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भारतीय पत्रकारिता का इतिहास जब भी सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के चश्मे से लिखा जाएगा, बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रिम पंक्ति में चमकेगा। बाबासाहेब केवल एक महान न्यायविद्, अर्थशास्त्री और संविधान निमार्ता ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी और पैनी धार वाले पत्रकार भी थे। उन्होंने मीडिया को सत्ता या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि शोषितों की मुक्ति का हथियार बनाया। इसी वैचारिक श्रृंखला में 29 जून 1928 को बम्बई (मुंबई) से शुरू हुआ समता पाक्षिक पत्र बहुजन पत्रकारिता और सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास का एक बेहद क्रांतिकारी अध्याय है। समता का प्रकाशन केवल एक नए अखबार की शुरूआत नहीं थी, बल्कि यह भारतीय समाज के ताने-बाने को समानता, बंधुत्व और न्याय के सिद्धांतों पर नए सिरे से बुनने का एक सुविचारित वैचारिक आंदोलन था।
अम्बेडकरवादी पत्रकारिता का विकासक्रम
डॉ. अम्बेडकर की पत्रकारिता के सफर को देखें, तो समता तक पहुँचने का उनका एक क्रमिक वैचारिक विकास दिखाई देता है। उन्होंने अपने अखबारों के नामकरण और उनके उद्देश्यों को आंदोलन की तात्कालिक और दीर्घकालिक आवश्यकताओं के अनुसार बदला।
मूकनायक (1920): इसका उद्देश्य समाज के उस बड़े हिस्से को आवाज देना था, जिसे सदियों से खामोश रखा गया था। यह दंश और पीड़ा की अभिव्यक्ति का दौर था।
बहिष्कृत भारत (1927): महाड़ सत्याग्रह के दौर में शुरू हुए इस पत्र का उद्देश्य उस बहिष्कार और अन्याय के खिलाफ तीखा आक्रोश दर्ज करना था, जो अमानवीय व्यवस्था द्वारा थोपा गया था।
समता (1928): पीड़ा और आक्रोश की अभिव्यक्ति के बाद, बाबासाहेब अब समाज को एक सकारात्मक और वैकल्पक समाधान देना चाहते थे। समता का अर्थ ही था—एक ऐसा समाज जहां कोई छोटा या बड़ा न हो, जहां विशेषाधिकारों का अंत हो। बहिष्कृत शब्द जहाँ समाज के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय और अलगाव को दर्शाता था, वहीं समता उस अंतिम गंतव्य को दर्शाता था, जिसे बाबासाहेब हासिल करना चाहते थे। यह विद्रोह से नव-निर्माण की ओर कदम था। समता पाक्षिक की स्थापना बाबासाहेब द्वारा गठित समाज समता संघ के मुखपत्र के रूप में की गई थी। इस संगठन और इसके पत्र की वैचारिकी बेहद प्रगतिशील और अपने समय से बहुत आगे थी। आमतौर पर माना जाता है कि बाबासाहेब का संघर्ष केवल अछूतों की मुक्ति के लिए था, लेकिन समता के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि वे पूरे हिंदू समाज के लोकतांत्रिकरण की लड़ाई लड़ रहे थे। समाज समता संघ में उन्होंने उन प्रगतिशील और संवेदनशील सवर्ण विचारकों को भी जोड़ा, जो जातिवाद और पाखंडवाद के खिलाफ थे। समता पत्र ने इस साझा मंच को वैचारिक ऊर्जा दी।
रोटी-बेटी के संबंध पर विशेष जोर
समता पत्र ने जाति व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करने के लिए दो सबसे बड़े क्रांतिकारी कदम उठाए—सह-भोजन और अंतरजातीय विवाह। बाबासाहेब का स्पष्ट मानना था कि जब तक लोग एक साथ बैठकर खाएंगे नहीं और आपस में शादियां नहीं करेंगे, तब तक जाति की दीवारें नहीं टूट सकतीं। समता ने इन विचारों को न केवल प्रमुखता से छापा, बल्कि ऐसे आयोजनों की रिपोर्टिंग करके समाज में एक नई चेतना का संचार किया।
पाखंडवाद और धार्मिक रूढ़ियों पर करारी चोट
समता पत्र केवल राजनीतिक अधिकारों की बात नहीं करता था, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा सामाजिक और धार्मिक सुधारों को समर्पित था। तत्कालीन समय में धर्म के नाम पर फैले पाखंड, अंधविश्वास और असमानता को इस पत्र ने लगातार बेनकाब किया। धार्मिक ग्रंथों की तार्किक समीक्षा: समता के संपादकीय और लेखों में उन धार्मिक मान्यताओं और ग्रंथों की तीखी लेकिन तार्किक समीक्षा की जाती थी, जो इंसानों के बीच भेद पैदा करते थे। पत्र का यह स्पष्ट संदेश था कि कोई भी परंपरा, ग्रंथ या नियम यदि इंसान को इंसान नहीं मानता, तो उसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। इसने बहुजन समाज के भीतर सदियों से बैठी हीनभावना को उखाड़ फेंका और उन्हें अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना सिखाया। यद्यपि समता के पीछे की पूरी सोच, प्रेरणा और रणनीतिक मार्गदर्शन डॉ. अम्बेडकर का था, लेकिन अपनी मसरूफियत और कानूनी व राजनीतिक लड़ाइयों के कारण उन्होंने इसके दैनिक संपादन की जिम्मेदारी अपने एक अत्यंत निष्ठावान और प्रगतिशील साथी देवराव विष्णु नाइक को सौंपी थी। देवराव विष्णु नाइक एक प्रबुद्ध सीकेपी समुदाय से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे, जो बाबासाहेब के विचारों के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उनके कुशल संपादन में समता ने भाषा की मयार्दा, तर्कों की सुदृढ़ता और पत्रकारिता के उच्चतम मानकों को बनाए रखा। इसने सिद्ध किया कि बहुजन आंदोलन केवल भावनाओं के सहारे नहीं, बल्कि अकादमिक और बौद्धिक तर्कों के बल पर लड़ा जा रहा है।
समता से जनता का सफर
समता पत्र लगभग ढाई वर्षों तक समाज में वैचारिक क्रांति की मशाल जलाए रहा। इस दौरान इसने अछूतों, पिछड़ों और महिलाओं के अधिकारों की वकालत की। 1930 के दशक तक आते-आते, बाबासाहेब के आंदोलन का दायरा और अधिक व्यापक हो चुका था। गोलमेज सम्मेलन के माध्यम से वे अछूतों की लड़ाई को वैश्विक और राष्ट्रीय पटल पर ले जा चुके थे। आंदोलन की इस बदलती और व्यापक होती प्रकृति को देखते हुए, 24 नवंबर 1930 को समता का विलय एक नए पत्र जनता में कर दिया गया। जनता का उद्देश्य केवल समता तक सीमित न रहकर, पूरे देश की शोषित जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक और सत्ता का हिस्सेदार बनाना था।
डॉ. अम्बेडकर द्वारा शुरू किए गए समता पत्र के लगभग 100 वर्ष पूरे होने वाले हैं, लेकिन इसके द्वारा उठाए गए सवाल और इसकी वैचारिक धार आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज के कॉपोर्रेट और टीआरपी-संचालित मीडिया के दौर में, जहां हाशिए के समाज के मुद्दे, दलित-बहुजन उत्पीड़न की खबरें और बुनियादी जन-सरोकार मुख्यधारा से गायब हैं, समता की याद हमें पत्रकारिता के वास्तविक धर्म की याद दिलाती है। समता हमें सिखाता है कि पत्रकारिता का असली काम सत्ता की चाटुकारिता करना या पाखंड को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को न्याय दिलाना और एक समतावादी, प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण करना है। बाबासाहेब की यह अनमोल विरासत आज भी हर उस पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह है, जो एक न्यायपूर्ण समाज का सपना देखता है।





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