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भारत में न्यायशास्त्र का इतिहास प्राचीन है, जो हजारों वर्षों के दार्शनिक, सामाजिक और कानूनी विकास का परिणाम है। भारतीय न्यायशास्त्र की यात्रा प्राचीन काल के धार्मिक और नैतिक सिद्धांतों से शुरू होकर, मध्यकाल के प्रशासनिक सुधारों और ब्रिटिश काल की ‘कॉमन लॉ’ प्रणाली से होते हुए आधुनिक भारत के संविधान (1950) तक पहुँचती है।
भारत में न्यायशास्त्र के इतिहास को चार चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
1. प्राचीन काल: प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र की जड़ें धर्म की अवधारणा में निहित हैं, जिसे पश्चिमी कानूनी दर्शन के प्राकृतिक न्यायशास्त्र के समकक्ष माना जा सकता है। वेद और धर्मशास्त्र न्याय के शुरूआती स्रोत (लगभग 1500 ईसा पूर्व) थे, जिसके बाद में धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र (जैसे मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति) अस्तित्व में आए इनमें नागरिक और आपराधिक कानूनों, विवाह, उत्तराधिकार और साक्ष्य के नियमों का विवरण मिलता है। महर्षि अक्षपाद गौतम द्वारा रचित ‘न्यायसूत्र’ ने भारतीय तर्कशास्त्र और प्रमाणशास्त्र की नींव रखी। इसमें सत्य तक पहुँचने के लिए चार प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) बताए गए, जिसने अदालती साक्ष्य प्रणाली को वैज्ञानिक आधार दिया। मौर्य काल में कौटिल्य (चाणक्य) के अर्थशास्त्र ने कानूनी सिद्धांतों को एक व्यवस्थित प्रशासनिक और व्यावहारिक रूप दिया। इसमें अपराधों की रोकथाम, जांच और दंड के कड़े प्रावधान थे। इस समय राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकारी होता था, लेकिन वह भी धर्म के अधीन था।
2. मध्यकाल: मुगल और सल्तनत काल के दौरान भारत में एक नई कानूनी व्यवस्था का आगमन हुआ। इस काल में न्यायशास्त्र शरिया (इस्लामी कानून) और फतवा (जैसे औरंगजेब के समय संकलित ‘फतवा-ए-आलमगीरी’) पर आधारित हो गया। न्याय प्रशासन के लिए काजी की नियुक्ति की गई जो मुफ़्ती की सहायता से विवादों का निपटारा करते थे। गैर-मुस्लिमों के व्यक्तिगत मामलों (जैसे विवाह और संपत्ति) में उनके पारंपरिक प्रथागत और हिंदू कानूनों को मान्यता दी जाती रही।
3. ब्रिटिश काल: ब्रिटिश शासन ने भारत के पारंपरिक न्यायशास्त्र को पूरी तरह बदल दिया और यहाँ एंग्लो-इंडियन न्यायशास्त्र तथा ‘कॉमन लॉ’ प्रणाली की नींव रखी। रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के तहत कलकत्ता में पहले सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई, और सर एलिजा इम्पे इसके पहले मुख्य न्यायाधीश बने। 1833 के चार्टर एक्ट के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग का गठन हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारतीय दंड संहिता (1860), नागरिक प्रक्रिया संहिता, और अनुबंध अधिनियम जैसे संहिताबद्ध कानून बने, जो कानूनी संप्रभुता पर आधारित थे। भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 के माध्यम से विभिन्न अदालतों को समाप्त कर एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली विकसित की गई।
4. आधुनिक काल: 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के साथ ही भारतीय न्यायशास्त्र ने एक नए युग में प्रवेश किया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून बना। जिसने ब्रिटिश संप्रभुता के स्थान पर संवैधानिक संप्रभुता स्थापित की। संविधान के भाग 3 में नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए गए और न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति मिली। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट विधायिका द्वारा बनाए गए किसी भी ऐसे कानून को रद्द कर सकता है जो संविधान के खिलाफ हो। 1980 के दशक में जस्टिस पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर के प्रयासों से जनहित याचिका की शुरूआत हुई। इसने भारतीय न्यायशास्त्र को अधिकार-केंद्रित से बदलकर न्याय-केंद्रित और गरीब-उन्मुख बनाया।
अतीत में ब्राह्मणी संस्कृति के न्यायशास्त्र की वास्तविकता
असमान दंड विधान: मनुष्यों को वर्ण विभाजन के आधार पर दंड देने की प्रक्रिया असमान थी। ब्राह्मण समुदाय के व्यक्ति को अधिकतम अपराध और न्यूनतम दंड जबकि शूद्र व वंचितों के लिए न्यूनतम अपराध और अधिकतम सजा का प्रावधान था। ब्राह्मणों के धर्मशास्त्रों में अपराध समान होने पर भी वर्ण के आधार पर दंड की मात्रा अलग थी यदि कोई शूद्र किसी उच्च वर्ण (विशेषकर ब्राह्मण) की मानहानि करता था, शारीरिक चोट पहुँचाता था या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता था, तो उसके लिए अत्यंत क्रूर शारीरिक दंड (जैसे जीभ काटना, अंग-भंग करना या मृत्युदंड) का प्रावधान था। इसके विपरीत, यदि कोई ब्राह्मण किसी शूद्र को अपशब्द कहता या प्रताड़ित करता था, तो उस पर केवल मामूली दंड लगाया जाता था। यदि कोई शूद्र उच्च वर्ण की महिला के साथ व्यभिचार या अपराध करता था, तो उसे क्रूरतम मृत्युदंड और संपत्ति जब्ती की सजा मिलती थी। वहीं, उच्च वर्ण के पुरुष द्वारा शूद्र महिला के साथ किए गए अपराधों में केवल मामूली जुर्माना या प्रायश्चित का नियम था।
न्यायाधीश का पद: मनुस्मृति के अनुसार, राजा की न्यायिक सभा में केवल वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण या अन्य द्विज (क्षत्रिय/वैश्य) ही न्यायाधीश थे। शूद्रों को न्यायपीठ पर बैठने या कानूनी साक्ष्य प्रक्रिया में उच्च वर्णों के बराबर दर्जा प्राप्त नहीं था।
सामाजिक और धार्मिक अधिकारों का निषेध: न्यायशास्त्र केवल अदालती मामलों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक अधिकारों को भी नियंत्रित करता था। शूद्रों के लिए वेदों का अध्ययन या उनका सुनना पूर्णत: प्रतिबंधित था। मनुस्मृति में यह भी कहा गया है कि शूद्र को अत्यधिक धन संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि धन पाकर वह उच्च वर्णों को पीड़ित कर सकता है। राजा को अधिकार था कि वह समाज की आर्थिक व्यवस्था को वर्ण के अनुसार बनाए रखे।
वर्तमान में भारत का न्यायशास्त्र कहाँ खड़ा है? आधुनिक भारत में प्राचीन ब्राह्मणी न्यायशास्त्र का कोई भी कानूनी या संवैधानिक अस्तित्व नहीं है। 1950 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा निर्मित भारत के संविधान के लागू होने के बाद प्राचीन असमान कानून पूरी तरह समाप्त हो गए। आज भारत का कानून जाति, वर्ण, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों को समान न्याय और समान सुरक्षा प्रदान करता है। जातिगत भेदभाव, छुआछूत और उत्पीड़न को दंडनीय अपराध घोषित करता है।
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ में लिखा था कि किसी भी व्यक्ति का सामाजिक दृष्टिकोण उसकी जातिगत पृष्ठभूमि से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। उनका तर्क था कि एक पारंपरिक रूढ़िवादी हिंदू (विशेषकर ब्राह्मण), जो जन्म-आधारित असमानता और शास्त्रों के पदानुक्रम में विश्वास रखता हो, वह शूद्रों या अछूतों के मामलों में पूरी तरह निष्पक्ष या न्यायसंगत दृष्टिकोण बनाए रखने में गंभीर वैचारिक सीमाओं से ग्रस्त हो सकता है। वहीं रामासामी पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी में न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व का कड़ा विरोध किया था और कहा था कि जब तक न्याय व्यवस्था में सभी जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक निष्पक्ष न्याय संभव नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका-में से न्यायपालिका को संविधान और मौलिक अधिकारों का अंतिम संरक्षक माना गया है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के हर वर्ग का कितना व्यापक और समावेशी प्रतिनिधित्व करती है। लंबे समय से कानूनी विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियों और संसदीय समितियों द्वारा यह गंभीर सवाल उठाया जाता रहा है कि भारतीय उच्च न्यायपालिका में एक खास सामाजिक व सांस्कृतिक वर्ग का आनुपातिक रूप से अत्यधिक प्रभाव है, जिसे आलोचक ‘ब्राह्मणी या सवर्ण संस्कृति का वर्चस्व’ बताते हैं।
प्रतिनिधित्व का अभाव: उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कमी को लेकर सरकार और संसद की रिपोर्टों में स्पष्ट आंकड़े सामने आए हैं:
संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट (कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय संबंधी स्थायी समिति) संसदीय समिति की 2023 की 133वीं रिपोर्ट के अनुसार, 2018 से 2023 के बीच उच्च न्यायालयों में नियुक्त कुल 601 न्यायाधीशों में से; लगभग 79 प्रतिशत (456 न्यायाधीश) उच्च वर्ग से थे; अन्य पिछड़ा वर्ग मात्र 11 प्रतिशत (लगभग 68 न्यायाधीश); अनुसूचित जाति 2.8 प्रतिशत (लगभग 17 न्यायाधीश); अनुसूचित जनजाति 1.5 प्रतिशत (9 न्यायाधीश), अल्पसंख्यक वर्ग 2.6 प्रतिशत (16 न्यायाधीश)।
1950 में स्थापना के बाद से उच्चतम न्यायालय में अब तक नियुक्त कुल न्यायाधीशों में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व नगण्य रहा है। 1980 तक शीर्ष अदालत में कोई भी दलित समुदाय से न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुआ था। जस्टिस के.जी. बालकृष्णन पहले दलित मुख्य न्यायाधीश बने। जब देश की आबादी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा एससी, एसटी, ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यकों से मिलकर बना है, तो उच्च न्यायिक पीठों पर 75 प्रतिशत से अधिक सर्वण समुदाय का प्रतिनिधित्व असंतुलन पैदा करता है।
कॉलेजियम और अंकल जज सिंड्रोम: उच्च न्यायपालिका में विशिष्ट वर्ग के वर्चस्व को बनाए रखने में वर्तमान नियुक्ति प्रणाली यानी कॉलेजियम प्रणाली हमेशा से संदिग्ध रही है और उस पर सवाल उठते रहे हैं। न्यायाधीशों द्वारा ही नए न्यायाधीशों का चयन किए जाने की प्रक्रिया में सामाजिक विविधता या सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों को सुनिश्चित करने का कोई अनिवार्य ढांचा मौजूद नहीं है, जिसके कारण विसंगतियाँ पैदा हो रही है। विधि आयोग की 230वीं रिपोर्ट में न्यायपालिका में ‘अंकल जज सिंड्रोम’ की चर्चा की गई थी। इसके तहत यह रेखांकित किया गया कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में बार काउंसिल से आने वाले वकीलों और जजों के बीच पारिवारिक, सांस्कृतिक और जातिगत संबंधों का प्रभाव चयन प्रक्रिया में अनौपचारिक वरीयता का रूप ले लेता है।
सांस्कृतिक और वैचारिक प्रभाव: न्यायपालिका में विविधता की कमी केवल संख्याओं का मामला नहीं है, बल्कि यह न्याय वितरण की संस्कृति और सोच को भी प्रभावित करता है। न्यायाधीश जिस सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से आते हैं, उनके मूल्य, पूर्वाग्रह और दृष्टिकोण न्यायिक फैसलों में परिलक्षित होते हैं। जातिगत हिंसा, एट्रोसिटीज एक्ट, आरक्षण और श्रम अधिकारों से जुड़े मामलों में कई बार ऐसे फैसले या टिप्पणियां सामने आई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि पीठ जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं से कटी हुई है। न्यायालय कक्षों में धार्मिक प्रतीकों, आचार-विचार और पारंपरिक अभिजात्य मान्यताओं की गहरी पैठ है, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष और समतावादी चरित्र के सापेक्ष पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम को अनौपचारिक रूप से वैध ठहराती है।
संवैधानिक दृष्टिकोण और सुधार के उपाय: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत उच्च न्यायपालिका में आरक्षण का प्रावधान नहीं है। हालांकि, न्यायपालिका को समावेशी बनाए बिना संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित ‘सामाजिक न्याय’ की अवधारणा अधूरी है। जब तक कॉलेजियम प्रणाली अस्तित्व में है, तब तक उच्चतम और उच्च न्यायालयों की नियुक्तियों में सामाजिक विविधता (एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिलाएं) को एक अनिवार्य मानदंड के रूप में शामिल करने की स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए।
न्यायपालिका एक ऐसा संस्थान है जो समाज के सामाजिक ताने-बाने को दिशा देता है। जब तक देश की शीर्ष अदालतें समाज के संपूर्ण सामाजिक स्वरूप का प्रतिबिंब नहीं बनेंगी, जब तक न्यायिक फैसलों में वंचित वर्गों का पूर्ण विश्वास और संवैधानिक लक्ष्य अधूरा रहेगा। समावेशी न्यायपालिका किसी वर्ग विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और संविधान के समतावादी दर्शन की अनिवार्यता है।





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