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सम्राट अशोक भारत के महान सम्राट हुए हैं जिन्होंने अखंड भारत का सपना देखा था और उन्होंने अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उस समय के भारतीय भूभाग पर जितने राज्य थे उन सभी को मौर्य साम्राज्य में सम्मलित कर लिया था। सम्राट अशोक के पिता सम्राट बिन्दुसार भी मौर्य साम्राज्य के एक महान सम्राट हुए हैं लेकिन सम्राट बिन्दुसार के साम्राज्य में कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) राज्य उनके साम्राज्य का हिस्सा नहीं था। सम्राट अशोक ऐसा देखकर यह सपना देखते थे कि मौर्य साम्राज्य में कलिंग राज्य को भी मिलाया जाये। कलिंग को अपने साम्राज्य में मिलाने का सपना सम्राट बिन्दुसार कभी पूरा नहीं कर पाये थे लेकिन सम्राट अशोक के मन में हमेशा यह ललक रही थी कि कलिंग राज्य को मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बनाया जाये।
सम्राट अशोक का नाम विश्व के महान सम्राटों में लिया जाता है। सम्राट अशोक चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र, सम्राट बिन्दुसार और रानी धर्मा के पुत्र थे। सम्राट अशोक की यात्रा ‘चंड अशोक’ से शुरू होकर ‘धम्म अशोक’ तक जाती है। किंवदंती के अनुसार सम्राट बिन्दुसार के सौ पुत्र कहे जाते हैं परंतु यह गणना एक अतिशयोक्ति ही नजर आती है। इसमें इतनी ही सत्यता लगती है कि सम्राट बिन्दुसार की कई रानियाँ थी, उनके कई पुत्र थे। सम्राट बिन्दुसार के बड़े पुत्र का नाम सुशीम था परंतु वह एक अहंकारी और अकुशल राजकुमार था। सुशीम देखने में सुंदर था, सम्राट बिन्दुसार भी उसको बहुत प्यार करते थे और बड़ा पुत्र होने के नाते उसे अपना उत्तराधिकारी भी बनाना चाहते थे। परंतु तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार यह तय नहीं था कि केवल बड़ा बेटा ही राजगद्दी का उत्तराधिकारी होगा। बल्कि जो भी योग्य, शासन व्यवस्था में निपुण और शासन सत्ता को संरक्षित व सुरक्षित रखने में कुशल हो, वह ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। उत्तराधिकारी की यही व्यवहारिक व्यवस्था तार्किक है चूंकि शासकों के उत्तराधिकारी अधिकतर आलसी और विलासी हुआ करते थे, विलासी और आलसी व्यक्ति किसी भी काम को सही दिशा देने में अक्सर अक्षम होते हैं ।
सम्राट अशोक अपने सभी भाइयों में उपेक्षित था, उसकी शारीरिक त्वचा और बनावट भी सुंदर नहीं थी, उसका शरीर खुदरा था। राजमहल में सभी छोट-बड़े अधिकारी उनके साथ राजकुमार होने जैसा व्यवहार नहीं करते थे, सम्राट अशोक को ऐसा देखकर उसी समय यह आभास हो गया था कि शासन की कुर्सी तक पहुँचने के लिए उसे अपने अंदर अदम्य साहस, वीरता और शस्त्र-शास्त्रों में निपुण होना पड़ेगा। अशोक के सभी भाई जब सम्राट बिन्दुसार के राज्य की भोग-विलासिता में जीवन बिता रहे थे तब सम्राट अशोक ने अपने आपको इन सभी चीजों से दूर रखा, वे एक बहुत साहसी और निर्भीक योद्धा बनने की चाह में लग गए। सम्राट अशोक के दादा चन्द्रगुप्त ने जो तलवार फेंक दी थी उसे सम्राट अशोक ने उठा लिया, तलवारबाजी और अन्य शस्त्र विद्या में अपने आपको उच्च कोटि का सक्षम योद्धा बना लिया। अब सम्राट बिन्दुसार के राज्य में राजकुमार अशोक जैसा सक्षम, शस्त्र विद्या में निपुण, साहसिक, निर्भीक कोई दूसरा व्यक्ति नहीं था।
सम्राट अशोक की योग्यता को परखने के लिए सम्राट बिन्दुसार ने राजकुमार अशोक को तक्षशिला के विद्रोह को दबाने के लिए वहाँ पहुँचने का आदेश दिया। राजकुमार अशोक पिता की आज्ञा का पालन करते हुए, तक्षशिला जाने के लिए तुरंत तैयार हो गए। सम्राट बिन्दुसार ने उनके साथ कुछेक सैनिक और घुड़सवारों की टुकड़ी भी भेजी। राजकुमार अशोक अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ वायु गति से तक्षशिला जाने को निकल पड़े। तक्षशिला पहुँचने पर वहाँ की जनता ने राजकुमार अशोक को बताया कि हम सम्राट बिन्दुसार के शासन के खिलाफ नहीं है। परंतु हमारे ऊपर राजकुमार सुशीम की नीतियों के द्वारा जो अत्याचार किया जा रहा है हम उसका विरोध कर रहे हैं। राजकुमार अशोक ने तक्षशिला की सभी जनता को सुना और उनकी शिकायतों का निवारण भी कर दिया। वहाँ की सभी जनता राजकुमार अशोक की वीरता और साहस को देखकर प्रसन्न हुई, उन्होंने विद्रोह को त्यागकर समर्पण भाव से राजकुमार अशोक के आदेशों का पालन किया। इसी बीच राजकुमार अशोक को पाटिलीपुत्र वापस आने का आदेश मिला, वे तुरंत पिता की आज्ञानुसार पाटिलीपुत्र के लिए रवाना हो गए। पाटिलीपुत्र पहुँचने पर उन्होंने अपने पिता सम्राट बिन्दुसार से मुलाकात की और उन्होंने तक्षशिला के विद्रोह की पूरी कहानी उन्हें सुनाई। राजकुमार अशोक ने अपने पिता सम्राट बिन्दुसार से नम्रतापूर्वक कहा कि आप मुझे उज्जयिनी पहुँचने का सीधे आदेश दे सकते थे, मुझे यहाँ बुलाकर क्या फायदा हुआ? राजकुमार अशोक ने कहा कि विद्रोह का जितनी जल्दी दमन कर दिया जाए उतना ही अच्छा होता है। राजकुमार अशोक की ये बातें सुनकर सम्राट बिन्दुसार खुश हुए और उन्होंने राजकुमार अशोक को उज्जयिनी प्रस्थान के लिए आदेश दिया।
उज्ज्यिनी के रास्ते में उनकी मुलाकात ‘विदिशा देवी’ से हुई। जिसे देखकर वे बहुत आकर्षित हुए और उन्होंने उससे विवाह करने का प्रस्ताव रखा। विदिशा देवी क्षत्रिय कुल से नहीं थी, वे एक शाक्य व्यापारी की बेटी थी, जो एक बौद्ध संप्रदाय से थी। राजकुमार अशोक ने विदिशा देवी से विवाह कर लिया, लेकिन ‘विदिशा’ को उनके राजमहल में रानियों जैसा व्यवहार नहीं मिला। समय अंतराल के बाद रानी ‘विदिशा देवी’ ने एक पुत्र (महेंद्र) और पुत्री (संघमित्रा) को जन्म दिया, जो आगे चलकर अशोक के धम्म प्रचार में सहायक बने। महेंद्र और संघमित्रा को अशोक ने बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा। उन्होंने पिता की आज्ञानुसार श्रीलंका में बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया।
सम्राट अशोक के मन में विश्व विजयी बनने का सपना था, इसीलिए उसने भारत के सभी छोटे-बड़े राज्य पाटिलीपुत्र के शासन में मिला लिए थे, परंतु कलिंग साम्राज्य पर सम्राट बिन्दुसार का आधिपत्य नहीं था। इसलिए सम्राट अशोक कलिंग प्रदेश को अपने साम्राज्य के अधीन करने की इच्छा के तहत, उन्होंने कलिंग को संदेश भेजा कि आप अपने राज्य को मौर्य साम्राज्य के अधीन कर दो, अन्यथा युद्ध झेलो। कलिंग की स्वाभिमानी जनता ने युद्ध को स्वीकार किया, चूंकि कलिंग की जनता अपनी स्वतंत्रता के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थी। वह किसी के अधीन परतंत्र रहने को तैयार नहीं थी। जिसके फलस्वरूप सम्राट अशोक ने मौर्य साम्राज्य की महान सेना को कलिंग पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया। आदेश के अनुसार सम्राट अशोक की सेना ने कलिंग की तरफ प्रस्थान किया, और पूरे साजो-समान के साथ कलिंग के चारों ओर घेरा डाल दिया। कलिंग के भीषण युद्ध में महासंग्राम हुआ, जिसमें लाखों से अधिक सैनिक, जवान, बच्चे, बूढ़े और महिलाएं मारी गई, साथ में वहाँ के साधु-संत, भिक्षु, श्रमण आदि भी मारे गए। सम्राट अशोक ने जब खूनी संघर्ष से लाल हुई जमीन और लाशों के ढेर को देखा तो सम्राट अशोक का मन विचलित हो उठा, उन्होंने देखा कि एक मरे हुए व्यक्ति को उसकी बेटी हाथ पकड़कर उठाने की कोशिश कर रही है तो दूसरी तरफ एक बच्चा अपनी मृत माँ के पास बैठकर विलाप कर रहा है और उसे जगाने की कोशिश कर रहा है। इस तरह के दृश्य देखकर सम्राट अशोक का हृदय अंदर तक आहत हुआ। कलिंग युद्ध पर तो उन्होंने जीत हासिल की, मगर उन्हें अपनी इस जीत से कोई हर्ष या उमंग नहीं हुई, बल्कि बदले में उन्हें युद्ध में मारी गई जनता को देखकर मन में शोक की भावना पैदा हुई। वही सम्राट अशोक जिसका नाम ‘अशोक’ इसलिए रखा गया था ‘उसे अब कोई ‘शोक’ नहीं है’ वह कलिंग युद्ध के भीषण नृसंहार को देखकर ‘शोक’ में डूब गया था।
कलिंग युद्ध के नृसंहार को देखकर सम्राट अशोक ने तीन ‘प्रतिज्ञाएं’ ली, पहली प्रतिज्ञा कि मैं युद्ध नीति का त्याग करता हूँ, मगर इसका अर्थ यह नहीं होगा कि मैं अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा नहीं करूंगा; दूसरी प्रतिज्ञा कि राज्य के सभी नागरिक मेरे अपने पुत्र-पुत्रियाँ है, मैं सभी के साथ समान व्यवहार करूंगा, राज्य में जो शिक्षा व्यवस्था व अन्य व्यवस्था मेरे परिवार व बच्चों को उपलब्ध होगी वहीं राज्य के सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध रहेगी; उनकी तीसरी प्रतिज्ञा, कि मेरे साम्राज्य में सभी संप्रदायों और धर्मों के लोग स्वतंत्र रूप से अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार पूजा-अर्चना करने के लिए स्वतंत्र होंगे, किसी भी संप्रदाय के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।
कलिंग युद्ध के भीषण नृसंहार को देखकर सम्राट अशोक के मन में शांति, अहिंसा और करुणा का भाव पैदा हुआ। जिसके फलस्वरूप उन्होंने ‘बुद्ध धम्म’ को अंगीकार कर लिया। जीवन पर्यंत उन्होंने देश-विदेशों में बुद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया। बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने बुद्ध धम्म की गाथाओं को शिलालेखों पर लिखवाया, बड़े-बड़े बुद्ध विहारों, स्कूल और विश्वविद्यालयों का निर्माण कराया। उन्होंने अपने शासनकाल में बुद्ध धम्म की तीसरी धम्म संगीति भी कराई, जो करीब 9 महीने से अधिक समय तक चली। हजारों विद्वान भिक्षुओं ने उसमें भाग लिया समय अंतराल में जो कमियाँ बुद्ध धम्म में प्रवेश कर चुकी थी उसके निवारण पर भी चर्चा हुई। सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म के अंदर उपजे सभी विकारों को खत्म करने के लिए पूरे समर्पण भाव के साथ प्रयास किए, और वे उसमें सफल भी हुए।
उनके बुद्ध धर्म की विशेषताएँ थी- धम्म यात्राओं का प्रारंभ; राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्ति; धम्म महामात्रों की नियुक्ति; विदेशों में धम्म प्रचारक भेजना; धम्म लिपियाँ खुदवाना; नेपाल तराई में स्थित निगत्मीका में कवक मुनि स्तूप की मरम्मत; स्तूपों, स्तंभों का निर्माण; बौद्ध धर्म में आई कुरीतियों का समापन।
सम्राट अशोक ने मौर्य साम्राज्य की सीमाओं को, भारत उपमहाद्वीप से बाहर अफगानिस्तान, ईरान, मध्य एशिया और सीरिया तक फैलाया। सम्राट अशोक के राज्य में उनका मुकाबला करने के लिए विश्व की किसी भी सेना में हिम्मत नहीं थी, वे एक कुशल व वीर योद्धा, प्रशासक व प्रबन्धक थे। जिन्होंने दुनिया का सबकुछ पाकर और फिर उसे त्यागकर बुद्ध धर्मं की शरण में जाने का फैसला किया। वर्तमान समय में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने सभी विषयों में वैश्विक ज्ञान अर्जित करके अंत में अपने आपको बुद्ध धर्म की शरण में समर्पित कर दिया। हिन्दुत्व की कुरीतियों से आहत होकर लोकहित में अन्य समुदायों को भी संदेश दिया कि आप सभी बुद्ध धम्म की शरण में जाकर अपने आपको हिन्दू रूपी महारोग से मुक्त करो। परंतु आज के अनुसूचित जाति के सामाजिक घटक बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर के अथक परिश्रम और संघर्ष के कारण पहले के मुकाबले शिक्षित, सम्पन्न और समृद्ध अवश्य हुए हैं, और उनमें तार्किक सोच का भी विकास हुआ है। अज्ञानता वश फिर भी वे सभी एक साथ मिलकर भगवान बुद्ध के धम्म को अंगीकार नहीं कर पा रहे हैं? शायद यही उनकी मानसिक संरचना में गहराई तक समाहित हिन्दुत्व की वैचारिकी के वायरस का प्रभाव है।
वर्तमान मोदी शासन की व्यवस्था: वर्तमान समय में देश की शासन सत्ता पर हिन्दुत्व की वैचारिकी हावी है। जिसके अंतर्गत भारतीय भू-भाग पर बसने वाले लोगों के साथ समता, बंधुता, न्याय के आधार पर व्यवहार नहीं किया जाता है। आज भारतीय समाज में इतना नफरती भाव पैदा हो गया है कि एक संप्रदाय का व्यक्ति दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति को न देखना चाहता है और न ही उसके साथ कोई सामाजिक रिश्ता रखना चाहता है। इस तरह का वातावरण मोदी सत्ता द्वारा सत्ता के बल से पैदा किया जा रहा है। हालांकि औपचारिक रूप से देश में लोकतान्त्रिक संविधान सत्ता है। लेकिन मोदी सत्ता ने लोकतंत्र की भावना की कदर न करते हुए देश के सभी संवैधानिक संस्थाओं में हिन्दुत्व की वैचारिकी के कट्टरपंथी बैठा दिये हैं, पूरे देश की शिक्षा का भगवाकरण हो चुका है। देश के सभी विश्वविद्यालयों में भगवा ब्रिगेड को स्थापित कर दिया गया है। विश्वविद्यालयों के कुलपति व शिक्षक हिन्दुत्व की वैचारिकी से ओत-प्रोत है। विश्वविद्यालयों व कालेजों में शिक्षक कम, संघी प्रेरक और शाखाएँ लगाने वाले अधिक दिखाई देने लगे हैं। हिन्दुत्व की वैचारिकी के माध्यम से शिक्षा के स्तर को निम्नतम स्तर पर पहुंचा दिया गया है। देश भर में विश्वविद्यालयों की संख्या एक हजार से ज्यादा है। साथ ही कॉलेजों की संख्या देशभर में करीब 45 हजार है। लेकिन देश का कोई भी शिक्षण संस्थान विश्व के श्रेष्ठ 500 संस्थानों में शामिल नहीं है। जिसे देखकर देश के सभी नागरिक आसानी से समझ सकते हैं कि देश की शिक्षा का स्तर दुनिया भर में निम्नता के स्तर को छू चुका है। मोदी सत्ता द्वारा अफीम चटाये गए अंधभक्त, मोदी को विश्व गुरु बता रहे हैं, वे शर्म और निर्लजता की सभी हदें पर कर चुके हैं।
मोदी संघी शासन को देश की गरीब जनता की न फिक्र है और न उनके लिए, उसके पास कोई सकारात्मक योजना है। मोदी संघी शासन का सिर्फ एक ही मंत्र और लक्ष्य है कि किसी भी कीमत पर चुनाव जीतकर सत्ता में रहें। उसके लिए उन्हें चाहे अवैध, असंवैधानिक रास्तों का पालन ही क्यों न करना पड़े। देश को दुनिया भर में महानतम स्तर पर पहुंचाने के लिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान की रचना की और अपनी इस रचना के साथ उन्होंने यह सपना देखा था कि अगर भारत की शासनकर्ता जमात ईमानदारी के साथ संवैधानिक प्रावधानों का पालन करेगी तो देश को और देश की जनता को विश्वभर में उत्कृष्ट दर्जा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक पाएगा। लेकिन अपनी इस परिकल्पना के साथ उन्होंने यह भी जोड़ा था कि अगर संविधान को मानने वाले अच्छे व्यक्ति होंगे, तो यह संविधान अच्छा साबित होगा और देश की जनता के लिए कल्याणकारी बन पाएगा। अगर सरकार में बैठे लोगों की मानसिकता अच्छी नहीं होगी तो यह संविधान अच्छा न साबित होकर बुरा ही साबित होगा। जो आज मोदी संघी सरकार में सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। मोदी ने अपने 12 वर्षों के शासन में परोक्ष रूप से संविधान को इतना कमजोर कर दिया है कि अब संविधान पर मनुस्मृति हावी होती दिखाई देने लगी है। मोदी ने देशभर में अपने इतने अंधभक्त पैदा कर दिये हैं कि वे अब रात-दिन मनुस्मृति का ही राग अलापते रहते हैं। देश में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों का कोई सम्मान बचा नहीं रह गया है। मोदी सत्ता में बैठे संघी लोग अखंड भारत और राष्ट्रवाद की बात तो करते हैं लेकिन वे इतने धूर्त है कि अखंड भारत सिर्फ सम्राट अशोक के शासन में था जब देश की सीमाएं पाकिस्तान, अफगानिस्तान ईरान और सीरिया तक थी। लेकिन सम्राट अशोक का अखंड भारत संघी मानसिकता के व्यक्तियों को तब हजम नहीं हुआ था, उन्होंने तब अपने मनुवादी चरित्र के अनुसार एक षड्यंत्र की रचना की थी, जिसके बाद उन्होंने अशोक के बाद के 10वें बौद्ध शासक बृहद्रथ की छल से हत्या की और उसके बाद बौद्ध शासकों द्वारा बनाए गए बौद्ध विहारों, बौद्ध स्थलों का विध्वंस किया। हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले मतावलंबियों ने इस देश से मानवतावादी बुद्ध धम्म को नष्ट किया जो अपने आप में यह दर्शाता है कि मनुवादी संस्कृति के व्यक्ति कभी भी मानवतावादी नहीं हो सकते और न ही वे भारत देश को अखंड भारत बना सकते। उनके मन में हमेशा ही छल-कपट और षड्यंत्र की भावना वास करती है। छली और कपटी व्यक्ति कभी भी किसी देश को श्रेष्ठता के पथ पर नहीं ले जा सकता। मनुवादी मानसिकता का पिछले ढाई हजार वर्षों का इतिहास इसी ओर इशारा कर रहा है। इसलिए देश के जागरूक लोगों को संघी मानसिकता के लोगों से सतत सावधान रहना होगा।
सम्राट अशोक की शासन व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम: सम्राट अशोक और उसके वंशजों का शासन भारत में करीब 100 वर्षों का रहा। जिसमें न कोई बाहरी आक्रमण हुआ और न ही कोई आंतरिक विद्रोह हुआ जो यह दर्शाता है कि सम्राट अशोक की शासन व्यवस्था सभी समुदायों के लिए सुखात्मक और आनंददायी थी। न किसी में कोई बैर था और न किसी समुदाय में नफरत का भाव था। यह सर्वविदित है कि जब समाज शांतिपूर्वक व्यवस्था में रहेगा तो वहाँ पर किसी भी प्रकार के उपद्रव व आक्रमण नहीं होंगे। सम्राट अशोक को कलिंग युद्ध के बाद यह एहसास हो गया था कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है, जनता में शांति, समृद्धिता और करुणा की भावना पैदा करने से ही सभी समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकता है। उन्होंने अपने इसी एहसास को जनता के सुख-चैन के लिए समाधान में बदला और उसे लागू किया, इसलिए उनका और उनके वंशजों का शासन करीब एक शताब्दी तक शांतिपूर्ण रहा, यह अपने आपमें एक वैश्विक स्तर की मिशाल है, जिसे भारत आज अपनाकर श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
मोदी-संघियों की शासन व्यवस्था: पिछले करीब एक दशक से मोदी संघी शासन चल रहा है, इस दौरान मोदी के अंधभक्त संघियों ने देश की जनता के बीच असमानता और नफरत के बीच बोये हैं। देश में बेरोजगारी चरम पर है, बेरोजगारी के कारण आम जनता के पास अपनी समस्याओं से निपटने के लिए पर्याप्त धन व संसाधन नहीं है। मोदी जब विदेशी धरती पर जाते हैं तो वहाँ की जनता को नारा देते हैं कि मैं बुद्ध की धरती से आया हूँ, हम युद्ध नहीं बुद्ध देते हैं। मोदी के धूर्त संघी सलाहकारों को मालूम होना चाहिए कि भगवान बुद्ध ने युद्ध टालने के लिए अपना गृह त्याग किया था चूंकि उस वक्त कोलियों और शाक्यों में नदी के पानी के बँटवारे को लेकर विवाद था, भगवान बुद्ध ने दोनों समुदायों को समझाया लेकिन वे दोनों समुदाय युद्ध पर आमादा थे, उन्होंने भगवान बुद्ध के सामने शर्त रखी कि युद्ध एक ही स्थिति में रोका जा सकता है कि सिद्धार्थ को अपना राजपाठ छोड़कर गृह त्याग करना पड़ेगा। भगवान बुद्ध ने दोनों समुदायों में युद्ध टालने और शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए अपना राजपाठ छोड़कर सन्यासी बनना स्वीकार किया था। लेकिन आज विश्व भर में जो व्यक्ति व्यापारी और अहंकारी मानसिकता के है वे ऐसा करने में अक्षम है। आज ईरान, इजराइल और अमेरिका का युद्ध चल रहा है उससे पूरी दुनिया की अर्थव्यस्व्था और शांति अस्त-व्यस्त है, मोदी और ट्रम्प में कुछ समानतायें हैं जैसे दोनों व्यापारी मानसिकता के हैं; दोनों परम अहंकारी है; दोनों के गुण देश और विश्व भर में शांति के लिए बड़ा खतरा है। दोनों ही नेता शांति व्यवस्था की बात न करके युद्ध की बात करते हैं जबकि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है इसलिए अंधभक्तों को वास्तविक धरातल पर आकर यह समझना होगा कि न अमेरिकी जनता के लिए ट्रम्प शांति और समृद्धि ला सकते है और न मोदी-संघी शासन व्यवस्था इस देश में शांति और समृद्धि ला सकती है। मिशाल के तौर पर मोदी-संघियों के शासन काल में जो आतंकी हमले हुए हैं वे भारतीय इतिहास में संख्या के हिसाब से सबसे अधिक है।
मोदी-संघी शासन व्यवस्था में हुए हमले-पुलवामा आतंकी हमला 2019; उड़ी सेना कैंप हमला 2016; पठानकोट एयरबेस हमला 2016; अमरनाथ यात्रियों पर हमला 2017; सुंजवान आर्मी कैंप हमला 2018; गुरदासपुर हमला 2015; नक्सली हमले: छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी बड़ी नक्सल बमबारी की घटनाएं हुईं, जैसे 2017 में सुकमा हमला, जिसमें 25 पुलिसकर्मी शहीद हुए।
अखंड भारत का नारा देने वाले मनुवादी संघी लोग महान सम्राट अशोक की शासन व्यवस्था से सबक लेकर क्या सम्राट अशोक द्वारा ली गई तीनों प्रतिज्ञाओं का पालन करने का संकल्प लेंगे? सम्राट अशोक की तीनों प्रतिज्ञाओं का पालन किए बिना कोई भी राष्ट्र न महान बन सकता है और न अखंड बन सकता है। इसलिए पाखंडी मनुवादी संघियों से निवेदन है कि वे छलावामयी झूठी बातें न करें और न उनका सहारा लें, साथ में यह भी संकल्प लें कि हम मनुस्मृति का त्याग करते हैं और भारतीय संविधान को सअक्षर आत्मसात करते हैं तभी हम सभी हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले अखंड भारत की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं। अन्यथा मनुवादियों-संघियों के सभी वायदे फरेबी और छलावामयी ही साबित होंगे। महान बनने के लिए महानता पूर्ण कार्य भी करने होते हैं झूठे वायदों और छलावों के बल पर न कोई महान बन सकता है और न अखंड बन सकता है। लोगों को मनुवादी मोदी सरकार मूर्ख न समझे।
अपना दीपक स्वयं बनो, भगवान बुद्ध का यही संदेश सभी पर लागू होता है और मनुवादी व्यवस्था से मुक्ति पाओ, बुद्ध धम्म ही दुनिया में मनुष्य कल्याण का एक मात्र साधन और साध्य है।





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