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भारत की पावन धरती बिहार में एक ऐसे साधारण व्यक्ति ने जन्म लिया, जिसने अपनी दिवंगत पत्नी के स्मृति-प्रेम और लोक-कल्याण की भावना में अकेले ही पूरे पहाड़ का सीना चीर दिया। बिहार के गया जिले में अत्री और वजीरगंज के समीप स्थित गेहलौर गाँव के निवासी दशरथ मांझी को संपूर्ण देश और दुनिया सम्मानपूर्वक माउंटेन मैन के नाम से जानती है। दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 (कुछ अभिलेखों में 1929) को गया (बिहार) के गेहलौर गाँव में एक अत्यंत निर्धन मुसहर (दलित) परिवार में हुआ था। बाल्यकाल में पारिवारिक तंगहाली के कारण वे कम उम्र में ही घर से भाग गए और धनबाद की कोयला खदानों में मजदूरी करने लगे। कुछ वर्षों बाद वे अपने गाँव लौट आए और फाल्गुनी देवी के साथ परिणय सूत्र में बंधे। गेहलौर गाँव के निकट एक विशालकाय और दुर्गेय पहाड़ स्थित था। गाँव के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं, बाजार या किसी भी बुनियादी आवश्यकता के लिए इस पहाड़ का चक्कर काटकर जाना पड़ता था, जिससे दूरी बहुत अधिक बढ़ जाती थी।
सन 1959-60 के दौरान, जब दशरथ मांझी पहाड़ के उस पार खेत में काम कर रहे थे, तब उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी उनके लिए भोजन और जल लेकर जा रही थीं। रास्ते में पहाड़ के संकरे और पथरीले दर्रे में पैर फिसलने के कारण वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। सही समय पर अस्पताल और चिकित्सीय सहायता न मिल पाने के कारण उनका असमय निधन हो गया। पत्नी की अकाल मृत्यु ने दशरथ मांझी के हृदय को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने मन ही मन यह प्रण लिया कि जिस पहाड़ के कारण उनकी पत्नी की जान गई और जो उनके गाँव के विकास में बाधा बना हुआ है, वे उस पहाड़ को काटकर बीचों-बीच से रास्ता निकालेंगे ताकि भविष्य में किसी अन्य ग्रामीण को इलाज के अभाव में अपनी जान न गंवानी पड़े।
हथौड़े और छैनी से चीरा पहाड़
केवल एक छैनी और हथौड़ा हाथ में लेकर अकेले ही 1960 में दशरथ मांझी ने विशालकाय गेहलौर की पहाड़ियों को काटना प्रारंभ कर दिया। शुरूआत में जब उन्होंने अपनी बकरियाँ बेचकर औजार खरीदे और पहाड़ तोड़ना शुरू किया, तो गाँव वालों और समाज ने उन्हें ‘पागल’ और ‘सनकी’ कहा। लेकिन मांझी ने कहा कि लोगों के इन तानों ने उनके संकल्प को और अधिक मजबूत किया। कड़ाके की ठंड, तपती धूप और मूसलाधार बारिश की परवाह किए बिना लगातार 22 वर्षों (1960 से 1982) की अखंड मेहनत के बाद उन्होंने अकेले के दम पर:
360 फुट लंबा (110 मीटर)
30 फुट चौड़ा (9.1 मीटर)
25 फुट गहरा (7.6 मीटर) रास्ता पहाड़ के सीने में बना दिया।
इस अभूतपूर्व कार्य के पूरा होने से गया के अत्री और वजीरगंज सेक्टर्स के बीच की दूरी 55 किलोमीटर से घटकर मात्र 13 से 15 किलोमीटर रह गई। यद्यपि वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी पहाड़ को काटना कानूनी रूप से जटिल विषय था, परंतु उनके इस सर्व-कल्याणकारी और निस्वार्थ मानवीय प्रयास के आगे सभी नतमस्तक हो गए। बाद में ग्रामीणों ने भी उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया, भोजन दिया और औजार खरीदने में सहयोग किया।
पैदल दिल्ली यात्रा: पहाड़ काटकर रास्ता बनाने के बाद भी जब सरकारी तंत्र ने उस रास्ते को पक्का करने में कोई रुचि नहीं दिखाई, तो दशरथ मांझी अपने हक की आवाज उठाने के लिए गया से नई दिल्ली तक रेल की पटरियों के सहारे पैदल (1,000 से अधिक किमी) चलकर दिल्ली पहुँचे और सरकार के समक्ष गुहार लगाई।
राष्ट्रीय व राज्य सम्मान: उनकी इस अभूतपूर्व उपलब्धि को देखते हुए बिहार सरकार ने उन्हें कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 2006 में बिहार सरकार द्वारा सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री प्रदान करने हेतु आधिकारिक प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा गया था।
सिनेमा और लोकप्रिय संस्कृति में स्थान
दशरथ मांझी की जीवन गाथा ने कला, साहित्य और सिनेमा जगत को गहराई से प्रभावित किया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म प्रभाग द्वारा कुमुद रंजन के निर्देशन में द मैन हु मूव्ड द माउंटेन नामक डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया गया। वहीं प्रसिद्ध निर्देशक केतन मेहता ने उनके जीवन पर आधारित फीचर फिल्म मांझी: द माउंटेन मैन बनाई। मांझी जी ने अपनी मृत्युशय्या पर इस फिल्म के निर्माण के अधिकार दिए थे। 21 अगस्त 2015 को रिलीज हुई इस फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दशरथ मांझी और राधिका आप्टे ने फाल्गुनी देवी का जीवंत अभिनय किया। इसके अलावा कन्नड़ फिल्म ओलवे मंदार (निर्देशन: जयतीर्थ) में भी उनके संघर्ष की झलक दिखाई गई। साथ ही आमिर खान द्वारा होस्ट किए गए टीवी शो सत्यमेव जयते के दूसरे सीजन का पहला एपिसोड दशरथ मांझी की स्मृति को समर्पित किया गया। आमिर खान ने उनके बेटे भागीरथ मांझी और बहू बसंती देवी से मुलाकात कर आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया था।
निधन: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय के कैंसर से जूझते हुए 17 अगस्त 2007 को 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। बिहार सरकार द्वारा उनका अंतिम संस्कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गेहलौर में उनकी स्मृति में 3 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क और एक अस्पताल बनवाने का निर्णय लिया, जो आज ग्रामीणों की सेवा कर रहा है।
दशरथ मांझी का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि मनुष्य के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति, पवित्र उद्देश्य और अटूट संकल्प हो, तो अकेला व्यक्ति भी बड़े से बड़े पहाड़ को झुका सकता है।





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