




2026-01-31 14:05:12
भारत एक प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाला देश है, जिसे अक्सर ब्राह्मणवादी संस्कृति के समर्थकों द्वारा रेखांकित किया जाता है। वस्तुत: इसी संस्कृति ने देश में जातियों और जातिवादी सोच को जन्म दिया। जातियों के भीतर भी क्रमिक ऊंच-नीच की एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई, जिसके अनुसार एक जाति दूसरी जाति से या तो ऊंची है या नीची। यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था देश में गहरी असमानता को जन्म देती है। इसी असमानता के कारण सामाजिक धरातल का विघटन होता है और यही जातीय आधारित विभाजन इतिहास में देश को लंबे समय तक गुलाम रखने में सहायक रहा है। सरल शब्दों में कहें तो, देश में आज जितनी भी विघटनकारी शक्तियाँ सक्रिय हैं, वे इसी ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था की उपज हैं। ऐसी सामाजिक व्यवस्था को देखकर बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में चेतावनी भरे स्वर में कहा था: ‘‘26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी।’’ अपने भाषण में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर शायद नए गणतांत्रिक राज्य और पुरानी सभ्यता के बीच के अंतर्विरोधों की ओर संकेत कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र भारतीय भूमि पर केवल एक ‘ऊपरी पोशाक’ जैसा है, जबकि यहाँ की मूल संस्कृति अनिवार्य तौर पर अलोकतांत्रिक है। उनके अनुसार, यहाँ के गाँव ‘स्थानीयता के गंदे नाले, अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता के गढ़’ हैं। भारत जैसे गरीब और गैर-बराबरी वाले देश में संविधान के जरिए छुआछूत खत्म करना, वंचितों के लिए सकारात्मक कदम उठाना, महिलाओं सहित सभी वयस्कों को मतदान का अधिकार देना और सबके लिए समान अधिकार तय करना एक युगांतकारी उपलब्धि थी। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ब्राह्मणवाद से हमारा तात्पर्य किसी विशेष जाति से नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता से है जो जाति आधारित भेदभाव, ऊंच-नीच, शोषण और छुआछूत जैसी सामाजिक बीमारियों का समर्थन करती है। ऐसी मानसिकता केवल सवर्णों में ही नहीं, बल्कि पिछड़ी (शूद्र) और अछूत कही जाने वाली जातियों के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती है, जो अपने ही वर्ग की अन्य जातियों के प्रति भेदभाव रखते हैं। वे भी ब्राह्मणवाद की ही श्रेणी में आते हैं।
देश में संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और लागू होने के बाद बाबा साहेब द्वारा उपरोक्त विरोधाभासों को दूर करने की जिम्मेदारी देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर थी, तो अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या सरकार के इन तीनों अंगों ने अपनी-अपनी भूमिका पूरी सत्यता, निष्ठा व पूर्ण ईमानदारी और समर्पण के साथ निभायी? साधारण, गंभीर तथा निर्णायक आंकलन करने पर यह स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है कि सरकार के उक्त लिखित तीनों अंगों ने अपनी-अपनी भूमिका ईमानदारी और निष्पक्षता से नहीं निभाई। देश के कुछेक जातिवादी मानसिकता वाले राजनैतिक व विभाजनकारी तत्वों (संघी) ने तो देश की इस अलोकतंत्रिक जमीन पर घी डालकर आग लगाने का काम किया। जिसके फलस्वरूप गैर बराबरी वाली व्यवस्था के कारण शूद्रों में आने वाली पिछड़ी व दलित जातीय घटकों के लोगों ने अपने हक व अधिकारों के लिए कई बार आंदोलन भी किये। लेकिन तत्कालीन सरकारों ने उन आंदोलनों को शांत करने के उद्देश्य से पिछड़े वर्ग के लिए कमीशन का गठन करके ऊपरी तौर पर पोशाक पहनाकर उन्हें शांत करने का काम किया, कोई स्थायी समाधान देने का काम नहीं किया। इस संदर्भ में सरकार के तीनों अंगों की क्रमश: भूमिका का संक्षिप्त उल्लेख-
विधायिका ने क्या अपना कर्तव्य निभाया? हालात को देखकर स्पष्ट तौर पर देश की जनता को नजर आता है कि विधायिका में जो जनप्रतिनिधि चुनकर संसद में जनता द्वारा भेजे गए वे अधिकाशत: ब्राह्मणवादी व संघी मानसिकता से संक्रमित थे। जिसके कारण देशभर में व्याप्त सामाजिक गैर बराबरी और जाति व्यवस्था के विरुद्ध कोई भी उपयुक्त कठोर कानून नहीं बनाया गया। जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि देश की विधायिका ने अपनी जिम्मेदारी पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से नहीं निभाई। जिसका मूल कारण था उनकी मानसिकता में गहराई तक व्याप्त ब्राह्मणवादी और संघी तत्वों का अंतर्निहित होना, यही कारण है कि संविधान को लागू हुए 75 वर्षों के बाद भी देश में गैर बराबरी और जातिवाद की जड़े कमजोर होने के बजाय और मजबूत होती हुई दिखाई दे रही है। डॉ. अमर्त्य सेन के अनुसार ‘जब समाज के कुछ वर्गों को शिक्षा से वंचित रखा जाता है तब समाज में असमानता बनी रहती है।’ जिसका निराकरण विधायिका के द्वारा किया जा सकता है। लेकिन देश की विधायिका संविधान लागू होने के बाद अपने इस कर्तव्य को निभाने में पूर्णतया असफल रही है।
क्या जनता ने सही प्रतिनिधियों को चुना? लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही अपने प्रतिनिधि चुनकर विधायिका में भेजती है और जनता द्वारा चुने गए इन प्रतिनिधियों से जनता की उम्मीद होती है कि हमारे (जनता) द्वारा चुनकर भेजे गए प्रतिनिधि, हमारे हक-अधिकारों को लेकर विधायिका में सवाल उठायंगे और विधायिका के द्वारा हमारे हक-अधिकारों के लिए कानून और संविधान सम्मत अधिकारों का निर्माण कराएंगे तथा विधायिका द्वारा बनाए गए हमारे हक-अधिकारों से संबन्धित कानूनों को कार्यपालिका द्वारा पूर्णतया लागू करा पाएंगे? इस संबंध में हमें मान्यवर साहेब कांशीराम जी का कथन याद आता है कि ‘समाज के नेता तब बिकते है, जब पहले उनका समाज बिक जाता है।’ आज की सामाजिक स्थिति ऐसी ही हो चली है कि समाज अपने जनप्रतिनिधियों का सही चुनाव न करके मुफ्त की रेबड़ियों के लालच में अपना वोट मनुवादी संस्कृति के लोगों को बेच रहे हैं। जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जब आपको (जनता) इनती समझ नहीं है कि आपके वोट से आपके भविष्य और समृद्धि का निर्माण होता है तो फिर आप अपने द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों से अपने भले के लिए कानूनों के निर्माण की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? इससे साफ तात्पर्य है कि अगर आप अपने लिए सही कानूनों का निर्माण करना चाहते हैं तो आपको अपने वोट के माध्यम से सही जनप्रतिनिधियों को भी चुनना होगा, सही प्रतिनिधि से तात्पर्य है जो व्यक्ति समाज के दुख दर्द से गहराई से जुड़ा हो, आपकी समस्याओं को समझता हो और उसके मस्तिष्क में आपकी समस्या के निराकरण के लिए भी समाधान मौजूद हो।
संविधान की रक्षक है न्यायपालिका: संविधान प्रावधानों को पूर्णतया जनहित में लागू कराना कार्यपालिका और न्यायपालिका का कर्तव्य होता है। अगर जनहित संबन्धित कानूनों को लागू कराने में कोई विवाद या कठिनाई पैदा होती है तो देश का उच्चतम व उच्च न्यायालय इस संबंध में संबन्धित सरकारों को आवश्यक दिशा-निर्देश देकर उसे सामाजिक धरातल या राष्ट्रीय पटल पर उतरवाकर लागू करा सकते हैं। लेकिन देश में ऐसे बहुत सारे मामले उच्चतम व उच्च न्यायालय के सामने आए जिनमें पिछड़ी व दलित जातियों के ऊपर उत्पीड़न को लेकर सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों को ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों द्वारा चुनौती दी गई। संबंधित संवैधानिक न्यायालयों ने केवल ऐसे मामलों को लेकर ऊपरी तौर पर ही दिखावटी उपचार किया। जिसके कारण बीमारी की जड़े दूर होने के बजाय गंभीर रूप से संक्रमित होकर आगे बढ़कर भयंकर रूप धारण करती रही। यूजीसी के नए नियमों को लेकर आज न्यायपालिका के सामने जो स्थिति बनी है यह उसी का परिणाम है अगर न्यायपालिका ने रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी जैसे अन्य केसों को लेकर सही दिशा निदेर्शों के तहत कठोर कानून बनाकर उसे ईमानदारी के साथ धरातल पर उतरवाया होता तो जो लोग आज यूजीसी द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस का विरोध कर रहे हैं वह नहीं हो पाता। न्यायपालिका के ढीले व अस्पष्ट रवैये के कारण समाज में व्याप्त गैर बराबरी समर्थक तत्वों (संघी-मनुवादी) के द्वारा विरोध प्रदर्शन सामने नहीं आते। जिन्हें देखकर अब न्यायपालिका और सरकार अपने कदम पीछे खिचकर प्रताड़ित जनता को न्याय दिलाने में हिचक रही है।
क्या ये मोदी सरकार की राजनीतिक चाल है? सरकार और न्यायपालिका का यूजीसी नियमों को लेकर पीछे हटना सरकार की एक राजनीतिक चाल भी हो सकती है! चूंकि आने वाले साल में कई राज्यों में निकाय व विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। न्यायपालिका का यूजीसी द्वारा जारी किये गए नियमों पर रोक लगाना न्यायपालिका और सरकार के बीच एक अदृश्य समझौता भी हो सकता है! चूंकि आज की सरकार में खुला ब्राह्मणवाद और संघवाद गहराई तक व्याप्त है। देश की न्याय व्यवस्था में आज ऐसे न्यायाधीशों को खुलेतौर पर स्थापित किया जा रहा है, जो खुलेतौर पर ब्राह्मणवाद और संघियों का समर्थन करते दिखते हैं। ताजा उदाहरण बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के प्रावधानों को लेकर विरोध दर्शाते हुए इस्तीफा दिया और अपनी जैसी मानसिकता वाले अन्य ब्राह्मणवादी तत्वों को भी उकसाने का काम किया। अग्निहोत्री अकेले न्यायपालिका के सदस्य नहीं है, आज देश की न्यायपालिका में हजारों की संख्या में ब्राह्मणवादी संघी मानसिकता के अलंकार अग्निहोत्री बैठे हुए हैं। जो देश की जनता को न्यायशास्त्र और संविधान सम्मत फैसले नहीं देते बल्कि ब्राह्मणवाद और संघी मानसिकता की जड़े इस देश में मजबूत कर रहे हैं। समाज के जिन समुदायों पर मनुवादी न्यायाधीशों के फैसलों का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है उन्हें भी अपने विरोध में संविधान के दायरे में रहकर संबन्धित सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन करने चाहिए।
कार्यपालिका का दायित्व: संविधान को उसके सही रूप में सामाजिक धरातल पर उतारकर जनहित में लागू करना कार्यपालिका की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। साथ ही उसकी यह भी जिम्मेदारी है कि जो लोग संविधान सम्मत कानूनों व प्रावधानों का विरोध करें उनका जनहित में समाधान और निवारण कैसे किया जाए? हम यहाँ पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. के.आर. नारायण जी का उल्लेख करना चाहते हैं, जब उन्होंने शिव सेना के संस्थापक और संचालक बाल केशव ठाकरे को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया था। चूंकि बाल ठाकरे द्वारा दिये गए वक्तव्य संविधान विरोधी थे, देश में संप्रदायवाद और विभाजन को बढ़ावा देने वाले थे, इसलिए उन्होंने ऐसा कठोर कदम उठाया था। वर्तमान समय में देश की महामहिम श्रीमति द्रौपदी मुर्मू जी हर रोज अपनी सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मोदी और सरकार में बैठे मंत्री व विधायक आमतौर पर विभाजनकारी तत्वों के बयानों पर कोई संज्ञान नहीं ले रही हैं। वर्तमान महामहिम श्रीमति द्रौपदी मुर्मू जी भी मंदिर संस्कृति को बढ़ावा देती प्रतीत हो रही हैं, जो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की महामहिम से ऐसी उम्मीद करना लोकतंत्र की भावना के विपरीत नजर आता है। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविद जी भी देश के मंदिरों में घूम-घूमकर मंदिर के पुजारियों द्वारा अपना अपमान करा रहे थे और देश की लोकतांत्रिक भावना को कमजोर कर रहे थे। क्या देश की लोकतंत्रिक जनता को अपने ऐसे महामहिमों की प्रशंसा करके उनको महामहिम जैसा आदर सम्मान देना चाहिए? जनता यह स्वयं तय करे।
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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