




2026-07-04 14:11:47
भारतीय संविधान के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाने वाली 15 महिलाओं में दक्षायिणी वेलायुधन का नाम बेहद खास है। वह संविधान सभा की एकमात्र दलित (अनुसूचित जाति) महिला सदस्य थीं। केवल 34 वर्ष की आयु में वह इस सभा की सबसे युवा सदस्यों में से एक थीं। उनका जीवन गहरे सामाजिक भेदभाव, संघर्ष और अद्वितीय साहस की एक अनूठी दास्तान है। दक्षायिणी वेलायुधन का जन्म 4 जुलाई, 1912 को कोचीन (वर्तमान एनार्कुलम जिला, केरल) के मुळावुकड द्वीप पर हुआ था। वह पुलाया समुदाय से ताल्लुक रखती थीं, जिसे उस दौर में अछूत माना जाता था और सामाजिक स्तर पर भयंकर प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। उस समय निचली जाति की महिलाओं को शरीर के ऊपरी हिस्से पर कपड़े (अपर क्लॉथ) पहनने की अनुमति नहीं थी। दक्षायिणी अपने समुदाय की उन पहली लड़कियों में से थीं, जिन्होंने इस दमनकारी नियम को ठुकराया और पूरे कपड़े पहनना शुरू किया। उन्हें सार्वजनिक सड़कों पर चलने और कुओं से पानी लेने तक की मनाही थी। ऐसी विकट परिस्थितियों के बीच उनके परिवार ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। दक्षायिणी की प्रारंभिक शिक्षा कोच्चि राज्य सरकार की छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) के सहयोग से हुई। तमाम सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए उन्होंने इतिहास रच दिया। साल 1935 में उन्होंने महाराजा कॉलेज, एनार्कुलम से विज्ञान (रसायन विज्ञान) में स्नातक की डिग्री पूरी की। वह ऐसा करने वाली पूरे भारत की पहली अनुसूचित जाति की महिला बनीं। कॉलेज के दिनों में वह विज्ञान विभाग में अकेली छात्रा थीं। उनके साथ वहां भी जातिगत भेदभाव हुआ; एक उच्च जाति के शिक्षक ने उन्हें प्रयोगशाला में प्रयोग (प्रैक्टिकल) पास से देखने तक से मना कर दिया था। उन्होंने दूर खिड़की से देखकर प्रयोग सीखे। इसके बाद उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स किया और 1935 से 1945 तक सरकारी स्कूलों में शिक्षिका के रूप में काम किया।
घोर छूआछूत का शिकार था पुलाया समुदाय
ऐश्ले मैथ्यू ने अपने शोधपत्र लेबर पार्टीशिपेशन एंड सोशल मोबिलिटी अमंग द पुलाया वुमेन आॅफ रूरल केरला में बताया है कि पुलाया समुदाय स्वतंत्रता पूर्व भारत में घोर छूआछूत का शिकार था। इस समुदाय के लोग अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करते थे। उनके ऊपर कई तरह की सामाजिक पाबंदिया थीं। जब दक्षायिणी का जन्म हुआ, तब तक केरल समाज में व्याप्त इस अतार्किक जाति व्यवस्था का विरोध होना शुरू हो चुका था। अय्यनकाली जैसे समाज सुधारकों ने पुलाया समुदाय के उत्थान की दिशा में आवाज उठाना शुरू कर दिया था, हालांकि मंजिल अभी भी काफी दूर थी। दक्षायिणी ने अपनी आत्मकथा में बताया है कि- मैं किसी गरीब पुलाया परिवार में पैदा नहीं हुई थीं। मेरे पांच भाई-बहनों में से पिता मुझसे ही सबसे ज्यादा प्यार करते थे और मेरा समर्थन करते थे। उनके इसी प्यार और समर्थन का नतीजा था कि दक्षायिणी अपने दौर की पहली दलित महिला बनीं, जिन्होंने ऊपरी अंगवस्त्र पहनना शुरू किया, जबकि उनसे पहले पुलाया समुदाय की महिलाएं अंगवस्त्र नहीं पहनती थीं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जहां अन्य दलित लड़कियों के अजाकी, पुमाला, चक्की, काली, कुरुंबा जैसे अजीबो-गरीब नाम हुआ करते थे, वही उनके माता-पिता ने उनका नाम दक्षिणायिणी रखा था, जिसका अर्थ होता है दक्ष कन्या अर्थात दुर्गा। इससे पता चलता है कि उनका परिवार समाज के दकियानूसी विचारधारा को नहीं मानता था।
दलित अधिकारों के लिए उठायी आवाज
वर्ष 1942 में दक्षिणायिनी कोचीन विधानसभा सीट के लिए नॉमिनेट की गयीं और वर्ष 1946 में उन्हें संविधान सभा की पहली और एकमात्र दलित महिला सदस्या के रूप में चुना गया। उनका मानना था कि कोई भी संविधान सभा केवल संविधान का निर्माण ही नहीं करती, बल्कि यह समाज के नये दृष्टिकोण का निर्माण करती है। महात्मा गांधी की समर्थक रहीं दक्षिणायिनी छूआछूत और सामाजिक भेदभाव की कट्टर विरोधी थीं।
अस्पृश्यता तथा पृथक निर्वाचिका का विरोध
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) के निर्माण में अहम वैचारिक भूमिका निभाई। उनका मानना था कि अछूत प्रथा को केवल कानूनी रूप से प्रतिबंधित करना काफी नहीं है, बल्कि इसके खिलाफ एक मजबूत सामाजिक और नैतिक अभियान चलाने की जरूरत है। वह महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थीं। डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ कई सामाजिक मुद्दों पर सहमत होते हुए भी, उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग का विरोध किया। उनका तर्क था कि इससे निचली जातियां समाज की मुख्यधारा से हमेशा के लिए अलग-थलग हो जाएंगी। वह एक अखंड और एकजुट भारत के पक्ष में थीं।
सत्ता का विकेंद्रीकरण
8 नवंबर, 1948 को जब डॉ. आंबेडकर ने संविधान का मसौदा पेश किया, तब दक्षायिणी ने उसकी सराहना करने के साथ-साथ एक बड़ी आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि इस मसौदे में सत्ता का बहुत अधिक केंद्रीयकरण कर दिया गया है। वह चाहती थीं कि पंचायतों और स्थानीय निकायों को अधिक शक्तियां मिलनी चाहिए। 1950 से 1952 तक उन्होंने भारत की अंतरिम संसद के सदस्य के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने विशेष रूप से शिक्षा और अनुसूचित जातियों के कल्याण से जुड़े मामलों में गहरी रुचि ली। बाद के वर्षों में, उन्होंने खुद को सीधे चुनावी राजनीति से थोड़ा दूर कर लिया और जमीनी स्तर पर सामाजिक काम करने के लिए महिला जागृति परिषद की स्थापना की। वह मद्रास में द कॉमन मैन पत्रिका की प्रबंध संपादक भी रहीं।
निधन: संविधान सभा और अंतरिम संसद (1950-52) का कार्यकाल पूरा होने के बाद, उन्होंने खुद को सक्रिय चुनावी राजनीति और चुनावी आपाधापी से दूर कर लिया था। इसके बाद वह दिल्ली में ही बस गईं और अपना पूरा ध्यान जमीनी स्तर पर काम करने और समाज सेवा में लगाया। जीवन के आखिरी दौर में वह कुछ समय तक अस्वस्थ रहीं। बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण 20 जुलाई, 1978 को 66 वर्ष की आयु में उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। देश के सबसे बड़े मंच (संविधान सभा) का हिस्सा रहने के बावजूद, उनका अंतिम समय बेहद सादगी और शालीनता में बीता। उन्होंने कभी भी अपने बड़े कद या राजनीतिक रसूख का व्यक्तिगत लाभ नहीं उठाया। उनके निधन के बाद देश ने एक ऐसी दूरदर्शी नेता को खो दिया जिसने जातिगत और लैंगिक दोनों तरह के सामाजिक बंधनों को तोड़कर इतिहास रचा था। उनका पूरा जीवन इस बात का गवाह रहा कि जब अधिकार और अवसर नहीं मिलते, तो उन्हें अपनी योग्यता और संघर्ष के बल पर हासिल किया जाता है। दक्षायिणी वेलायुधन का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे दृढ़ इच्छाशक्ति और शिक्षा के बल पर समाज की सबसे दमनकारी बेड़ियों को तोड़ा जा सकता है। महिलाओं और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण में उनके इसी योगदान को याद रखने के लिए केरल सरकार द्वारा आज भी दक्षायिणी वेलायुधन पुरस्कार दिया जाता है।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |