्छे होते हैं। अच्छे-बुरे की पहचान अनुपातिक सापेक्ष से की जाती है, अगर किसी समुदाय में अधिकांश लोग अच्छे हैं और उनमें न्यायिक चरित्र है तो उन्हें अच्छा और न्यायिक चरित्र वाला समुदाय ही कहा जाएगा।
हिंदुत्व की वैचारिकी से संक्रमित है भारतीय न्याय प्रणाली: भारत एक ऐसा देश है जो बहुत सारे धर्मों, जातियों, कबीलों आदि से मिलकर बना है। भारत की जनता भी उसी प्रकार से टुकड़ों में विभाजित है। पिछले करीब 10-12 वर्षों में हिंदुत्व की वैचारिकी का प्रभाव समाज में अधिक देखने को मिला है। हिंदुत्व की वैचारिकी ने भारतीय समाज को धर्म और जातीय घटकों के आधार पर बाँटकर उनमें धार्मिक नफरत के बीज बौने का काम अधिक किया है। आज पूरा भारतीय समाज जातीय घटकों के आधार पर पूर्णतया विभाजित है। समाज में धार्मिक अन्धश्रद्धा का बोलबाला है। भारतीय समाज अपनी तर्क शक्ति और बुद्धिमत्ता को खोता जा रहा है। भारतीय समाज जब विभिन्न धर्म व जातियों से मिलकर बना है तो सही व तार्किक न्यायिक व्यवस्था के लिए सभी धार्मिक व जातीय संप्रदायों का उसमें अनुपातिक हिस्सा होना चाहिए। तभी समाज में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और भरोसा देखने को मिल सकेगा। 26 मार्च 2025 के टाइम्स आॅफ इंडिया अखबार में कानून मंत्री ने एक सवाल के जवाब में संसद को बताया कि 78 प्रतिशत न्यायधीश देश के उच्च न्यायालयों में सवर्ण जाति के ही लोग हैं, जबकि अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के प्रत्येक घटक का हिस्सा 5 प्रतिशत है और अन्य पिछड़े वर्ग का हिस्सा 12 प्रतिशत है। इसका मतलब साफ है कि जिन समुदायों की जनसंख्या देश में 85 प्रतिशत है उन जातीय समुदायों का न्यायपालिका के न्यायधीशों में उनका हिस्सा 27 प्रतिशत के करीब है और जिनकी संख्या देश मे करीब 12-15 प्रतिशत है उनकी न्यायपालिका में हिस्सेदारी 73 प्रतिशत है। यह अपने आप में दूर से चमकने वाली रणनीतिक न्यायिक विसंगति है। जिसका निर्माण कोलीजियम सिस्टम से चुने गए ब्राह्मणी संस्कृति के न्यायधीशों द्वारा किया जा रहा है। लगता है जब तक यह विसंगति न्यायपालिका के सिस्टम में बनी रहेगी तब तक देश की जनता को तार्किक न्याय और न्याय शास्त्र सम्मत फैसलों की उम्मीद नहीं कर सकती।
अधिकांशत: किस समुदाय के न्यायधीश भ्रष्टाचारी? आँकड़ों को देखकर जाहिर होता है कि जिस जातीय समुदाय के लोग न्यायपालिका में अधिक है उसी जातीय समुदाय के लोग भ्रष्टाचार में भी अधिक लिप्त होंगे? अगर उच्च न्यायालयों में 73 प्रतिशत न्यायधीश सवर्ण जातीय घटकों से हैं तो यह आंकलन किया जा सकता है कि देश के न्यायपालिका में कम से कम 75 प्रतिशत न्यायधीश सवर्ण जातियों से हैं उनमें भ्रष्टाचार भी अधिक होगा। चूंकि उन्हें पता है कि देश की शासन व्यवस्था में बैठे उनके आका उनका कुछ नहीं बिगड़ने देंगे। इसलिए खुलकर बिना किसी डर के भ्रष्टाचार करो और उसी भ्रष्टाचार के धन से सत्ता में बैठे आकाओं को भी पोषित करते रहो। न्यायपालिका का भ्रष्टाचार खुल के जनता के सामने आया है। देश की जनता ने विभिन्न माध्यमों से उसे देखा है लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायधीश यशवंत वर्मा जी के सरकारी आवास से अकूत नोंटो की गड्डियाँ जली हालत में मिलने की खबर प्रकाशित और प्रसारित हुई। तभी से सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचता नजर आ रहा है। जिसे देखकर लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम में न्यायधीश वर्मा का कोई शुभचिंतक पहले से ही विद्यमान है जो उनका बचाव कर रहा है। न्यायधीश वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय में आने से पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायधीश थे और उन्हें बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। अब ऐसा संज्ञान में आया है कि न्यायधीश वर्मा के पिता भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायधीश थे और बाद में उनका बेटा भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ही न्यायधीश नियुक्त हो गया। इससे साफ जाहिर होता है कि कॉलेजियम सिस्टम में भाई-भतीजावाद अधिक है। न्यायधीश वर्मा के घर से अकूत अवैध संपत्ति पाये जाने का मामला जनता के संज्ञान में आ जाने के बाद उन्हें वापिस इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का आदेश हुआ है। जो किसी भी न्यायिक दृष्टि से जनता की नजर में न्याय संगत नहीं है। क्या इसी तरह के न्यायिक फैसले ब्राह्मणी संस्कृति की मानसिकता को प्रदर्शित नहीं करते? अवश्य ही उच्चतम न्यायालय द्वारा संगीन मामलों में लिए गए ऐसे फैसले जनता के गले से नीचे नहीं उतरते जिसके कारण जनता का न्यायपालिका में भरोसा घटता जा रहा है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की बार काउंसिल के अधिवक्ताओं ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए कह दिया है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय कूड़ेदान नहीं है और अगर उनका स्थानांतरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय से रोका नहीं गया तो हम उनकी न्यायिक बेंचों में शामिल नहीं होंगे। परंतु न जाने क्यों जस्टिस वर्मा के अपराध को घुमा-फिराकर कम करने की चेष्टा की जा रही है और उन्हें संविधान सम्मत व्यवस्था के तहत दंडित नहीं किया जा रहा है?
न्यायपालिका में सुधार कैसे हो? न्यायपालिका में सुधार के लिए सबसे पहले देश की जनगणना के मुताबिक न्यायपालिका में न्यायधीशों को स्थापित करना होगा। तभी देश की जनता में न्याय के प्रति विश्वास जागेगा। आज देश के न्यायपालिका में जितना भ्रष्टाचार जनता के सामने खुलकर आ रहा है ऐसी उम्मीद जनता ने नहीं की थी। न्यायपालिका में बैठे कुछेक न्यायधीशों की मानसिकता में ब्राह्मणी संस्कृति की मनुस्मृति आधारित दूषित परिकल्पना इस हद तक उनकी आंतरिक संरचना में समाहित हो चुकी है कि वे फैसले सुनाते समय यह भी भूल जाते हैं कि वे अब एक न्याय की कुर्सी पर हैं और उन्हें देश के कानून और न्याय शास्त्र का पालन करते हुए सभी नागरिकों के लिए न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। मगर आज ऐसा हो नहीं रहा है 26 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने पर भी कुणाल कामरा के मुंबई के ‘हैबिटेट कॉमेडी कल्ब’ शॉ के बाद तोड़फोड़ पर शिंदे ने कहा कि सामने वाले व्यक्ति को भी एक मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। अन्यथा क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। इतना ही नहीं यूपी के योगी-संघी शासन में आमतौर पर मुस्लिमों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त कर दिया जाता है। जिसकी संपत्ति को निशाना बनाकर बुलडोजर के द्वारा ध्वस्त किया जा रहा होता है वह उच्चतम न्यायलय में न्याय पाने के लिए पेश होकर न्याय माँग रहा होता है, उसे न्याय प्रक्रिया में स्टे का आॅर्डर भी मिल जाता है परंतु स्टे का ध्यान न रखकर योगी-संघी आतताही सरकार उस संपत्ति को ध्वस्त करने की कार्यवाही तुरंत कर देती है। इस तरह का त्वरित बुलडोजर न्याय मनुवादी डबल इंजन की सरकारों में अधिक देखने को मिल रहा है। इस तरह का त्वरित बुलजोड़र न्याय दलितों और मुस्लिमों के ऊपर अधिक त्वरित और प्रभावी दिखाई दे रहा है। लेकिन ऐसी घटनाओं को देखकर भी दलित और मुस्लिम समुदाय इसे समझ नहीं रहे हैं और वह आपस में एकता के लिए कोई मुहिम भी नहीं चला रहे है।
दलित-मुस्लिम समुदाय को सामाजिक और राजनीतिक एकता जरूरी: देश का दलित-मुस्लिम समुदाय एक ऐसा बहुसंख्यक समुदाय है जिनकी सम्मलित जनसंख्या 30 प्रतिशत से भी अधिक है। अगर इन समुदायों के साथ अति पिछड़ी जातियों जैसे नाई, कुम्हार, गडरिये, लौहार, कुर्मी, तेली, पटेल, केवट, मांझी इत्यादि को भी जोड़ दिया जाये क्योंकि उनके भी सभी सामाजिक हालात और उनका उत्पीड़न एक जैसा ही हैं। परंतु वे सभी क्रमिक ऊँच-नीच की हिंदुत्व की वैचारिकी के कारण अलग-थलग है। वे सभी जातीय घटक आपस में बंटकर अलग-अलग तरीके से कट भी रहे हैं और पिट भी रहे हैं। इन सभी जातीय घटकों (उत्पीड़ित समाज) को एक साथ आकर अपनी सामाजिक और राजनीतिक जड़ों को मजबूत करना चाहिए और उन्हें एक साथ आकर देश में उत्पीड़ित समाज की सत्ता को स्थापित करना चाहिए।
देश का उत्पीड़त समाज मान्यवर साहेब कांशीराम जी के प्रयासों से राजनीतिक सत्ता में आगे आये, अगर ऐसा करने में यह समाज फिर से सक्षम होता है तो उत्पीड़न कर्ता (शोषक समाज) इस देश की भौगोलिक परिधि के अंदर दिखाई नहीं देगा बल्कि वह यहाँ के दलित, मुस्लिम व अति पिछड़ी जातीय घटकों की एकता से भय खाकर उत्पीड़न भी करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। उसे अपनी सुरक्षा के लिए देश की सीमाओं से बाहर जाना पड़ेगा। इन सभी दलित, अल्पसंख्यक व पिछड़े समुदायों को मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने राजनैतिक फार्मूला दिया था कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, देश में उतनी उसकी हिस्सेदारी’ अभी तक शोषित समाज ने एकमत होकर न इसे आत्मसात किया है और न ही इस सिद्धांत के अनुसार उन्होंने अपने आपको इस राजनैतिक आचरण में ढाला है। शोषित समाज के जातीय घटकों से हमारा अनुरोध है कि अगर आपको शोषण से मुक्ति पानी है; सत्ता में शोषित समाज को स्थापित करना है तो शोषित समाज के सभी जातीय घटकों को एक साथ आकर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर और मान्यवर साहेब कांशीराम जी के रास्ते पर चलकर अपने आपको जनता के समक्ष जाकर अपनी एकजुटता को प्रदर्शित करना होगा और एक-दूसरे के दुख-दर्द में साथ खड़े होकर साथ दिखना भी होगा। तभी इस देश में शोषित समाज के अंदर एकता और उनकी स्वतंत्रता की क्रांति का आगाज हो सकेगा।
जय भीम, जय संविधान
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