




2026-10-04 12:52:00
डॉ. भीमराव आंबेडकर के वैचारिक आंदोलन को मूर्तरूप प्रदान करने वाले, सामाजिक व राजनीतिक क्रांति के द्योतक, एक राष्ट्रीय पार्टी के संस्थापक युगप्रवर्तक बहुजन समाज के महानायक साहेब मान्यवर कांशीराम जी इस देश के राजनीतिक क्षितिज की ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले ऐसे व्यक्तित्व थे जिनको उनके त्याग व महान कार्यों के लिए सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्रों में सदैव याद किया जायेगा। मान्यवर कांशीराम जी का जन्म 15 मार्च 1934 को खवासपुर जिला रोपड़ पंजाब में एक दलित सिख परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम विशन कौर तथा पिता का नाम हरी सिंह था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद कांशीराम जी की सन 1958 में डीआरडीओ के सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ मिलिट्री एक्सप्लोसिव, पूना में वैज्ञानिक के पद पर नियुक्ति हो गई। इस समय तक कांशीराम जी अविवाहित थे।
कांशीराम जी का व्यक्तित्व साधारण नहीं था बल्कि उनका बहुआयामी व्यक्तित्व था। वे एक अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री, इतिहासवेत्ता, दार्शनिक तथा भविष्यवक्ता थे। इन सब विशेषताओं के होने पर भी कांशीराम जी एक समाज सुधारक के रूप में ज्यादा विख्यात हैं। धार्मिक सुधार के लिए भी उन्होंने जनमानस को जाग्रत किया। सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सभी क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। उनके द्वारा योजनाबद्ध तरीके से लगातार सामाजिक आंदोलन व परिवर्तन के द्वारा कम ही समय में एक मजबूत सामाजिक संगठन (बामसेफ) तथा एक राष्ट्रीय पार्टी (बहुजन समाज पार्टी) को खड़ा कर देना बीसवीं सदी का एक जीता जागता उदाहरण है। दलित वर्ग, कमजोर, पिछड़े तथा अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को सोशल इंजीनियरिंग द्वारा जोड़कर बहुजन समाज पार्टी जैसे संगठन की स्थापना करना असंभव को संभव कर दिखाने का महान कार्य कांशीराम जी ने किया। बहुजन समाज पार्टी केवल एक राजनीतिक पार्टी ही नहीं बल्कि यह सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन भी है।
इसे बड़े मुकाम तक पहुंचने की पृष्ठभूमि की भी चर्चा करें। बात वर्ष 1964 की है। कांशीराम जी के कार्यालय के मैनेजमेंट ने वर्ष 1965 के लिए सरकारी छुट्टियों का निर्धारण करते समय बुद्ध पूर्णिमा तथा डॉ. आंबेडकर जयंती की छुट्टियां निरस्त करके उनके बदले दीवाली की छुट्टियां बढ़ा दीं। इस कदम से दलित वर्ग के अधिकारियों व कर्मचारियों में रोष व्याप्त हो गया। इसके लिए दीनाभाना नामक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने मैनेजमेंट के सामने अपना विरोध जताया तथा छुट्टियों के इस निर्धारण पर अपनी सहमति देने से मना कर दिया। छुट्टियों का यह मुद्दा कार्यालय मैनेजमेंट व दलित कर्मचारियों के बीच प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। मैनेजमेंट ने अड़ियल रवैया अपनाते हुए कर्मचारियों की मांग ठुकरा दी। साथ ही दीनाभाना जी को नौकरी से सस्पेंड कर दिया।
इस घटना से कांशीराम जी के मन को झटका लगा। उन्होंने इस लड़ाई में दीनाभाना जी का साथ देने का निश्चय किया। इसी समय कांशीराम जी की भेंट डी. के. खापर्डे जी से हुई। उन्होंने कांशीराम जी को डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित बहुत उच्च कोटि की पुस्तक एनिहिलेशन आॅफ कास्ट (जाति का विनाश/ जातिभेद का उच्छेद) पढ़ने के लिए दी। इस पुस्तक को पढ़ने से उनका मन व्यथित हो गया तथा इस पुस्तक को उन्होंने कई बार पढ़ा। इस पुस्तक कांशीराम जी की जीवन धारा ही बदल दी। डॉ. आंबेडकर को अपना आदर्श मानकर, कांशीराम जी ने उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का मन बनाया।
कांशीराम जी छुट्टियों वाले मामले में पूरी दिलचस्पी ले रहे थे। यह केस कोर्ट भी गया तथा रक्षा मंत्रालय भी पहुंचा। रक्षा मंत्रालय ने बुद्ध पूर्णिमा तथा डॉ. आंबेडकर जयंती की छुट्टी को कर्मचारियों की मांग के अनुरूप मान लिया तथा पूना कार्यालय के मैनेजमेंट को फटकार लगाई। दीनाभाना जी की जीत हुई तथा उनका निलंबन निरस्त करना पड़ा। इस जीत से दलित वर्ग के कर्मचारियों का मनोबल बढ़ गया। कांशीराम जी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला किया। उन्होंने 1971 में अपनी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। वे पूना छोड़कर दिल्ली आ गये। कांशीराम जी ने यह प्रण किये:
●मैं आजीवन अविवाहित रहूंगा।
●मैं अपने परिवार को त्याग दूंगा।
●मैं अपने लिए कोई सम्पत्ति नहीं रखूंगा।
●मैं अपना पूरा जीवन फुले-आंबेडकरी मिशन को आगे बढ़ाने में लगाऊंगा।
कांशीराम जी का रहन सहन बहुत साधारण, वेशभूषा साधारण, खानपान साधारण लेकिन विचारधारा उच्च कोटि की थी। स्वभाव से वे अक्खड़, फक्कड़, घुमक्कड़, त्यागी, स्पष्टवादी तथा असीम हौसले के धनी थे। उन्होंने अब अपना सारा ध्यान फुले-आंबेडकरी मिशन के अनुसार दलित, कमजोर तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के उत्थान व सशक्तिकरण पर केन्द्रित कर दिया।
कांशीराम जी ने अपने साथियों से विचार विमर्श करके सर्वप्रथम कर्मचारी संगठन की नींव रखी और 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉईज फेडरेशन) नामक संगठन की औपचारिक स्थापना की। उन्होंने पूरे देश में दिन रात घूम-घूम कर बैकवर्ड, दलित तथा अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों को बामसेफ से जोड़ा। इस संगठन को बहुत मजबूत, सार्थक तथा कैडर वाला संगठन बनाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की। उनमें संगठन करने की अद्वितीय शक्ति थी। उन्हें मालूम था कि संगठन को मजबूत बनाने के लिए सदस्यों को कैडर का प्रशिक्षण देना आवश्यक है। इसलिए उन्होंने पूरे देश में बामसेफ के सदस्यों को कैडर का प्रशिक्षण देने के लिए अनेक कैडर कैम्पों का आयोजन किया। वे स्वयं भी एक कर्मठ कार्यकर्ता व अनुशासित कैडर की तरह व्यवहार करते थे।
इन कैडर कैम्पों के माध्यम से कांशीराम जी ने डॉ. आंबेडकर, महात्मा फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार रामास्वामी तथा नारायण गुरु आदि महानायकों की शिक्षाओं तथा मिशन को कर्मचारियों के मस्तिष्क में पूरी निष्ठा से भर दिया। साथ ही डॉ. आंबेडकर की इच्छा वाला मंत्र पे बैक टू सोसाइटी (समाज को वापस लौटाना) का भी भरपूर प्रचार प्रसार किया तथा कर्मचारी वर्ग को इस पर अमल भी करने के लिए प्रेरित किया। कांशीराम जी ने कैडर के लिए आवश्यक अनुशासन, नियम तथा दिशा निर्देश निर्धारित कर दिये। इस प्रकार उन्होंने पूरे देश में लाखों कर्मचारियों का कैडर वाला मजबूत संगठन बामसेफ खड़ा कर दिया जिसकी कैडर वाले संगठन की पहचान बन गई जो आज तक कायम है। बामसेफ का मुख्य कार्य बुद्धिजीवी सेल अर्थात ब्रेन (मस्तिष्क) का काम करना था और इसे गैर-राजनीतिक, गैर-धार्मिक तथा गैर-आंदोलनकारी संगठन रखा गया। इसके बाद कांशीराम जी ने 6 दिसंबर 1981 को दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य धरना, प्रदर्शन तथा संघर्ष संबंधित कार्यों में भाग लेना था। बामसेफ तथा डीएस-4 दोनों ही संगठन भली-भांति अपना-अपना काम करने लगे। इसके बाद कांशीराम जी ने फुले-आंबेडकरी मिशन को अधिक शक्ति और गति प्रदान करने के लिए और इस आंदोलन को और आगे ले जाने के लिए एक राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस की। अब उनके मन में यह बात बड़े जोर से चल रही थी कि हमारे लोगों को अब लेने वाला नहीं बल्कि देने वाला बनाना है। हम अब अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव में टिकट बांटेंगे न कि टिकट मांगने वाले बनेंगे। इसी ध्येय के साथ कांशीराम जी ने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी नामक राजनीतिक दल की स्थापना की।
कांशीराम जी के निर्देशन में कार्यकतार्ओं की कड़ी मेहनत से बसपा आगे बढ़ने लगी और कम समय में ही इसकी पहचान स्थापित हो गई। कांशीराम जी ने कमाल की सोशल इंजीनियरिंग अपनाई। इसके द्वारा उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग तथा अनेक अगड़ों को भी बसपा से जोड़ा। अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने के लिए कांशीराम जी ने ये कुछ नारे दिये:
●वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा।
●दलित व पिछड़ों को भी देश का हुक्मरान बनाना है।
●अपने समाज को बिकाऊ समाज नहीं बनने देना है।
●बसपा को एक वोट, एक नोट दो।
●हमारे लोग गरीब व साधनहीन हैं इसलिये प्रचार के लिये, आंदोलन के लिये अपने छोटे-छोटे साधनों को बड़े पैमाने पर प्रयोग में लाओ।
●हम टिकट मांगने वाले नहीं बल्कि टिकट देने वाले बनेंगे।
●हमे मजबूत सरकार नहीं, बल्कि मजबूर सरकार चाहिए।
●हम इस देश में बाबा साहेब के सपनों को साकार करने के लिए समतामूलक समाज की स्थापना करेंगे।
●हमको शासन-प्रशासन तथा देश के सभी संसाधनों में भागीदारी लेनी है।
●हम बाबा साहेब द्वारा बनाये गये संविधान की रक्षा करेंगे तथा उसके साथ किसी को छेड़छाड़ नहीं करने देंगे।
●हम मंडल कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए भी आरक्षण लागू करवायेंगे।
इस प्रकार कांशीराम जी की सोशल इंजीनियरिंग तथा उनकी अद्भुत संगठनकर्ता क्षमता रंग लाने लगी और बसपा दिन-प्रतिदिन मजबूत होती चली गई। चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के विधायक तथा सांसद जीतने लगे। सन 1993 में समाजवादी पार्टी तथा बसपा ने मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा और बहुमत प्राप्त करके सरकार बनाई। यह कांशीराम जी की पहली बड़ी जीत थी। इसका श्रेय भी कांशीराम जी को ही जाता है। कांशीराम जी स्वयं 1991 में इटावा से उपचुनाव में पहली बार लोकसभा सांसद चुने गये। इसके बाद वे 1996 में होशियारपुर (पंजाब) से लोकसभा सांसद तथा बाद में राज्य सभा के सदस्य चुने गये।
कांशीराम जी ने 27 अगस्त 1997 को भारत की आजादी की गोल्डन जुबली (50वीं वर्षगांठ) के अवसर पर राज्य सभा में अपने भाषण में कहा:
‘हमारे देश में अंग्रेजों के राज में जो कल्चरल रिवोल्ट (सांस्कृतिक परिवर्तन) देश के कोने-कोने में नजर आता था, पिछले पचास सालों में हमने उसका कोई नोट नहीं लिया बल्कि उल्टे उसे दबाने की कोशिश की जाती रही है। इसके दुष्परिणाम आज देश भुगत रहा है। महाराष्ट्र में 1848 से 1956 तक यह रिवोल्ट चलता रहा। 1848 से 1890 तक महामना ज्योतिबा फुले, 1892 से 1922 तक शाहूजी महाराज तथा 1922 से 1956 तक डॉ. आंबेडकर की देखरेख में चला रिवोल्ट देखने को मिला। लेकिन इस रिवोल्ट का कोई नोट वर्तमान सरकारों ने नहीं लिया गया। गांधी जी ने 1932 में कम्यूनल अवॉर्ड में अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन किया और यह अधिकार छीन लिया गया। इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री रहते हुए 1942 में अंग्रेज सरकार के सामने अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों के लिए पृथक व्यवस्थापन (सेपरेट सेटलमेंट) की मांग रखी। डॉ. आंबेडकर ने कहा—हमारा पृथक निर्वाचन का अधिकार छीन लिया। अलग देश हम मांग नहीं रहे। देश में बहुतायत में पड़ी कृषि भूमि और कृषि के उपयोग में न आने वाली बहुत भूमि उपलब्ध है। भूमिहीन लोग ही इस भूमि पर अनाज उगाते हैं। इसलिये इन भूमिहीनों को भूमि के अलग-अलग पैकेट्स बनाकर यह भूमि इन भूमिहीन लोगों को दे दी जाये। इससे कृषि की पैदावार बढ़ेगी व साथ ही बेरोजगारी की समस्या भी कम होगी। अंग्रेज सरकार ने आंबेडकर की इस मांग को मानकर इसे पूरा करने का वायदा भी किया था। लेकिन बाद में देश आजाद हो गया और अंग्रेज सरकार चली गई। यह मांग डॉ. आंबेडकर ने कानून मंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने भी रखी। सिद्धांत रूप से सहमत होते हुए भी अन्य कारणों से नेहरू जी ने ऐसा करने से मना कर दिया। अन्य उदाहरण भी हैं। इस प्रकार इन कल्चरल रिवोल्ट का न कभी नोट लिया न ही उन पर कुछ काम किया। इसके दुष्परिणाम देश व अनुसूचित जाति/जनजाति के लोग भुगत रहे हैं। लेकिन मैं बता देना चाहता हूं कि हमने इसका नोट लिया है। हम इस पर काम करेंगे। हम अपने रास्ते स्वयं बनायेंगे तथा हम भी इस देश के हुक्मरान बनेंगे।’
कांशीराम जी पूरे देश में भ्रमण कर दिन रात मेहनत करके बसपा को मजबूत करने में जुटे रहे। इसके परिणामस्वरूप अनेक प्रदेशों में बहुजन समाज पार्टी के विधायक और नगर निकायों में पार्षद तथा जिला पंचायत सदस्य चुनकर आने लगे। बहुजन समाज पार्टी को 1996 में राष्ट्रीय दल की मान्यता मिली।
सन 1995, 1997 तथा तीसरी बार 2002 में बहन कु. मायावती के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सरकार बनी। इसी क्रम में सन 2007 में मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी की उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनी। कांशीराम जी की ये वे उपलब्धियां हैं जिन्हें देखकर राजनीतिक पंडित भी भौचक्के रह गये। कांशीराम जी का बनाया हुआ कारवां निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है।
कांशीराम जी के आंदोलन तथा उत्तर प्रदेश में बनी बसपा सरकार का यह करिश्मा हुआ कि देश में अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को गुलामी का अहसास समाप्त हो गया, वे अपने अधिकारों व ताकत को समझने लगे और उनका मनोबल अब बढ़ चुका है। ये लोग अब किसी भी प्रकार के अत्याचार को सहन नहीं कर रहे हैं, उसका विरोध भी कर रहे हैं तथा अपने स्वाभिमान को समझ रहे हैं और इसके लिए लड़ भी रहे हैं।
बाबा साहेब के सपनों को ही साकार करने की कड़ी में ही मान्यवर कांशीराम जी ने 6 मई 2002 को आरक्षण के शताब्दी महोत्सव पर तथा 13-14 अक्टूबर 2002 को धम्मचक्कप्पवत्तन दिवस पर नागपुर में तथा बहुजन समाज दिवस पर 15 मार्च 2003 को बम्बई (दादर) के शिवाजी पार्क में विशाल रैली में यह घोषणा की कि हम धम्मचक्कप्पवत्तन की गोल्डन जुबली के अवसर पर बुद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करेंगे। लेकिन दुखद रूप से वर्ष 2003 में मान्यवर मस्तिष्क आघात (स्ट्रोक) के कारण गंभीर रूप से पीड़ित हो गये। उनका सार्वजनिक जीवन बहुत सीमित हो गया।
9 अक्टूबर 2006 को नई दिल्ली में 72 वर्ष की आयु में मान्यवर कांशीराम जी का उनके आवास, हुमायूं रोड, नई दिल्ली पर परिनिर्वाण हो गया। दिल्ली में ही निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। उनकी इच्छा के अनुसार ही बहन कु. मायावती ने उन्हें मुखाग्नि दी। उनके निधन की खबर पूरे देश में फैल गई। देश के अनेक प्रदेशों से उनके अनुयायी अपने नेता के अंतिम दर्शनों के लिए दिल्ली पहुंचे। उनके आवास पर उनके अंतिम दर्शन के लिए बहुत भारी भीड़ जमा हो गई जिसे नियंत्रित करने के लिए दिल्ली पुलिस को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। निगमबोध घाट पर लाखों की भीड़ जमा थी। तमाम मीडिया और चैनल वाले उनके अंतिम संस्कार को कवर करने के लिए मौजूद थे। निगमबोध घाट और आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक को नियंत्रित करना पड़ा था।
मान्यवर कांशीराम जी के पूरे जीवन का आकलन करें तो हम पाते हैं कि जो उन्होंने कहा सो किया। न उन्होंने विवाह किया, न अपने पैतृक घर गये यहां तक कि अपनी माता जी की मृत्यु पर भी, न ही कोई सम्पत्ति बनाई और जीवन पर्यन्त फुले-अंबेडकर के मिशन को आगे बढ़ाने में समर्पण भावना से अथक दिन-रात लगे रहे और करके भी दिखाया। कांशीराम जी के जीवन तथा महान कार्यों से सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |