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भदंत नागार्जुन आर्य सुरई ससाई आधुनिक भारत में बौद्ध धम्म के पुनर्जागरण, दलित-शोषित वर्ग के उत्थान और आम्बेडकरवादी आंदोलन के सबसे प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। जापान में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और अपना संपूर्ण जीवन तथागत बुद्ध के करुणा और समता के संदेश को समर्पित कर दिया। भदंत आर्य नागार्जुन सुरई ससाई का जन्म 30 अगस्त 1935 को जापान के ओकायामा प्रान्त के निमी के समीप स्थित सुगाओ गाँव में हुआ था। उनका बचपन का नाम मिनोरू ससाई था। युवावस्था में जीवन के गहरे प्रश्नों और आध्यात्मिक खोज के चलते वे बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हुए। 14 वर्ष की आयु में उन्होंने बौद्ध भिक्षु के रूप में दीक्षा ली, जहाँ उनके गुरु शुजुमा यामामोटो ने उन्हें सुरई नाम दिया। इसके बाद उन्होंने तोक्यो के ताइशो विश्वविद्यालय से बौद्ध दर्शन और साहित्य का गहन अध्ययन किया। जापान में शिंगोन परंपरा में दीक्षित होने के बाद, ससाई के मन में बुद्ध की मूल शिक्षाओं और साधना की गहरी समझ हासिल करने की तीव्र लालसा जागी। 1966 में वे उच्च विपश्यना ध्यान की साधना के लिए थाईलैंड चले गए।
भारत आगमन और ऐतिहासिक मोड़: वर्ष 1966 में सुरई ससाई पहली बार भारत पहुंचे। भारत आने के बाद वे प्रसिद्ध जापानी बौद्ध भिक्षु निकिदात्सु फूजी (गुरुजी फूजी) के संपर्क में आए और बिहार के राजगीर में विश्व शांति स्तूप के निर्माण कार्य में सहयोग करने लगे। राजगीर प्रवास के दौरान उनके जीवन में एक अलौकिक मोड़ आया। ससाई बताते हैं कि एक रात उन्हें एक स्वप्न आया, जिसमें एक श्वेत वस्त्रधारी महापुरुष ने उनसे कहा— ‘नागपुर जाओ, वहाँ तुम्हारा वास्तविक कार्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।’ इस स्वप्न के बाद वे राजगीर से निकलकर महाराष्ट्र के नागपुर पहुँचे। नागपुर वही ऐतिहासिक भूमि थी जहाँ 14 अक्टूबर 1956 को बोधिसत्व डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। नागपुर में जब ससाई की भेंट 1956 के दीक्षा समारोह के मुख्य प्रबंधक वामनराव गोडबोले से हुई, तब गोडबोले के घर पर डॉ. आम्बेडकर की तस्वीर देखते ही ससाई पहचान गए कि स्वप्न में आने वाले महापुरुष बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ही थे। इसके बाद उन्होंने नागपुर को ही अपना स्थायी कार्यक्षेत्र बना लिया।
नागपुर में धम्म प्रचार और संघर्ष: 1960 के दशक के उत्तरार्ध में नागपुर की दलित और शोषित बस्तियों में एक जापानी भिक्षु का पहुँचना कौतूहल का विषय था। ससाई ने मराठी और हिंदी भाषा सीखी और स्थानीय लोगों के सुख-दुख में पूरी तरह घुल-मिल गए।
जय भीम का उद्घोष: उन्होंने बस्तियों में घूम-घूमकर जय भीम का अभिवादन स्वीकार किया और लोगों को संगठित करना शुरू किया।
विहारों का निर्माण: उन्होंने नागपुर और आसपास के क्षेत्रों में सैकड़ों छोटे-बड़े बौद्ध विहारों, वाचनालयों और ध्यान केंद्रों की स्थापना करवाई।
सामाजिक क्रांति: उन्होंने अंधविश्वास, कुरीतियों और नशामुक्ति के खिलाफ सघन अभियान चलाया और डॉ. आम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं को जन-जन तक पहुँचाया।
भारतीय नागरिकता की प्राप्ति
1980 के दशक के अंत में भारत में उनके लंबे प्रवास को लेकर वीजा संबंधी तकनीकी अड़चनें आईं और सरकार द्वारा उन्हें जापान निर्वासित करने की स्थिति बन गई। उस समय नागपुर सहित पूरे महाराष्ट्र की जनता सड़क पर उतर आई। लाखों आम्बेडकरवादी अनुयायियों ने ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया। जनभावनाओं और न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद, भारत सरकार ने 1987 में उन्हें पूर्ण भारतीय नागरिकता प्रदान की। भारतीय नागरिकता प्राप्त करते ही नियमानुसार उनकी जापानी नागरिकता समाप्त हो गई। उन्होंने स्वेच्छा से अपने जन्मभूमि के अधिकारों को त्यागकर भारत माता और बाबासाहेब के मिशन को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
प्रमुख आंदोलन और ऐतिहासिक योगदान: भदंत आर्य नागार्जुन सुरई ससाई ने न केवल धम्म प्रचार किया, बल्कि बौद्ध पहचान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व भी किया:
महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन (बोधगया): तथागत बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल बोधगया महाविहार के प्रबंधन में बौद्धों का पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए भंते ससाई ने राष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक आंदोलन शुरू किया। उन्होंने महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन के तहत देशव्यापी पदयात्राएँ, धरने और रैलियाँ आयोजित कीं।
मानसर पुरातात्विक उत्खनन: नागपुर के निकट मानसर में प्राचीन बौद्ध अवशेषों की खोज और उत्खनन में भदंत ससाई का अभूतपूर्व योगदान रहा। उन्होंने तर्क दिया कि यह स्थल प्राचीन महायान बौद्ध दार्शनिक आचार्य नागार्जुन की कर्मभूमि और प्राचीन प्रवरपुर है। इसके संरक्षण हेतु उन्होंने बोधिसत्व नागार्जुन स्मारक संस्था व अनुसंधान केंद्र की स्थापना की।
दीक्षाभूमि स्मारक का विकास: वे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर स्मारक समिति, दीक्षाभूमि, नागपुर के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। उन्होंने दीक्षाभूमि को एक वैश्विक बौद्ध तीर्थ और भव्य स्मारक के रूप में विकसित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में भूमिका: वर्ष 2003 से 2006 तक भदंत ससाई ने भारत सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य के रूप में कार्य किया, जहाँ उन्होंने बौद्ध समुदाय के अधिकारों, छात्रवृत्तियों और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए कई नीतियां बनवाईं।
भारत-जापान सांस्कृतिक सेतु: उन्होंने जापान के नागरिकों और बौद्ध विद्वानों को डॉ. आम्बेडकर के सामाजिक न्याय के दर्शन और भारत के नवयान बौद्ध आंदोलन से परिचित कराया। जापान में ऊ१. इुंं२ंँीु अेुी‘िं१ कल्ल३ी१ल्लं३्रङ्मल्लं’ अ२२ङ्मू्रं३्रङ्मल्ल ाङ्म१ ए४िूं३्रङ्मल्ल (इअकअए) की स्थापना में उनकी केंद्रीय भूमिका रही, जिसके जरिए गरीब भारतीय छात्रों की शिक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाया जाता है।
भदंत सुरई ससाई एक निर्भीक, ओजस्वी और क्रांतिकारी भिक्षु के रूप में जाने जाते हैं। वे केवल ध्यान और पूजा-पाठ तक सीमित रहने वाले संन्यासी नहीं हैं, बल्कि वे अन्याय के खिलाफ सड़क पर उतरने वाले संघर्षशील योद्धा हैं। वे अक्सर कहते हैं: ‘‘बुद्ध का धम्म केवल मंदिरों में बैठने के लिए नहीं है; यह शोषितों, पीड़ितों और गरीबों को आत्मसम्मान और समानता से जीने का अधिकार दिलाने की शक्ति है।’’ उनकी दिनचर्या सादगीपूर्ण है। वे 90 वर्ष से अधिक की आयु में भी नागपुर (महाराष्ट्र) में रहकर बौद्ध धम्म के प्रचार, दीक्षाभूमि और समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
उपसंहार: 30 अगस्त को जन्म लेने वाले भदंत नागार्जुन आर्य सुरई ससाई का जीवन यह सिद्ध करता है कि संतों, समाज सुधारकों और बोधिसत्वों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। जापान में जन्म लेकर भारत की मिट्टी को अपनाना और डॉ. आम्बेडकर के सामाजिक न्याय के सपने को पूरा करने के लिए जीवन खपा देना, मानव इतिहास का एक विरल और प्रेरणादायक अध्याय है। भारत और विश्व का बौद्ध समाज उनके अतुलनीय त्याग, संघर्ष और समर्पण के प्रति सदैव ऋणी रहेगा।





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