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हिंदी साहित्य के इतिहास और भारतीय बौद्धिक विमर्श में प्रोफेसर तुलसी राम का नाम केवल एक दलित आत्मकथाकार के रूप में दर्ज नहीं है, बल्कि वे एक ऐसे विचार-पुंज थे जिन्होंने भारतीय समाज की जटिलताओं को सुलझाने के लिए बुद्ध, मार्क्स और अम्बेडकर का एक दुर्लभ रसायन तैयार किया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज में रूसी अध्ययन के प्रोफेसर रहे तुलसी राम ने अपने जीवन और लेखन से यह सिद्ध किया कि भारत में वर्ग-संघर्ष और वर्ण-संघर्ष को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। वे सही मायनों में एक अम्बेडकरवादी कम्युनिस्ट थे—एक ऐसा बुद्धिजीवी जो अपनी जड़ों (दलित चेतना) से कटकर मार्क्सवादी नहीं बना, बल्कि जिसने मार्क्सवाद को भारतीय सामाजिक यथार्थ (जाति) की कसौटी पर कसकर अपनाया। उनका जन्म एक जुलाई, 1949 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में चिरैयाकोट के पास स्थित धरमपुर गांव में हुआ था। बचपन में चेचक के कारण एक आँख की रोशनी खोने की घटना ने उन्हें अंधविश्वास के क्रूर चेहरे से परिचित कराया। गाँव के लोग और परिवारवाले इलाज कराने के बजाय झाड़-फूंक और देवी-देवताओं की शरण में गए, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी आँख हमेशा के लिए चली गई। समाज ने उन्हें कनवा कहकर अपमानित किया। यहीं से उनके मन में धर्म और पाखंड के प्रति विद्रोह के बीज पड़े। उदाहरण के लिए, जब वे अपनी दादी या गाँव के अंधविश्वासी पात्रों का चित्रण करते हैं, तो वे उनसे नफरत नहीं करते, बल्कि उस व्यवस्था पर चोट करते हैं जिसने उन लोगों को अज्ञानी बनाए रखा। यह दृष्टि उन्हें एक बड़ा लेखक बनाती है—एक ऐसा लेखक जो पाप से घृणा करता है, पापी से नहीं। कहा जाता है कि गरीबी, अभाव, रूढ़ियों व कुरीतियों के बंधनों के साथ नाना सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए उन्हें बचपन से ही पुस्तकें पढ़ने का व्यसन हो गया था। इसलिए उच्च शिक्षा के सिलसिले में वे आजमगढ़ से काशी हिंदू विश्वविद्यालय पहुंचे तो सबसे ज्यादा खुश उसका पुस्तकालय देखकर हुए थे। यह सोचकर कि अब उनके मनचाही पुस्तकों के समुद्र में डूबने-उतरने में कोई बाधा नहीं होगी। यहीं पर वो कम्युनिस्ट राजनीति के सम्पर्क में आए और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर काम करने लगे। घर से बीएचयू तक का सफर तय करने में उन्हें कई कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा और भयंकर अभावों से गुजरना पड़ा और सामाजिक अपमान का दंश झेलना पड़ा। उन्होंने दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी। बाद में यहीं स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर हो गए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंध पर आइडियॉलॉजी इन सोवियत-ईरान रिलेशन्स: लेनिन टू स्टालिन नाम की किताब लिखी थी। इसके अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर कई पुस्तकें लिखीं लेकिन उनकी आत्मकथा सबसे अधिक चर्चित रही। आत्मकथा के दो खंडों मणिकर्णिका और मुर्दहिया में उन्होंने हिंदी पट्टी में दलित समाज के हालात का जिस बारीकी से वर्णन किया है वो हिंदी और खासकर दलित साहित्य की अमूल्य निधि है। उनकी आत्मकथा का पहला भाग मुर्दहिया 2010 में और दूसरा भाग मणिकर्णिका 2013 में प्रकाशित होने के पश्चात, उनके बचपन और बी.एच.यू. में छात्र जीवन का परिचय आम जन के लिए सुलभ हुआ। वरना 2008 तक तो वे अपने गाँव का पता तक सार्वजनिक करने को तैयार नहीं थे। 1997-98 में उन्होंने भारत अश्वघोष नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया। हालांकि यह पत्रिका बहुत लम्बी नहीं चल पायी। आलोचना और तद्भव जैसी पत्रिकाओं ने उनके गम्भीर और लम्बे लेखों का प्रकाशन किया। यत्र-तत्र, पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे हुए उनके लेख भारतीय राजनीति और समाज को समझने की अलग दृष्टि प्रदान करते हैं।
बौद्ध श्रमण चिन्तन परम्परा के चिन्तक
प्रो. तुलसीराम के जीवन में बुद्ध का विज्ञानबोध, कबीर का फक्कड़पन और डॉ. आंबेडकर की सामाजिक प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। इस तरह के जीवन का चुनाव उन्होंने स्वयं किया। हम समझ सकते हैं कि ऐसा जीवन चुनना कोई आसान नहीं रहा होगा। उनकी पत्नी श्रीमती प्रभा चौधरी कहती है कि मेरी शादी में एक दुल्हा व एक बाराती रिक्शे पर आये थे। बौद्ध रीति से विवाह सम्पन्न हुआ। उस समय वे जे.एन.यू. में सहायक प्रोफेसर थे। संचय जैसी कोई प्रवृत्ति उनके अन्दर नहीं थी। सम्भवत: यही कारण रहा होगा कि उन्होंने अपने विद्वतापूर्ण लेखों का भी कोई संग्रह नहीं प्रकाशित करवाया। जबकि उनके लेख बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। फक्कड़पन इतना कि वे अपने दोस्तों को अक्सर स्वयं खाना बनाकर खिलाते रहते थे। न जाने कितने व्यक्तियों और संस्थाओं को आर्थिक सहयोग करते थे। ज्ञान की भूख जबर्दस्त। किसी भी तथ्य का जिक्र बिना प्रमाण के नहीं करते थे। सामाजिक प्रतिबद्धता इतनी कि किसी की भी आलोचना करने से नहीं हिचकते थे। चाहे वे नेता हो, लेखक हों या कोई दल ही क्यों न हो। अपना पक्ष बड़ी निर्भीकता से रखते थे।
पुस्तकों से रहा लगाव
प्रो. तुलसी राम को पुस्तकों से बड़ा लगाव था। इनका निजी पुस्तकालय बहुत ही समृद्ध था। इनके पुस्तकालय में धर्म, राजनीति, साहित्य से लेकर विविध विधाओं की पुस्तकें थीं। वे गम्भीर अध्येता थे। लेखन व भाषणों में दिए गये सन्दर्भों से प्रो. तुलसी राम के ज्ञान का विस्तार व गहराई का अन्दाजा लगाया जा सकता है। उनके द्वारा दिए गये सन्दर्भों में बौद्ध साहित्य, वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, जैन धर्म के साहित्य, डॉ. अम्बेडकर के ग्रन्थों के साथ तमाम विदेशी लेखकों के साहित्यों की भरमार देखने को मिलती है। इनकी भाषा में विद्वता व सहजता का अनूठा मिश्रण दिखाई पड़ता है। डॉ. अम्बेडकर के पश्चात दलित समाज में पैदा होने वाले एक गम्भीर अध्येता, जिसका सामाजिक सरोकार भी उतना ही गहरा हो, की खोज की जाय तो सम्भवत: प्रो. तुलसी राम का नाम ही उभरकर सामने आयेगा। इनके लेखन में निर्भीकता, वैज्ञानिकता, तर्कशीलता, सामाजिक प्रतिबद्धता आदि तत्त्व विद्यमान हैं।
तीन बौद्धिक परम्पराओं के वाहक थे
प्रो. तुलसीराम मुख्य रूप से बुद्ध, मार्क्स और अम्बेडकर की बौद्धिक और वैचारिक परम्पराओं के वाहक थे। वे इन तीनों महापुरुषों के चिंतन के सामंजस्य से एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और जातिविहीन भारतीय समाज का निर्माण करना चाहते थे। प्रो. तुलसीराम पर बुद्ध, मार्क्स और आंबेडकर के साथ महात्मा फुले, रामास्वामी पेरियार का भी प्रभाव पड़ा था। वे अपने विचारों को इन्हीं महापुरुषों की चिन्तन परम्परा की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रो. तुलसीराम पर बुद्ध का गहरा प्रभाव था, जो मुर्दहिया और मणिकर्णिका में स्पष्ट दिखता है। वे करुणा, जागरूकता और जाति-विरोधी चेतना के लिए बुद्ध के दर्शन को प्रासंगिक मानते थे। वे मार्क्सवाद के समर्थक थे और सामाजिक परिवर्तन के लिए आर्थिक समानता को अनिवार्य मानते थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में वामपंथी आंदोलन के दौर को अपनी रचनाओं में जीवंत किया। वे अंबेडकरवादी विचारों से दृढ़ता से जुड़े हुए थे और वर्ण व्यवस्था व ब्राह्मणवाद को भारतीय समाज के लिए सबसे घातक मानते थे। पूँजीवाद आधुनिक काल की वैश्विक परिघटना है जिसके शोषक प्रवृत्ति पर महात्मा फुले से लेकर डॉ. आंबेडकर तक प्रश्न खड़ा करते हैं। वे मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के बीच सेतु का कार्य करते थे। उनका मानना था कि बेहतर समाज का निर्माण इन तीनों महापुरुषों के चिंतन से ही निकलेगा।
मार्क्सवादी दृष्टि: वे सोवियत रूस और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलनों के गहरे जानकार थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘सिया (सीआईए): राजनीतिक विध्वंस का अमेरिकी हथियार’ में अमेरिकी साम्राज्यवाद की पोल खोली। वे मानते थे कि दलितों की मुक्ति केवल सामाजिक सुधार से नहीं होगी, बल्कि संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर उनके अधिकार से होगी, जो कि एक मार्क्सवादी सोच है। प्रो. तुलसी राम मार्क्सवादी आन्दोलन पर आरोप लगाते हैं कि इसने पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष तो चलाया लेकिन भारतीय सामन्तवाद जिसे ब्राह्मणवाद के रूप में चिन्हित किया जाना चाहिए, के विरुद्ध संघर्ष नहीं छेड़ा। यह मार्क्सवाद की वैचारिक नासमझी थी।
अपने समय के कबीर थे
दलित-वाम समन्वय के आड़े आने वाली दलित शक्तियों को खरी-खरी सुनाने में तो वे अपने समय के कबीर ही बन जाते थे। कई साल पहले, एक दलित संगठन ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि में प्रयुक्त कुछ शब्दों पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए उसे जलाने की घोषणा की, तो तुलसीराम ने कहा था- मात्र चमार शब्द के इस्तेमाल के कारण जो लोग आज रंगभूमि जला रहे हैं वे अतिवादी हैं और उन्हें एक दिन पूरा बौद्ध साहित्य जलाना पड़ सकता है, क्योंकि उसमें भी चमार व चांडाल जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं। क्या वे इसके लिए तैयार हैं?
जाति व्यवस्था के घोर विरोधी
जाति व्यवस्था को वे परमाणु बम से भी कहीं ज्यादा घातक मानते थे। उनके शब्दों में आप किसी शहर पर परमाणु बम गिरा दीजिए तो वह उसकी एक-दो पीढ़ियों को ही नष्ट कर पायेगा। लेकिन हमारे समाज पर थोपी गई जाति व्यवस्था पीढी दर पीढ़़ी संभावनाओं का संहार करती आ रही है। वे कई लोगों की इस राय से कतई इत्तेफाक नहीं रखते थे कि विज्ञान व तकनीक प्रदत्त नये-नये आविष्कारों के उपयोग से जीवनशैली में आया बदलाव, सामाजिक बदलाव का वाहक बनेगा या एकमात्र विकास ही दलितों व वंचितों के सौ मर्जों की दवा सिद्ध होगा। उनकी मानें तो वैज्ञानिक आविष्कारों या भौतिक उपलब्धियों का काम सामाजिक परिवर्तन करना नहीं है। इस परिवर्तन के लिए सामूहिक चेतना जरूरी है और हमे केवल उसी पर निर्भर करना पड़ेगा। दिक्कत की बात यह है कि इधर इस चेतना को जगाने की जगह दूषित करने का काम ज्यादा हो रहा है।
वर्ण-व्यवस्था व हिन्दू धर्म की वैचारिकी सबसे बड़ी समस्या
प्रो. तुलसी राम मानते थे कि भारत की सबसे बड़ी समस्या वर्ण-व्यवस्था व हिन्दू धर्म की वैचारिकी है। वर्ण-व्यवस्था के कारण न केवल दलितों को, बल्कि शूद्रों और महिलाओं को भी अपमान एवं क्रूरता का दंश झेलना पड़ा। प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था के सिद्धान्तों के आधार पर ही शूद्रों तथा अस्पृश्यों को ज्ञान, सम्पत्ति तथा शस्त्र से वंचित रखा गया था। मनुस्मृति जैसे धर्मग्रन्थों में यह प्रावधान किया गया कि शूद्र और अस्पृश्य सम्पत्ति नहीं रख सकते यदि वे सम्पत्ति रखने का प्रयास करते हैं तो उनकी सम्पत्ति राजा द्वारा छीन ली जायेगी। दलितों को अमानवीय परिस्थिति में जीवन-यापन करने को बाध्य होना पड़ा। ज्ञान, सम्पत्ति तथा शस्त्र से विहीन होना पड़ा। वर्ण-व्यवस्था के आदर्शों का प्रभाव भारतीय जनमानस में इतना व्याप्त है कि गैर दलित आज भी दलितों को मनुष्य मानने को तैयार नहीं हैं। महिलाओं को भी भारतीय समाज पुरुषों के समान मानने को तैयार नहीं है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था में महिलायें शूद्र वर्ण में रखी गयी हैं। वर्ण-व्यवस्था का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि भारत एक देश के रूप में सदैव कमजोर बना रहा जिसके कारण सदियों तक विदेशियों ने इसे पराधीन बनाकर रखा। प्रो. तुलसीराम वर्ण-व्यवस्था की तुलना साम्राज्यवाद से करते हैं। जिस प्रकार साम्राज्यवादी देश अपने से कमजोर देश का शोषण-उत्पीड़न करता है उसी प्रकार वर्ण-व्यवस्थावादी समाज अपने से कमजोर समाज का शोषण-उत्पीड़न करता है। उनके शब्दों में वर्ण-व्यवस्था सदियों से चली आ रही एक आन्तरिक सवर्ण उपनिवेशवाद है, जो दलितों के शोषण पर कायम है। इससे खतरनाक फॉसिस्ट व्यवस्था कभी कहीं और स्थापित नहीं हुई। ऐसा सिर्फ भारत में है। साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद सिर्फ विदेशी ही नहीं होता, यह आन्तरिक भी होता है, अन्यथा अनेक देशों में आज भी अपने ही शासकों के विरुद्ध लोग क्यों लड़ते ? बुरा व्यवहार सिर्फ विदेशी ही नहीं करता है। भारत के दलितों के साथ जिस तरह का व्यवहार यहाँ के सवर्ण करते हैं वैसा व्यवहार करने के लिए कभी किसी विदेशी की जरूरत नहीं पड़ी।
हिन्दुत्व तथा राष्ट्रवाद वर्ण-व्यवस्था के नये नाम
प्रो. तुलसी राम भारतीय जनता पार्टी को वर्ण व्यवस्था समर्थक पार्टी मानते हैं। उनके अनुसार हिन्दुत्व तथा राष्ट्रवाद वर्ण-व्यवस्था के नये नाम हैं। वर्ण-व्यवस्था हिन्दू धर्म की कण्ठनली है। अत: जिस दिन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो जायेगी उस दिन यह धर्म भी अपना अस्तित्व खो बैठेगा। यही कारण है कि हिन्दू दार्शनिक तथा प्रचारक वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर की देन कहकर इसे हमेशा अन्धविश्वास का रूप देते रहे हैं। भाजपा वर्ण-व्यवस्था समर्थक पार्टी है। भाजपा जब भी और जहाँ भी सत्ता में आती है, वह सबसे पहले वर्ण-व्यवस्था के संस्थानिक स्तम्भों को धर्म तथा संस्कृति के कंकड़-पत्थर से मजबूत करने में व्यस्त हो जाती है, जिसके लिए उसकी सरकारें सबसे पहले स्कूली पाठ्यक्रमों में मिथकों तथा अन्धविश्वासों पर आधारित इतिहास भंजक पाठों को थोप देती हैं। जैसे गुजरात के नवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में भाजपा के मिथकबाजों ने लिखा है, वर्ण-व्यवस्था, आर्यों द्वारा विश्व मानव समाज को दिया गया सबसे बड़ा उपहार है। प्रो. तुलसी राम की दृष्टि में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में चलाये गये सामाजिक आन्दोलन एवं उनसे निकले विभिन्न राजनीतिक दल भी वर्ण-व्यवस्था को मजबूत करने का ही कार्य करते हैं। उनके अनुसार लोहियावादी संघ परिवार के निरन्तर सहयोगी रहे हैं। यूरोपीय सोशलिस्टों ने जिस तरह कम्युनिस्ट विरोध के नाम पर फासिस्टों को सहयोग दिया, वैसे ही लोहियावादी सोशलिस्टों ने कांग्रेस विरोध के नाम पर हमेशा हिन्दू फासिस्टों का साथ दिया है। प्रो. तुलसी राम वर्ण व्यवस्था व हिन्दू धर्म की वैचारिकी को स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुत्व व न्याय पर आधारित समाज निर्माण में प्रमुख बाधा मानते हैं। वे ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद दोनों के विरुद्ध संघर्ष चलाने का आह्वान करते हैं। वे बुद्धवाद, मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद के उद्देश्यों में साम्यता देखते हैं। हालाँकि तीनों महापुरुषों के मार्ग को लेकर बहस की आवश्यकता है। लेकिन इतना तो तय है कि बेहतर समाज का निर्माण का मार्ग इन्हीं महापुरुषों के चिन्तन से निकलेगा जिसमें प्रो. तुलसी राम के विपुल साहित्य की भूमिका अहम होगी।
निधन: प्रो. तुलसीराम लम्बी और कष्टप्रद बीमारी से जूझते हुए 13 फरवरी 2015 को निर्वाण प्राप्त हो गये। वे वर्तमान केन्द्रीय सरकार के फासीवादी स्वरूप को पहले ही पहचान गये थे जिसको रेखांकित करने से लेकर आज भी फासीवादी विरोधी परम्परा के राजनीतिक उत्तराधिकारियों में बहस चल रही है। प्रो. तुलसीराम का जीवन और उनकी दृष्टि हमें मानव विरोधी शोषक परम्पराओं को समझने तथा स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुत्व व न्याय पर आधारित एक नया प्रबुद्ध भारत बनाने में सहायक होगी। इसी कामना के साथ बौद्ध श्रमण चिन्तन परम्परा के चिन्तक प्रो. तुलसीराम को विनम्र श्रद्धांजलि।
(प्रो. तुलसी राम जी को कोटि-कोटि नमन!)





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