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अय्यंकाली: केरल के महान समाज सुधारक और दलित चेतना के अग्रदूत

Ayyankali: Keralas Great Social Reformer and Pioneer of Dalit Consciousness
News

2026-06-13 14:10:37

भारत का इतिहास ऐसे अनगिनत शूरवीरों और समाज सुधारकों की गाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों, भेदभाव और असमानता के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। ऐसे ही एक महान युगपुरुष और क्रांति के प्रणेता थे महात्मा अय्यंकाली। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरूआत में केरल (तत्कालीन त्रावणकोर रियासत) में जब छुआछूत और जातिवाद अपनी चरम सीमा पर था, तब अय्यंकाली ने शोषित और वंचित वर्गों, विशेषकर पुलाया समुदाय को उनके मानवीय अधिकार दिलाने के लिए एक अभूतपूर्व संघर्ष का नेतृत्व किया। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह सदियों से उत्पीड़ित एक पूरे समाज के जागरण और मुक्ति का इतिहास है। 19वीं सदी के त्रावणकोर (वर्तमान केरल) में जाति व्यवस्था इतनी क्रूर और अमानवीय थी कि स्वामी विवेकानंद ने केरल की यात्रा के बाद इसे ‘जातियों का पागलखाना’ कहा था। उस समय दलितों और निचली जातियों (जैसे पुलाया, पराया, एझावा) की स्थिति जानवरों से भी बदतर थी। उन पर निम्नलिखित कठोर और अमानवीय प्रतिबंध लागू थे। दलितों को न केवल अछूत माना जाता था, बल्कि उन्हें देखना भी अपवित्र माना जाता था। सवर्णों से उन्हें 64 कदम दूर रहने का नियम था। दलितों को उन सार्वजनिक सड़कों पर चलने की मनाही थी, जिनका उपयोग उच्च जाति के लोग करते थे। दलित पुरुषों और महिलाओं को शरीर का ऊपरी हिस्सा (कमर के ऊपर) ढंकने की अनुमति नहीं थी। महिलाओं को गले में पत्थरों की भारी मालाएं (कल्लूमाला) पहननी पड़ती थीं जो उनकी निम्न जाति का प्रतीक थीं। दलित बच्चों को स्कूलों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। उनके लिए शिक्षा के द्वार पूरी तरह बंद थे। पुलाया समुदाय के लोग मुख्य रूप से खेतों में काम करने वाले खेतिहर मजदूर थे, जिन्हें जमीन के साथ खरीदा और बेचा जाता था।

महात्मा अय्यंकाली का जन्म 28 अगस्त 1863 को त्रावणकोर रियासत (वर्तमान तिरुवनंतपुरम जिले) के वेंगानूर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम अय्यन और माता का नाम माला था। वे पुलाया समुदाय से ताल्लुक रखते थे। अय्यंकाली का बचपन घोर गरीबी और भेदभाव के बीच बीता। शिक्षा का अधिकार न होने के कारण वे कभी स्कूल नहीं जा सके और निरक्षर ही रहे। लेकिन प्रकृति ने उन्हें एक सुगठित शरीर, अदम्य साहस और एक तीक्ष्ण बुद्धि प्रदान की थी। युवावस्था में आते-आते वे अपने समुदाय के लोगों पर होने वाले दैनिक अत्याचारों को देखकर गहरे आक्रोश से भर गए। उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शारीरिक शक्ति को माध्यम बनाया और कलारीपयट्टू (केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट) सीखी। वे जल्द ही अपने समुदाय के युवाओं के बीच एक स्वाभाविक नेता के रूप में उभर गए।

अय्यंकाली का पहला और सबसे ऐतिहासिक विद्रोह 1893 की विल्लुवंडी यात्रा थी। उस समय दलितों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार नहीं था। इसके अलावा, दलितों को बैलगाड़ी (विल्लुवंडी) रखने या उसकी सवारी करने की भी मनाही थी। अय्यंकाली ने अपनी बचत से एक अच्छी बैलगाड़ी (विल्लुवंडी) खरीदी। उन्होंने उस गाड़ी में दो मजबूत बैल जोते। सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने एक सवर्ण की तरह कपड़े पहने—सिर पर पगड़ी बांधी, शरीर पर साफ कपड़े लपेटे और अपनी मूंछों को ताव दिया। वे अपनी बैलगाड़ी लेकर वेंगानूर से तिरुवनंतपुरम (कवडियार) की सार्वजनिक सड़क पर निकल पड़े। गाड़ी में लगी घंटियों की आवाज सुनकर जब उच्च जाति के लोगों ने एक पुलाया को इस वेशभूषा में राजपथ पर चलते देखा, तो वे क्रोध से आगबबूला हो गए। रास्ते में कई जगह उन्हें रोकने की कोशिश की गई, उनके साथ मारपीट का प्रयास हुआ, लेकिन अय्यंकाली ने अपनी कटार (चाकू) निकालकर डटकर उनका सामना किया। उनके साहस के आगे किसी की टिकने की हिम्मत नहीं हुई। यह यात्रा केवल एक बैलगाड़ी की सवारी नहीं थी; यह सदियों पुराने ब्राह्मणवादी और जातिवादी वर्चस्व के सीने पर एक जोरदार प्रहार था। इस घटना ने दलितों के भीतर एक नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार किया। इसके बाद 1898 में चाला बाजार में भी उन्होंने इसी तरह का सड़क संघर्ष किया और सार्वजनिक सड़कों पर दलितों के चलने का अधिकार धीरे-धीरे सुनिश्चित किया। अय्यंकाली समझ गए थे कि असंगठित रहकर इस सामंती व्यवस्था से नहीं लड़ा जा सकता। इसलिए, 1907 में उन्होंने साधु जन परिपालन संघ की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य दलितों और वंचित वर्गों को संगठित करना, उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था करना, उनके आर्थिक हालात सुधारना और उनके खिलाफ होने वाले अन्याय का सामूहिक विरोध करना था। अय्यंकाली ने संगठन को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से चलाया। उन्होंने अपने समुदाय के लोगों से अपील की कि वे सप्ताह में एक मुट्ठी चावल संगठन के लिए दान करें। संगठन ने अपने स्वयं के न्यायालय स्थापित किए, जहां दलितों के आपसी विवादों को सुलझाया जाता था ताकि उन्हें उच्च जाति के जमींदारों या सरकारी अदालतों में जाकर अपमानित न होना पड़े। यह केरल में दलितों का पहला ऐसा आधुनिक संगठन था जिसने सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर क्रांति की नींव रखी।

शिक्षा के लिए संघर्ष

अय्यंकाली स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन वे शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझते थे। उनका मानना था कि अज्ञानता ही दासता की सबसे बड़ी जंजीर है। 1907 में त्रावणकोर सरकार ने दलित बच्चों को स्कूलों में प्रवेश देने का एक आदेश पारित किया था, लेकिन उच्च जाति के लोगों और अधिकारियों के विरोध के कारण इसे कभी लागू नहीं किया गया। अय्यंकाली ने अपने समुदाय के बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए एक लंबा आंदोलन शुरू किया। जब सवर्णों ने पुलाया बच्चों को स्कूल में घुसने से रोका, तो अय्यंकाली ने एक ऐसा ब्रह्मास्त्र निकाला जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने पुलाया और अन्य कृषि मजदूरों को काम रोकने का आदेश दिया। उनका ऐतिहासिक नारा था:

‘यदि हमारे बच्चों को स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया गया, तो तुम्हारे खेतों में केवल खरपतवार ही उगेगी।

यह भारत के इतिहास की शायद पहली संगठित कृषि हड़ताल थी। महीनों तक खेत खाली पड़े रहे। जमींदारों ने अन्य जातियों के मजदूरों को लाने की कोशिश की, लेकिन खेती का काम पुलाया समुदाय की विशेषज्ञता थी। अंतत:, आर्थिक नुकसान से घबराकर जमींदारों और सरकार को झुकना पड़ा। 1914 में सरकार ने एक नया आदेश जारी कर दलित बच्चों के लिए स्कूलों के दरवाजे खोल दिए। इस आदेश के बाद अय्यंकाली पंचमी नाम की एक छोटी दलित बच्ची का हाथ पकड़कर उसे ऊरुट्टम्बलम के स्कूल में दाखिला दिलाने ले गए। उच्च जाति के लोगों ने इसके विरोध में पूरे स्कूल को ही आग लगा दी और इसका इल्जाम अय्यंकाली पर मढ़ दिया। इसके बाद कई दिनों तक पुलाया समुदाय पर हिंसक हमले हुए, जिसे ऊरुट्टम्बलम दंगे के नाम से जाना जाता है। लेकिन अय्यंकाली पीछे नहीं हटे और अंतत: शिक्षा के अधिकार को लागू करवा कर ही दम लिया।

कल्लूमाला आंदोलन (पत्थरों की माला का विद्रोह)

अय्यंकाली का एक और महान योगदान दलित महिलाओं के सम्मान और गरिमा की रक्षा करना था। उस समय पुलाया समुदाय की महिलाओं को कमर के ऊपर कपड़े पहनने की मनाही थी। अपनी निम्न जाति की पहचान के लिए उन्हें गले में भारी और खुरदरे पत्थरों/मोतियों की माला (कल्लूमाला) पहननी पड़ती थी, जिससे उनकी गर्दन छिल जाती थी और खून बहने लगता था। अय्यंकाली ने महिलाओं को जागरूक किया कि यह माला कोई आभूषण नहीं, बल्कि उनकी गुलामी की बेड़ी है। उन्होंने महिलाओं से इन मालाओं को उतार फेंकने और सम्मानजनक ब्लाउज (रविकै) पहनने का आह्वान किया। इस बात को लेकर सवर्णों ने कोल्लम के पेरिनाड में हिंसक हमले शुरू कर दिए। महिलाओं के कपड़े फाड़े गए और उन्हें प्रताड़ित किया गया। 1915 में कोल्लम में अय्यंकाली के नेतृत्व में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें हजारों दलित महिलाएं शामिल हुईं। अय्यंकाली की उपस्थिति में महिलाओं ने अपनी कल्लूमाला को तोड़कर फेंक दिया और ऊपरी वस्त्र पहनने के अपने अधिकार की घोषणा की। यह केरल के इतिहास में महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकार का एक बहुत बड़ा मील का पत्थर था। अय्यंकाली के संघर्षों और उनके संगठन की बढ़ती ताकत को देखते हुए त्रावणकोर सरकार को उन्हें मान्यता देनी पड़ी। 1911 में त्रावणकोर के महाराजा ने अय्यंकाली को श्री मूलम प्रजा सभा (तत्कालीन विधानसभा) का सदस्य मनोनीत किया। वे इस सभा में पहुंचने वाले पुलाया समुदाय के पहले व्यक्ति थे।

वे लगभग 25 वर्षों तक इस प्रजा सभा के सदस्य रहे। उन्होंने इस मंच का उपयोग अपने समाज की आवाज उठाने के लिए किया। उन्होंने सरकार से मांग की कि:

<दलितों को खेती करने और घर बनाने के लिए मुफ्त सरकारी जमीन दी जाए।

<सरकारी नौकरियों (कम से कम चपरासी के पद पर) में दलितों को प्रतिनिधित्व दिया जाए।

<जो स्कूल दलितों को प्रवेश नहीं देते, उनकी मान्यता रद्द की जाए।

<दलितों के लिए अलग स्कूल और हॉस्टल बनाए जाएं।

उनके इन्हीं अथक प्रयासों के कारण त्रावणकोर में भूमिहीन दलितों को जमीन के पट्टे मिलने शुरू हुए और उनके लिए विशेष विद्यालय खोले गए।

अय्यंकाली के कार्य केवल केरल तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनकी गूंज राष्ट्रीय स्तर पर भी सुनी गई। जब जनवरी 1937 में महात्मा गांधी केरल के दौरे पर आए, तो उन्होंने विशेष रूप से वेंगानूर जाकर अय्यंकाली से मुलाकात की। गांधीजी अय्यंकाली के व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए जमीनी कार्यों से अत्यधिक प्रभावित हुए। गांधीजी ने उनसे पूछा, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? अय्यंकाली ने बड़े ही गर्व और स्पष्टता के साथ उत्तर दिया:

‘मेरी केवल एक ही इच्छा है। मैं मरते दम तक यह देखना चाहता हूँ कि मेरे समुदाय के कम से कम दस लोग बीए (इ.अ.) पास करके स्नातक बनें।’ अय्यंकाली का यह जवाब शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। इसी ऐतिहासिक मुलाकात में महात्मा गांधी ने उनके संघर्षों का सम्मान करते हुए उन्हें ‘पुलाया राजा’ की उपाधि दी थी।

महापरिनिर्वाण

जीवन भर अपने समाज के लिए एक अजेय योद्धा की तरह लड़ने वाले इस महामानव का शरीर अंतत: बीमारियों और बुढ़ापे के कारण कमजोर होने लगा। 18 जून 1941 को 77 वर्ष की आयु में महात्मा अय्यंकाली का निधन (महापरिनिर्वाण) हो गया। उनका देहावसान केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि एक युग की समाप्ति थी। उन्होंने जिस समाज को एक जानवर के स्तर से उठाया था, उसे उन्होंने मानवीय गरिमा, शिक्षा और अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखा दिया था।

महात्मा अय्यंकाली का नाम भारत के उन अग्रणी दलित विचारकों और समाज सुधारकों की सूची में सबसे ऊपर आता है, जिनमें महात्मा ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियार और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर शामिल हैं। अय्यंकाली केवल उपदेश देने वाले सुधारक नहीं थे, वे एक एक्शन-ओरिएंटेड (कर्मठ) क्रांतिकारी थे। जहाँ डॉ. अंबेडकर ने कानूनी और संवैधानिक रास्तों से दलितों को अधिकार दिलाए, वहीं अय्यंकाली ने सड़कों पर उतरकर, बैलगाड़ी चलाकर और हड़तालें करके अपने अधिकार छीने। उनका विल्लुवंडी आंदोलन सार्वजनिक संपत्ति पर समान अधिकार का प्रतीक है। उनकी शिक्षा हड़ताल यह दशार्ती है कि बिना शिक्षा के कोई भी समाज तरक्की नहीं कर सकता। कल्लूमाला आंदोलन महिलाओं की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का एक प्रारंभिक और सफल मॉडल है। आज जब हम आधुनिक और शिक्षित केरल की बात करते हैं, तो उस केरल मॉडल की नींव में कहीं न कहीं महात्मा अय्यंकाली का वह पसीना और खून मिला हुआ है जो उन्होंने वेंगानूर की सड़कों पर बहाया था। उनके द्वारा जलाई गई ज्योति आज भी भारत के करोड़ों शोषितों और वंचितों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए प्रेरित करती है। एक ऐसा समाज जहां आज भी कई रूपों में जातिगत भेदभाव मौजूद है, वहां महात्मा अय्यंकाली के विचार और उनके संघर्ष के तरीके हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। भारत के इतिहास में उनका स्थान एक सच्चे महात्मा और क्रांतिवीर के रूप में सदैव अमर रहेगा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

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