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‘मूर्ति भंजन आंदोलन’

ब्राह्मणवादी वर्चस्व और अंधविश्वास के खिलाफ पेरियार का ‘मूर्ति भंजन आंदोलन’
News

2026-06-01 16:13:20

27 मई 1953 को दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक युगांतरकारी घटना घटी, जिसे मूर्ति भंजन आंदोलन (Idol Breaking Movement) के रूप में जाना जाता है। इस ऐतिहासिक आंदोलन की शुरूआत इरोड वेंकटप्पा रामासामी ने की थी, जिन्हें दुनिया आदर से पेरियार (तमिल भाषा में जिसका अर्थ है महान आत्मा या बुजुर्ग) के नाम से जानती है जो 20वीं सदी के भारत के सबसे प्रभावशाली समाज सुधारकों, विचारकों और तर्कवादियों में से एक थे। यह आंदोलन केवल मूर्तियों को तोड़ने का भौतिक कृत्य नहीं था, बल्कि यह जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी वर्चस्व और अंधविश्वास के खिलाफ एक गहरा वैचारिक और प्रतीकात्मक विद्रोह था। उन्होंने दक्षिण भारत में सामाजिक समानता, आत्म-सम्मान और रूढ़िवादिता के खिलाफ एक ऐसी वैचारिक क्रांति की भी शुरूआत की थी, जिसने वहां की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल दिया।

पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 को मद्रास प्रेसीडेंसी के इरोड (अब तमिलनाडु में) में एक अत्यंत समृद्ध और रसूखदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम वेंकटप्पा नायकर और माता का नाम चिन्नथायम्माल था। उनका परिवार व्यापारिक क्षेत्र में बहुत सफल था। पेरियार बालिजा नायडू जाति से ताल्लुक रखते थे। यह जाति सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न और प्रभुत्वशाली मानी जाती थी, लेकिन पारंपरिक हिंदू वर्ण व्यवस्था के वर्गीकरण के अनुसार, उन्हें गैर-ब्राह्मण या शूद्र की श्रेणी में रखा जाता था। बचपन से ही पेरियार ने देखा कि उनका परिवार बेहद समृद्ध होने और समाज में ऊंचा मुकाम रखने के बावजूद, धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों में ब्राह्मणों के मुकाबले दोयम दर्जे पर ही रखा जाता था। इस विरोधाभास और जाति-आधारित भेदभाव ने उनके बाल मन में गहरे सवाल खड़े किए। पेरियार का मन पारंपरिक स्कूली शिक्षा में बहुत ज्यादा नहीं लगा और उन्होंने महज 10-12 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी और अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ गए। वह बचपन से ही बेहद तर्कशील थे और घर पर आने वाले पंडितों से धर्म और पुराणों की विसंगतियों पर तीखे सवाल पूछा करते थे।

मूर्ति भंजन आंदोलन का उद्देश्य: पेरियार द्वारा स्थापित द्रविड़ कड़गम और आत्म-सम्मान आंदोलन यह विरोध धार्मिक विद्वेष नहीं, बल्कि तर्कवाद, मानवीय गरिमा और जाति-उन्मूलन की राजनीति का एक सशक्त प्रकटीकरण था।

प्रतीकात्मक विरोध: पेरियार का मानना था कि धार्मिक पौराणिक कथाएं और कुछ देवी-देवता समाज में ऊंच-नीच और जन्म आधारित भेदभाव (वर्ण व्यवस्था) को संस्थागत रूप देते हैं। पेरियार ने आंदोलन के लिए सबसे पहले गणेश (तमिल में पिल्लैयार) की मूर्तियों को चुना। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी कार्य की शुरूआत में सबसे पहले गणेश की पूजा की जाती है, इसलिए रूढ़िवादिता और वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन की शुरूआत भी इन्हीं के प्रतीक से होनी चाहिए।

क्यों चुना 27 मई का दिन?

पेरियार ने इस आंदोलन के लिए 27 मई 1953 की तारीख चुनी, क्योंकि इस दिन बुद्ध पूर्णिमा (महात्मा बुद्ध का जन्मदिन) था। बुद्ध को इतिहास में तर्कवाद, जाति-विरोधी और रूढ़िवाद के खिलाफ खड़े होने वाले शुरूआती प्रतीकों के रूप में देखा जाता है। इसी विचार को रेखांकित करने के लिए पेरियार ने शाम 6:30 बजे पूरे राज्य में आंदोलन का आह्वान किया।

आंदोलन की पद्धति

पेरियार ने आंदोलन शुरू करने से पहले समाचार पत्र विदुथलाई में एक स्पष्ट बयान जारी किया था ताकि कोई सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान न हो: ‘‘जब मैं कहता हूं कि हम मूर्तियां तोड़ने जा रहे हैं, तो कोई यह न समझे कि हम मंदिरों के भीतर जाकर हंगामा करेंगे। कोई भी मंदिर में प्रवेश नहीं करेगा। हम कुम्हारों से वैसी ही मिट्टी की मूर्तियां बनवाएंगे या दुकानों से खरीदेंगे। हम सार्वजनिक रूप से सड़क के किनारे उन्हें इकट्ठा करके तोड़ेंगे। मैं स्पष्ट करता हूं कि मंदिरों की मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।’’ आंदोलन के दौरान जब राज्य भर में हजारों कार्यकतार्ओं ने सड़कों पर मिट्टी की मूर्तियां तोड़ीं, तब उन्होंने यह नारा या घोषणा दोहराई कि वे इस व्यवस्था और उन धार्मिक बंधनों का विरोध कर रहे हैं जो इंसानों को जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा मानते हैं। इस आंदोलन के बाद रूढ़िवादी पक्षों द्वारा पेरियार और उनके कार्यकतार्ओं के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मुकदमा दर्ज कराया गया। कोर्ट में यह मामला एक ऐतिहासिक कानूनी नजीर बना: अदालत का रुख: मामले की सुनवाई के दौरान जज रमन नायर ने शिकायतकतार्ओं से पूछा कि क्या मूर्तियां मंदिरों से चुराई गई थीं? जवाब मिला कि कार्यकतार्ओं ने खुद मूर्तियां बनाईं/खरीदीं और अपनी ही संपत्ति को नष्ट किया। जज ने कहा कि आंदोलन की घोषणा तीन महीने पहले से की जा रही थी, ऐसे में शिकायतकर्ता वहां क्यों गए जहां यह आयोजन हो रहा था? अदालत ने अभिव्यक्ति और प्रतीकात्मक विरोध के अधिकार को ध्यान में रखते हुए केस को खारिज कर दिया।

आंदोलन का प्रभाव

यह आंदोलन तमिलनाडु की राजनीति और सामाजिक चेतना में एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसने:

=तर्कवाद को आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बनाया।

=द्रविड़ आंदोलन को और अधिक आक्रामक और वैचारिक रूप से मजबूत किया।

=दक्षिण भारत की राजनीति में जाति-विरोधी चेतना को मुख्यधारा में स्थापित करने में मदद की।

काशी की घटना (1904):

25 वर्ष की आयु में पिता से अनबन के बाद पेरियार गृहत्याग कर संन्यासी बन गए और काशी (वाराणसी) पहुंचे। काशी में उनके साथ घटी एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी: काशी में अत्यंत भूख लगने पर वह एक नि:शुल्क भोजनालय (सत्रम) में गए, लेकिन वहां केवल ब्राह्मणों को ही प्रवेश की अनुमति थी। गैर-ब्राह्मण होने के कारण पेरियार को न सिर्फ अपमानित किया गया, बल्कि धक्का देकर सड़क पर निकाल दिया गया। भूख के कारण उन्हें कचरे के डिब्बे से खाना ढूंढकर खाना पड़ा। इस घटना ने उन्हें यह अहसास कराया कि धर्म और ईश्वर के नाम पर इंसानियत को किस कदर कुचला जाता है। यहीं से वह कट्टर नास्तिक और समाज सुधारक बन गए।

आत्म-सम्मान आंदोलन 1925

कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने इस ऐतिहासिक आंदोलन की नींव रखी। पेरियार ने देखा कि कांग्रेस के भीतर भी ब्राह्मणवादी मानसिकता हावी थी। चेरनमादेवी गुरुकुल में कांग्रेस के फंड से चलने वाले स्कूल में ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण बच्चों के लिए अलग-अलग भोजन की व्यवस्था थी, जिसका पेरियार ने कड़ा विरोध किया। जब कांग्रेस ने विधानसभाओं और नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण के उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया, तो उन्होंने 1925 में कांग्रेस छोड़ दी। इसका मुख्य दर्शन था कि ‘किसी भी मनुष्य को अपने आत्म-सम्मान की कीमत पर ईश्वर या धर्म को स्वीकार नहीं करना चाहिए।’ उन्होंने बिना ब्राह्मण पुरोहितों और बिना धार्मिक कर्मकांडों के विवाह की पद्धति शुरू की, जिसे आत्म-सम्मान विवाह कहा गया। इसमें लड़का-लड़की बस एक-दूसरे को माला पहनाकर जीवनसाथी स्वीकार करते थे। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने नामों के पीछे से जातिसूचक उपनाम (जैसे नायकर, मुदलियार, अय्यर) हटा दें।

महिला अधिकारों के प्रणेता

पेरियार केवल जाति-विरोधी नेता नहीं थे, बल्कि वह अपने समय से बहुत आगे के नारीवादी विचारक थे। 1938 में एक महिला सम्मेलन में ही उन्हें पेरियार की उपाधि दी गई थी। उन्होंने बाल विवाह और देवदासी प्रथा का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने विधवा विवाह, महिलाओं की शिक्षा और संपत्ति में महिलाओं के समान अधिकार की वकालत की। वह उस दौर में महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के सबसे बड़े पैरोकार थे, ताकि महिलाएं केवल बच्चे पैदा करने की मशीन बनकर न रह जाएं।

पेरियार ने जीवन के आखिरी क्षण तक (94 वर्ष की आयु तक) व्हीलचेयर पर बैठकर लगातार सभाएं कीं और अपने विचारों का प्रचार किया। 24 दिसंबर 1973 को वेल्लोर में इस महान क्रांतिकारी विचारक का निधन हो गया। यूनेस्को ने 1970 में उन्हें ‘नए युग का मसीहा, दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आंदोलनों के पितामह और अज्ञानता, अंधविश्वास तथा निरर्थक रीति-रिवाजों के कट्टर दुश्मन’ के रूप में सम्मानित किया था। उनका संघर्ष आज भी भारत में सामाजिक न्याय, आरक्षण और तर्कवाद की हर लड़ाई का मुख्य आधार स्तंभ है।

पेरियार के 15 क्रांतिकारी संदेश

1. तार्किकता और आत्म-चिंतन पर संदेश

जो मैं कहता हूँ, उसे केवल इसलिए मत मानो क्योंकि उसे पेरियार कह रहा है। अपनी खुद की बुद्धि और तर्क की कसौटी पर उसे कसो; यदि तुम्हारी बुद्धि उसे सही पाए, तभी उसे स्वीकार करो, अन्यथा उसे ठुकरा दो।

2. सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ

राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी और बेमानी है, जब तक कि देश के भीतर सामाजिक समानता और हर नागरिक को आत्म-सम्मान (स्वाभिमान) हासिल न हो जाए।

3. जाति व्यवस्था और ऊंच-नीच पर प्रहार

जाति इंसान को इंसान नहीं समझने देती। यह समाज को टुकड़ों में बांटती है और ऊंच-नीच का भेद पैदा करती है। ऐसी व्यवस्था का समूल नाश होना चाहिए जो जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ और किसी को अछूत व नीच बनाती है।

4. महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता पर

महिलाओं को केवल बच्चों को जन्म देने और रसोई संभालने की मशीन समझना बंद होना चाहिए। जब तक महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति का अधिकार और अपनी मर्जी से जीने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक कोई भी समाज सभ्य नहीं कहला सकता।

5. अंधविश्वास और रूढ़िवादिता के खिलाफ

बुद्धि का उपयोग करो। पत्थरों, मूर्तियों और बेजान चीजों में भगवान को ढूंढना और उनके नाम पर अपना समय व पैसा बर्बाद करना मानसिक गुलामी का सबसे बड़ा प्रमाण है।

6. पुरोहितवाद और मध्यस्थों का विरोध

मनुष्य और ईश्वर (यदि वह है) के बीच किसी तीसरे बिचौलिए (पुजारी या मौलवी) की कोई आवश्यकता नहीं है। धर्म के इन स्वघोषित ठेकेदारों ने ही समाज में अंधकार फैलाया है।

7. ईश्वर और मनुष्य की महत्ता पर प्रसिद्ध नारा

यदि ईश्वर असमानता और जातिवाद को बढ़ावा देता है, तो मैं ऐसे ईश्वर को नहीं मानता। जो ईश्वर को मानता है वह मूर्ख है, जो उसकी आड़ में इंसानों का शोषण करता है वह बर्बर है। मनुष्य की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

8. बाल-विवाह और विवाह व्यवस्था में सुधार

विवाह दो आत्माओं का बराबरी का समझौता होना चाहिए, न कि किसी महिला को पुरुष की दासी बनाने का जरिया। बाल-विवाह और बेमेल विवाह समाज के लिए अभिशाप हैं।

9. शिक्षा का असली उद्देश्य

शिक्षा का मतलब केवल डिग्रियां हासिल करना या नौकरियां पाना नहीं है। शिक्षा का असली उद्देश्य मनुष्य की सोच को तार्किक, वैज्ञानिक और मानवीय बनाना है।

10. स्वाभिमान सर्वोपरि है

तुम्हारी जान चली जाए तो परवाह नहीं, लेकिन तुम्हारा आत्म-सम्मान कभी कम नहीं होना चाहिए। बिना स्वाभिमान के जीना, मरे हुए के समान जीने जैसा है।

11. कर्मकांड और पाखंड पर चोट

जो लोग जीवित माता-पिता और भूखे इंसानों को भोजन नहीं करा सकते, उनका मृत पूर्वजों के नाम पर श्राद्ध करना या बड़े-बड़े आयोजन करना सिर्फ एक ढोंग है।

12. जन्मजात श्रेष्ठता के भ्रम का खंडन

कोई भी व्यक्ति सिर्फ इसलिए महान नहीं हो जाता कि उसने किसी खास जाति या कुल में जन्म लिया है। मनुष्य के विचार, उसके कर्म और उसका समाज के प्रति व्यवहार ही उसकी महानता तय करते हैं।

13. वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर

पुरानी सड़ी-गली परंपराओं और शास्त्रों को सिर्फ इसलिए मत ढोते रहो क्योंकि वे सदियों पुराने हैं। विज्ञान और नए युग के अनुसार अपनी सोच को बदलो।

14. समाज सुधार की शुरूआत स्वयं से

यदि तुम समाज में बदलाव देखना चाहते हो, तो इसकी शुरूआत अपने घर से करो। जातिगत उपनामों को छोड़ो, रूढ़ियों को तोड़ो और बराबरी का आचरण करो।

15. वैश्विक भाईचारे और मानवता का संदेश

मेरा आंदोलन किसी व्यक्ति या विशेष समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जो इंसानों के बीच दीवारें खड़ी करती है। दुनिया में केवल एक ही धर्म होना चाहिए और वह है—मानवता।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05