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क्रांतिकारी समाज सुधारक सदगुरु संत कबीर दास जयंती

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2026-06-01 16:03:32

भारतीय इतिहास के आकाश में संत कबीर दास एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक सदियों बाद आज भी फीकी नहीं पड़ी है। 15वीं शताब्दी का वह कालखंड, जब भारतीय समाज धार्मिक पाखंड, छूआछूत, ऊंच-नीच और संकीर्ण रूढ़िवादिता के गहरे अंधकार में डूबा हुआ था, तब कबीर एक क्रांतिकारी मशाल बनकर उभरे। वे केवल एक संत, कवि या भक्त नहीं थे; वे एक प्रखर समाज सुधारक, विचारक्रांति के जनक और मानवता के सच्चे मसीहा थे। कबीर ने किसी विश्वविद्यालय में शिक्षा नहीं ली थी, न ही उन्होंने किसी शास्त्र का पारंपरिक अध्ययन किया था। उन्होंने स्वयं कहा था: मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।

इसके बावजूद, कबीर का ज्ञान और उनका अनुभव ब्रह्मांड जितना व्यापक था। उन्होंने समाज के दोहरे चरित्र को बहुत करीब से देखा था। यही कारण है कि उनकी वाणी सीधे दिल पर चोट करती है और सदियों पुरानी रूढ़ियों को हिलाकर रख देती है। आइए, समानता, बंधुत्व और जातिवाद के समूल नाश का संदेश देने वाले सदगुरु कबीर दास जी की संपूर्ण जीवनी और उनके क्रांतिकारी दर्शन को विस्तार से समझते हैं।

प्रारंभिक जीवन: संत कबीर दास जी के जन्म को लेकर इतिहास और जनश्रुतियों में गहरा कौतूहल रहा है। प्रामाणिक दस्तावेजों और विद्वानों के अनुसार, उनका जन्म सन 1398 (संवत 1455) में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को धर्म नगरी काशी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। कबीर के जन्म के संदर्भ में एक अत्यंत प्रचलित कथा है। कहा जाता है कि वे एक नवजात शिशु के रूप में काशी के लहरतारा तालाब में तैरते हुए कमल के पत्ते पर मिले थे। वहाँ से गुजर रहे नीरू और नीमा नाम के एक निर्धन और संतानहीन मुस्लिम जुलाहा (बुनकर) दंपत्ति की नजर उस अत्यंत तेजवान बालक पर पड़ी। वे उस शिशु को अपने घर ले आए और उसका नाम रखा—कबीर, जिसका अरबी भाषा में अर्थ होता है—महान या सर्वश्रेष्ठ। इस प्रकार, कबीर का पालन-पोषण एक साधारण जुलाहा परिवार में हुआ। बचपन से ही वे सूत कातने और कपड़ा बुनने के पारिवारिक व्यवसाय में लग गए। यह जुलाहा पृष्ठभूमि कबीर के दर्शन में गहराई से झलकती है। उन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को समझाने के लिए अक्सर ताना-बाना, चदरिया और सूत जैसे प्रतीकों का बेहद खूबसूरती से उपयोग किया है। उत्तर भारत के बुनकरों में कोरी मुख्य हैं। बेन्स जुलाहों को कोरियों की समशील जाति ही मानते हैं। कुछेक पंडितों ने यह भी अनुमान किया है कि मुसलमानी धर्म ग्रहण करने वाले कोरी ही जुलाहे हैं। यह उल्लेख किया जा सकता है कि कबीरदास जहाँ अपने को बार-बार जुलाहा कहते हैं,

(1) जाति जुलाहा मति कौ धीर। हरषि गुन रमै कबीर।

(2) तू ब्राह्मन मैं काशी का जुलाहा।

वहाँ कभी-कभी अपने को कोरी भी कह गए हैं। ऐसा जान पड़ता है कि यद्यपि कबीरदास के युग में जुलाहों ने मुसलमानी धर्म ग्रहण कर लिया था पर साधारण जनता में तब भी कोरी नाम से परिचित थे।

कबीर का गृहस्थ जीवन

अक्सर माना जाता है कि अध्यात्म या संत बनने के लिए संसार का त्याग करना पड़ता है, लेकिन कबीर ने इस धारणा को भी तोड़ा। वे एक गृहस्थ संत थे। उन्होंने कभी अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। उनकी पत्नी का नाम लोई था, जो उनके विचारों का सम्मान करती थीं। उनके एक पुत्र थे जिनका नाम कमाल और एक पुत्री थीं जिनका नाम कमली था। कबीर दिनभर कपड़े बुनते थे, उन्हें बाजार में बेचते थे और उससे जो भी रुखा-सूखा धन मिलता, उससे अपना परिवार चलाते थे तथा शेष धन संतों और भूखों की सेवा में लगा देते थे। वे अपनी कुटिया में ही बैठकर ईश्वर की साधना करते थे। उनका ईश्वर कोई हाड़-मांस का इंसान या आसमान में बैठा कोई सुल्तान नहीं था; उनका राम निर्गुण और निराकार था, जो कण-कण में व्याप्त था। एक बार काशी के एक बहुत बड़े और अमीर सेठ (व्यापारी) कबीर दास जी के दर्शन करने उनकी कुटिया पर आए। सेठ ने देखा कि कबीर जी और उनका परिवार बेहद गरीबी में जी रहा है। सेठ ने कबीर जी को बहुत सारा धन, रत्न और कीमती जागीर भेंट करनी चाही। कबीर दास जी ने हाथ जोड़कर कहा:

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाय।

उन्होंने सेठ का धन लेने से साफ मना कर दिया और कहा कि मुझे इस माया की कोई आवश्यकता नहीं है। सेठ निराश होकर जाने लगा। तभी रास्ते में उसे कबीर के पुत्र कमाल मिल गए। सेठ ने कमाल को सारी बात बताई और कहा कि मैं आपके परिवार की गरीबी दूर करना चाहता था, लेकिन आपके पिता ने यह धन ठुकरा दिया। कमाल ने सोचा कि यदि कोई अपनी मर्जी से और आदरपूर्वक दान दे रहा है, तो उसे ठुकराकर उसका दिल नहीं दुखाना चाहिए, और उस धन से कई गरीबों का भला भी किया जा सकता है। कमाल ने वह धन और कीमती उपहार सेठ से स्वीकार कर लिए और उसे घर ले आए। जब कबीर दास जी ने देखा कि उनका बेटा घर में धन-दौलत और माया बटोरकर लाया है, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्हें लगा कि कमाल सांसारिक मोह-माया के जाल में फंस गया है। इसी दुख और क्षोभ में आकर कबीर के मुख से यह दोहा निकला था:

डूबा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल।

हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।

अर्थ: कबीर दास जी (व्यंग्य या सजल भाव में) कहते हैं कि कबीर का वंश तो मानो अब डूब गया, क्योंकि उनके घर में कमाल जैसा पुत्र पैदा हुआ है। उसने ईश्वर का सिमरन (साधना और संतोष का मार्ग) छोड़ दिया है और दुनिया की धन-दौलत (माल) बटोरकर घर ले आया है।

जातिवाद पर प्रखर प्रहार

कबीर दास जी का पूरा जीवन और उनकी पूरी कविता समाज से विषमता को मिटाने के प्रति समर्पित थी। उनके समय में जातिवाद अपने सबसे वीभत्स रूप में था। मनुष्य की योग्यता उसके कर्म से नहीं, बल्कि उसके जन्म से तय हो रही थी। कबीर ने इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। कबीर का मानना था कि ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक ही मिट्टी और एक ही ज्योति से बनाया है, फिर उनमें ऊंच-नीच का भेद कैसा? उन्होंने उस समय के मठाधीशों और पुरोहितों से सीधे तीखे सवाल किए। उनका स्पष्ट कहना था कि यदि कोई व्यक्ति खुद को ऊंचे कुल का मानता है, तो उसमें और दूसरों में शारीरिक स्तर पर क्या अंतर है? कबीर दास जी ने जातिवाद पर प्रहार करते हुए जो कालजयी पंक्तियाँ कहीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं:

जो तू बाम्हन बाम्हनी जाया, तो आन बाट काहे नहीं आया?

जो तू तुरक तुरकनी जाया, तो भीतर खतना क्यों न कराया?

अर्थ:
कबीर सीधे तौर पर तत्कालीन समाज के ठेकेदारों को चुनौती देते हुए कहते हैं कि यदि तुम ब्राह्मण के घर पैदा होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ समझते हो, तो तुम्हारी उत्पत्ति किसी अन्य विशेष मार्ग से क्यों नहीं हुई? तुम भी तो उसी तरह जन्मे हो जैसे एक आम इंसान। और यदि तुम मुसलमान होने पर गर्व करते हो, तो जन्मजात रूप से वह पहचान लेकर क्यों नहीं आए? प्रकृति सबको एक समान पैदा करती है, जाति और धर्म इंसानों की बनाई हुई दीवारें हैं। कबीर ने जन्म के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकारों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने नारा दिया कि भगवान के दरबार में केवल भक्ति और कर्म की प्रधानता है, जाति की नहीं:

जाति पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

अर्थ:
ईश्वर की भक्ति के मार्ग में जाति, पांति या कुल का कोई स्थान नहीं है। जो भी सच्चे मन से उस परमपिता परमेश्वर को भजता है, वह उसी का हो जाता है। ईश्वर किसी की जाति देखकर उस पर कृपा नहीं करता।

धार्मिक पाखंड और बाह्याडंबरों का पुरजोर विरोध

कबीर दास जी एक ऐसे निष्पक्ष सुधारक थे, जिन्होंने हिंदू और मुसलमान, दोनों ही धर्मों में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों और आडंबरों पर समान रूप से और अत्यंत निर्भीकता से प्रहार किया। वे किसी धर्म के विरोधी नहीं थे, बल्कि धर्म के नाम पर की जाने वाली ढोंगबाजी के कट्टर दुश्मन थे। काशी में रहते हुए उन्होंने देखा कि लोग गंगा में नहाकर खुद को पवित्र मानते थे, मूर्तियों के सामने सिर पटकते थे, लेकिन मन में नफरत पाले रखते थे। उन्होंने पत्थर पूजा और तिलक-माला के आडंबर पर तंज कसते हुए कहा:

पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।

याते तो चाकी भली, पीस खाय संसार॥

अर्थ:
यदि पत्थर की मूर्ति को पूजने मात्र से भगवान मिल जाते हैं, तो मैं किसी छोटे पत्थर को क्यों पूजूं, मैं तो पूरे पहाड़ की पूजा करने लग जाऊंगा। कबीर कहते हैं कि उस अचल पत्थर की मूर्ति से तो घर की वह पत्थर की चक्की कहीं अधिक बेहतर है, जिसे पीसकर पूरा संसार अपना पेट भरता है। अर्थात, कर्म प्रधान है, निर्जीव पत्थरों में भगवान को ढूंढना व्यर्थ है। कबीर ने केवल हिंदुओं को ही नहीं टोका, बल्कि उन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों और दिखावे की इबादत पर भी उतनी ही करारी चोट की। मस्जिदों से जोर-जोर से दी जाने वाली अजान पर उन्होंने कहा:

काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदयाय॥

अर्थ:
कंकड़ और पत्थर जोड़कर इंसानों ने मस्जिद तो खड़ी कर ली है, और उस पर चढ़कर मुल्ला (मौलवी) इस तरह जोर-जोर से चिल्लाकर अजान देता है मानो खुदा बहरा हो गया हो। कबीर का मानना था कि ईश्वर अंतयार्मी है, वह दिल की धड़कन और चींटी के पैरों की आवाज भी सुनता है, उसे रिझाने के लिए चिल्लाने या दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है।

गुरु दीक्षा: कबीर सत्य की खोज में थे और उस दौर में बिना गुरु के ज्ञान अधूरा माना जाता था। कबीर महान वैष्णव संत स्वामी रामानंद को अपना गुरु बनाना चाहते थे। परंतु, तत्कालीन रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण एक साधारण जुलाहे को शिष्य के रूप में स्वीकार करना आसान नहीं था। कबीर ने इसके लिए एक अनूठा मार्ग चुना। वे जानते थे कि स्वामी रामानंद प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में (सुबह चार बजे) गंगा स्नान के लिए काशी के पंचगंगा घाट जाते हैं। एक दिन कबीर रात के अंधेरे में ही पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। जब स्वामी रामानंद जी सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे, तो अंधेरे के कारण उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से अनायास ही शब्द निकला—राम-राम! कबीर ने इसी राम शब्द को गुरु-मंत्र मान लिया और स्वामी रामानंद को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। जब रामानंद जी को कबीर की प्रतिभा, प्रखर बुद्धि और आध्यात्मिक निष्ठा का पता चला, तो उन्होंने सहर्ष कबीर को अपना प्रिय शिष्य बना लिया।

कबीर जी के अप्रतिम दोहे

कबीर दास जी की वाणी को उनके शिष्यों ने बीजक नामक ग्रंथ में संकलित किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं—साखी, सबद और रमैनी। कबीर के दोहे (साखियाँ) जीवन जीने की कला सिखाते हैं और समाज को समानता का पाठ पढ़ाते हैं। यहाँ उनके कुछ सबसे प्रचलित दोहे और उनके गहरे अर्थ प्रस्तुत हैं:

ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय॥

अर्थ:
कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन का अहंकार (आपा) त्याग कर ऐसे मधुर वचन बोलने चाहिए, जिससे सुनने वाले को असीम शांति और सुख का अनुभव हो (वह शीतल हो जाए) और साथ ही, वैसी मधुर वाणी बोलने से स्वयं के मन को भी आंतरिक संतोष और शीतलता प्राप्त हो। कटु वचन समाज में दूरियां बढ़ाते हैं, जबकि मधुर वचन समानता और प्रेम का विस्तार करते हैं।

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥

अर्थ:
ऊंचे कुल में जन्म लेने या बहुत धनवान हो जाने मात्र से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता। कबीर इसकी तुलना खजूर के पेड़ से करते हैं। खजूर का पेड़ बहुत ऊंचा और बड़ा होता है, लेकिन वह न तो किसी राहगीर (पंथी) को छाया दे पाता है और उसके फल भी इतनी ऊंचाई पर लगते हैं कि उन्हें तोड़ना बेहद मुश्किल होता है। अर्थात, यदि आपके भीतर परोपकार और समाज के प्रति दया की भावना नहीं है, तो आपका बड़प्पन व्यर्थ है।

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करत सुभाय॥

अर्थ:
कबीर दास जी की समाज सुधार की तकनीक बेहद अनूठी थी। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति आपकी बुराई या आलोचना करता है, उसे हमेशा अपने पास रखना चाहिए, हो सके तो अपने घर के आंगन में ही उसके लिए एक कुटिया बनवा देनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि आलोचक आपकी कमियों को उजागर करके, बिना पानी और बिना साबुन के, आपके स्वभाव और चरित्र को बिल्कुल साफ और स्वच्छ बना देता है।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

अर्थ:
जब मैं इस संसार में कमियां और बुराइयाँ ढूंढने निकला, तो मुझे कोई भी इंसान बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने ठहरकर अपने अंतर्मन में झांका, अपने खुद के विचारों का विश्लेषण किया, तो मुझे अहसास हुआ कि इस संसार में मुझसे बुरा और कमियों से भरा कोई दूसरा है ही नहीं। कबीर कहते हैं कि दूसरों पर उंगली उठाने से पहले व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

अर्थ:
बड़ी-बड़ी धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकें (पोथियां) पढ़-पढ़कर न जाने कितने लोग इस संसार से चले गए, लेकिन कोई भी सच्चा ज्ञानी या पंडित नहीं बन सका। इसके विपरीत, जो व्यक्ति प्रेम, करुणा और मानवता के केवल ढाई अक्षर को समझ लेता है और उसे अपने जीवन में उतार लेता है, वही इस संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी या पंडित है। कबीर के लिए प्रेम ही ईश्वर था और प्रेम ही समानता का आधार था।

अंधविश्वास पर आखिरी प्रहार

संत कबीर दास जी ने न केवल अपने जीवन और कविताओं से समाज को सुधारा, बल्कि अपनी मृत्यु के माध्यम से भी सदियों पुराने अंधविश्वास की जड़ पर अंतिम और सबसे करारा प्रहार किया। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में कबीर दास जी अस्वस्थ रहने लगे थे। उस दौर में काशी (वाराणसी) में एक बहुत बड़ा अंधविश्वास फैला हुआ था। रूढ़िवादी लोग मानते थे कि: जिसकी मृत्यु काशी में होगी, वह सीधे स्वर्ग जाएगा। जिसकी मृत्यु काशी से कुछ दूरी पर स्थित मघर (वर्तमान संत कबीर नगर जिला, उ.प्र.) में होगी, वह सीधे नरक जाएगा या अगले जन्म में गधा बनेगा। कबीर दास जी ने जीवनभर जिस पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, वे भला इस अंधविश्वास को कैसे जिंदा रहने देते? उन्होंने इस मिथक को मटियामेट करने का फैसला किया। अपने अंतिम समय में, जब वे बेहद वृद्ध और कमजोर हो चुके थे, वे जानबूझकर काशी छोड़कर मघर चले गए। उनके शिष्यों ने उन्हें बहुत रोका, लेकिन कबीर अडिग रहे। उनका मानना था कि यदि काशी में मरने से ही स्वर्ग मिलता है, तो इसमें ईश्वर की कृपा कहाँ हुई? वह तो स्थान की महिमा हुई। उन्होंने गर्व से कहा:

क्या कासी, क्या मगहर ऊसर, हृदै राम जूं होई।

जौ कासी तन तजै कबीरा, रामहिं कौंन निहोरा॥

अर्थ:
यदि कबीर काशी में ही प्राण त्यागेगा, तो उसमें राम का क्या उपकार? तब तो लोग स्थान को पूजेंगे, ईश्वर को नहीं। जिसके हृदय में राम (ईश्वर) का वास है, उसके लिए काशी और मघर दोनों एक समान हैं।

मृत्यु: कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं।

संत कबीर दास जी का जीवन और उनका साहित्य भारतीय उपमहाद्वीप की एक अमूल्य धरोहर है। उन्होंने आज से छह सौ साल पहले जो बातें कहीं, वे आज के आधुनिक, वैज्ञानिक और तकनीकी युग में भी 100% सटीक बैठती हैं। आज जब दुनिया जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषा और नस्ल के नाम पर आपस में लड़ रही है, तब कबीर का यह संदेश हमें सही रास्ता दिखाता है कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं। कबीर का दर्शन किसी बंद कमरे का दर्शन नहीं है, बल्कि वह सड़क पर चलते हुए आम आदमी का दर्शन है। उन्होंने समाज को सिखाया कि सच्ची पूजा किसी मंदिर या मस्जिद की चहारदीवारी में नहीं, बल्कि भूखे को भोजन कराने, ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाने और आपस में प्रेम से रहने में है। सदगुरु कबीर दास जी का जीवन हमें साहस, निर्भीकता, समता और असीम मानवीय करुणा की सीख देता है। वे कल भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रासंगिक हैं और जब तक यह सृष्टि रहेगी, उनका मानवतावादी दृष्टिकोण प्रासंगिक रहेगा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05