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आदिवासियों के हकों के लिए लड़ने वाले जयपाल सिंह मुंडा

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2026-01-10 14:09:55

जयपाल सिंह मुंडा जी का जन्म 3 जनवरी, 1903 को खूंटी के टकरा पाहनटोली के एक आदिवासी परिवार में हुआ। उन दिनों बिहार भी बंगाल का हिस्सा हुआ करता था। उनके बचपन का नाम प्रमोद पाहन तथा पिताजी का नाम अमरू पाहन था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में ही हुई। ईसाई धर्म स्वीकार करने के उपरांत उन्होंने रांची में चर्च रोड स्थित सेंट पॉल हाई स्कूल से 1919 में दसवीं कक्षा की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। सन 1920 में उनको सैंट अगस्टाइन कॉलेज तथा 1922 में आॅक्सफोर्ड के संत जॉन्स कॉलेज में प्रवेश मिला लेकिन उन्होंने अपना आदिवासी वाला नाम नहीं बदला। वे आदिवासी समाज के प्रथम युवक थे जो ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा प्रतियोगिता उत्तीर्ण कर भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) आॅफिसर बने। वे हॉकी के पहले आदिवासी और भारतीय खिलाड़ी थे जिनको आॅक्सफोर्ड में आॅक्सफोर्ड ब्लू की उपाधि से नवाजा गया। वे भारतीय हॉकी के कैप्टन रहे जो डिफेंडर के स्थान पर खेलते थे। सन 1928 में ओलंपिक्स एमस्टरडम (हालेंड) में हुए खेलों में अपनी कप्तानी के चलते ब्रिटिश इंडिया को प्रथम गोल्ड मेडल दिलाया। हॉकी से मोह के चलते उन्होंने प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया।

उनको पादरी बनने के लिए ही उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लंदन भेजा गया था लेकिन उन्होंने पादरी बनने से मना कर दिया। इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने कुछ दिन कोलकाता में बर्मा सेल कंपनी में नौकरी की तथा उसके बाद रांची के कॉलेज में प्रिंसिपल के रूप में नौकरी की।उन्होंने कॉलेज के प्राध्यापक से त्यागपत्र देकर बीकानेर के नरेश के यहां राजस्व मंत्री के रूप में काम किया। उन्होंने 1931 में तारा मजूमदार से शादी की जो कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष रहे ब्योमकेश चन्द्र बनर्जी की नातिन थी। 1954 में उनकी दूसरी शादी जहांआरा से हुई।

बीकानेर के नरेश की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने आदिवासी समाज में घूम-घूम कर दौरा किया और अपने समाज की परेशानियों को जाना। सन 1938 में उन्होंने आदिवासी महा सभा का गठन करने के उपरांत झारखंड पार्टी बनाई। 1946 में वे अपने गांव खूंटी विधानसभा के ग्रामीण क्षेत्र से कांग्रेस के नुमाइंदे को हराकर संविधान सभा में पहुंचे। संविधान सभा में उन्होंने आदिवासियों के लिए अपनी आवाज बुलंद रखी। संविधान के मसौदे पर बहस करते हुए उन्होंने शराबबंदी के विरोध में अपनी आवाज उठाई इसका कारण था कि चावल की खेती का काम जिसे शराब बनती थी आदिवासियों से जुड़ा हुआ था। उन्होंने जनजाति शब्द की जगह जंगली और आदिवासी शब्द को तरजीह दी। वे अनुसूचित जाति के लोगों की तरह अपने आप को हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं मानते थे। लेकिन कांग्रेस बहुमत की संविधान सभा में उनको जंगली अथवा आदिवासी शब्द के लिए कामयाबी नहीं मिल पाई।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर उन्होंने संविधान सभा में संविधान के मसौदे पर आदिवासियों के कल्याण के लिए सराहनीय काम किया जिसके कारण झारखंड के आदिवासी समाज के लोग उनको अपना देवता मानते हैं।

आदिवासियों के मसीहा जयपाल सिंह मुंडा जी 1952 में हुए स्वतंत्र भारत के प्रथम संसदीय आम चुनाव में अपने क्षेत्र से ही सांसद चुनकर आए एवं 1957, 1962 और 1967 के चुनाव में भी भारी मतों से विजयी रहे। 20 मार्च , 1970 को दिल्ली में उनके सरकारी बंगले में मस्तिष्क से रक्त स्राव के कारण 67 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।

उनके पास अपना कच्चा फूंस वाला पैतृक घर था जो रखरखाव ना होने के कारण क्षतिग्रस्त हो गया है।

उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी हैं जिनमें इसी सदी के असुर, अथ दुड़गम असुर हत्या कथा (कहानी संग्रह) जो मिट्टी की नमी जानते हैं, खामोशी का अर्थ पराजय नहीं होता (कविता संग्रह), अब हामर हक बनेला, आदि मशहूर कृतियां हैं।

जयपाल सिंह मुंडा मध्य पूर्व भारत के आदि वासियों को शोषण से बचाने के लिए अलग से आदिवासी राज्य की आवाज उठाने वाले पहले आदिवासी राजनीतिक नेता थे और झारखंड राज्य के जनक जिन्होंने बंगाल, बिहार , उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य इलाके को मिलाकर झारखंड की परिकल्पना की थी। उनकी मृत्यु के 30 वर्ष पश्चात 2000 में झारखंड राज्य तो बना लेकिन उनकी परिकल्पना के अनुरूप नही क्योंकि बिहार, उड़ीसा और बंगाल के आदिवासियों का एक तिहाई हिस्सा भी झारखंड राज्य में शामिल नहीं किया गया। झारखंड राज्य तो बना लेकिन आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित नहीं हो पाए। आज भी उनको जल जंगल जमीन के अधिकार से वंचित रखा जा रहा है। अगर वह अपनी मृत्यु से पहले झारखंड पार्टी का विलय इंडियन नेशनल कांग्रेस में नहीं करते तो शायद ऐसा नहीं होता। फिर भी आदिवासी समाज में जो प्रासंगिकता उनके जीवन काल में रही वह आज भी बनी हुई है।

एक ऐसे पहले आदिवासी उच्च शिक्षित, शिक्षक, अधिकारी, ब्रिटिश काल के बीकानेर रजवाड़े के राजस्व मंत्री, संविधान सभा के निर्वाचित सदस्य, कवि, लेखक एवं महान राजनेता मारेंग गोमके जयपाल सिंह मुंडे जी को कोटि-कोटि नमन!

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05