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भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में दीवान बहादुर रत्तामलाई श्रीनिवासन (जिन्हें आदर से आर. श्रीनिवासन या थाता यानी दादाजी भी कहा जाता है) एक ऐसी महान और क्रांतिकारी शख्सियत हैं, जिन्होंने डॉ. बी.आर. आंबेडकर से भी पहले दक्षिण भारत में दलित चेतना और आत्मसम्मान के आंदोलन की नींव रखी थी। वे एक दूरदर्शी नेता, प्रखर पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और शोषितों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले योद्धा थे। गांधी और बाबासाहेब के समकालीन रहे आर. श्रीनिवासन का जीवन सामाजिक न्याय की लड़ाई का एक जीवंत दस्तावेज है। रत्तामलाई श्रीनिवासन का जन्म 7 जुलाई 1859 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के चेंगलपट्टू जिले के मदुरंतकम तालुका के कोझियालम गांव में हुआ था। उनका परिवार एक गरीब आदि द्रविड़ (परैयर) परिवार था। उनके पिता रत्तामलाई के अंग्रेजों के साथ व्यापारिक संबंध थे, जिसके कारण तंगी के बावजूद उन्हें पढ़ने का अवसर मिल सका। उनकी शिक्षा कोयंबटूर के एक आवासीय विद्यालय में हुई। उस दौर में जातिवाद और छुआछूत अपनी चरम सीमा पर था। उस विद्यालय के 400 छात्रों में श्रीनिवासन अकेले दलित छात्र थे। स्कूल के दिनों में ही उन्हें कदम-कदम पर जातिगत भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा। इन कड़वे अनुभवों ने उनके बाल-मन पर गहरा घाव किया, लेकिन उन्हें कमजोर करने के बजाय इस भेदभाव ने उनके भीतर सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ने की क्रांतिकारी चिंगारी सुलगा दी। पढ़ाई के साथ-साथ उनकी रुचि कला और पेंटिंग में भी थी, जिसके लिए उन्होंने कोयंबटूर में विशेष प्रशिक्षण भी लिया था।
दलित चेतना का उदय: शिक्षा पूरी करने के बाद श्रीनिवासन ऊटी (उदगमंडलम) चले गए, जो उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। वहां उन्होंने एक एकाउंटेंट (लेखाकार) के रूप में सरकारी सेवा शुरू की। उस समय ऊटी दलित राजनीतिक चेतना का एक उभरता हुआ केंद्र बन रहा था। वहां श्रीनिवासन ने देखा कि निचली जातियों के लोगों को बुनियादी मानवीय अधिकारों से भी वंचित रखा जा रहा था। उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी लेने की आजादी नहीं थी, वे मुख्य सड़कों पर चल नहीं सकते थे और सम्मानजनक कपड़े तक नहीं पहन सकते थे। इन अत्याचारों को देखकर उन्होंने प्रशासनिक नौकरी के दायरे से बाहर निकलकर समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लिया। वर्ष 1888 में उनका विवाह अरंगनायगी से हुआ। एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी यह भी है कि उनकी बहन का विवाह प्रसिद्ध बौद्ध पुनरुत्थानवादी और महान दलित विचारक पंडित अय्याथी थास से हुआ था। इस पारिवारिक और वैचारिक संबंध ने श्रीनिवासन की सामाजिक सोच को और अधिक धार दी।
पत्रकारिता और संस्थागत क्रांति: 1890 के दशक में श्रीनिवासन पूरी तरह से सामाजिक आंदोलनों में कूद पड़े। उनका मानना था कि जब तक शोषित समाज संगठित नहीं होगा और उसकी अपनी आवाज नहीं होगी, तब तक बदलाव नामुमकिन है। उन्होंने सबसे पहले 1891 में परैयर महाजन सभा का गठन किया, जिसका नाम आगे चलकर 1893 में आदि-द्रविड़ महाजन सभा किया गया। इस संगठन का उद्देश्य दलितों को उनके नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें शिक्षित करना था। अक्टूबर 1893 में उन्होंने तमिल भाषा में एक मासिक पत्रिका/अखबार शुरू किया जिसका नाम था परैयन। यह भारत के शुरूआती सबाल्टर्न (वंचित वर्ग के) अखबारों में से एक था। चार आने की कीमत वाले इस चार पन्नों के अखबार के जरिए वे जातिगत अत्याचारों को उजागर करते थे और ब्रिटिश सरकार से दलितों के लिए शिक्षा और नौकरियों की मांग करते थे। जल्द ही यह अखबार शोषितों की बुलंद आवाज बन गया। हालांकि, जातिवादी ताकतों और ब्रिटिश प्रशासन को उनका यह क्रांतिकारी अंदाज रास नहीं आया। 1896 में एक संपादकीय को लेकर उन पर अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन पर 100 रुपये का जुमार्ना भी लगाया गया, जो उस समय एक बड़ी राशि थी। तमाम आर्थिक तंगियों और कानूनी अड़चनों के बावजूद उन्होंने झुकना स्वीकार नहीं किया।
दक्षिण अफ्रीका प्रवास: साल 1894 में आर. श्रीनिवासन सरकारी सेवा के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका चले गए, जहां उन्होंने एक स्थानीय अदालत में अनुवादक के रूप में काम किया। यहीं पर उनकी मुलाकात गांधी से हुई, जो उस समय वहां भारतीयों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में प्रवास के दौरान श्रीनिवासन ने गांधीजी के साथ मिलकर काम किया। इस जुड़ाव का एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक पहलू यह है कि श्रीनिवासन ने ही गांधीजी को तमिल संस्कृति और भाषा के महत्व से परिचित कराया था। उन्हीं के प्रभाव में आकर महात्मा गांधी ने पहली बार तमिल भाषा में ‘मो. क. गांधी’ (तमिल लिपि में मोहरदास करमचंद गांधी) के रूप में हस्ताक्षर करना शुरू किया था। वर्ष 1920 में श्रीनिवासन दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौट आए और दोबारा भारत के सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय हो गए।
राजनीतिक सुधार: भारत लौटने के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता और कद दोनों बहुत बढ़ गए। 1923 में उन्हें मद्रास लेजिस्लेटिव काउंसिल (मद्रास विधान परिषद) के सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। वे 1935 तक इस पद पर बने रहे। इस दौरान वे गैर-ब्राह्मण आंदोलन की प्रतिनिधि जस्टिस पार्टी के भी महत्वपूर्ण स्तंभ रहे। 1924 में उन्होंने काउंसिल की कानून समिति के सामने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा कि दलितों और अछूत समझे जाने वाले लोगों को सभी सार्वजनिक सड़कों, कुओं, अस्पतालों, सराय और सरकारी भवनों का उपयोग करने का कानूनी अधिकार मिलना चाहिए। यह प्रस्ताव 1925 में लागू हुआ, जिसने दलितों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने लगातार यह मांग उठाई कि शोषित वर्ग के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा, वजीफा (स्कॉलरशिप) और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
गोलमेज सम्मेलन: आर. श्रीनिवासन के जीवन का सबसे गौरवशाली क्षण तब आया जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें लंदन में आयोजित प्रथम (1930) और द्वितीय (1931) गोलमेज सम्मेलनों में दलितों के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया। वहां उन्होंने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ मंच साझा किया। लंदन में उन्होंने और बाबासाहेब ने मिलकर अछूतों के राजनीतिक अधिकारों और उनके लिए पृथक निर्वाचन मंडल की पुरजोर वकालत की। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक दलितों के पास अपने प्रतिनिधि खुद चुनने का अधिकार नहीं होगा, तब तक सत्ता की चाबी उनके हाथ में नहीं आ सकती। बाद में, जब महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बाद 1932 में पूना पैक्ट हुआ, तो बाबासाहेब आंबेडकर और गांधीजी के साथ आर. श्रीनिवासन भी इस ऐतिहासिक समझौते के प्रमुख हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक थे।
उपाधियां और सम्मान
दलितों, पिछड़ों और शोषित समाज के उत्थान के लिए उनके द्वारा किए गए अथक और निस्वार्थ कार्यों के सम्मान में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कई प्रतिष्ठित नागरिक उपाधियों से नवाजा:
राव साहिब (1920)
राव बहादुर (1926)
दीवान बहादुर (1936)
लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह प्यार और आदर था जो उन्हें अपने समाज से मिला। लोग उन्हें श्रद्धा से थाता कहते थे। उन्होंने कभी भी अपने काम के बदले किसी व्यक्तिगत लाभ या प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की।
निधन: 18 सितंबर 1945 को 86 वर्ष की आयु में इस महान क्रांतिकारी नेता का निधन हो गया। चेन्नई के ओटेरी में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसे आज उरीमई कलम (अधिकारों की भूमि) स्मारक के रूप में जाना जाता है। दीवान बहादुर आर. श्रीनिवासन भारत के उन अग्रदूतों में से थे जिन्होंने उस दौर में समानता की मशाल जलाई जब समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए आवाज उठाना मौत को दावत देने जैसा था। उन्होंने न केवल भारत में बल्कि विदेश (दक्षिण अफ्रीका) में भी मानवाधिकारों का परचम लहराया। आज का आधुनिक भारत, जो समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर खड़ा है, रत्तामलाई श्रीनिवासन जैसे नायकों के संघर्षों का सदैव ऋणी रहेगा।





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