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प्रख्यात दलित साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि

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2026-06-27 14:01:40

हिंदी साहित्य के इतिहास में एक ऐसा दौर था जब साहित्य के केंद्र में केवल राजा-महाराजा, मध्यवर्गीय कशमकश या फिर ग्रामीण जीवन का एक रूमानी चित्रण हुआ करता था। उस दौर में समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा, उसका रोज का अपमान और उसकी मानवीय गरिमा की लड़ाई मुख्यधारा के पन्नों से गायब थी। इस साहित्यिक खामोशी को जिस रचनाकार ने अपनी आग्नेय लेखनी से हमेशा के लिए तोड़ दिया, उनका नाम है—ओमप्रकाश वाल्मीकि। 30 जून 1950 को जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि हिंदी दलित साहित्य के वे देदीप्यमान स्तंभ हैं, जिन्होंने न केवल शोषित समाज की स्वानुभूति (खुद भुगती हुई पीड़ा) को शब्दों में ढाला, बल्कि मुख्यधारा के सौंदर्यशास्त्र की स्थापित कसौटियों को बदलने के लिए मजबूर कर दिया। उनकी जयंती के अवसर पर, आइए उनके जीवन, उनके कड़े संघर्षों, उनकी वैचारिकी और उनके उस अमर साहित्यिक अवदान को गहराई से समझते हैं जिसने करोड़ों लोगों को आत्मसम्मान से जीना सिखाया। ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक छोटे से गाँव बरला में हुआ था। वे अछूत समझी जाने वाली चूड़ा (वाल्मीकि) जाति में पैदा हुए थे। यह वह दौर था जब देश को आजाद हुए कुछ ही साल हुए थे, संविधान लागू हो चुका था, लेकिन ग्रामीण भारत की रगों में जातिवाद का जहर पूरी तरह घुला हुआ था। गाँव में उनका घर अन्यायी सामाजिक व्यवस्था के नियमों के मुताबिक, मुख्य आबादी से दूर एक गंदे नाले के किनारे था। बचपन से ही उन्होंने देखा कि कैसे उनके समाज के लोगों को पूरे गाँव का कूड़ा-कचरा साफ करने, मरे हुए मवेशियों को उठाने और जमींदारों के खेतों में बिना मजदूरी (बेगार) किए खटने के बाद भी अपवित्र माना जाता था। गंदगी के बीच रहने को मजबूर इस समाज को बुनियादी मानवीय अधिकार भी हासिल नहीं थे। गाँव के कुएं से पानी पीना पाप था और सवर्णों के मोहल्ले से गुजरते समय निगाहें नीची रखना एक अघोषित कानून था। इसी घुटनभरे माहौल में वाल्मीकि जी का बचपन बीता, जिसने उनकी चेतना पर गहरे जख्म भी दिए और बाद में उनके भीतर के लेखक को भी जगाया।

शिक्षा की डगर पर अपमान का साया

ओमप्रकाश वाल्मीकि के पिताजी भले ही अनपढ़ थे, लेकिन उनके भीतर एक अद्भुत दूरदर्शिता थी। वे बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के इस संदेश को समझ चुके थे कि ‘शिक्षा ही वह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वह दहाड़ेगा।’ उन्होंने ठान लिया था कि वे अपने बेटे को पढ़ाएंगे ताकि उसे इस अमानवीय दलदल से निकाला जा सके। लेकिन स्कूल की दहलीज लांघना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। उनके दाखिले के समय ही जातिगत पहचान आड़े आ गई। स्कूल में उनके साथ जो बर्ताव हुआ, उसे उन्होंने अपनी विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा जूठन में बेहद मार्मिकता से दर्ज किया है। जब वे चौथी कक्षा में थे, तब स्कूल के हेडमास्टर कालीराम ने उन्हें कक्षा में बैठने के बजाय एक क्रूर आदेश दिया। हेडमास्टर ने उनके हाथ में झाड़ू थमाते हुए कहा था—‘ये तेरा खानदानी काम है, जा पूरा स्कूल साफ कर।’ नन्हें ओमप्रकाश तीन दिनों तक भूखे-प्यासे, रोते हुए पूरे स्कूल के मैदान और कमरों में झाड़ू लगाते रहे, जबकि उनके साथ के बच्चे पढ़ रहे होते थे। तीसरे दिन जब उनके पिताजी ने अपने लाडले को स्कूल में झाड़ू लगाते देखा, तो उनका खून खौल उठा। उन्होंने बिना किसी डर के हेडमास्टर का सामना किया, झाड़ू छीनकर फेंक दी और दहाड़ते हुए कहा—‘कौन है वो मास्टर जो मेरे बेटे से झाड़ू लगवावे है... जा रहा हूँ इसे लेकर, पर याद रखना यह यहीं पढ़ेगा, इसी स्कूल में... और इसके जैसे और भी आवेंगे पढ़ने।’ यह घटना केवल एक पिता का गुस्सा नहीं थी, बल्कि सदियों के दमन के खिलाफ एक अछूत पिता का पहला ऐतिहासिक प्रतिरोध था। इस घटना ने वाल्मीकि जी के मन में यह बात गाड़ दी कि शिक्षा ही सम्मान पाने का इकलौता रास्ता है। तमाम अपमानों, टाट-पट्टी से दूर जमीन पर बैठने की मजबूरियों और शिक्षकों के तानों को सहते हुए उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की।

दलित विमर्श का एक ऐतिहासिक भूकंप

सन 1997 में जब ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन प्रकाशित हुई, तो उसने हिंदी साहित्य जगत को हिलाकर रख दिया। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं थी, बल्कि यह पूरे समाज के सामूहिक दर्द का दस्तावेज थी। इस किताब का नाम जूठन रखना बेहद सोची-समझी और गहरी चोट करने वाली रणनीति थी। जूठन का मतलब होता है—किसी की थाली में बचा हुआ जूठा खाना। सवर्णों के घरों में शादी-ब्याह या उत्सवों के बाद जो जूठन बचती थी, उसे टोकरों में भरकर वाल्मीकि समाज के लोग अपने घर लाते थे। उसे सुखाकर रखा जाता था और कड़कड़ाती ठंड या बरसात के दिनों में पानी में उबालकर खाया जाता था। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि जब वे इस जूठन को खाते थे, तो उनके भीतर का इंसान मर जाता था। उन्होंने सवाल उठाया कि जो संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की बात करती है, वह अपने ही भाइयों को जूठन खिलाने पर कैसे गर्व कर सकती है?

जूठन का प्रभाव

साहित्य में स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की बहस शुरू हुई।

अंग्रेजी, जर्मन, जापानी, तमिल और कन्नड़ में अनुवाद।

वैश्विक अकादमिक विमर्श में शामिल।

जूठन ने हिंदी के संभ्रांत पाठकों को यह अहसास कराया कि जिस भारत की चकाचौंध पर वे गर्व करते हैं, उसके पीछे अंधेरी बस्तियों का कितना भयानक सच छुपा हुआ है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने केवल आत्मकथा ही नहीं लिखी, बल्कि कविता, कहानी, नाटक और साहित्यिक आलोचना में भी अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी ताकत थी—उसमें बनावटीपन या क्लिष्ट शब्दों का न होना। वे सीधे और मारक शब्दों में बात करते थे। उनके प्रमुख कहानी संग्रहों में सलामी (सलामी / सलाम), घुसपैठिये और छतरी शामिल हैं। सलाम कहानी यह कहानी दिखाती है कि शहर में पढ़-लिखकर अधिकारी बन जाने के बाद भी जब एक दलित युवक अपने गाँव लौटता है, तो कैसे वहाँ की सामंती व्यवस्था उससे सलाम (एक तरह की गुलामी की रस्म) करने की उम्मीद करती है। यह कहानी बताती है कि आर्थिक प्रगति के बाद भी सामाजिक मानसिकता नहीं बदली है। शवयात्रा कहानी: यह कहानी मरे हुए जानवरों को उठाने की प्रथा के खिलाफ दलित युवाओं के विद्रोह और उसके बाद गाँव में पैदा होने वाले तनाव को बहुत बारीकी से रेखांकित करती है। वाल्मीकि जी की कविताओं में सदियों का गुस्सा भी था और एक नए सुबह की उम्मीद भी। उनकी एक बेहद प्रसिद्ध कविता ठाकुर का कुआं आज भी व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।

चूल्हा मिट्टी का, मिट्टी तालाब की, तालाब ठाकुर का।

भूख रोटी की, रोटी बाजरे की, बाजरा खेत का, खेत ठाकुर का।

बैल ठाकुर का, हल ठाकुर का, हल की मूठ पर हथेली अपनी, फसल ठाकुर की।

कुआँ ठाकुर का, पानी ठाकुर का, खेत-खलिहान ठाकुर का, गली-मोहल्ले ठाकुर के।

फिर अपना क्या? गाँव? शहर? या देश?

यह कविता आज भी देश के संसाधनों पर चंद लोगों के कब्जे और बहुजन समाज की भूमिहीनता के दर्द को सबसे सरल शब्दों में बयां करती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि का एक बहुत बड़ा योगदान उनकी वैचारिक पुस्तक दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (2001) है। इस किताब के जरिए उन्होंने मुख्यधारा के आलोचकों को करारा जवाब दिया। पारंपरिक हिंदी साहित्य रस, अलंकार, वक्रोक्ति और आनंद को साहित्य की कसौटी मानता था। वाल्मीकि जी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया: जिस साहित्य को पढ़कर किसी को आनंद आ रहा हो, हो सकता है कि वह साहित्य समाज के एक बड़े हिस्से के शोषण पर टिका हो। दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र आनंद का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समता और मानवीय मुक्ति का सौंदर्यशास्त्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कला केवल कला के लिए नहीं हो सकती; कला को जीवन की सच्चाइयों और इंसानी गरिमा की कसौटी पर कसा जाना चाहिए।

रंगकर्म और सांस्कृतिक चेतना

बहुत कम लोग जानते हैं कि ओमप्रकाश वाल्मीकि एक बेहतरीन लेखक होने के साथ-साथ एक बेहद सक्रिय रंगकर्मी और निर्देशक भी थे। वे आॅर्डनेंस फैक्ट्री (देहरादून) में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी लगातार नाटकों से जुड़े रहे। उन्होंने देहरादून में मेघदूत नामक नाट्य संस्था की स्थापना की। उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन किया और उनमें अभिनय भी किया। उनका मानना था कि नाटक सीधे जनता से संवाद करने का सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने भारत के महान क्रांतिकारी और नाटककार सफदर हाशमी के विचारों को आगे बढ़ाते हुए नुक्कड़ नाटकों के जरिए भी बस्तियों में चेतना फैलाने का काम किया।

पुरस्कार और सम्मान

डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार (1993): उनके शुरूआती क्रांतिकारी लेखन के लिए।

परिवेश सम्मान

जयश्री सम्मान

कथाक्रम सम्मान

निधन: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए 17 नवंबर 2013 को देहरादून के एक अस्पताल में इस महान लेखक ने आखिरी सांस ली। उनका चले जाना साहित्य जगत के लिए एक ऐसा शून्य था, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। आज भी ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रासंगिकता रत्ती भर भी कम नहीं हुई है। आज भी जब हम देश के अलग-अलग हिस्सों में जातिगत उत्पीड़न, हाथ से मैला उठाने की प्रथा के कारण होने वाली मौतें, या यूनिवर्सिटी कैंपसों में दलित-आदिवासी छात्रों के साथ होने वाले परोक्ष भेदभाव की खबरें सुनते हैं, तो हमें वाल्मीकि जी की याद आती है। उन्होंने अपनी लेखनी से हमें जो सबसे बड़ा सबक दिया, वह यह था कि ‘पीड़ा को केवल सहना नहीं है, उसे दर्ज करना है और व्यवस्था के सामने तर्कसंगत सवाल बनकर खड़े होना है।’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की जयंती पर उन्हें नमन करने का सबसे सही तरीका यही होगा कि हम उनकी किताबों को पढ़ें, उनके विचारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं और एक ऐसे पाखंड-मुक्त, समतावादी भारत के निर्माण में अपना योगदान दें, जिसका सपना उन्होंने और बाबासाहेब अम्बेडकर ने देखा था। उनकी रचनाएं हमेशा शोषितों के लिए मशाल और शोषकों के लिए एक आईना बनी रहेंगी।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05