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क्रांतिकारी जनकवि लाल सिंह दिल

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2025-04-04 13:48:45

लाल सिंह ‘दिल’ (11 अप्रैल 1943 से 14 अगस्त 2007) पंजाबी साहित्य के एक प्रमुख क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान अपनी लेखनी से समाज के शोषित और दलित वर्ग की आवाज को बुलंद किया। उनका असली नाम लाल सिंह था, लेकिन वे अपने उपनाम ‘दिल’ से अधिक प्रसिद्ध हुए। उनकी कविताएँ सामाजिक अन्याय, जातिवाद, और शोषण के खिलाफ एक तीखा विद्रोह थीं, जो पंजाबी काव्य में एक नए युग की शुरूआत का प्रतीक बनीं। लाल सिंह ‘दिल’ का जन्म पंजाब के समराला में एक मजदूर परिवार में हुआ था। वे रामगढ़िया समुदाय से थे, जो उस समय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ था।

नक्सलवादी आंदोलन और प्रभाव

1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सल आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैला और पंजाब में भी इसका व्यापक असर पड़ा। इसी बीच साहित्य और कला से जुड़े काफी लोग इसकी तरफ आकर्षित हुए। 11 अप्रैल 1943 में पंजाब के घुंघराली शिक्खां में रामदासिया समुदाय में जन्मे लाल सिंह दिल भी 1969 के करीब नक्सली आंदोलन से जुड़ गए लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने खुद को इससे अलग कर लिया। जेल में रहने के दौरान ही 1971 में उनका पहला कविता संग्रह सतलुज दी हवा प्रकाशित हुआ। दिल का मानना था कि मुस्लिम धर्म में जातीय भेदभाव नहीं होता। हालांकि दत्त के अनुसार, दिल ने मुस्लिम आइडेंटिटी इसलिए भी अपनाई ताकि उनकी शादी हो सके। लेकिन कुछ सालों बाद उन्हें ये महसूस हुआ कि मुस्लिमों के बीच भी जातिगत भेदभाव है।

यूपी में रहते हुए भी उन्होंने कवितायें लिखीं और इस दौरान वो कई उर्दू लेखकों के संपर्क में भी आए।

रेडिकल लिटरेरी मूवमेंट

लाल सिंह दिल ने अपनी आत्मकथा दास्तां में इस बात का विस्तार से जिक्र किया है कि कैसे उन्हें बचपन से ही जातीय भेदभाव झेलना पड़ा। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया है जिसमें जब वे महज 5 या 6 साल के थे तब जाट किसानों के कुएं पर नहाने के कारण उनको बूरी तरह पीटा गया था। लाल सिंह दिल के परिवार की आर्थिक स्थिति बदतर होने के बाद भी वो अपने समुदाय से 10वीं कक्षा पास करने वाले पहले व्यक्ति थे। पढ़ाई के साथ वो दिहाड़ी मजदूरी भी करते ताकि परिवार चल सके।

असफल कथा

दिल की पंजाबी कविताओं का हिंदी में अनुवाद करने वाले पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सत्यपाल सहगल ने अपनी किताब प्रतिनिधि कविताएं-लाल सिंह दिल में लिखा है, दिल के संवेदनशील मन पर पड़ी चोटों ने उसे विद्रोही बना दिया और वह क्रांति और नए समाज के न केवल सपने लेने लगा, बल्कि, उसकी शीघ्र चरितार्थता में भी विश्वास करने लगा।

प्रोफेसर सत्यपाल सहगल के अनुसार दिल की रचनाओं का अनुवाद करना इतना आसान नहीं था क्योंकि वो एक ऐसा कवि था जो उन लोगों के बारे में कविता लिखता था जो समाज में दीन, हीन और सबसे उपेक्षित रहे हैं।

सहगल कहते हैं, दिल का काम बेजोड़ है क्योंकि उस जैसा सूक्ष्म कलाबोध दुर्लभ है। उसका अपना सौंदर्यशास्त्र है, जो टफ तो है पर रफ नहीं। वहां गुस्सा, उबाल, नफरत, प्रोटेस्ट और खुरेजी तो है ही, गूंजें-अनुगूंजे भी हैं।

लाल सिंह दिल कभी ज्यादा किताबों की शोहबत में नहीं रहे लेकिन उन्होंने अपने परिवेश को शब्दों के जरिए बखूबी उतारा। उन्होंने कविता की तीन किताबें लिखीं जिसमें सतलज दी हवा (1971), बहुत सारे सूरज (1982), साथर (1997) शामिल हैं और दास्तां नाम से उनकी आत्मकथा भी है। उनकी समस्त कविताएं नागलोक शीर्षक वाली किताब में है जो 1998 में छपी थी।

व्यक्तिगत जीवन और चुनौतियाँ

दिल का जीवन बेहद कष्टमय रहा। नक्सल आंदोलन में भागीदारी के कारण उन्हें कई बार जेल हुई, जहाँ उन्हें शारीरिक और मानसिक यातनाएँ झेलनी पड़ीं। जेल से छूटने के बाद भी उनकी जिंदगी आसान नहीं हुई। वे आर्थिक तंगी से जूझते रहे और अपने अंतिम दिनों में समराला में एक चाय की दुकान चलाकर गुजारा करते थे। उनकी यह सादगी और संघर्षशीलता उनकी रचनाओं में भी झलकती है।

सम्मान: उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 2004 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी कृति सत्थर के लिए मिला। यह पुरस्कार उनके जीवन की कठिनाइयों के बीच एक बड़ी पहचान था।

मृत्यु और विरासत

15 साल पहले 14 अगस्त 2007 को दिला का निधन हुआ था। डॉ. सत्यपाल सहगल ने अपनी किताब में लिखा है, उसका जीवन-अंत जिस मुफलिसी और उपेक्षा से भरा था, वह एक मायने में साहित्यिक समाज में सुपरिचित चीज है और कायदे से किसी शहादत की श्रेणी में नहीं रखी जाती है, जैसे एके-47 की गोलियां खाकर पाश की जिंदगी के अंत की शहादत।

लाल सिंह ‘दिल’ न केवल एक कवि थे, बल्कि एक विचारक और योद्धा भी थे, जिन्होंने अपने शब्दों से समाज को झकझोरने का काम किया।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 11:08:05