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9 अगस्त : अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस

अस्तित्व, अधिकार और अस्मिता का वैश्विक संघर्ष
News

2026-08-08 13:29:21

दुनिया भर में हर साल 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस मनाया जाता है। यह दिन विश्व के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले मूलनिवासियों (आदिवासियों) के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, भाषा और उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक वैश्विक मंच प्रदान करता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सदियों से हाशिए पर धकेले गए समुदायों के आत्मसम्मान, पहचान और उनके अस्तित्व के संघर्ष का प्रतीक है। मूलनिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर पहली बार प्रयास 20वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुए। जिसकी शुरूआत (1982) में संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार आयोग ने 9 अगस्त 1982 को पहली बार मूलनिवासी आबादी पर एक कार्य समूह की बैठक आयोजित की। वहीं इसकी आधिकारिक घोषणा दिसंबर 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 49/214 पारित कर हर साल 9 अगस्त को ‘अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। तथा 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र ने मूलनिवासियों के अधिकारों पर घोषणापत्र को अपनाया। यह दस्तावेज मूलनिवासियों के आत्मनिर्णय, सांस्कृतिक अधिकारों और संसाधनों पर उनके पारंपरिक स्वामित्व को वैश्विक मान्यता देता है।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर यदि विश्व मूलनिवासी दिवस मनाया जाता है तो उसका उद्देश्य यह कि अतीत में विश्व के कई देशों में वहां के मूलनिवासियों पर हुए अत्याचारों के बारे में जब समाज को जानकारी मिली और उसके मध्य का सच सबके सामने आया तो उनके साथ हुए अन्याय को राष्ट्रीय स्तर पर सबके सामने लाने की बात सामने आयी। जिसमें तय हुआ कि इस दिन को विश्व मूलनिवासी दिवस का दर्जा देकर प्रतिवर्ष बनाया जाए। यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका खंड के देशों में साम्राज्यवादी ताकतों ने स्थानीय मूलनिवासियों पर आक्रमण कर अमानवीय अत्याचार किये, उनकी संस्कृति को नष्ट किया, वहां अपने उपनिवेश-कॉलोनियां बनाई। कहीं-कहीं तो सम्पूर्ण मूलनिवासी समाज को नष्ट कर अपनी बस्ती बनाई। 13 फरवरी 2008 को आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रूड ने इस संदर्भ में संसद में सार्वजनिक रूप में वहां के मूलनिवासियों से माफी भी मांगी थी। आज वक्त बदला है। विश्व में हम परिवर्तन देख सकते हैं। जनजातीय समाज में आयी जागृति के कारण आज समाज अपने अधिकारों के लिए आगे आया है। ऐसे में जनजातीय समाज ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ मनाए, उनके लिये एकता प्रकट करे तो उसमें कुछ अनुचित नहीं। परन्तु भारत में इसके मनाने की प्रासंगिकता पर विचार आवश्यक है।

कौन हंै मूलनिवासी? संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व भर में लगभग 90 से अधिक देशों में 47.6 करोड़ से अधिक मूलनिवासी रहते हैं। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 6% हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों में इनकी हिस्सेदारी 15% से अधिक है। वहीं भारत में वे सभी भारतीय जो यहां की श्रवण संस्कृति में विश्वास करते थे वे वास्तव में यहाँ के मूलनिवासी हैं। भारत के संविधान ने जिस समाज को अनुसूचित जनजाति के रूप में घोषित किया है उसके विकास हेतु कई प्रकार के प्रयास चल रहे हैं। संविधान में जनजाति समाज के लिये कई अधिकारों का प्रावधान है। विश्व में मूलनिवासियों के अधिकारों की जो बात आज चल रही है वैसे अधिकार (उससे भी अधिक) भारतीय संविधानकर्ताओं ने पहले से ही जनजाति समाज को दिए हैं। इसलिए विश्व के अन्य देशों में मूलनिवासियों के अधिकारों की लड़ाई और भारत में जनजाति अधिकारों की बात में बहुत अंतर है। एक बात है कि स्वतंत्रता के बाद जनजाति समाज के विकास हेतु जिन योजनाओं की सरकार ने आज तक घोषणा की है उसका लाभ वास्तव में जनजाति समाज को नहीं मिला है। सरकारी अधिकारियों के रवैये के कारण समाज के अंतिम पंक्ति में खडे व्यक्ति तक लाभ नहीं पहुंच सका है। इसके लिये जनजाति समाज को अपनी बात करना उचित एवं न्यायपूर्ण कह सकते हैं। परन्तु विश्व के अन्य देशों में अपने अधिकारों के लिये जिस प्रकार की भाषा बोली जाती है वैसी स्थिति भारत में नहीं है।

भारत में कुछ लोग ‘आदिवासी दिवस’ के नाम पर अपनी राजनीति कर रहे हैं, उसे भी समझने की आवश्यकता है। जनजाति समाज को संम्पूर्ण समाज के साथ जोड़ने के बदले अलग पहचान की बात होती हो तो उसमें देशहित नहीं है। जनजाति समाज के पढ़े-लिखे युवकों को इसे समझने की आवश्यकता है। वैसे भी अपने जनजाति बन्धुओं में शिक्षा का प्रतिशत कम है। इसलिये कोई भी आए और अपनी बात कहने के बहाने कुछ भी समझाये- ये कितना उचित होगा? ‘हमें अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करना पड़े तो हम संघर्ष करेंगे परन्तु अपने अधिकार लेकर ही रहेंगे’, यह सुनने के लिये तो अच्छा लगता है। परन्तु भाषण के बाद आंदोलन और इसका परिणाम यदि हिंसा में परिवर्तित होता हो तो कदापि उचित नही, इससे जनजाति को ही परेशानी होगी। जागृत जनजातीय युवकों को ऐसे स्वार्थी तत्वों की मनसा को समझना होगा। इससे अपने समाज को बचाना होगा। ‘आदिवासी दिवस’ के नाम पर यदि अलगाव की भावना बढ़ती है तो वह न जनजाति समाज के हित में है और न देश के हित में। हमें एक बात को स्पष्ट रूप से जानने की आवश्यक है कि हम समाज को जोड़ने का कार्य कर रहे हैं, न कि तोड़ने का। जनजातीय समाज सम्पूर्ण समाज का अभिन्न अंग था और आज भी है, इसमें कोई भी दो राय नहीं है। यदि कोई हमारे जनजाति बन्धुओं को सम्पूर्ण समाज से अलग कर उसकी अलग पहचान बनाना चाहता है तो वह देश की एकता एवं अखण्डता के लिए संकट ही होगा। वास्तव में सांस्कृतिक विरासत को लेकर समाज को जोड़ने का कार्य करने की आवश्यकता है। जनजातीय समाज का विकास हो सके इसके लिए शिक्षा, आरोग्य, रोजगार चलाते हुए प्रयास होने चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मानव सभ्यता की जड़ें मूलनिवासियों की जीवनशैली में निहित हैं। यदि हमें अपनी पृथ्वी को बचाना है, जलवायु संकट को टालना है और एक न्यायसंगत समाज का निर्माण करना है, तो हमें मूलनिवासियों के अधिकारों, उनकी संस्कृति और उनकी भूमि का सम्मान करना होगा। मूलनिवासियों का विकास उन्हें उनकी जड़ों से उखाड़कर नहीं, बल्कि उनकी पहचान और स्वाभिमान को बनाए रखते हुए ही संभव है। 9 अगस्त का यह दिन पूरी दुनिया को यह संदेश देता है कि— जल, जंगल और जमीन पर मूलनिवासियों का अधिकार, केवल एक मांग नहीं बल्कि उनकी जीवन-रेखा और मानव सभ्यता का आधार है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05