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वीरांगना फूलन देवी

क्रांति की लाल आंधी: शोषितों, पीड़ितों और आत्मसम्मान की अमर प्रतीक
News

2026-07-25 15:34:10

भारतीय समाज का इतिहास केवल राजाओं, महाराजाओं और सामंतों की गाथाओं तक सीमित नहीं है; इसका सबसे जीवंत और जलता हुआ पृष्ठ उन आवाजों ने लिखा है जिन्होंने सदियों की खामोशी, जात-पात के अत्याचार, पितृसत्ता की जंजीरों और सामंती उत्पीड़न की ईंट से ईंट बजा दी। इन्हीं ऐतिहासिक आवाजों में सबसे मुखर, निडर और क्रांतिकारी नाम है—फूलन देवी। फूलन देवी केवल एक नाम या ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था के उस काले चेहरे पर एक करारा थप्पड़ हैं, जो दलितों, पिछड़ों और महिलाओं को इंसानों जैसी जिंदगी जीने का अधिकार भी नहीं देना चाहती थी। वे शोषित वर्ग के आत्मसम्मान, प्रतिरोध और स्वाभिमान का एक ऐसा जलता हुआ सूरज थीं, जिसने यह साबित कर दिया कि जब एक शोषित नारी अपनी चेतना को पहचान लेती है, तो वह व्यवस्था के सारे सामंती ढांचों को हिलाकर रख सकती है।

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के गोरहा का पूर्वा गांव में एक गरीब मल्लाह (निषाद/कश्यप - पिछड़ा वर्ग) परिवार में हुआ था। जिस सामाजिक ताने-बाने में उनका जन्म हुआ, वहां तीन स्तरों पर भयंकर दमन पहले से मौजूद था। जातिगत आधार पर: ऊंची जातियों का आर्थिक और सामाजिक वर्चस्व। आर्थिक आधार पर: भूमिहीनता, गरीबी और भुखमरी। लैंगिक आधार पर: महिला होने के नाते दोहरे उत्पीड़न का शिकार होना। फूलन के बचपन में ही उनके पिता की जमीन पर उनके दबंग और सामंती चाचा ने अवैध कब्जा कर लिया। जब बाकी परिवार डरकर चुप बैठ गया, तब 10 साल की मासूम बच्ची फूलन ने इस अन्याय का विरोध किया। वे अपनी बहन के साथ जाकर चाचा के खेत में उग रही फसल पर बैठ गईं और हक मांगने लगीं। यह उनकी क्रांतिकारी चेतना का पहला अंकुरण था—एक ऐसी बच्ची जिसने बेहद कम उम्र में समझ लिया था कि अगर आप शांत रहेंगे, तो दबंग आपकी सांसे भी छीन लेंगे। इस विरोध की कीमत उन्हें भयंकर रूप से चुकानी पड़ी। 11 साल की उम्र में ही उनकी मर्जी के बिना उनका विवाह उनसे कई साल बड़े एक व्यक्ति से कर दिया गया, जहां उन्हें भयंकर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ी।

बीहड़ की ओर कदम: जब फूलन अपने मायके वापस लौटीं, तो गांव के सामंती और सवर्ण दबंगों को एक मल्लाह की बेटी का स्वाभिमान बर्दाश्त नहीं हुआ। उन पर चोरी के झूठे इल्जाम लगाए गए, पुलिस से पिटवाया गया और मानसिक रूप से तोड़ दिया गया। जब समाज का हर दरवाजा—कानून, अदालत, पुलिस और समाज—एक गरीब दलित-पिछड़े के लिए बंद हो जाता है, तब उसके पास दो ही रास्ते बचते हैं: या तो वह घुट-घुट कर मर जाए, या फिर खुद अपनी सुरक्षा का हथियार उठा ले। फूलन ने दूसरा रास्ता चुना। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में, परिस्थितियां उन्हें चंबल और यमुना के बीहड़ों की ओर धकेल ले गईं। बीहड़ में पहुंचने के बाद भी जातिगत और लैंगिक भेदभाव ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। डाकू गिरोहों में भी सवर्णों (विशेषकर ठाकुरों) का दबदबा था। लेकिन यहीं उनकी मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई, जो शोषित वर्ग से थे। विक्रम और फूलन ने मिलकर बीहड़ के भीतर भी एक सामाजिक संतुलन और शोषितों के हक की बात शुरू की।

सामूहिक बलात्कार और प्रतिशोध: फूलन देवी के जीवन की सबसे दर्दनाक और भयावह घटना थी—बेहमई में उनके साथ हुआ सामूहिक बर्बरता का नंगा नाच। विक्रम मल्लाह की हत्या के बाद, सामंती मानसिकता से ग्रस्त ठाकुर डाकुओं (लाला राम और माधव सिंह गिरोह) ने फूलन को अगवा कर लिया। उन्हें बेहमई गांव में हफ्तों तक बंधक बनाकर रखा गया, जहां उनके साथ क्रूरतम सामूहिक बलात्कार किया गया। उन्हें नग्न अवस्था में कुएं से पानी भरने पर मजबूर किया गया ताकि उनका आत्मसम्मान पूरी तरह कुचल दिया जाए। लेकिन सामंती सोच रखने वाले यह भूल गए थे कि वे एक आम इंसान को नहीं, बल्कि क्रांति की एक ज्वाला को प्रताड़ित कर रहे थे। 14 फरवरी 1981 को, बेहमई गांव में बेहमई कांड हुआ। फूलन देवी अपने दल के साथ वहां पहुंचीं और उन अत्याचारियों की पहचान की जिन्होंने उनके साथ दरिंदगी की थी। वहां 20 से अधिक सामंती दबंगों को गोलियों से भून दिया गया। ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य: इतिहासकार और सामाजिक विश्लेषक बेहमई कांड को केवल एक अपराध या हत्या के रूप में नहीं देखते। यह भारतीय समाज के हजारों सालों से चले आ रहे उस दलित-शोषित आक्रोश का एक हिंसक विस्फोट था, जो सदियों से अपनी माताओं, बहनों और बेटियों की आबरू को सामंतों के हाथों लुटते देखने पर मजबूर था। यह पीड़िता का अत्याचारी की छाती पर लिखा गया एक क्रूर लेकिन ऐतिहासिक जवाब था।

आत्मसमर्पण: बेहमई कांड के बाद उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार की नींद उड़ गई। चंबल के इतिहास में पहली बार किसी महिला बागी ने पूरी राज्य मशीनरी को हिलाकर रख दिया था। फूलन देवी शोषितों के लिए रॉबिनहुड बन चुकी थीं—वे गरीबों को राशन बांटती थीं, दबंगों द्वारा छीनी गई जमीनें वापस दिलाती थीं और महिलाओं पर अत्याचार करने वालों को सजा देती थीं। 1983 में, तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार (मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल) के सामने फूलन देवी ने आत्मसमर्पण किया। लेकिन यह आत्मसमर्पण उन्होंने अपनी शर्तों पर किया, जो उनकी राजनीतिक समझ और स्वाभिमान का प्रमाण था: उन्होंने कभी भी उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने हथियार नहीं डाले (क्योंकि उन्हें पता था कि यूपी पुलिस सामंती तंत्र का हिस्सा थी)। उन्होंने शर्त रखी कि उनके साथियों को फांसी की सजा नहीं दी जाएगी।

जेल से संसद तक: फूलन देवी ने बिना मुकदमे के लगभग 11 साल ग्वालियर और तिहाड़ जेल में बिताए। इस दौरान उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी जूझना पड़ा, लेकिन जेल की ऊंची दीवारें उनके हौसले को नहीं तोड़ सकीं। 1994 में, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार ने मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में कदम उठाते हुए फूलन देवी पर लगे सारे मुकदमे वापस लिए और उन्हें रिहा कर दिया। जेल से बाहर आते ही फूलन देवी ने समझ लिया कि अब लड़ाई बंदूक से नहीं, बल्कि बाबा साहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के दिए गए संविधान और लोकतंत्र के हथियार वोट से लड़ी जाएगी। फूलन देवी 1996 में पहली बार उत्तर प्रदेश की मिजार्पुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर देश की सबसे बड़ी पंचायत—संसद पहुँचीं। यह भारतीय लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक पल था: जिस महिला को समाज के दबंगों ने नग्न करके घुमाया था, वही महिला अब उसी देश के कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था में बैठकर शोषित समाज की नुमाइंदगी कर रही थी। संसद में पहुँचकर उन्होंने कभी अपनी पृष्ठभूमि को नहीं छिपाया। उन्होंने खुलकर कहा, मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, लेकिन मैं दर्द पढ़ना जानती हूँ। मैं जानती हूँ कि जब किसी गरीब की झोपड़ी जलाई जाती है या किसी बेटी की आबरू लूटी जाती है, तो कैसा लगता है। उन्होंने सांसद रहते हुए निषाद, मल्लाह, कश्यप, बिंद और तमाम दलित-पिछड़ी जातियों के अधिकारों, शिक्षा, और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए लगातार काम किया। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शोषितों की आवाज बनीं, यहां तक कि एशियाई मानवाधिकार सम्मेलनों में भी उन्हें आमंत्रित किया गया।

परिनिर्वाण और शहादत: फूलन देवी का राजनीतिक और सामाजिक कद जैसे-जैसे बढ़ता गया, सामंती शक्तियों के पेट में दर्द गहराता गया। वे एक निषाद/दलित महिला को देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद पर बैठकर हुकूमत करते नहीं देख सकते थे। 25 जुलाई 2001 को, नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास (अशोका रोड) के बाहर कायरतापूर्ण तरीके से शेर सिंह राणा और उसके सहयोगियों द्वारा गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। हत्यारे भले ही यह सोच रहे थे कि उन्होंने फूलन देवी का अंत कर दिया, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि विचारों और क्रांति की कभी हत्या नहीं की जा सकती। वे जिंदा थीं तो एक बागी थीं, जब मरीं तो शोषितों के दिलों में अमर शहीद और वीरांगना बन गईं।

फूलन देवी का जीवन हमें कई महत्वपूर्ण सामाजिक और क्रांतिकारी सबक सिखाता है:

(क) जातिगत और लैंगिक दमन का दोहरा मुकाबला

फूलन देवी का जीवन इस बात का प्रतीक है कि भारत में जब एक महिला शोषित जाति से आती है, तो उसका संघर्ष दोगुना हो जाता है। उन्होंने पितृसत्ता और जातिवाद दोनों के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी।

(ख) दया नहीं, अधिकार की राजनीति

फूलन देवी ने कभी किसी से भीख या दया नहीं मांगी। उन्होंने अपने अधिकारों को छीना। जब उन्हें कानून से न्याय नहीं मिला, तो उन्होंने अपने स्तर पर न्याय किया। वे शोषित वर्ग को यह सिखाती हैं कि अधिकार मांगे नहीं जाते, छीनने पड़ते हैं।

(ग) निषाद/मल्लाह समाज की राजनीतिक चेतना की जननी

उत्तर प्रदेश और पूरे उत्तरी भारत के निषाद, कश्यप, बिंद, मल्लाह और केवट समाज में जो आज राजनैतिक चेतना और गोलबंदी दिखती है, उसकी सबसे बड़ी नीव फूलन देवी ने रखी थी। उन्होंने इस समाज को यह अहसास कराया कि वे केवल नदियां पार कराने वाले केवट नहीं हैं, बल्कि देश की सत्ता की पतवार संभालने के भी हकदार हैं।

(घ) आत्मसम्मान की अमर गाथा

फूलन देवी का नाम आज भी किसी भी पीड़ित महिला के अंदर अन्याय से लड़ने की ताकत भर देता है। वे यह संदेश देती हैं कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी विकट क्यों न हों, आत्मसम्मान से समझौता कभी नहीं करना चाहिए।

8. उपसंहार: इतिहास के पन्नों में फूलन देवी का स्थान

मुख्यधारा के इतिहासकारों ने भले ही फूलन देवी को लंबे समय तक केवल एक डाकू या बागी के चश्मे से देखने की कोशिश की, लेकिन भारत के बहुजन, दलित, पिछड़े और शोषित समाज के लिए वे क्रांति की देवी और आत्मसम्मान की शेरनी हैं।

फूलन देवी का जीवन इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि एक बेहद गरीब, अनपढ़ और प्रताड़ित महिला किस तरह अपनी इच्छाशक्ति के बल पर बंदूक से लेकर संसद तक का सफर तय कर सकती है। 25 जुलाई को उनके परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें याद करना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि उस संकल्प को दोहराना है जो उन्होंने लिया था—जब तक समाज में आखरी शोषित व्यक्ति पर अत्याचार होता रहेगा, तब तक हर पीड़ित के अंदर से एक फूलन देवी जन्म लेती रहेगी। दलित, शोषित समाज को अपने अथक संघर्ष क बल पर न्याय पाना होगा। हर गांव, कस्बे में उत्पीड़न और अत्याचार के खिलाफ अपना स्वाभिमान और सम्मान पान के लिए कई-कई फूलन देवीयों को पैदा करके उन्हें संरक्षित करना होगा।

(वीरांगना फूलन देवी के परिनिर्वाण दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन और विनम्र श्रद्धांजलि!)

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05