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भारतीय उपमहाद्वीप का सामाजिक इतिहास अत्यंत जटिल और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। यहाँ की जाति व्यवस्था ने विभिन्न समुदायों के भाग्य, सामाजिक स्थिति और पहचान को सदियों तक प्रभावित किया है। इसी सामाजिक ताने-बाने के भीतर वाल्मीकि समाज (ऐतिहासिक रूप से भंगी, चूहड़ा या हलालखोर आदि नामों से पुकारे जाने वाले समूह) का इतिहास सामाजिक वंचना, कठोरतम मानवीय संघर्ष और अंतत: एक गौरवशाली आत्म-सम्मान की पुनर्खोज की एक अद्वितीय गाथा है। यह समाज वर्तमान समय में मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश) में केंद्रित है। सदियों से सामाजिक पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर धकेले जाने के बावजूद, इस समुदाय ने बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में एक अभूतपूर्व वैचारिक और सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया। इस क्रांति ने न केवल उनके सामाजिक नामकरण को बदला, बल्कि उन्हें एक नई धार्मिक और दार्शनिक पहचान भी प्रदान की। प्रस्तुत लेख में वाल्मीकि समाज के संपूर्ण इतिहास, उनके नामकरण की प्रक्रिया, और महर्षि वाल्मीकि के साथ उनके प्रतीकात्मक संबंधों का एक विस्तृत और निष्पक्ष विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। वाल्मीकि समाज के अतीत को समझने के लिए इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने मुख्य रूप से दो दृष्टिकोणों का सहारा लिया है। पहला दृष्टिकोण मूल निवासी सिद्धांत पर आधारित है, जबकि दूसरा दृष्टिकोण मध्यकालीन विस्थापन और जबरन श्रम की व्याख्या करता है।
मूल निवासी सिद्धांत और युद्ध बंदी
कई दलित इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि वाल्मीकि समाज के पूर्वज इस भूमि के मूल निवासी या योद्धा कबीले थे। प्राचीन काल में जब कबीलाई युद्ध होते थे, तो पराजित कबीलों को विजेता कबीलों द्वारा दास बना लिया जाता था। इन पराजित लोगों को नगरों से बाहर रहने पर विवश किया गया और उन्हें ऐसे कार्य सौंपे गए जिन्हें समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘द अनटचेबल्स’ में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया है कि अछूत समझे जाने वाले लोग मूल रूप से टूटे हुए लोग थे, जो बौद्ध धर्म के अनुयायी थे या जिन्होंने स्थापित ब्राह्मणवादी व्यवस्था की अधीनता को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था, जिसके कारण उन्हें समाज के हाशिए पर धकेल दिया गया।
मध्यकाल और मैला ढोने की प्रथा का उदय
इतिहासकारों के एक बड़े वर्ग का मत है कि आधुनिक काल में जिस भंगी या सफाई कामगार पहचान को इस समाज से जोड़ा गया, उसकी जड़ें मध्यकाल, विशेषकर मुगल काल और सामंती व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में थीं। प्राचीन भारत में मैला ढोने की प्रथा के साक्ष्य बहुत सीमित हैं; उस समय शुचिता के नियम अलग थे और ग्रामीण व्यवस्था में मानव मल का निपटान प्राकृतिक रूप से या खुले क्षेत्रों में होता था। परंतु, मध्यकाल में जब बड़े किले, बंद प्राचीर वाले शहर और पर्दा प्रथा का प्रचलन बढ़ा, तब बंद शौचालयों का निर्माण शुरू हुआ। इन शौचालयों की सफाई के लिए एक विशेष श्रम बल की आवश्यकता उत्पन्न हुई। ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, जिन युद्धबंदियों या स्थानीय समुदायों ने इस्लामी शासकों या सामंतों के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया और धर्म परिवर्तन का विरोध किया, उन्हें दंडित करने और मानसिक रूप से तोड़ने के लिए इस अत्यंत अपमानजनक कार्य में लगा दिया गया। समय के साथ, यह पेशा वंशानुगत हो गया और एक पूरी जाति को इस काम के साथ अपरिवर्तनीय रूप से बांध दिया गया।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के ब्रिटिश शासन ने इस समाज की वंचना को और अधिक संस्थागत और अपरिवर्तनीय बना दिया। अंग्रेजों ने भारत में आधुनिक नागरिक निकायों यानी नगर पालिकाओं की स्थापना की। लंदन की तर्ज पर भारतीय शहरों (जैसे कलकत्ता, बंबई, दिल्ली और लाहौर) में स्वच्छता व्यवस्था लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर सफाई कर्मचारियों की भर्ती की गई। ब्रिटिश सरकार ने एक प्रशासनिक नीति के तहत ग्रामीण क्षेत्रों से पारंपरिक रूप से शोषित कबीलों और जातियों (विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश के चूहड़ा समुदाय) को शहरों की ओर आकर्षित किया और उन्हें सफाई के काम में स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया। इस प्रक्रिया ने दो काम किए: पहला, इसने इस समाज को एक निश्चित रोजगार तो दिया, लेकिन दूसरा और सबसे आत्मघाती प्रभाव यह हुआ कि सफाई का काम और जाति की पहचान हमेशा के लिए एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए। समाजशास्त्र में इसे पेशे का जातिगत अलगाव कहा जाता है, जहाँ से निकलना इस समाज के लिए अत्यंत कठिन हो गया।
कैसे मिला वाल्मीकि नाम?
जब किसी शोषित समाज को मुख्यधारा में सम्मान पाना होता है, तो वह इतिहास या पौराणिक कथाओं के किसी महान और पूजनीय पात्र को अपना प्रतीक बना लेता है। वाल्मीकि समाज ने भी महर्षि वाल्मीकि को अपना गुरु और पूर्वज मानकर समाज में फैली हीनभावना को खत्म किया और अपनी एक नई, गौरवशाली पहचान बनाई। बीसवीं शताब्दी की शुरूआत से पहले, इस समाज के लिए प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर चूहड़ा, भंगी, हलालखोर या लालबेगी जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था। ये सभी शब्द अत्यधिक अपमानजनक थे और इनके साथ गहरी हीनभावना और अछूतपन की भावना जुड़ी हुई थी। इस अपमान के विरुद्ध और एक गरिमापूर्ण पहचान की खोज में बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में वाल्मीकि आंदोलन का जन्म हुआ। इस आंदोलन की वैचारिक नींव रखने में पंडित अमी चंद शर्मा का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। वे पंजाब के एक समाज सुधारक थे, जिन्होंने इस शोषित समाज की स्थिति को देखा और उनके भीतर आत्म-सम्मान जगाने का बीड़ा उठाया। सन 1916 में उन्होंने वाल्मीकि प्रकाश नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक में उन्होंन यह प्रतिपादित किया कि इस शोषित समाज के मूल पूर्वज कोई और नहीं, बल्कि रामायण के रचयिता आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि हैं।
सद्गुरु अमियानंद जी और सामाजिक लामबंदी
1920 और 1930 के दशक में इस वैचारिक चेतना को धरातल पर उतारने का कार्य सद्गुरु अमियानंद जी और उनके समकालीन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया। उन्होंने पंजाब, अविभाजित भारत के लाहौर, जालंधर, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में वाल्मीकि सभाओं का गठन किया। इन सभाओं का मुख्य उद्देश्य समाज के लोगों के भीतर से हीनभावना को समाप्त करना, उन्हें मद्यपान और अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर करना, तथा शिक्षा की ओर अग्रसर करना था। उन्होंने नारा दिया कि समाज का कोई भी व्यक्ति भविष्य में खुद को जातिसूचक या अपमानजनक नामों से संबोधित नहीं करेगा, बल्कि अपनी पहचान वाल्मीकि के रूप में स्थापित करेगा।
1931 की जनगणना: वाल्मीकि आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता सन 1931 की ब्रिटिश भारत की जनगणना में देखने को मिली। आंदोलन के नेताओं के आह्वान पर, पंजाब, दिल्ली और आसपास के राज्यों में रहने वाले लाखों सफाई कामगारों ने अपनी पारंपरिक और अपमानजनक जातिगत पहचान को त्यागकर सामूहिक रूप से अपनी जाति के कॉलम में वाल्मीकि दर्ज करवाया। यह भारत के इतिहास में किसी शोषित समाज द्वारा अपनी पहचान बदलने का एक अभूतपूर्व और सबसे बड़ा सामूहिक प्रयास था।
महर्षि और वाल्मीकि समाज का संबंध
ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय रूप से यह स्थापित सत्य है कि महर्षि वाल्मीकि और आधुनिक भंगी या सफाई कामगार समाज के बीच कोई सीधा जैविक, वंशानुगत या रक्त का संबंध नहीं है। इस तथ्य को स्थापित करने के लिए इतिहास, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र के अकादमिक तर्कों को समझना आवश्यक है। हिंदू धर्मग्रंथों, पुराणों (जैसे विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत) और स्वयं रामायण के अंतर्गत महर्षि वाल्मीकि के जीवन और उनकी वंशावली का जो विवरण मिलता है, वह उन्हें प्राचेतस परंपरा से जोड़ता है। वे वरुण (जिनका एक नाम प्रचेता भी था) के पुत्र माने गए हैं, जो भृगु वंश के महान ऋषि थे। सनातन परंपरा में भृगु वंश को उत्तम ब्राह्मण परंपरा का अंग माना गया है। यद्यपि कुछ बाद की लोक-कथाओं में उन्हें रत्नाकर डाकू के रूप में चित्रित किया गया है, जो भटककर दस्यु बन गए थे, परंतु वहाँ भी उनके किसी अछूत या सफाई कामगार जाति में जन्म लेने का कोई उल्लेख नहीं मिलता। प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में मैला ढोने जैसी कोई जाति अस्तित्व में ही नहीं थी, अत: महर्षि वाल्मीकि का इस आधुनिक जाति से कोई जैविक संबंध होना ऐतिहासिक रूप से सर्वथा असंभव है।
कैसे और क्यों मिला वाल्मीकि नाम? प्रसिद्ध भारतीय समाजशास्त्री प्रो. एम.एन. श्रीनिवास ने शोषित समाजों के उत्थान की प्रक्रिया को समझाने के लिए संस्कृतिकरण का सिद्धांत दिया था। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी विद्वान मार्क जुर्गेंसमेयर ने अपनी पुस्तक ‘रिलिजियस रिबेल्स इन द पंजाब’ में इस आंदोलन का गहन अध्ययन किया है। इन समाजशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार, जब किसी समाज को सदियों तक अमानवीय भेदभाव और सामाजिक हीनता का शिकार बनाया जाता है, तो वह समाज अपनी अस्मिता की रक्षा और पुनर्गठन के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों की खोज करता है। बीसवीं सदी के नेताओं ने देखा कि हिंदू समाज में महर्षि वाल्मीकि को भगवान राम के समकालीन, रामायण के रचयिता और एक परम पूजनीय ऋषि के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। अत:, इस समाज ने महर्षि वाल्मीकि को अपने आध्यात्मिक गुरु, रक्षक और सांस्कृतिक पूर्वज के रूप में अंगीकार कर लिया। यह संबंध रक्त का नहीं, बल्कि आस्था और अस्मिता का था। महर्षि वाल्मीकि को अपना प्रतीक मानकर इस समाज ने सवर्ण समाज के सामने एक अकाट्य वैचारिक चुनौती प्रस्तुत की: यदि आप महर्षि वाल्मीकि की पूजा करते हैं, तो आप उनके नाम से जुड़े इस समाज को अछूत या अपवित्र कैसे कह सकते हैं? इस प्रकार, यह संबंध पूरी तरह से एक राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रणनीति थी।
महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के दृष्टिकोण
आधुनिक काल में वाल्मीकि समाज की स्थिति और उनके उत्थान को लेकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान दो समानांतर विचारधाराएं सक्रिय थीं, जिन्होंने इस समाज को गहराई से प्रभावित किया। महात्मा गांधी वाल्मीकि (भंगी) समाज की अमानवीय स्थिति से अत्यधिक द्रवित थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वच्छता के कार्य को सर्वोच्च महत्व दिया। गांधीजी स्वयं साबरमती आश्रम में शौचालयों की सफाई करते थे और उन्होंने घोषणा की थी कि यदि उनका पुनर्जन्म हो, तो वे एक भंगी के घर में जन्म लेना चाहेंगे ताकि वे उनके दुखों को साझा कर सकें और उन्हें मुक्त करा सकें। गांधीजी ने इस समाज को हरिजन (ईश्वर की संतान) नाम दिया। गांधीजी मुख्य रूप से जाति व्यवस्था के मूल ढांचे को नष्ट करने के बजाय उसके भीतर ही सम्मानजनक स्थान देने के पक्षधर थे।
इसके विपरीत, बोधिसत्व डॉ. भीमराव आंबेडकर का दृष्टिकोण पूरी तरह से संरचनात्मक और राजनीतिक था। बाबासाहेब का मानना था कि केवल नाम बदल देने या सवर्णों के हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा करने से इस समाज का उद्धार नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक वंशानुगत श्रम विभाजन को समाप्त नहीं किया जाएगा और जब तक वाल्मीकि समाज के लोग पारंपरिक सफाई के पेशे को छोड़कर शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीति में हिस्सेदारी नहीं मांगेंगे, तब तक उनका वास्तविक सशक्तिकरण असंभव है। वाल्मीकि समाज ने कालान्तर में इन दोनों वैचारिक धाराओं से प्रेरणा ली; उन्होंने अपनी धार्मिक अस्मिता को वाल्मीकि आंदोलन से जोड़ा और अपने राजनीतिक व कानूनी अधिकारों के लिए डॉ. आंबेडकर के संविधान को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
समकालीन स्थिति, चुनौतियाँ और भविष्य
आजादी के सात दशकों के बाद, वाल्मीकि समाज की स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया है, परंतु चुनौतियाँ आज भी गंभीर हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-17 के तहत अस्पृष्यता का उन्मूलन और हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध अधिनियम जैसे कानूनों ने इस समाज को कानूनी सुरक्षा प्रदान की है। आज इस समाज के युवा पढ़-लिखकर प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, कला, साहित्य और राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इसके बावजूद, देश के कई हिस्सों में आज भी सफाई कार्य का ठेकाकरण और सीवर सफाई के दौरान होने वाली दुर्घटनाएं इसी समाज के हिस्से आती हैं, जो एक गंभीर मानवाधिकार मुद्दा है। आधुनिक वाल्मीकि आंदोलन अब केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता, उच्च शिक्षा और सत्ता में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग कर रहा है।
बोधिसत्व डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भारत की जाति व्यवस्था की एक अनूठी विशेषता बताई थी, जिसे उन्होंने श्रेणीबद्ध असमानता कहा था। इसके तहत जातियों को एक ऐसी सीढ़ी के रूप में व्यवस्थित किया गया है जहाँ हर जाति अपने से नीचे एक जाति देखती है और खुद को उससे श्रेष्ठ समझती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य शोषित समाजों को आपस में ही बांटकर रखना था ताकि वे कभी एकजुट होकर शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज न उठा सकें। बाबासाहेब का मानना था कि जब तक हाशिए पर धकेले गए ये समाज (चाहे वे वाल्मीकि हों, महार हों या जाटव) आपस में रोटी-बेटी का संबंध स्थापित नहीं करेंगे और एक-दूसरे को समान नहीं मानेंगे, तब तक जातिवाद का समूल नाश नहीं हो सकता। इन जातियों का एक साथ आना ही श्रेणीबद्ध असमानता के इस चक्र को तोड़ सकता है। वाल्मीकि जाति का इतिहास भारतीय सामाजिक व्यवस्था के क्रूरतम पक्षों और उसके समानांतर चलने वाले मानवीय जिजीविषा के संघर्ष का दस्तावेज है। ऐतिहासिक रूप से जिन लोगों को सामंती और औपनिवेशिक व्यवस्था ने हाशिए पर धकेला, उन्होंने बीसवीं सदी में अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना के बल पर स्वयं को वाल्मीकि के रूप में पुनर्गठित किया। यह स्थापित सत्य है कि महर्षि वाल्मीकि से उनका कोई जैविक या वंशावली का नाता नहीं है। वाल्मीकि समुदाय को इस असली तथ्य को समझना चाहिए।
बाबासाहेब का श्रेणीबद्ध असमानता का सिद्धांत
बोधिसत्व डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भारत की जाति व्यवस्था की एक अनूठी विशेषता बताई थी, जिसे उन्होंने श्रेणीबद्ध असमानता कहा था। इसके तहत जातियों को एक ऐसी सीढ़ी के रूप में व्यवस्थित किया गया है जहाँ हर जाति अपने से नीचे एक जाति देखती है और खुद को उससे श्रेष्ठ समझती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य शोषित समाजों को आपस में ही बांटकर रखना था ताकि वे कभी एकजुट होकर शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज न उठा सकें। बाबासाहेब का मानना था कि जब तक हाशिए पर धकेले गए ये समाज (चाहे वे वाल्मीकि हों, महार हों या जाटव) आपस में रोटी-बेटी का संबंध स्थापित नहीं करेंगे और एक-दूसरे को समान नहीं मानेंगे, तब तक जातिवाद का समूल नाश नहीं हो सकता। इन जातियों का एक साथ आना ही श्रेणीबद्ध असमानता के इस चक्र को तोड़ सकता है। लोकतंत्र में संख्या बल ही सबसे बड़ी ताकत होती है। जब तक शोषित वर्ग की विभिन्न उप-जातियां अलग-अलग समूहों में बंटी रहेंगी, तब तक वे राजनीतिक रूप से कमजोर बनी रहेंगी। अक्सर राजनीतिक दल इन उप-जातियों के बीच आपसी मतभेद या प्रतिस्पर्धा का फायदा उठाकर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हैं। यदि वाल्मीकि, जाटव, चमार और अन्य बहुजन समाज एकजुट होकर एक साझा मंच पर आते हैं, तो वे अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी, आरक्षण की रक्षा, सीवर सफाई में होने वाली मौतों के खिलाफ कड़े कानून और बेहतर शिक्षा व रोजगार की मांगों को लेकर सरकार पर कहीं अधिक प्रभावी दबाव बना सकते हैं। इन सभी जातियों का वैचारिक आधार भी एक ही है। वाल्मीकि समाज जहाँ आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि के आत्म-सम्मान और चेतना से प्रेरणा लेता है, वहीं महार, जाटव और चमार समाज डॉ. आंबेडकर, संत रविदास, और चोखामेला के विचारों पर चलते हैं। ये सभी महापुरुष मानवीय गरिमा, समानता और भाईचारे के प्रणेता थे। इन महापुरुषों के विचार आपस में टकराते नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए वैचारिक स्तर पर भी इन समाजों के बीच कोई दूरी नहीं होनी चाहिए। कई बार अनुसूचित जाति के भीतर ही कुछ उप-जातियां अन्य उप-जातियों के प्रति (विशेष रूप से सफाई कामगार समुदायों के प्रति) पूर्वाग्रह या हीनभावना रखती हैं। पूर्ण एकजुटता के लिए यह अनिवार्य है कि चमार, जाटव या महार समाज वाल्मीकि समाज को पूर्ण सामाजिक समानता दें। केवल राजनीतिक मंचों पर एक साथ आना काफी नहीं है। वास्तविक एकता तब स्थापित होगी जब इन समाजों के बीच अंतजार्तीय विवाह और सामाजिक मेलजोल आम बात बन जाएगी।
निष्कर्ष: निश्चित रूप से, वाल्मीकि समाज और अन्य शोषित जातियां एक ही वर्ग का हिस्सा हैं क्योंकि उनका अतीत, वर्तमान की चुनौतियाँ और भविष्य के लक्ष्य एक जैसे हैं। बिखराव केवल उनके दमन को लंबा खींच सकता है, जबकि उनकी एकजुटता और बंधुत्व ही उनके पूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करेगी। जैसा कि बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था—‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’—यहाँ संगठित रहो का अर्थ अपनी उप-जाति में सिमटना नहीं, बल्कि पूरे शोषित समाज का एक मजबूत संगठन बनना है। वाल्मीकि समुदाय को यह भी जान लेना चाहिए कुछ लोग अछूत वर्ग को आपस में बांटकर कमजोर करने की साजिश लगातार करते आ रहे है। अतीत से चूड़े, भंगी, चमार आदि नाम को जोड़कर दी जाने वाली गाली, इसे एक ही समाज के सदस्य होने की पुष्टी करता है। इसलिए एससी, एसटी, ओबीसी, पिछड़े सभी को मिलकर एक साथ काम करना होगा तथा शिक्षा पर पूरा ध्यान देना होगा तभी समाज और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो पायेगी और वह मुख्य धारा में कदम-ताल करता नजर आयेगा।
| Aniket goutam, Uttar Pradesh | |
| Mera maanna yah hai ki india ke andar koi cast na ho sab equal ho or apna dhyan education per de tabhi india age bad sakta hai nahi to is country ka beda garak hone se koi nahi rok sakta hai na hi Narendra Modi or na hi yogi adityanath cast h Desh ba | |
| 2026-07-31 19:07:41 | |





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