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जहरीली असमानता को समाप्त करने का उपाय

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2026-08-08 13:34:25

उत्तर प्रदेश के भैडापुर गाँव, डाकखाना रटौल, जिला बागपत में एक अम्बेडकरवादी समाज के जागरूक व्यक्ति ने अपने मकान में घरेलू उद्योग लगाया और वहाँ पर पेपर रील बनाने वाली मशीनें ंलगवाई। 4 अगस्त 2026 को मशीनों को स्थापित करके उसका उद्घाटन गाँव के ‘वाल्मीकि’ समाज के वरिष्ठ व्यक्ति के द्वारा कराया गया। मशीन का उद्घाटन करने के लिए फैक्टरी के मालिकों ने ‘राजी’ नाम के वाल्मीकि को चुना। ‘राजी’ का परिवार भैडापुर गाँव में अकेला परिवार है। पहले इसी गाँव में ‘वाल्मीकि समुदाय’ के 6-7 परिवार थे, लेकिन वे अब ज्यादातर शहरों की तरफ पलायन कर चुके हैं। ‘राजी’ का अकेला परिवार ही अब गाँव में रहकर दूसरे के यहाँ छोटा-मोटा काम करके अपना जीवन यापन करता है। उसके पास न जमीन है और न कमाई का कोई अन्य साधन है। उसकी सम्पूर्ण जीविका दूसरों पर ही निर्भर है। ऐसी स्थिति को देखकर पेपर रील बनाने वाली फैक्टरी के मालिक ने सोचा कि क्यों ना समाज में गहराई तक व्याप्त असमानता को उल्टी तरफ मोड़ा जाये। मशीन स्थापना के बाद पेपर रील बनाने वाली मशीन के उद्घाटन के लिए ‘राजी वाल्मीकि’ को आमंत्रित किया, और उसी के कर कमलों द्वारा मशीन को विधिवत रुप से संचालित कराया गया। ‘राजी’ यह सम्मान पाकर खुश नजर आए, उनको इस मौके पर मिठाई और उपहार भी दिया गया। जिसे पाकर उनका दिल गर्व से फूला हुआ नजर आया। यह सिर्फ एक छोटी सी शुरूआत है, चूंकि देश में जातिवाद और असमानता की जड़े हिन्दुत्व की वैचारिकी के कारण गहराई तक व्याप्त है। इसको समतल करने के उद्देश्य से फैक्टरी के स्वामी ने वाल्मीकि समाज के ‘राजी’ नाम के व्यक्ति से उद्घाटन कराया। इस मौके पर फैक्टरी में काम करने वाले कारीगर, कर्मचारी और समाज के अन्य लोग भी उपस्थित थे। उपस्थित सभी सज्जनों ने इस पहल को देखकर समाज में पाखंडी परंपरा के विपरीत एक नया व अनूठा कार्यक्रम देखा।

इस मौके पर फैक्टरी के स्वामी ने ‘राजी’ वाल्मीकि का नया नामकरण करने की घोषणा भी की। घोषणा के बाद वहाँ पर उपस्थित सभी को बताया गया कि आज से ‘राजी’ वाल्मीकि का नाम ‘राजी’ वाल्मीकि न रहकर ‘राजीव कुमार शर्मा’ होगा और समाज में सभी लोग अब इनको ‘राजीव कुमार शर्मा’ के नाम से पुकारेंगे। अभी तक हमारा समाज ऐसे मौके पर वाल्मीकियों को आमंत्रित नहीं करता, बल्कि ऐसे मौके पर वह अनपढ़, गंवार ब्राह्मणों को आमंत्रित करके उनको सम्मान देता है, और साथ में भारी नगद दक्षिणा भी देता है। इस प्रथा से समाज का आर्थिक बल और स्वाभिमान दोनों ही घटते हैं, फायदा सिर्फ ब्राह्मण पुजारी को ही होता है। यह सभी के लिए सोचने का विषय है, समाज से आग्रह है कि वे ऐसे सभी अवसरों पर ‘बाल्मीकी’ समुदाय के व्यक्तियों को आमंत्रित करके उन्हें अपने साथ में बैठायें, उन्हें स्थिति के अनुसार सम्मानित करके दक्षिणा भी दें। शायद हम समाज में वर्षों से चली आ रही असमान परिपाटी को बदलकर, एक नए युग की शुरूआत कर सकते हैं। समाज का जो अंग हाशिये पर है, ऐसा करके हम उसमें भी सम्मान के बीज अंकुरित कर सकते हैं। अभी तक यह समाज अपने आपको उपेक्षित, बहिष्कृत और निम्न ही समझता आया है। इनमें उत्कृष्टता की भावना के बीज जगाने का काम देश की जागरूक जनता को ही करना चाहिए।

यहाँ पर लिखने का उद्देश्य समाज के किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर ऊंचा या नीचा दिखाने नहीं है, बल्कि समाज में एक समतामूलक सोच के बीज रोपित करना है ताकि वह बीज समाज में उगकर अपना प्रभाव फैलाकर समाज की सोच को छाया दे सके, और उसकी छाया में बैठकर समाज समता मूलकता के लिए प्रेरित हो सके। जागरूक लोगों से अनुरोध है कि वे हाशिये पर पड़े व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के ऐसे प्रयास करें। इस कार्य से हमारा उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं है, किसी को ऊंच-नीचा भी दिखाना नहीं है, हमारा उद्देश्य है कि भारतीय समाज में जाति के आधार पर न कोई ऊंचा समझा जाये और न कोई नीचा समझा जाये। सभी को एक समान समझा जाये तभी समाज में एकता का भाव अंकुरित होगा। एकता और अखंडता का भाव मजबूत होकर ही देश सुरक्षित होगा।

वाल्मीकि व अन्य अछूतों की संभावित ऐतिहासिक पहचान: समाज के जागरूक लोगों को बताना चाहते हैं कि देश का अछूत वर्ग वाल्मीकियों सहित भारत का वास्तविक मूल निवासी है और अतीत में ये ही समुदाय भारत का शासक हुआ करता था। लेकिन यूरेशिया और मध्य एशिया से भीख मांगते हुए आए कथित आर्य ब्राह्मणों ने मूलनिवासियों की इस पवित्र भूमि पर छल-कपट, झूठ और नौटंकियाँ करके उनका जल, जंगल जमीन हड़प लिया। उन्हें अपने पाखंडी छलावों में फंसाया, उनकी आंतरिक संरचना में कृत्रिम भगवानों, देवी-देवताओं को उनके मस्तिष्क में स्थापित किया। हजारों वर्षों तक विदेशी धरती से आए कथित द्विजों ने अपनी पाखंडी नौटंकी के द्वारा यहाँ के मूलनिवासियों के मस्तिष्क में मजबूती से समाहित कर दिया। यहाँ के अधिकांश मूलनिवासी उनकी षड्यंत्रकारी चालों में फंस गए और षड्यंत्र के तहत विदेशी धरती से आए कथित ब्राह्मणों को बिना किसी संघर्ष के अपनी शासन सत्ता सौंप दी। यहाँ के ये मूलनिवासी अपनी प्रवृति के अनुसार सीधे सादे थे उनकी आंतरिक संरचना में न कोई षड्यंत्र था और न कोई छल-कपट। उन्हें सिर्फ उतनी ही समझ थी कि ये विदेशी धरती से आए परदेशी है, हमसे अपनी जीविका के लिए आश्रय मांग रहे हैं। यहाँ के मूलनिवासी मानवतावादी थे, उन्होंने यूरेशीय और मध्य एशिया से आए कथित आर्य ब्राह्मणों को जीविका के लिए आश्रय दे दिया था।

विदेशी धरती से आए कुटिल द्विजों का षड्यंत्र: द्विजों ने मौके को पाकर षड्यंत्रकारी तरीके से सोचा की हम संख्याबल में कम है। इसलिए यहाँ के मूलनिवासियों पर मानवता के रास्ते से कब्जा नहीं किया जा सकता, इसलिए यहाँ के मूलनिवासियों को हमें छोटे-छोटे सामाजिक टुकड़ों में विभक्त करना होगा। कथित आर्य ब्राह्मणों ने यहाँ पर समृद्धशाली मूलनिवासियों को चार वर्णों में विभक्त किया और उसके बाद उन्होंने पाया कि समाज के इस प्रकार के वर्गीकरण से कथित ब्राह्मण संस्कृति का वर्चस्व स्थापित नहीं किया जा सकता। तब उन्होंने समाज को छोटे-छोटे हजारों टुकड़ों में विभक्त किया। इस प्रकार से विभक्त किए गए सामाजिक टुकड़ों को उनके व्यवसाय से जोड़कर ‘जाति’ का नाम दिया। इस प्रकार देश की सामाजिक व्यवस्था 6743 जातीय टुकड़ों में विभक्त हो गई। इन सभी जातीय टुकड़ों में क्रमिक ऊंच नीच की व्यवस्था कायम की गई। ताकि एक जातीय समूह का व्यक्ति क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था के तहत या तो दूसरे घटक से ऊंच होगा या नीचा होगा। ब्राह्मणी संस्कृति ने इस तरह की व्यवस्था से ऊंचा या नीचा स्थापित करके यहाँ के मूलनिवासियों की एकता की शक्ति को टुकड़ों में बांटकर तोड़ दिया। उसी का परिणाम आज पूरा देश देख रहा है कि देश की सामाजिक व्यवस्था जातियों में विभक्त है। सभी जातीय घटक अपने आपको एक दूसरे से भिन्न मानते हैं, उनमें एकता का भाव नहीं हैं। सामाजिक विभक्तिकरण के कारण ही भारत 755 वर्षों तक विदेशियों का गुलाम रहा। इतने वर्षों तक गुलाम रहने के बाद भी देश की जनता ने कोई सबक नहीं लिया।

गुलामी का कारण: विदेश से आए कथित ब्राह्मणों ने यहाँ के मूल निवासियों से आश्रय पाने के बाद उनपर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए सबसे पहले यहाँ के मूलनिवासी शासकों को गुलाम बनाकर घृणित किस्म के सामाजिक कार्य सौंपे। इस रणनीति के पीछे विदेश से आए आर्य ब्राह्मणों का उद्देश्य था कि जिन कार्यों को समाज घृणा के कार्य समझता है, यहाँ से गुलाम बनाए गए शासक वर्ग को वे ही काम दिये जाये, ताकि समय अंतराल में भारत के सभी वास्तविक निवासी कथित ब्राह्मणों के जाल में फंस जाये। इस रणनीति के पीछे उनका उद्देश्य था कि अधिक से अधिक संख्या में ब्राह्मणों द्वारा अछूत बनाए गए मूलनिवासी समय अंतराल में उनसे घृणा करने लगे। साक्ष्य के तौर पर कह सकते हैं कि जब कोई शासक दूसरे स्थान पर जाकर अपना वर्चस्व स्थापित करता है तो वह सबसे पहले वहाँ के शासक वर्ग को गुलाम बनाकर घृणित काम देता है, ताकि उसमें समय अंतराल के बाद शासक होने का स्वाभिमान खत्म हो जाये और वे आपस में ही एक दूसरे से घृणा करने लगे।

मूलनिवासियों को शिक्षा से वंचित किया: विदेश से आए आर्य ब्राह्मण जानते थे और आज भी जानते हैं कि उनकी जनसंख्या का प्रतिशत देश में तीन प्रतिशत है जो किसी भी प्रकार से यहाँ की मूल निवासियों की संख्या पर भारी नहीं पड़ सकता। इसलिए इन सभी को टुकड़ों में बांटकर क्रमिक ऊंच-नीच की श्रेणी में रखकर अलग-अलग रखा जाये तभी ये शक्ति विहीन रहेंगे, इसलिए इन्हें शिक्षा पाने के अधिकार से प्रतिबंधित किया जाये। ताकि यह पूरा समाज समय अंतराल के बाद हमारे द्वारा परोसे जा रहे अंधविश्वासों और परपंचों में फँसकर गुलाम बनने के लिए अपने आप मजबूर हो सके। इस प्रकार से कथित आर्य ब्राह्मणों ने यहाँ के मूलनिवासियों की प्रतिभाशाली शिक्षा पद्यति और गौरव को ध्वस्त किया।

वर्तमान सत्ता में ब्राह्मणवाद का उदय: पिछले 12 वर्षों से मनुवादी संघी सरकार है, यहाँ के शूद्र समाज-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग- नाई, कुम्हार, तेली, तमोली, बढ़ई, मल्लाह, कुर्मी, गड़रिये आदि में एकता के अभाव के कारण ब्राह्मणवाद का वर्चस्व लोकतांत्रिक सत्ता में देखने को मिल रहा है। जबकि इस प्रकार का ब्राह्मणवादी वर्चस्व लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। तीन प्रतिशत की आबादी वाला ब्राह्मण संस्कृति का समाज देश की लोकतांत्रिक सत्ता में कैसे काबिज हो सकता है? इसलिए देश के शूद्र जातीय घटकों से अनुरोध है कि वे अपने संख्याबल को समझें और अपने ही समूह के भाइयों से घृणा और निम्नता का भाव न रखें, सभी को एक होकर सत्ता पर काबिज होने का सपना देखना होगा। बहुजन समाज के सभी जातीय घटक अलग-अलग रहकर ब्राह्मणवादी क्रमिक ऊंच-नीच के गणित में फँसकर देश की शासन सत्ता पर स्थापित नहीं हो सकते। बहुजन समाज के कुछेक सामंतवादी मानसिकता के घटक बहुजन एकता के लिए सबसे बडेÞ खतरें हैं। जिनमें मुख्य है ं-जाट, गुर्जर, अहीर आदि ये अपना वर्चस्व बनाए रखने की नियत से समाज को एकता के सूत्र में बंधने नहीं देते, जिसका ताजा उदाहरण अखिलेश यादव हंै।

वाल्मीकि समुदाय से कराइए धार्मिक अनुष्ठान: समाज में होने वाले जितने भी धार्मिक अनुष्ठान हैं वे सभी वाल्मीकि व उपेक्षित समुदाय के पुजारियों से कराने चाहिए जिससे समता, भाईचारा आपस में मजबूत हो सके और देश में एकता, अखंडता की नींव को कोई आताताही शासनकर्ता हिला न सके। इसलिए आपसी भाईचारे और देश की स्थिति को मजबूत करने के लिए जाति-पाति के बंधन से बाहर आकर ही यह संभव हो सकता है।

जय भीम, जय संविधान

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05