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1857 ई. के स्वतंत्रता आंदोलन के वातावरण में डूंगरपुर जिले के बांसीया गांव स्थित बंजारा परिवार के बेछडगेर कमलीदेवी के यहां 20 दिसंबर 1858 ई. गोविंद बंजारा का जन्म हुआ। वागड़ क्षेत्र में गुलामी की मार झेल रहे आदिवासी समाज को संबल देकर भक्ति मार्ग से जोड़कर गोविन्द गुरु महाराज ने नई भक्ति क्रांति का संचार किया। समाजबंधुओं की दुर्दशा देख कर लोगों को संस्कारित करने स्वतंत्र कराने का संकल्प लेकर भगत आंदोलन की राह पकड़ी। वे राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन के जनक थे। 1903 में उन्होंने ‘संप सभा’ नामक संगठन बनाया। ‘संप’ का अर्थ है मेल-मिलाप और बुराईयों का त्याग करना। गोविंद गुरु के नेतृत्व में ‘मेल-मिलाप’ का यह कार्य आगे बढ़ा और मानगढ़ इसका केन्द्र बन गया। इस केंद्र ने आदिवासियों को अपनी संस्कृति के बारे में जागृत किया था। गोविंद गुरू को मानने वाले लोग मूर्ति पूजा का निषेध करते हैं तथा किसी ईश्वर की पूजा नहीं करते। वे प्रकृति-पूजक हैं।
भगत आंदोलन
गोविंद गुरु ने राजस्थान और गुजरात के आदिवासी बहुत सीमावर्ती क्षेत्रों में 1890 के दशक में भगत आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में अग्नि को प्रतीक माना गया था। उन्होंने 1893 में सम्प सभा की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी और व्यभिचार से दूर रहने का प्रचार किया। गोविंद गुरु ने लोगों से सादा जीवन जीने, हर दिन नहाने, यज्ञ और कीर्तन करने, बच्चों को पढ़ाने, अन्याय न सहने, जागीरदारों को लगान न देने और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या की राजपूत प्रथा और राजपूतों और ब्राह्मणों दोनों के बीच विधवा पुनर्विवाह के खिलाफ निषेध की निंदा की, और इस संबंध में आदिवासी प्रथाओं की श्रेष्ठता पर जोर दिया।
मानगढ़ धाम
गोविंद गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने का कार्य भी किया। इसका नतीजा यह हुआ की डूंगरपुर का तत्कालीन राजा इतना डर गया कि उसने अंग्रेज सेना से सहायता मांगी। 17 नवंबर 1913 में अंग्रेज सेना की सहायता से लगभग 2000 निहत्थे आदिवासियों की मानगढ़ की पहाड़ी पर हत्या कर दी गयी और गोविंद गुरु को अंग्रेजों ने बंदी बना लिया। उन्हें 1923 में इस शर्त पर छोड़ा गया कि वे इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करेंगे। 30 अक्टूबर 1931 को गोविंद गुरु की मृत्यु हो गई, जहां उनका चबूतरा बना हुआ है।
स्वाभिमान, स्वातंर्त्य हेतु अंग्रेजों की गुलामी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय कर समाज को प्रेरित किया। भगत आंदोलन की राह में 5 लाख लोगों ने गोविंद को अपना गुरु मान लिया था।





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