2025-03-13 12:28:01
चेतन सिंह
प्रश्न: होली में कितनी सच्चाई है, क्या यह ब्राह्मणवादी/मनुवादी व्यवस्था का बहुजन समाज को ठगने का एक तरीका है?
उत्तर: होली नाम का कथित त्यौहार यहाँ के मूलनिवासियों के लिए कोई त्यौहार नहीं है। मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति की पुस्तक मनुस्मृति के अनुसार देश के मूलनिवासी समुदाय को शूद्र घोषित किया गया है। शूद्र वर्ण में दो उपवर्ग भी है, एक अछूत (एससी जातियों का समूह) और दूसरा है सछूत (ओबीसी जातियों का समूह)। अछूत समूह में अनुसूचित कही जाने वाली वे जातियाँ हैं जिन्हें मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति के अनुसार छूना भी पाप बना दिया था और इन अछूत जाति के समाज का आम रास्तों पर चलना भी प्रतिबंधित कर दिया था। ब्राह्मणी/मनुवादी संस्कृति के लोगों ने मनोवैज्ञानिक तरीके से ऐसी विषमतावादी अमानवीय व्यवस्था को समाज में गहराई तक स्थापित किया। अगर कोई अछूत जाति का व्यक्ति रास्ते पर पड़ी किसी वस्तु को छू ले तो वह अपवित्र हो जाती है। इसलिए समाज के विभिन्न जातीय समूह अछूत जाति के व्यक्तियों से अलगाववाद रख रहे थे, और उनमें अछूतों के प्रति नफरत का भाव गहराई तक विद्यमान किया गया था। मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने बारम्बारता की नीति अपनाकर इस व्यवस्था को जनता के मस्तिष्क में समाहित कर दिया था। अगर अछूत समूह के व्यक्ति आम रास्ते से गुजरते हैं तो वह रास्ता अपवित्र हो जाता था इसलिए ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने अछूत वर्ग के व्यक्ति के कमर पर झाड़ू बाँधकर चलने का प्रावधान किया था ताकि उनके पैरों के निशान साथ-साथ मिटते जाएँ। ब्राह्मणी संस्कृति का यह प्रावधान अमानवीय तो था ही, मगर इसमें कोई तर्क और वैज्ञानिकता भी नहीं थी, चूंकि अगर झाड़ू के द्वारा पैरों के निशान मिटाये जा रहे हैं तो जिस मिट्टी और धूल पर शूद्रों के पैरों के निशान बनते थे वे पद-चिन्ह झाड़ू से मिटाकर मिट्टी के कण कैसे शुद्ध हो रहे थे? इन अकल के अंधे मनुवादी-ब्राह्मणों से पूछना चाहिए कि झाडू से पद चिन्ह मिटाने भर से वह रास्ता शुद्ध कैसे हो गया? इस तरह के अवैज्ञानिक और अमानवीय प्रावधानों को देखकर लगता है कि ब्राह्मणी संस्कृति के मनुवादी लोग उच्च कोटि के मूर्ख और धूर्त थे। उनमें तर्कसंगत और वैज्ञानिक सोच का घोर अभाव था। हम यहाँ पर यह भी बताना चाहते हैं कि अगर ब्राह्मणी संस्कृति के इन मूर्खों और धूर्तों को अपनी पवित्रता कायम रखनी ही थी तो उन्हें (आर्य) भारत भूमि पर नहीं आना चाहिए था और किसी वजह से यहाँ पहुँचने में सफल भी हो गए तो उन्हें अछूतों द्वारा अपवित्र की गई पृथ्वी को छोड़कर तुरंत यहाँ से भाग जाना चाहिए था। ब्राह्मणी-मनुवादी संस्कृति के अमानवीय, अतर्कशील, अवैज्ञानिक व्यवहार को देखकर अछूत कही जाने वाली जातीय समूहों को अपने एकता बल से इन मनुवादी-ब्राह्मणी (आर्य) संस्कृति के लोगों को यहाँ (भारत) से अपने शारीरिक और बुद्धिबल से खदेड़ देना चाहिए था। शूद्र वर्ग का दूसरा हिस्सा सछूत समुदाय की वे अति पिछड़ी जातियाँ है जो आज के समय में ओबीसी की श्रेणी में आती है। लेकिन इस ओबीसी में भी दो प्रकार की उप-श्रेणियाँ है। पहली श्रेणी उन जातियों की हैं जो मूल रूप से कामगार तकनीकी जातियाँ कही जाती है, जैसे नाई, कुम्हार, गडरिये, बढ़ई, तेली, तमोली, लौहार, धोबी, पटेल, मौर्य, शाक्य, कुशवाहा व अन्य समक्षक जातियाँ हैं जिनका मुख्य कार्य तकनीकी किस्म का है। दूसरी श्रेणी में वे सभी पिछड़ी जातियाँ आती है जो कृषि के कार्यों में लगी हुई है और कृषि योग भूमि पर उनका मालिकाना अधिकार भी है। कृषि योग भूमि पर इस श्रेणी का मालिकाना अधिकार होने के कारण इस श्रेणी के लोगों में अहंकार, उदण्डता व सामंतवादी सोच अधिक है। इस श्रेणी की जातियों की वैसे तो बहुत सारी अछूत और सछूत जातियाँ भी हैं। मगर मुख्य रूप से इस श्रेणी में- जाट, गुर्जर, अहीर, व उनके समकक्ष अन्य जातियाँ आती है। इनकी मानसिकता में खेती की जमीन का अधिकार होना और सामंतवादी सोच का होना, इस जातीय समूह के लोगों को अछूत व अति पिछड़ी कामगार जातियों पर अमानवीय हमले करने के लिए उत्प्रेरित करती है। वास्तविकता के आधार पर देखा जाए तो ये अति पिछड़ी जातियाँ व अछूत वर्ग की सैंकड़ों जातियाँ ही आधुनिक भारत के वैज्ञानिक समूह है जिन्होंने अपने तकनीकी ज्ञान के आधार पर निरंतरता के साथ उसमें सुधार व उत्तम बनाने की प्रक्रिया को जारी रखा जिसके कारण भारत का तकनीकी ज्ञान निरंतरता के साथ दिन-प्रतिदिन उत्कृष्ट बनता गया है।
होली शूद्रों को अपमानित करने का मनुवादी त्यौहार है गर्व करने का नहीं। मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने यहाँ के मूलनिवासी (शूद्र) समुदाय को अपमानित करने के उद्देश्य से अपने षड्यंत्रों के द्वारा होली के त्यौहार की रचना की और समाज में उस घटना को बारम्बारता के साथ दोहरा कर पक्का किया।
होली के नाम में छिपा है अतीत के कुटिल ब्राह्मणों की पौराणिक कथा का रहस्य यहाँ पर हिरनाष्क और हिरण्यकश्यप नाम के दो सगे भाई थे जिनका राज्य हरिद्रोही (वर्तमान हरदोई) में था। इनकी एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र प्रह्लाद था। होलिका जो प्रह्लाद की बुआ थी वह उसे बहुत प्यार करती थी। ब्राह्मणी संस्कृति के विष्णु व अन्य दुराचारियों ने हिरनाष्क और हिरण्यकश्यप के राज्य को हड़पने के उद्देश्य से प्रह्लाद को चुना और उसे विभिन्न षड्यंत्रकारी योजनाओं के द्वारा अपने जाल में फंसाया। प्रह्लाद को नशेड़ी, भंगेड़ी व व्यभिचारी बनाया। ताकि हिरनाकश्यप के शासन को उसे ध्वस्त करके हड़पा जा सके। मूलनिवासियों की आस्था व सामाजिक दंतकथाओं के आधार पर ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद ब्राह्मणी संस्कृति के दुराचरियों के चंगुल में फँसकर तथाकथित होली फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पुर्णिमा को मनाई जाती है। इस दिन ब्राह्मणी संस्कृति के उदण्ड किस्म के गुंडों ने योजना बनाकर प्रह्लाद को अपने पास बुलाया, उसे शराब व अन्य किस्म के नशे में मदमस्त किया और वह काफी देर रात तक घर नहीं लौटा तो हिरण्यकश्यप के मंत्री-संत्रियों ने उसे ढूँढा तो पता चला कि वह ब्राह्मणी संस्कृति के विष्णु के षड्यंत्र के तहत उसकी मण्डली में शराब पीकर बेहोशी जैसी अवस्था में मदमस्त पड़ा है। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह घटना मालूम हुई तो वह उसे देखने के लिए रात के अंधेरे में ढूँढते-ढूँढते वहाँ पहुँच गई और वहाँ जाकर देखा कि ब्राह्मण संस्कृति के गुण्डे प्रह्लाद को घेरे हुए हैं। उन्होंने होलिका को देखकर उसके साथ भी अभद्रता और गाली-गलोच की। विष्णु ब्राह्मण व नारायण के गुंडों ने होलिका से साथ बलत्कार किया और उसे वहीं जंगल में मारकर फेंक और जंगल से लकड़ी, कबाड़ इत्यादि इकट्ठा करके लाश को उसमें जला दिया, वास्तविकता के आधार पर होली नाम का कोई त्यौहार है ही नहीं, यह सिर्फ आर्यों द्वारा रची गई एक षड्यंत्रकारी अमानवीय घटना है जिसके द्वारा भारत के अनार्यों (मूलनिवासी) को अपमानित किया जाता है। वैसे भी भारतीय जनता में ब्राह्मणी संस्कृति के लोग होली को आमतौर पर शूद्रों का त्यौहार बताते हैं इस तरह का उनका कथन शूद्र समाज की लड़की के साथ बलत्कार करके मारकर जला देना एक अमानवीय षड्यंत्रकारी घटना है, शूद्रों ने न इसे समझा है न इसके पीछे के तर्क को जाने की कोशिश की हैं।
प्रश्न: होली त्यौहार से फायदा किसको है?
उत्तर: देश में ब्राह्मण-बनिया गठबंधन दृढ़ता के साथ अबाध्य रूप से चल रहा है। मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति के लोग शूद्र समाज को हमेशा षड्यंत्रकारी घटनाओं में फंसाकर उनकी अज्ञानता का फायदा उठाते हैं। कड़ी मेहनत और परिश्रम से शूद्र समाज जो कुछ धन-संपत्ति अर्जित करता है उसे होली या अन्य किसी त्यौहार के बहाने बनियों द्वारा समय-समय पर लूट लिया जाता है। ब्राह्मण मंदिरों में चढ़ावा लेकर अपने जीवन को बिना श्रम और कठिनाई के जीने में सफल रहता है और जनता में अपने आपको श्रेष्ठ बताता है। वर्तमान समय में शूद्र समाज के जातीय घटक भी ब्राह्मणी संस्कृति के इस कुचक्र में फँसकर ब्राह्मणों के पुजा स्थलों आदि में बढ़-चढ़कर दान देते हैं और ब्राह्मणी षड्यंत्र में फँसकर अपने आपको झूठी श्रेष्ठता में फँसाकर ब्राह्मणों द्वारा अपने आपको निरंतरता के साथ ठगवाते रहते हैं। ब्राह्मणी संस्कृति की वैचारिकी में तथाकथित त्यौहारों से फायदा सिर्फ ब्राह्मण और बनियों का ही होता हैं, समाज के अन्य लोग तथाकथित त्यौहार के बहाने किसी न किसी रूप में लगातार ठगे ही जा रहे हैं। प्रश्न: जब शूद्र समाज हिंदू है तो उसके साथ भेदभाव क्यों है?
उत्तर: हिंदुत्ववादी वैचारिकी का आधार विषमतावाद है जिसके आधार पर यह संस्कृति मनुष्य-मनुष्य में भेद करती है। हिंदुओं में आपस के सभी जातीय घटकों में क्रमिक ऊँच-नीच की व्यवस्था है। हिंदुत्ववादी वैचारिकी में कोई जातीय घटक ऊँचा है तो कोई जातीय घटक नीचा है। समस्त हिंदू कहे जाने वाला समाज विषमता से भरे धरातल पर खड़ा है उनमें न कोई मेल-मिलाप है और न ही उनमें भाईचारा है। हिंदुत्ववादी वैचारिकी में एक घटक दूसरे घटक से ऊँचा या नीचा होने के कारण, आपस में नफरत का भाव रखता है। इसलिए जितने भी हिंदुत्व की वैचारिकी के जातीय घटक है, वे आपस में एक नहीं है। इन पूरे जातीय घटकों को हिंदुत्व की वैचारिकी के कर्णधारों से पूछना चाहिए कि हम कैसे हिंदू है, जब हम में कोई समानता नहीं है, समता का व्यवहार नहीं है? आजादी के 75 वर्षों के बाद और देश में संवैधानिक सत्ता स्थापित होने के बाद भी हिंदुत्व की वैचारिकी में ऊँच-नीच और छुआछूत की प्राकाष्ठा है। हिंदुओं बताओ इन नीच व हीन भाव से मुक्ति कब मिलेगी?
प्रश्न: कुछ समय के लिए हम यह मान भी लें कि शूद्र समाज हिंदू है, तो क्या हिंदू अपने भाईयों के साथ एक जैसा समान व्यवहार करते है? क्योंकि आज प्रत्येक जाति घटक अपने-अपने मौहल्ले में होली दहन की अलग-अलग लकड़ियाँ रखी हुई है, इसको आप किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर: हिंदुत्ववाद की वैचारिकी का मूल विषमता पर टिका है, इसमें न कोई समानता है, न समाज के जातीय घटकों में कोई मेल-मिलाप है। जातीय घटकों के बीच क्रमिक ऊँच-नीच की व्यवस्था है। एक जातीय घटक दूसरे जातीय घटक से या तो नीचा है या ऊँचा है। हिंदू कहे जाने वाले समाज में जो त्यौहार या उत्सव मनाये जाते हैं उनमें भी जातिवाद की व्यवस्था झलकती है। जैसे दीवाली का त्यौहार, वैश्यों का त्यौहार माना जाता है, होली के कथित त्यौहार को शूद्रों का त्यौहार कहा जाता है। दशहरे के कथित त्यौहार को क्षत्रियों का त्यौहार या उत्सव माना जाता है। इस प्रकार के उत्सव या त्यौहारों का जातीय घटकों के आधार पर विभक्तिकरण करके समाज में समता और समानता के भाव को बुनियादी तौर पर समाप्त कर दिया गया है। समाज का सामाजिक ढाँचा और आचरण इसी असमानता भरी मानसिकता पर खड़ा हुआ है। आज हम समाज की विभिन्न कालोनियों, मौहल्लों में घूमकर देखते हैं कि समाज के सभी जातीय घटक अपने-अपने मौहल्लों में होली का उत्सव मनाने के लिए लकड़ी या अन्य ईंधन इकट्ठा कर रहे हैं जिसका वे अपने-अपने तरीके से दहन करेंगे। यह सब देखकर लगता है कि देश के शूद्र समाज को विशेषकर दलित व अत्यंत पिछड़ी जातियों को अपने मान और अपमान का ज्ञान नहीं है। वे आज पढ़-लिखकर भी ब्राह्मणी संस्कृति के जाल में फँसकर अतीत में किये गए षड्यंत्रकारी मूलनिवासी होलिका नाम की बेटी का निरंतरता के साथ दहन करके समाज को अपमानित करने का अतीत से अब तक काम करते आ रहे हैं।
प्रश्न: हिंदुत्व की वैचारिकी आधारित त्यौहारों के संबंध में आप बहुजन समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: बहुजन समाज के लिए सबसे सटीक संदेश और आज के सामाजिक, राजनैतिक वातावरण में यही है कि पूरा बहुजन समाज एससी/एसटी/ओबीसी/धार्मिक अल्पसंख्यकों को मिलकर इकट्ठा रहना चाहिए, अपना वोट सच्चे अम्बेडकरवादियों को ही देना चाहिए। चुनाव लड़ने से भयभीत नहीं होना चाहिए, नकली और फर्जी अम्बेडकरवादियों से जागरूक और सावधान रहना चाहिए। आज के राजनैतिक परिवेश में बहुजन समाज बिना नैतिक बल के कारण बिखरा हुआ है, उसकी एकजुटता तार-तार है। कथित अम्बेडकरवादी सामाजिक संगठनों का ऊपरी आवरण अम्बेडकरवादी दिखता है और उनकी आंतरिक संरचना मनुवादी है। ऐसे सभी सामाजिक संगठनों और उनके संचालकों से सभी को सावधान रहकर अपने देश की इस पवित्र भूमि पर अपने महापुरुषों के नाम पर समय-समय पर मेलों का आयोजन करना चाहिए। जैसे- शाहू मेला, पेरियार मेला, अम्बेडकर मेला, ज्योतिराव फुले मेला, माता सावित्रीबाई फुले मेला, संत गाडगे मेला, संत शिरोमणि गुरु रविदास मेला, संत कबीर मेला, गुरु घासीदास मेला, कांशीराम मेला, अशोक विजयदशमी मेला, भीमा कोरेगाँव मेला, विज्ञान मेला, कृषि मेला, आदि मेलों का आयोजन करना चाहिए और अपने समाज के लोगों को इन मेलों के माध्यम से उनके इतिहास, उनके द्वारा समाज हित में किये गए कार्यों से अवगत कराकर समाज को निरंतरता के साथ जागरूक करना चाहिए।
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