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अंधा बांटे रेवड़ी, अपनेअपने को दे

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2026-03-21 15:50:16

उपरोक्त कहावत भारतीय समाज में पुरातन समय से प्रचलित है जिसका अर्थ है कि अगर अंधा व्यक्ति भी कुछ किसी को बांटता है या देता है तो वह भी पहले अपने ही समुदाय या जान पहचान के व्यक्ति को देता है। देश में ‘भारत रत्न’ का पुरस्कार 1954 से दिया जा रहा है और 2025 तक यह पुरस्कार करीब 50 लोगों को दिया जा चुका है। भारत एक जाति प्रधान देश है, यहाँ के लोगों की मानसिकता में जातिवाद गहराई तक समाहित है। भारत में ब्राह्मण जाति की संख्या करीब 3 प्रतिशत के आसपास है, भारत जब स्वतंत्र हुआ तो सत्ता की बागडोर ब्राह्मणों के हाथों में आई। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी बने, जो जाति के आधार पर कश्मीरी ब्राह्मण थे। उनके मंत्रिमंडल में ब्राह्मण जाति के व्यक्तियों का वर्चस्व था। हालांकि ब्राह्मणों की देश में जनसंख्या उस समय भी 3 प्रतिशत थी और आज भी 3 प्रतिशत के आसपास है।

समाज में उत्कृष्ट कार्य कर रहे व्यक्तियों को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का सरकार ने 1954 में फैसला किया और 2025 तक करीब 50 लोगों को भारत रत्न सम्मान से पुरस्कृत भी किया गया। भारत रत्न पुरस्कार प्रदान करने के लिए विशेष योग्यता का प्रावधान नहीं है। यह किसी भी व्यक्ति को उसके योगदान व सेवाओं के आधार पर सरकार द्वारा प्रदान किया जा सकता है। भारत रत्न पुरस्कारों की गणना करने पर पता चलता है कि 2025 तक करीब 49-50 व्यक्तियों को भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शुरूआत में यह पुरस्कार केवल कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक क्षेत्र में ‘असाधारण उपलब्धि’ के लिए दिया जाता था। परंतु 2011 में सरकार ने इसमें कुछ बदलाव करके विस्तार किया। अब यह सम्मान ‘मानवीय प्रयास के लिए किसी भी क्षेत्र’ में उच्चतम स्तर की सेवा या प्रदर्शन के लिए दिया जा सकता है। इसका मतलब है कि खेल या अन्य क्षेत्रों के लोग भी अब इसके पात्र हो सकते हैं।

इस सम्मान के लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं है, इसके लिए सिफारिशे प्रधानमंत्री द्वारा सीधे राष्ट्रपति को भेजी जाती है। पुरस्कार प्रदान करने के लिए कोई विशेष समिति भी नहीं होती ताकि पुरस्कार के लिए नामित या सिफारिश किए गए व्यक्ति का सही तरीके से मूल्यांकन किया जा सके। पुरस्कार पाने वालों की संख्या भी निश्चित नहीं है। इसे देखकर लगता है कि पुरस्कार के लिए प्रधानमंत्री की मानसिकता के आधार पर नाम राष्ट्रपति को भेजे जाते हैं और राष्ट्रपति महोदय औपचारिकता स्वरूप उसपर हस्ताक्षर कर देते हैं। भारत जाति प्रधान देश है, अगर प्रधानमंत्री जातिवादी मानसिकता का है तो वह अपनी मानसिकता के अनुसार ही नाम राजनीतिक गुणा-भाग के आधार पर समय की स्थिति को आँकते हुए अपनी सिफारिश के साथ नाम राष्ट्रपति को भेज देते हैं।

आमतौर पर यह सम्मान भारतीय नागरिकों को दिया जाता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। यह गैर भारतीयों जैसे नेल्सन मंडेला और खान अब्दुल गफ्फार खान को भी दिया जा चुका है। शुरूआत में यह सम्मान मरणोपरांत नहीं दिया जाता था, लेकिन 1955 में इस प्रावधान को बदला गया और अब इसे मरणोपरांत भी दिया जाने लगा है। यह पुरस्कार एक सम्मान मात्र है, यह कोई पदवी नहीं है और जिसे भी यह सम्मान दिया जाता है वह व्यक्ति भी इसे पदवी के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18(1) के अनुसार भारत रत्न प्राप्तकर्त्ता अपने नाम के आगे या पीछे पदवी के रूप में इसे इस्तेमाल नहीं कर सकता। इस सम्मान में व्यक्ति को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षित एक प्रमाण पत्र और एक पदक (पीपल के पत्ते के आकार का) दिया जाता है। इसमें कोई नगद राशि नहीं दी जाती। प्राप्तकर्त्ता को ‘वरीयता सूची’ में सातवाँ स्थान मिलता है।

हम पहले ही लिख चुके हैं कि भारत एक जाति प्रधान देश है जहां पर मनुष्य की जाति देखकर ही उसकी योग्यता, स्थान, सम्मान, आदि तय किए जाते हैं। भारत रत्न जैसे सम्मानित पुरस्कार पाने वालों की जातीयता का विश्लेषण करने से पता चलता है कि पुरस्कार पाने वालों में 50 प्रतिशत से अधिक संख्या ब्राह्मण समुदाय से आने वाले व्यक्तियों की है। दूसरे नंबर पर कायस्थ है, जिनकी जनसंख्या देश में करीब 2 प्रतिशत आँकी जाती है, लेकिन कायस्थ समुदाय से भारत रत्न पाने वाले 7 व्यक्ति है, जो करीब 14 प्रतिशत बनते हैं। यह दर्शाता है कि कायस्थ हमेशा शासन सत्ता के करीब रहे हैं चाहे राज अंग्रेजों का था या मुस्लिमों का। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिमों व अन्य समुदायों का योगदान कमत्तर नहीं रहा है, विशेषकर ब्राह्मणों से, लेकिन 70 वर्षों से अधिक समय बीतने पर केवल 5 मुस्लिमों को भारत रत्न के सम्मान से नवाजा गया है जो उनकी जनसंख्या का करीब 2.5 प्रतिशत ही बनता है जबकि देश में मुस्लिम समुदाय की औसत जनसंख्या 17 प्रतिशत के आसपास है।

भारत में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या करीब 25 प्रतिशत है लेकिन इस समुदाय से अनुसूचित जाति के केवल एक व्यक्ति डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को ही सम्मान दिया गया, वह भी वर्षों तक अनुसूचित जातीय घटकों की लगातार मांगों के बावजूद। कांग्रेसी सरकारों ने उनकी मांगों को अनदेखा किया। 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार आने पर उन्हें भारत रत्न से पुरस्कृत किया गया। इस सबके पीछे ब्राह्मणवादी षड्यंत्रकारी मानसिकता का खेल था। ब्राह्मणवाद और अम्बेडकरवाद भारत में एक-दूसरे के विरोधी है। ब्राह्मणवाद देश में विषमता, जातिवाद और मनुस्मृति आधारित शासन का समर्थन करता है, अम्बेडकरवाद इस देश में समता, समानता, न्याय, बंधुत्व और भाईचारे की बात करता है। वास्तविक आंकलन करने पर देखा जाये कि भारत का सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? तो तार्किक तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष मिलेगा कि ब्राह्मणवाद ही इस देश में मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है, जो निरंतरता के साथ देश को कमजोर कर रहा है चूंकि देश हजारों जातियों, पंथों व समुदाय में बंटा हुआ है। देश की जनता को विभिन्न धड़ो में बांटने के लिए ब्राह्मणवादी मानसिकता जिम्मेदार है। जिसके फलस्वरूप यह देश हजारों वर्षों तक विदेशियों का गुलाम रहा और सैकड़ों बार विदेशी आक्रांताओं ने इसे लूटा। लेकिन फिर भी ब्राह्मणवादी मानसिकता के षड्यंत्रकारी लोग, लोगों को आपस में बांटकर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने के लिए वोट मांगते हैं और बेशर्मी के साथ सत्ता में विराजमान हो जाते हैं।

आजादी के बाद से देश में अभी तक 15 प्रधानमंत्री बने है जिसमें से 6 व्यक्ति ब्राह्मण समुदाय से रहे हैं जो देश की कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत से अधिक बनता है जबकि ब्राह्मणों की जनसंख्या देश में 3 प्रतिशत है। बहुजन समाज के महानायक मान्यवर साहेब कांसीराम जी का राजनीति के क्षेत्र में योगदान बहुत ही विशिष्ट, जनता उन्मुखी और लोकतंत्र को मजबूत बनाने का रहा है उनका चर्चित नारा था ‘जिसकी संख्या जितनी भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’ यह सिद्धांत लोकतंत्र को मजबूत व टिकाऊ बनाने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। देश की जनसंख्या कई हजार जातियों में विघटित है। जिसके कारण सामाजिक व्यवस्था में पारस्परिक एकीकरण नहीं हो पा रहा है। देश का हर जातीय घटक अपने आपको एक अलग स्वतंत्र इकाई के रूप में समझता है। दूसरे समुदायों के साथ कोई तालमेल या भाईचारा नहीं रखता है। इसी सामाजिक व्यवस्था के कारण और देश की मनुवादी संघी मानसिकता के कारण समाज में विघटन बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप देश विश्वभर के सभी मानवीय पायदान पर निम्नतम स्तर पर है।

विश्वभर के अन्य देशों की आर्थिक व सामाजिक समृद्धि को देखकर देश की जागरूक जनता शर्मसार होती है कि हमारा देश ऐसी स्थिति में क्यों है? सटीक आंकलन करने पर लगता है कि देश में ब्राह्मणवाद हावी है जो मुख्य रूप से मनुष्यों के बीच जातीय आधार पर भेदभाव अपनाकर बंटवारा कर रहा है और उन्हें आपस में मिलने और संपन्नता हासिल करने की भावना को भी कमजोर करता है। यह सार्वभौमिक सत्य है जब तक हम एक नहीं होंगे; सभी के लिए समान अवसर नहीं होंगे तो फिर हम सब एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण कैसे कर सकते हैं? यह सब जानते तो हैं लेकिन सभी एक साथ इकट्ठा होकर एकता के साथ ब्राह्मणवाद पर प्रहार नहीं करते, जिसका प्रतिफल है कि समाज के सभी व्यक्ति कमजोर और लाचार बने हुए है।

भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी अधिक है लेकिन आजादी के 78 वर्ष बाद भी इन जातीय समुदाय से एक भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाया। जिसका मुख्य कारण देश में जातिवाद की प्रबलता है। उदाहरण के तौर पर कांग्रेसी सरकार में बाबू जगजीवन राम लंबे समय तक अनुभवी और सफल मंत्री रहे लेकिन जातिवादी मानसिकता के कारण वे देश के प्रधानमंत्री नहीं बन पाये। यह अपने आप में दर्शाता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन भारत में ब्राह्मणवाद और जातिवाद है। किसी की भी सरकार ने जातिवाद को भयंकर रोग मानकर उसके विरूद्ध कोई कानून नहीं बनाया और न ही व्यक्तियों के नाम के आगे-पीछे जाति सूचक शब्द लगाने को प्रतिबंधित किया। इससे साबित होता है कि देश की ब्राह्मणवादी मानसिकता वाली सरकारों के लिए जाति को बनाए रखना सत्ता में आने के लिए एक अहम यंत्र/तंत्र है। जिसके आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कराके सत्ता प्राप्त की जा सकती है और फिर उसी सत्ता के कोढ़े से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को निरंतरता के साथ प्रताड़ित भी किया जाता है।

आज देश में मोदी संघी सरकार ब्राह्मणवादी संस्कृति से निर्मित है, कहने के लिए तो मोदी अपने आपको ओबीसी बताते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली देश के लिए एक कट्टर ब्राह्मणवादी कुल में पैदा हुए व्यक्ति से भी अधिक खतरनाक है। मोदी सरकार देश में मनुवादी-संघी संस्कृति को खुले रूप में बढ़ावा दे रही है। आज सरकार ने देश में लाखों की संख्या में ब्राह्मणवादी और जातिवादी अंधभक्त पैदा कर दिये हैं जो देशभर में खुलेआम खुले सांड की तरह घूम रहे हैं। मोदी सरकार ने बाबा संस्कृति को बढ़ावा दिया है जिसके कारण देश में लाखों की संख्या में अरबपति बाबा खुलेआम विचरण कर रहे हैं, वे खुलेआम जघन्यतम अपराधों में भी लिप्त है। जिन्हें मोदी संघी सरकार से संरक्षण प्राप्त है। देश की कानून व्यवस्था भी इन बाबाओं के सामने नतमस्तक रहती है। जिसे देखकर लगता है कि देश में कानून का राज नहीं, बल्कि देश में बाबाओं और ब्राह्मणवादी मनुस्मृति का शासन है।

बहुजन समाज सरकार से आग्रह करता है कि उनके महानतम विचारक और हाशिये पर पड़े समाज को राजनीतिक रूप से जागरूक और एकत्र करने में मान्यवर साहेब कांसीराम जी का अदम्य योगदान है उन्होंने उन समुदायों में राजनैतिक चेतना पैदा की जो राजनीतिक प्रवाह से बहुत दूर थे जिन्हें वर्तमान सरकार ने हिन्दुत्व की वैचारिकी की चटनी चटाकर अपना अंधभक्त बना लिया है और अगर देश में सांप्रदायिक दंगे होते हैं तो उन्हें ही दंगों में बलि का बकरा बना दिया जाता है। वर्तमान सरकार के निशाने पर दलित और मुस्लिम समुदाय है। ब्राह्मणवादी सत्ताधारी लोग जानते हैं कि इन्हें आसानी से बहकाया/छला जा सकता है। चुनाव आने पर मुफ्त की रेवड़ियाँ या पाँच किलो अनाज बांटकर या इनकी वोट को 500 या 1000 रुपये में आसानी से खरीदा जा सकता है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05