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हिंदी साहित्य और बहुजन विमर्श के आकाश में प्रो. तुलसी राम एक ऐसे ध्रुवतारे की तरह हैं, जिनकी चमक ने अकादमिक जगत और आम समाज, दोनों को समान रूप से आलोकित किया। वे केवल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर नहीं थे, बल्कि वे उस जिजीविषा के साक्षात प्रतीक थे जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती। प्रो. तुलसी राम का जन्म 1 जुलाई 1949 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अत्यंत पिछड़े और विपन्न गाँव धरमपुर गाँव में हुआ था। वे चमार जाति में पैदा हुए थे। उनके बचपन का परिवेश आर्थिक तंगी से तो जूझ ही रहा था, लेकिन उससे भी भयानक संकट था—गाँव में फैला गहरे स्तर का पाखंड और अंधविश्वास। उनकी आत्मकथा मुर्दहिया और मणिकर्णिका केवल एक व्यक्ति के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि वह भारतीय ग्रामीण समाज के भीतर गहरे धंसे जातिवाद, अंधविश्वास, पाखंड और उस औपनिवेशिक मानसिकता का समाजशास्त्रीय दस्तावेज है जिसे मुख्यधारा के इतिहासकारों ने हमेशा अनदेखा किया।
अंधविश्वास के कारण झेला अपशकुनी होने का दंश
बचपन में ही वे चेचक (स्मॉलपॉक्स) जैसी महामारी की चपेट में आ गए। उस दौर में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव और पाखंड के कारण चेचक को माता माई का प्रकोप माना जाता था। इस बीमारी के कारण नन्हे तुलसी राम की दाईं आँख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई और उनका चेहरा दागदार हो गया। सामंती और अंधविश्वासी समाज ने इस बच्चे के प्रति सहानुभूति दिखाने के बजाय उन्हें अपशकुनी घोषित कर दिया। उनके अपने परिवार और गाँव के लोग मानने लगे कि उनके जन्म और इस रूप के कारण ही परिवार पर विपत्तियां आ रही हैं। यहाँ तक कि खुद उनके अंधविश्वासी दादा उन्हें फूटी आँख से नहीं देखना चाहते थे। एक बच्चे के कोमल मन पर इस सामाजिक तिरस्कार ने जो घाव दिए, उसने आगे चलकर उनके भीतर तर्कवाद का बीज बोया। जिस समाज ने तुलसी राम को अवांछित मानकर हाशिए पर धकेल दिया था, उसी समाज को चुनौती देने के लिए उन्होंने अक्षरों का सहारा लिया। गाँव के प्राथमिक स्कूल से उनकी पढ़ाई शुरू हुई, जहाँ कदम-कदम पर जातिगत भेदभाव मौजूद था। दलित बच्चों को टाट-पट्टी से दूर जमीन पर बैठना पड़ता था और सवर्ण शिक्षक बात-बात पर उन्हें अपमानित करते थे। तुलसी राम जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कैसे गाँव के श्मशान घाट (जिसे वे मुर्दहिया कहते थे) के पास बैठकर वे घंटों पढ़ा करते थे, क्योंकि वहाँ उन्हें परेशान करने वाला कोई नहीं होता था। जिस जगह से लोग डरते थे, वह जगह इस विलक्षण बालक के लिए ज्ञान साधना का केंद्र बन गई।
आजमगढ़ से बनारस तक का सफर
तमाम सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को तोड़ते हुए उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए आजमगढ़ शहर और फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुँचे। बीएचयू का माहौल उनके वैचारिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहाँ आकर उन्होंने मार्क्सवाद, वैश्विक राजनीति और बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को गहराई से पढ़ना शुरू किया। वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय हुए और शोषितों के हक के लिए आवाज उठाई। बीएचयू के बाद तुलसी राम जी ने भारत के सबसे प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का रुख किया। यहाँ से उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की और बाद में जेएनयू के स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज के अंतर्गत सेंटर फॉर रशियन एंड सेंट्रल एशियन स्टडीज में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए। एक गाँव के श्मशान के किनारे बैठकर पढ़ने वाला लड़का देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विशेषज्ञ बनकर प्राध्यापक की कुर्सी पर बैठा था। यह केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि पूरे बहुजन समाज के बौद्धिक सामर्थ्य का उद्घोष था। प्रो. तुलसी राम को रशियन स्टडीज और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का गहरा ज्ञान था। उन्होंने सोवियत संघ के पतन, वैश्विक राजनीति और कम्युनिस्ट आंदोलनों पर कई महत्वपूर्ण अकादमिक शोध पत्र और पुस्तकें लिखीं। छात्रों के प्रिय तुलसी दा: जेएनयू के कैंपस में वे छात्रों के बीच तुलसी दा के नाम से लोकप्रिय थे। उनकी कक्षाएं केवल रशियन स्टडीज तक सीमित नहीं होती थीं; वे अपने व्याख्यानों में मार्क्स, बुद्ध, अम्बेडकर और भारतीय लोक संस्कृति के अंतसंर्बंधों को इस तरह समझाते थे कि छात्र मंत्रमुग्ध रह जाते थे।
मुर्दहिया और मणिकर्णिका: हिंदी साहित्य का वैचारिक भूचाल
प्रो. तुलसी राम ने अकादमिक क्षेत्र में बहुत काम किया था, लेकिन हिंदी जगत में उन्हें जो कालजयी ख्याति मिली, वह उनकी दो आत्मकथाओं से मिली: मुर्दहिया (2010) और मणिकर्णिका (2014)। हिंदी में ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन या कौशल्या बैसंत्री की दोहरा अभिशाप जैसी आत्मकथाएं मुख्य रूप से आक्रोश, पीड़ा और सीधे सामाजिक प्रतिशोध की भाषा में लिखी गई हैं। लेकिन प्रो. तुलसी राम की मुर्दहिया की शैली बिल्कुल जुदा है। तुलसी राम जी ने अपने जीवन की सबसे क्रूर और दर्दनाक घटनाओं को भी एक गहरे व्यंग्य और हास्य के पुट के साथ लिखा है। वे अपनी पीड़ा पर रोते नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की मूर्खता और पाखंड पर इस तरह हंसते हैं कि पाठक शोषक वर्ग की वैचारिकी से घृणा करने लगता है। मुर्दहिया में आजमगढ़ के ग्रामीण अंचल की लोक-कथाओं, भूतों-प्रेतों के अंधविश्वासों, लोक-देवताओं (जैसे डीह बाबा) और वहां की अनूठी उप-संस्कृतियों का ऐसा जीवंत चित्रण है कि वह एक बेहतरीन समाजशास्त्रीय केस-स्टडी बन जाती है। मुर्दहिया में केवल इंसानों का जिÞक्र नहीं है, बल्कि मुर्दहिया के गिद्ध, गाँव के गधे और मवेशी भी कहानी के जीवंत पात्र बनकर उभरते हैं। लेखक ने दिखाया है कि कैसे सामंती व्यवस्था में एक अछूत और एक बेजुबान जानवर की स्थिति लगभग एक जैसी ही थी।
मार्क्स और बुद्ध का संगम
प्रो. तुलसी राम वैचारिक रूप से किसी एक संकीर्ण दायरे में बंधने वाले चिंतक नहीं थे। उनका पूरा जीवन दर्शन दो महान विचारों के समन्वय पर टिका था—मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन। वे मानते थे कि भारत के संदर्भ में केवल आर्थिक वर्ग संघर्ष से क्रांति नहीं आ सकती, जब तक कि यहाँ की सदियों पुरानी जाति व्यवस्था पर तीखा प्रहार न किया जाए। वे कम्युनिस्ट आंदोलनों में जाति के सवाल को शामिल करने के सबसे मुखर पैरोकार थे। अपने जीवन के उत्तरार्ध में वे भगवान बुद्ध के विचारों की ओर गहरे आकर्षित हुए। बाबासाहेब अम्बेडकर की तरह उनका भी यह दृढ़ विश्वास था कि सामाजिक समता के लिए एक ऐसे नैतिक और पाखंड-मुक्त धम्म (धर्म) की आवश्यकता है जो विज्ञान, तर्क और इंसानी करुणा पर आधारित हो। उन्होंने अंधविश्वास के घने अंधकार को मिटाने के लिए बुद्ध के अप्प दीपो भव (अपना दीपक स्वयं बनो) के सिद्धांत को सर्वोपरि माना।
रूढ़िवाद और पाखंडवाद के खिलाफ संघर्ष
तुलसी राम जी का पूरा लेखन और जीवन वास्तव में पाखंडवाद के खिलाफ एक सतत युद्ध था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में दिखाया कि कैसे धर्म, ज्योतिष, भूत-प्रेत और शकुन-अपशकुन जैसी मनगढ़ंत बातें शोषित वर्ग को मानसिक रूप से पंगु बनाए रखने के औजार हैं। वे लिखते हैं कि जब तक बहुजन समाज इन पाखंडी मान्यताओं और अंधविश्वासों के चंगुल से आजाद नहीं होगा, तब तक वह अपने राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की लड़ाई सही मायने में नहीं लड़ सकता। शिक्षा को वे केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं मानते थे, बल्कि उसे दिमाग को अंधविश्वासों से मुक्त करने वाली एक चेतना के रूप में देखते थे।
निधन: प्रो. तुलसी राम का निधन 13 फरवरी 2015 को हुआ था। वे लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। प्रो. तुलसी राम पिछले काफी समय से किडनी (गुर्दे) की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। उनके दोनों गुर्दे काम करना बंद कर चुके थे, जिसकी वजह से वे लंबे समय से नियमित रूप से डायलिसिस पर चल रहे थे। बीमारी के चलते उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। आखिरकार, नई दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज के दौरान 65 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने और अंगों के काम बंद कर देने के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों और देश भर के बहुजन-वामपंथी विचारकों में शोक की लहर दौड़ गई थी। उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा और उनके विचारों के अनुरूप बिना किसी पाखंड या धार्मिक कर्मकांड के किया गया था। तुलसी राम जी को एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता है जो शरीर की तमाम गंभीर सीमाओं (बचपन में ही एक आंख की रोशनी चले जाने और बाद में दोनों किडनियां खराब होने) के बावजूद वैचारिक और बौद्धिक रूप से कभी नहीं थके। उनका इस तरह जाना अकादमिक जगत और सामाजिक न्याय के आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ी क्षति था।
आज जब हम डिजिटल क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में जी रहे हैं, तब भी प्रो. तुलसी राम के विचार और उनका जीवन हमारे लिए अत्यधिक प्रासंगिक हैं। आज भी हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा, पढ़ा-लिखा होने के बावजूद, नए-नए रूपों में पाखंड, अंधविश्वास और जातिगत संकीर्णता का शिकार हो रहा है। सोशल मीडिया के इस दौर में भी पहचान की राजनीति समाज को बांटने का काम कर रही है। ऐसे समय में प्रो. तुलसी राम की मुर्दहिया हमें याद दिलाती है कि असली प्रगतिशीलता केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि हमारी सोच और तार्किकता में होती है। विपरीत परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आपके भीतर अक्षरों के प्रति निष्ठा और अपने समाज को बदलने का जज्बा है, तो आप मुर्दहिया के एकांत से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े मंचों पर अपनी धाक जमा सकते हैं। उनका समतावादी दृष्टिकोण आज भी करोड़ों बहुजन युवाओं और न्यायप्रिय नागरिकों का मार्गदर्शन कर रहा है। प्रो. तुलसी राम जयंती दिवस पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके तार्किक और पाखंड-मुक्त समाज के सपने को आगे बढ़ाएं।





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