2025-01-05 07:15:20
अम्बेडकरवाद और ब्राह्मणवाद भारतीय समाज में सामाजिक चिंतन की दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इनमें से एक घटेगा, तो दूसरा बढ़ेगा। एक मिटेगा, दूसरा बचेगा। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की नजर में ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ जिन लोगों का संगठन है, वे मानसिक रूप से बीमार है और उनकी यह बीमारी बाकी सभी लोगों के लिए एक बड़ा खतरा है। राष्ट्र निर्माता के रूप में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की विधिवत स्थापना का कार्य 26 नवम्बर संविधान दिवस मनाने की घोषणा के साथ सम्पन्न हुआ। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को अपनाने की बीजेपी और संघ की नापाक कोशिशों का भी यह चरम रूप है। लेकिन भारत के जागरूक लोगों को यह सोचना होगा कि क्या मनुवादी-संघी, मोदी-भाजपा के लोग अगरबत्तीवाद के जरिये बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के विचारों को आत्मसात कर सकते हैं? इसमें पूरे अम्बेडकरवादी बहुजन समाज को संदेह है। अम्बेडकरी समाज के संदेह का कारण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के विचारों और उनके द्वारा लिखित साहित्य में स्पष्ट रूप से नजर आता है। इस बात की पुष्टि के लिए बाबा साहेब की सिर्फ एक किताब ‘जाति विच्छेद’ का संदर्भ ही काफी है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखित यह किताब पहली बार 1936 में छपी थी जो उनके भाषण का रूप है, जिसमें बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने लाहौर के ‘जात-पात तोड़क माडल’ के 1936 के वार्षिक अधिवेशन के लिए तैयार किया था। इस लिखे हुए भाषण को पढ़कर ‘जात-पात तोड़क माडल’ के संचालकों ने आपत्तियाँ व्यक्त की थी और फिर इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया था। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने इस भाषण को ही बाद में ‘जाति विच्छेद’ के नाम से छपवाया था। दूसरे संस्करण की भूमिका में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने इस किताब का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए लिखा था कि ‘अगर मैं हिंदुओं को यह समझा पाया कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी दूसरे भारतीय लोगों के स्वास्थ्य और उनकी खुशी के लिए खतरा है, तो मैं अपने काम से संतुष्ट हो पाऊँगा।’
अम्बेडकरवाद को स्थापित करने में कांशीराम जी के कार्य: भारत की राजनीति का व्याकरण बदल देने का श्रेय मान्यवर साहेब कांशीराम जी को ही जाता है, जिनका उदय 70 के दशक में हुआ। उनके सामाजिक, राजनैतिक संघर्ष और विचारों को देखने से पता चलता है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के मिशन को सही अर्थों में भारत की जनता को समझाने का कार्य मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने किया। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर चाहते थे कि भारत का शूद्र कहे जाने वाला समाज इकट्ठा हो, एकजुट हो, शासन सत्ता में उनकी भागीदारी हो। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस मंशा को संविधान में दिये गए अनुच्छेदों के माध्यम से समाज के सभी जातीय, धार्मिक घटकों के लिए अपनी विचारधारा न्याय, बंधुता, समानता, स्वतंत्रता को दिया है। जो मानवतावाद, समतावाद और वैज्ञानिकवाद को अग्रसर करती है। जबकि दूसरी विचारधारा ब्राह्मणवाद है, जो न्याय, बंधुता, स्वतंत्रता, मानवतावाद और वैज्ञानिकतावाद के भी विरुद्ध है। संक्षेप में कहें तो अम्बेडकरवाद की विचारधारा समाज की पोषक है और ब्राह्मणवाद की विचारधारा समाज की शोषक है।
मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने इस देश की बहुजन जनता के बीच पूरे देश में घूम-घूमकर, साईकिल रैलियाँ निकालकर, समाज में नुक्कड़ सभाएँ करके अपने सीमित संसाधनों से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एससी /एसटी/ ओबीसी/ धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिमों सहित को जागृत और इकट्ठा करने का काम किया। बहुजन समाज को उनके राजनैतिक अधिकारों और सत्ता में उनकी भागीदारी के बारे में बताया। जिसके कारण बहुजन जनता में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के द्वारा संविधान में दिये गए नागरिक अधिकारों व राजनैतिक अधिकारों की जागरूकता बढ़ी। इस जागरूकता के कारण ही बहुजन समाज की जनता में राजनैतिक सत्ता पाने की ललक भी बढ़ी जो मान्यवर साहेब कांशीराम जी का ही करिश्मा था। जिसके कारण बहुजन समाज एकजुट हुआ और राजनैतिक शक्ति में परिवर्तित हुआ। उत्तर प्रदेश जैसे देश के बड़े प्रदेश में बहुजन समाज की बेटी बहन मायावती जी चार बार मुख्यमंत्री बन पायी। बाबा साहेब का वह सपना कि ‘जाओ अपनी दीवारों पर लिख दो कि तुम्हें एक दिन इस देश का शासक बनना है’, पूरा हुआ। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के राजनैतिक मिशन को भारत भूमि पर स्थापित करने का श्रेय केवल और केवल मान्यवर साहेब कांशीराम जी को ही जाता है।
अम्बेडकरवाद का अर्थ: भारतीय परिपेक्ष्य मे अम्बेडकरवाद का रूप व्यापक है। अम्बेडकरवाद भारत भूमि पर रहने वाले सभी नागरिकों को जीवन यापन करने तथा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, बौद्धिक क्रांति का स्वरूप है। बिना अम्बेडकरवाद की अवधारणा के इस देश की रूढ़िवादी सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था में मानवतावाद और वैज्ञानिकतावाद की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, क्योंकि अम्बेडकरवाद केवल ‘वाद’ नहीं है बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह मनुष्य के लिए गरिमा से जीवन जीने की कला है। अम्बेडकरवाद समाज में रह रहे सभी मनुष्यों के दुखों का निवारण है जबकि ब्राह्मणवाद इसके उलट सभी मनुष्यों के दुखों का कारण है।
अम्बेडकरवाद की जरूरत: आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। यह सभी घटनाओं के लिए सत्य है, बिना कारण के संसार में कुछ भी घटित नहीं होता। भारतीय समाज में फैली घोर शोषणकारी, पाखंडवादी, अमानवीयता ही अम्बेडकरवाद को जन्म देने के लिए जिम्मेदार है। ब्राह्मणवाद वह नासूर है जो भारत के इतिहास में लगभग 3 हजार वर्षों से यहाँ की जनता पर अमानवीयता की सभी हदों को पार करके प्रताड़नाओं के कारण ही भारत भूमि पर अस्तित्व में आया। अम्बेडकरवाद को यहाँ पर स्थापित करने के लिए खुद बाबा साहेब ने अपने बचपन से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक संघर्ष किया। अम्बेडकरवाद सिर्फ एक विचार है जो मनुष्य को गरिमा के साथ जीने के लिए प्रेरित करता है और ब्राह्मणवाद के शोषण से मुक्ति दिलाता है। वर्तमान समय में ब्राह्मणवाद अपने चरमोत्कर्ष पर है और इसको बढ़ाने के लिए मोदी-संघी सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। मोदी-संघियों की मानसिकता यहाँ के सभी लोगों को ठगने में महारथ रखती है। वर्तमान समय में मोदी-संघी सरकार अपनी छलावामयी नीतियों और पैत्ररेबाजी से बहुजन समाज के सामाजिक संगठनों में बैठे स्वार्थी व राजनीति की लालसा वाले लोगों का इस्तेमाल करके अम्बेडकरवाद को कमजोर करने का काम कर रही है। अम्बेडकरवाद को कमजोर किये बिना ब्राह्मणवाद मजबूत नहीं हो सकता है जबकि वर्तमान मोदी-संघी सरकार का अहम उद्देश्य यह है कि देश में किसी भी कीमत पर ब्राह्मणवाद को स्थापित करना है, चाहे उसके लिए देश की जनता को कोई भी कीमत चुकानी पड़े। इस ब्राह्मणवाद की आँच अब बहुजन समाज की भोली-भाली जनता पर अधिक पड़ती दिखाई दे रही है। लेकिन ब्राह्मणवाद सत्ता के धन-बल के सहारे बेखौफ आगे बढ़ता जा रहा है। कुछेक स्वार्थी सामाजिक संगठनों के संचालकों का इस्तेमाल ब्राह्मणवाद अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहा है। बहुजन समाज के इन स्वार्थी लोगों को सत्ता बल से किसी न किसी प्रकार का लालच, राजनीति में घुसने का लालच, अवैध तरीके से धन कमाने का लालच देकर समाज को दिशाहीन किया जा रहा है। समाज में ऐसे स्वार्थी लोगों की कमी नहीं है, वे हर समय लालचों में फँसकर बिकने को तैयार रहते हैं। समाज आज ये सभी दृश्य अपनी नंगी आँखों से देख रहा है।
बहुजन समाज में बिखराव: बहुजन समाज का हर व्यक्ति आज अपने-अपने कथित सामाजिक संगठनों और राजनैतिक संगठनों के द्वारा ठगा सा महसूस कर रहा है। उनकी ऐसी दशा बन चुकी है कि वे किस पर यकीन करें और किस पर यकीन न करें, समझ ही नहीं पा रहे हैं। सामाजिक बिखराव के कारण ब्राह्मणवाद मजबूत हो रहा है और निरंतरता के साथ सत्ता पर काबीज होता जा रहा है। बहुजन समाज की जनता शिक्षा और रोजगार से त्रस्त है और उनकी यह त्रस्तता बढ़ाई जा रही है ताकि वे हताश और निराश होकर ब्राह्मणवाद की शरण में आ जाए जो होता हुआ भी दिख रहा है। ब्राह्मणवाद की छलावामयी पैत्ररेबाजी के कारण बहुजन समाज के कुछेक जातीय घटक आपस में बंट रहे है और कट भी रहे हैं। ऐसा देखकर भी बहुजन समाज की जनता को ब्राह्मणवाद की शरण में जाने से परहेज नहीं हो रहा है और वे खुशी से हिदुत्व का चोला ओढ़कर ब्राह्मणवाद को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। जबसे देश में मोदी-संघी सरकार आयी है तब से बहुजन समाज के जातीय घटकों पर शोषण बढ़ा है, जहाँ-जहाँ मोदी-संघी सरकार की डबल इंजन की सरकारें हैं वहाँ-वहाँ पर अत्याचार और जातीय उत्पीड़न की घटनाएँ बढ़कर डबल हो चुकी है। बहुजन समाज की महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। लेकिन फिर भी बहुजन समाज की आँखे नहीं खुल पा रही है, जो आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना है!
अम्बेडकर के नाम पर मोदी-संघी सरकार का नाटक: आज पूरा संसार बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की बौद्धिक क्षमता का लोहा मानकर उन्हें सम्मान से नवाज रहा है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमाएँ विश्व के 20 देशों में स्थापित की जा चुकी है। वहीं दूसरी ओर मोदी-संघी सरकार बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का नाम लेकर दिखावटी नाटक करती है। मोदी देश के प्रधानमंत्री होकर दुनिया में सबसे अधिक झूठ बोलने का काम करते हैं। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिन, स्मृति दिवस और संविधान दिवस पर नतमस्तक होकर अम्बेडकर के अनुयायियों और दुनिया को दिखावे का ढोंग करते हैं। जबकि मोदी सरकार ने पुरानी संसद के प्रांगण में लगी बाबा साहेब की विशालकाय प्रतिमा को 3-4 जून 2024 की रात में चुपके से हटाने का काम किया, इसकी किसी को भी सूचना नहीं दी गई थी। मोदी सरकार का ऐसा करना ही मोदी की मानसिकता में गहराई तक छिपे ब्राह्मणवाद को दर्शाता है। संघियों की यही छलावामयी रणनीति बहुजन समाज के अधिकतर जातीय घटकों के स्वार्थी लोगों की समझ में नहीं आ रही है। जिसके कारण समाज में बिखराव की प्रक्रिया की गति तेज हो रही है, सामाजिक एकता खत्म हो रही है, संघर्ष का मादा घट रहा है और गुलामी की मानसिकता बढ़ रही है।
मोदी-संघी सरकार में संविधान की शपथ लेकर कई हिंदुत्ववादी मंत्री, मुख्यमंत्री पूरे वर्ष संवैधानिक मूल्यों को ध्वस्त करते देखे जाते हैं। हालही के शीत कालीन सत्र में गृहमंत्री अमित शाह ने यह कहकर अपनी मानसिकता में गहराई तक छिपे ब्राह्मणवाद को सबके सामने संसद में बयान देकर कहा कि ‘अम्बेडकर, अम्बेडकर, अम्बेडकर बोलना अब एक फैशन हो गया है, अगर इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।’ बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को सोचना चाहिए कि हिन्दू के रूप में जन्में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू के रूप में न मरने का संकल्प लिया था। गृहमंत्री अमित शाह उसी हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म व स्वर्ग-नरक की धारणाओं से उनका अपमान करते हुए कहते हैं कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर जितना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। यह बाबा साहेब का खुला अपमान है इस पर अमित शाह के इस्तीफे से कम कुछ भी नहीं चलेगा।
भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने अंतिम वर्षों में एक अनौपचारिक वार्ता में एक पत्रकार से कहा था कि देश की समस्याओं के हल केवल इसलिए गुम हुए जा रहे है कि संकल्पहीन नेताओं को समस्याओं के इस्तेमाल से सत्ता में बने रहने में मजा आने लगा है। इस मजे के समक्ष उनके आत्मसमर्पण के कारण पूंजी कदम-कदम पर हमारे राष्ट्र-राज्य व उसकी सत्ता का अतिक्रमण कर रही है। आज वास्तविकता के आधार पर देखा जाये तो बहुजन समाज से चुनकर आए सांसद व विधान सभाओं में बैठे नेता अपने मजे में चूर है उन्हें अपने समाज की जनता से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। ऐसे सभी राजनैतिक नेता व समाज के सामाजिक संगठनों के संचालकों के नेता बहुजन समाज के राजनैतिक दलाल बन चुके हैं और इस दलाली के काम में वे बहुजन समाज को कमजोर कर रहे है और ब्राह्मणवाद को मजबूत कर रहे है।
बहुजन समाज को प्रेरकों की जरूरत: ब्राह्मणी संस्कृति के संघी लोगों की अतीत के इतिहास से ही मानसिकता रही है कि बहुजन समाज को नुकसान पहुँचाने के लिए बहुजन समाज के ही कमजोर व लालची लोगों का इस्तेमाल अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए करो और उन्हीं को अपने उद्देश्य के लिए बली का बकरा बनाओ। मोदी-संघी सरकार में बहुजन समाज के बैठे अधिकारियों, संवैधानिक पदों पर बैठे संघी मानसिकता से संक्रमित लोगों का इस्तेमाल करो। इस प्रकार के साक्ष्य पूरे समाज के सामाने हैं जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा विस्थापन के मुद्दे पर समाज के कुछेक सामाजिक संगठनों द्वारा धरना-प्रदर्शन और विरोध किया जा रहा था तो संसद में बैठे पक्ष-विपक्ष के किसी भी नेता ने प्रतिमा विस्थापन के मुद्दे पर न चिंता जताई और न सरकार के विरुद्ध कुछ बोला। बल्कि सामाजिक संगठन जो प्रतिमा विस्थापन के मुद्दे पर संघर्ष चलाने का दम भर रहे थे उसमें से कुछेक की मंशा भी आज संदेह के घेरे में हैं चूंकि उनमें से कुछेक राजनीतिक स्वार्थ की भावना अपने अंदर छिपाये हुए, मोदी-संघी सरकार की आंतरिक भावना के साथ थे। बाहर से वे प्रतिमा विस्थापन के मुद्दे पर संघर्ष का नाटक कर रहे थे। ऐसे लोगों से समाज को कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, समाज ऐसे स्वार्थी व गुलाम मानसिकता के लोगों के कारण ही ब्राह्मणवादियों से आजतक लुटता-पीटता आ रहा है। ऐसा देखते हुए हम निसंदेह कह सकते हैं कि बहुजन समाज के ऊपर जो खतरा मंडरा रहा है उसमें किसी हद तक हमारे ही लोग जो आस्तीन के साँप बनकर काम कर रहे हैं वे अधिक खतरनाक है, आज उन्हें पहचानने और मारने की अधिक आवश्यकता है।
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