




2026-01-19 16:36:24
समाजवादी आंदोलन का इतिहास केवल सत्ता संघर्षों और चुनावी सफलताओं की गाथा भर नहीं है, बल्कि उन व्यक्तित्वों की भी कहानी है, जिन्होंने सत्ता के भीतर रहते हुए भी उसे साध्य नहीं, साधन माना। शिवनंदन पासवान (13 जनवरी, 1936-15 नवंबर, 1989) ऐसे ही विरल समाजवादी नेता थे। वह तीन बार विधायक रहे। इस दौरान कपूर्री ठाकुर के मंत्रिमंडल में भूमि एवं राजस्व मंत्री रहे। इसके अलावा बिहार विधान सभा में जनता पार्टी के मुख्य सचेतक, उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष रहे। अपने कार्यकारी अध्यक्ष काल के दौर में उन्होंने कपूर्री ठाकुर को मरणोपरांत उन्हें नेता प्रतिपक्ष की वैधता दिलवायी और आजीवन लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के लिए संघर्ष किया। उनकी राजनीति पद, प्रतिष्ठा या पहचान की नहीं, बल्कि विचार, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की थी।
राजनीति में आने से पहले शिवनंदन पासवान ने बिहार की सर्वोच्च सिविल सेवा की भी नौकरी की और वहां भी अपने काम से लोगों के मन में छाप छोड़ने के लिए वे जाने गए। बिहार में 5 मुख्यमंत्रियों के निजी सहायक के रूप में उन्होंने काम किया। लेकिन आज की पीढ़ी उनका नाम तक नहीं जानती। जिस बिहार विधान सभा के वे कार्यकारी अध्यक्ष रहे, उसके रिकार्ड में भी उनकी उपस्थिति मिटाने का षड्यंत्र जारी है।
13 जनवरी, 1936 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सकरा में पिता खोभारी पासवान और मां मछिया देवी के घर जन्मे शिवनंदन पासवान ने आर्थिक परेशानियों के बावजूद न सिर्फ एम.ए. तक की शिक्षा अर्जित की, बल्कि 1960 में बिहार की सर्वोच्च सिविल सेवा की परीक्षा (बीपीएससी) में भी उत्तीर्ण हुए। लेकिन श्रीकृष्ण सिंह के तथाकथित स्वर्णिम शासनकाल में भी साल भर तक उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया। बिहार के तंत्र पर काबिज वर्चस्वशाली बाबुओं ने कम्युनिस्ट बतलाकर उनकी नियुक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया। अंतत: कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री से अनुनय-विनय किया और एक साल बाद उनकी पहली नियुक्ति सिंहभूम जिले के मुसाबनी में प्रखंड विकास पदाधिकारी के रूप में हुई। बिहार प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उन्होंने प्रखंड से लेकर सचिवालय तक अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। बिहार सिविल सर्विस एसोसिएशन के सचिव के रूप में उन्होंने वर्षों तक उनके हितों के लिए कई निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं। अंतत: बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में वह उप सचिव बने। बाद में सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया और पूर्णकालिक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सोशलिस्ट पार्टी से खुद को नाभिनाल कर लिया।
शिवनंदन पासवान का बचपन जिस परिवेश में निर्मित हो रहा था, उसमें सामाजिक-राजनीतिक रूप से चेतना हर किसी में आनी ही आनी थी। वह आजादी के बाद का दौर था और कांग्रेस की हुकूमत का पूरे देश पर रौब-दाब था। उसके इन कार्यकलापों के विरुद्ध आम जनमानस में मोहभंग की स्थिति थी। केंद्र और बिहार में शासन व्यवस्था की इस निरंकुशता का मुकाबला समाजवादी नेतृत्व कर रहा था। जब वह कॉलेज के दिनों में पढ़ रहे थे उसी समय से समाजवादी आंदोलनों की गतिविधियों में उनकी सक्रियता बढ़ी। बिहार में हो रहे 1952 के प्रथम आम चुनाव के समय वह नौवीं कक्षा के छात्र थे। फिर भी इतनी कम उम्र में ही उन्होंने सकरा विधान सभा क्षेत्र में चुनाव प्रभारी के रूप में काम किया। सोशलिस्ट पार्टी में उनके काम करने के तरीके की लोगों ने सराहना की। फिर उनकी सक्रियता बढ़ती ही गई और अगले ही आम चुनाव 1957 में वे सकरा-कुढ़नी निर्वाचन क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव में खड़े हुए, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी की वोट लूट और धांधली के कारण इस चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
1977 के आपातकाल के दौरान शिवनंदन पासवान ने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसी वर्ष वह जनता पार्टी के टिकट पर सकरा विधान सभा से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। इसबार जनता पार्टी की सरकार कपूर्री ठाकुर के मुख्यमंत्रित्व में स्थापित की गई और शिवनंदन पासवान इस सरकार में भूमि एवं राजस्व राज्यमंत्री बनाए गए। 1979 में ही वह अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण समिति के सभापति रहे। इसी क्रम में अपने दल के बिहार विधान सभा में मुख्य सचेतक रहे। उन्होंने शोषण मुक्ति सेना का गठन किया। 1980 में वह वैशाली जिले के पातेपुर विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद 1985 में वे पुन: सकरा विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। इसके पहले 1980 के लोकसभा चुनाव में वे सासाराम से बाबू जगजीवन राम के खिलाफ चुनाव लड़े, लेकिन उसमें वे पराजित हुए।
शिवनंदन पासवान ने जिस दौर में राजनीति में प्रवेश किया, वह बिहार और देश की राजनीति के लिए उथल-पुथल का समय था। समाजवादी आंदोलन सड़क से संसद तक अपनी जगह बना रहा था। उन्होंने शुरू से ही यह स्पष्ट कर दिया था कि उनकी राजनीति न तो व्यक्तिपूजा पर आधारित होगी न ही यथास्थिति बनाए रखने पर। वे दलित प्रश्न को वर्ग-प्रश्न और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देखते थे।
शिवनंदन पासवान का विधान सभा जीवन इस मायने में विशिष्ट है कि उन्होंने सदन को सत्ता का मंच नहीं, बल्कि जनता की आवाज का मंच माना। वे 1985 में बिहार विधान सभा के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए तथा इस पद पर मृत्युपर्यंत रहे। इस बीच बिहार विधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल (जनवरी, 1989 से लेकर मार्च, 1989 तक) लोकतांत्रिक मयार्दाओं, निष्पक्ष संचालन और विपक्ष के सम्मान के लिए याद किया जाना चाहिए। इसके बावजूद उनका नाम अध्यक्षों की औपचारिक सूची में दर्ज न होना बताता है कि हमारी संस्थागत स्मृति कितनी चयनात्मक और सत्ता अनुकूल होती जा रही है। यह चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक विस्मरण है।
शिवनंदन पासवान का राजनीतिक जीवन उस समय एक निर्णायक मोड़ पर आया, जब वे भूमि एवं राजस्व राज्य मंत्री बने। यह वह विभाग था, जहां दलितों, भूमिहीनों और गरीब किसानों के प्रश्न सीधे जुड़े थे। जब उन्हें लगा कि सरकार की नीतियां समाजवादी मूल्यों से समझौता कर रही हैं, तो उन्होंने कपूर्री ठाकुर को अपने इस्तीफे का पत्र लिखा। यह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक दुर्लभ क्षण था जहां एक मंत्री सत्ता से चिपके रहने के बजाय सिद्धांतों के साथ खड़ा हुआ। कपूर्री ठाकुर द्वारा इस्तीफा स्वीकार न किया जाना इस बात का प्रमाण है कि शिवनंदन पासवान की वैचारिक प्रतिबद्धता पर स्वयं समाजवादी नेतृत्व को भी भरोसा था। कपूर्री ठाकुर और शिवनंदन पासवान का संबंध केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक था। दोनों सामाजिक न्याय, पिछड़ों-दलितों के अधिकारों और सादा जीवन, उच्च विचार के पक्षधर थे। शिवनंदन पासवान ने कपूर्री ठाकुर से यह सीखा कि सत्ता में रहते हुए भी सत्ता का प्रतिरोध कैसे किया जाता है। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने दलित राजनीति को समाजवादी आंदोलन से अलग नहीं होने दिया।
शिवनंदन पासवान उस समाजवादी परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसकी लौ आज के समय में और अधिक जरूरी हो गई है जब दलित राजनीति का बड़ा हिस्सा समाजवाद और आंबेडकरवाद से विच्छिन्न होकर सत्तावादी दक्षिणपंथ के साथ समझौते कर चुका है। शिवनंदन पासवान का जीवन उस सामाजिक यथार्थ से उपजा था, जहां जाति, वर्ग और सत्ता की असमानताएं प्रतिदिन मनुष्य की गरिमा को चुनौती देती हैं। दलित समुदाय से आने के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीति को केवल पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं किया। उनके वैचारिक निर्माण पर डॉ. आंबेडकर, राममनोहर लोहिया, जेपी आंदोलन और कपूर्री ठाकुर की समाजवादी धारा का गहरा प्रभाव था। वे मानते थे कि दलित मुक्ति केवल सत्ता-साझेदारी से नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक ढांचों के आमूल परिवर्तन से संभव है। उनके लिए समाजवाद कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति थी।
13 सितंबर, 1989 को स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली में भर्ती करवाया गया। वहां उनकी किडनी ट्रांसप्लांट की गई। इसी बीच हार्ट अटैक हुआ और 15 नवंबर, 1989 को बिहार विधान सभा के उपाध्यक्ष के पद पर अपने कार्यकाल के दौरान ही उनका निधन हो गया। सरकारी पद पर रहते हुए उनके इलाज में तत्कालीन शासन द्वारा अगर असहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया गया होता तो वह असमय काल कवलित नहीं होते।





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