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भारतीय उपमहाद्वीप का सांस्कृतिक इतिहास केवल भव्य महलों, संस्कृत के ग्रंथों या बड़े-बड़े राजवंशों के शिलालेखों तक सीमित नहीं है। इसका एक बहुत बड़ा और जीवंत हिस्सा उन ग्रामीण अंचलों में सांस लेता है, जहां सदियों से हाशिए के समाजों ने अपनी आस्थाओं, प्रतीकों और पहचान को जिंदा रखा है। जब हम उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों का दौरा करते हैं, तो अक्सर गांवों की सीमाओं (सरहदों) पर, किसी पुराने नीम, पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे एक छोटा सा मिट्टी या पत्थरों का चबूतरा दिखाई देता है। स्थानीय बोलचाल की भाषा में इस स्थान को चामर, चामट, चमरिया या डीह बाबा का स्थान कहा जाता है। ऊपरी तौर पर देखने पर यह एक अत्यंत साधारण, बिना किसी भव्यता वाला लोक-धार्मिक स्थल प्रतीत होता है। लेकिन यदि इतिहास, नृवंशविज्ञान और पुरातत्व के चश्मे से इसका गहरा विश्लेषण किया जाए, तो यह साधारण सा चबूतरा भारत की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक—यक्ष परंपरा (प्राचीन श्रमण और लोकायत संस्कृति) की जीवित ऐतिहासिक कड़ी के रूप में उभरता है।
प्राचीन भारतीय वाङ्मय और इतिहास में यक्ष और यक्षिणी शब्द का उल्लेख वेदों, उपनिषदों, बौद्ध और जैन साहित्यों में प्रचुरता से मिलता है। यक्षों की मूल अवधारणा को समझने के लिए हमें उस दौर के धार्मिक और दार्शनिक परिदृश्य को समझना होगा, जिसे मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित किया गया था: वैदिक धारा और श्रमण धारा।
वैदिक परंपरा जहां अमूर्त शक्तियों (जैसे इंद्र, वरुण, अग्नि) और यज्ञ-अनुष्ठानों पर केंद्रित थी, वहीं भारत के मूल निवासियों की बहुजन-श्रमण परंपरा पूरी तरह प्रकृति से जुड़ी हुई थी। यक्ष इसी प्रकृति-पूजा के जीवंत प्रतीक थे। यक्ष का शाब्दिक अर्थ ही होता है—एक ऐसी अदृश्य शक्ति जो पूजनीय हो या प्रकृति का रहस्य। यक्षों के लिए किसी बंद मंदिर या गर्भगृह की कल्पना नहीं थी। वे खुले आसमान के नीचे, जंगलों में, पहाड़ों पर, कुओं के किनारे या किसी विशाल वृक्ष (जैसे बोधि वृक्ष, वट वृक्ष) के नीचे वास करते थे। उन्हें क्षेत्रपाल या भूमिपुत्र माना जाता था, जिनका काम किसी कबीले, गांव या प्राकृतिक संपदा की रक्षा करना था। यक्षिणियों को विशेष रूप से जल, वनस्पति और जीवन की उर्वरता से जोड़ा जाता था। ऐसा माना जाता था कि उनके स्पर्श से प्रकृति लहलहा उठती थी। यक्ष पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और गैर-वैदिक चरित्र था। इसमें किसी संस्कृत के जटिल मंत्रों की आवश्यकता नहीं थी, न ही किसी पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता की। आम लोग यक्षों को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के प्रतीक (जैसे लघु मूर्तियां या घोड़े), पानी, दूध, फूल और अनाज चढ़ाते थे। यह पूरी तरह से एक समतावादी और सामुदायिक पूजा पद्धति थी, जिसमें समाज के सभी अंगों की समान भागीदारी होती थी।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जब भगवान बुद्ध ने अपने धम्म (नैतिक नियम और अष्टांगिक मार्ग) का प्रवर्तन किया, तो उन्होंने तत्कालीन समाज में गहराई से रची-बसी लोक-संस्कृति को नष्ट नहीं किया। बौद्ध धम्म ने एक असाधारण और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाते हुए इन यक्ष-प्रतीकों को अपने भीतर समाहित कर लिया। यही कारण है कि प्राचीन बौद्ध कला और स्तूपों के निर्माण में यक्ष-यक्षिणियों को सर्वोच्च और अत्यंत आदरणीय स्थान मिला। जब सम्राट अशोक और उनके बाद के शासकों के काल में महान स्तूपों (जैसे सांची, भरहुत और अमरावती) का निर्माण हुआ, तो यक्षों को इन पवित्र स्तूपों के तोरण द्वारों और वेदिकाओं पर रक्षक या द्वारपाल के रूप में उकेरा गया। मध्य प्रदेश के भरहुत स्तूप पर तो बाकायदा पालि लिपि में शिलालेख मिलते हैं, जिनमें यक्षों के नाम दर्ज हैं—जैसे कुबेर यक्ष, विरूढ़क यक्ष, और सुचिलोम यक्ष। यहाँ वे हाथ जोड़े या पहरेदार की मुद्रा में खड़े हैं, जो यह दिखाता है कि वे तथागत बुद्ध के विचारों के संरक्षण के लिए तत्पर हैं। सांची स्तूप के पूर्वी तोरण द्वार पर उत्कीर्ण वृक्ष को पकड़े हुए त्रिभंग मुद्रा में लटकी यक्षिणी (शालभंजिका) की मूर्ति प्राचीन भारतीय कला की सबसे सुंदर कृतियों में से एक है। यह इस बात का प्रतीक है कि बुद्ध का धम्म प्रकृति के नियमों और लोक-आस्था के साथ पूरी तरह सामंजस्य में था। बौद्ध साहित्यों और जातक कथाओं में यक्षों के स्वभाव में आए बदलाव की अनेक प्रेरक कहानियां हैं। उदाहरण के लिए, आलवक यक्ष की कथा, जो पहले एक हिंसक और डरावना यक्ष था, लेकिन जब वह बुद्ध के संपर्क में आया, तो उनके करुणा, मैत्री और प्रज्ञा के उपदेशों को सुनकर उसका पूरी तरह हृदय परिवर्तन हो गया। वह धम्म का एक महान उपासक और रक्षक बन गया। ये कहानियां केवल धार्मिक नहीं थीं, बल्कि इनका एक गहरा सामाजिक संदेश था: बुद्ध का मार्ग समाज के सबसे उग्र, हाशिए पर पड़े या बहिष्कृत तत्वों को भी आत्म-सुधार और शांति के मार्ग पर लाने में सक्षम है।
ऐतिहासिक संक्रमण और सामाजिक विस्थापन
बौद्ध कला के इस स्वर्णिम काल के बाद, भारतीय इतिहास ने एक करवट ली। मौर्य साम्राज्य के पतन और उत्तर-वैदिक काल के पुनरुत्थान (विशेषकर गुप्त साम्राज्य के दौर में) के साथ समाज की धार्मिक और सामाजिक संरचना में बड़े बदलाव आए। इन बदलावों का सबसे सीधा असर भारत के मूल निवासियों और उनकी यक्ष परंपरा पर पड़ा। गुप्त काल के बाद से भारत में भव्य पत्थरों के बंद मंदिरों और मूर्तिपूजा की एक नई विधा का विकास हुआ। पुराणों की रचना की गई, जिसके तहत कई पुराने देवी-देवताओं का मानवीकरण या नए रूपों में समावेशन किया गया। इस प्रक्रिया में, जहां उच्च वर्गों को इन नए भव्य मंदिरों के भीतर पूजा का अधिकार मिला, वहीं समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जिसे बाद में अछूत, वंचित या दलित (जैसे चर्मकार/जाटव कोली, खटीक, वाल्मीकी आदि) श्रेणियों में डाल दिया गया, उन्हें इन मुख्यधारा के धार्मिक स्थलों से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया गया। छुआछूत और जातिगत पदानुक्रम के कड़े नियमों के कारण, वंचित समाजों को मुख्य गांवों के भीतर न तो पक्के मकान बनाने की इजाजत थी और न ही अपने धार्मिक प्रतीकों को स्थापित करने की। इसका परिणाम यह हुआ कि इन समाजों ने अपने पुरखों, अपने कुलदेवताओं और अपनी पुरानी यक्ष परंपरा को संजोने के लिए गांव की सरहदों (सीमाओं) को चुना। चूंकि वे मुख्य बस्ती से बाहर रहते थे, इसलिए उनके रक्षक देवता भी गांव के बाहर स्थापित हुए। यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जहां प्राचीन काल का भव्य यक्ष चबूतरा ग्रामीण भारत की सीमा पर एक साधारण चामर थान या भूमिया डीह बाबा का थान में तब्दील हो गया।
आज की चामर और प्राचीन यक्ष में समानताएं
यदि हम आज के ग्रामीण अंचलों में मौजूद चामर या चामट के स्थानों की पूजा पद्धति, उनके स्थान और उनकी सामाजिक भूमिका का बारीकी से अध्ययन करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह प्राचीन यक्ष पूजा का ही हुबहू निरंतर रूप है। सदियों का समय बीत गया, नाम बदल गए, लेकिन मूल चेतना अपरिवर्तित रही। उत्तर प्रदेश के अवध, पूर्वांचल और बिहार के गांवों में एक बहुत ही अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। जब किसी परिवार में कोई शुभ कार्य होता है (जैसे शादी, बच्चे का जन्म) या कोई मन्नत पूरी होती है, तो वे गांव के बाहर स्थित इस चामर या डीह या ‘भूमिया’ के स्थान पर मिट्टी के छोटे-छोटे पके हुए घोड़े (जिन्हें स्थानीय भाषा में घुड़ले कहा जाता है) चढ़ाते हैं। यह कोई साधारण रस्म नहीं है। पुरातत्वविदों को भरहुत, मथुरा और अहिच्छत्र की खुदाई में प्राचीन यक्ष स्थानों से मिट्टी के घोड़ों और सवारों के अनगिनत अवशेष मिले हैं। प्राचीन काल में यक्षों को गति और सुरक्षा का देवता माना जाता था, और घोड़ा उनकी तीव्र गति का प्रतीक था। आज 2000 से अधिक साल बीत जाने के बाद भी, ग्रामीण भारत की महिलाएं और पुरुष उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए इन स्थानों पर मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं। प्राचीन यक्ष परंपरा की तरह ही आज के चामर स्थान पर किसी ब्राह्मण या ऊंचे वर्ग के पुजारी की कोई भूमिका नहीं होती। इस स्थान की देखरेख और पूजा-सेवा आमतौर पर समाज के वंचित वर्ग (जैसे जाटव, चमार, कोली, खटीक या अन्य बहुजन जातियों) के किसी बुजुर्ग या परिवार द्वारा की जाती है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर भगत या पंडा कहा जाता है। यहाँ की पूजा में किसी प्रकार का पाखंड या जटिलता नहीं होती। सादा जल चढ़ाना, मिट्टी का दीया जलाना और धूप दिखाना ही इसकी मुख्य क्रियाएं हैं। यह इस स्थान के लोकतांत्रिक और समतावादी चरित्र को आज भी बनाए हुए है।
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिरोध और लोक-चेतना
गांवों के बाहर स्थित यह चामर भुमिया का स्थान केवल एक धार्मिक श्रद्धा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह वंचित समाज के सांस्कृतिक प्रतिरोध का एक मूक प्रतीक भी है। इतिहास गवाह है कि जब किसी समाज पर कोई बाहरी या थोपी हुई सांस्कृतिक व्यवस्था हावी होती है, तो वह समाज अपनी मूल पहचान को बचाने के लिए लोक-कलाओं और लोक-देवताओं का सहारा लेता है। दलित और वंचित समाज ने मुख्यधारा के उन मंदिरों के समानांतर, जहां उन्हें प्रवेश की मनाही थी, गांव के बाहर अपनी एक स्वतंत्र आध्यात्मिक सत्ता खड़ी की। यह चामर थान इस बात का प्रमाण है कि सत्ता और संसाधनों से बेदखल किए जाने के बावजूद, इस समाज ने अपनी जड़ों और अपने पुरखों की स्मृतियों को कभी मिटने नहीं दिया। आज के दौर में जब बहुजन समाज के भीतर अपनी ऐतिहासिक पहचान को लेकर एक नई सामाजिक और राजनीतिक चेतना जागी है, तब इन स्थानों को देखने का नजरिया भी बदला है। कई दलित चिंतकों और इतिहासकारों का मानना है कि ये स्थान दरअसल प्राचीन बौद्ध स्तूपों या विहारों के नष्ट किए गए अवशेषों के प्रतीक हैं। जब प्राचीन बौद्ध संस्कृतियों का दमन किया गया, तो आम ग्रामीण जनता ने बुद्ध के शांति और करुणा के प्रतीकों को पूरी तरह खोने के बजाय, उन्हें इन पिंडियों और लोक-देवताओं के रूप में सहेज लिया। यही कारण है कि आज कई जगहों पर इन चामर या डीह के स्थानों के आसपास डॉ. बी.आर. आंबेडकर की मूर्तियां या नीले ध्वज भी दिखाई देने लगे हैं, जो इस लोक-परंपरा को आधुनिक चेतना और बौद्ध धम्म के पुनरुत्थान से जोड़ते हैं।
प्राचीन यक्ष परंपरा से लेकर आज की ग्रामीण सरहदों पर स्थित चामर भुमिया तक का सफर भारतीय इतिहास की एक अद्भुत और अछूती दास्तान है। यह हमें सिखाता है कि इतिहास केवल बड़ी-बड़ी किताबों या संगमरमर के महलों में नहीं लिखा जाता, बल्कि वह आम जनता की रोजमर्रा की आस्थाओं, उनके द्वारा चढ़ाए जाने वाले मिट्टी के घोड़ों और पेड़ों के नीचे बने चबूतरों में भी सुरक्षित रहता है। आज जब हम गांवों के बाहर इस स्थान को देखते हैं, तो हमें उसमें सांची के तोरण द्वार पर लटकी उस शालभंजिका की प्रतिध्वनि सुनाई देनी चाहिए। हमें उसमें भरहुत स्तूप पर पहरा देते उस कुबेर यक्ष का अक्स दिखाई देना चाहिए। यह स्थान इस बात का जीवंत साक्ष्य है कि भारत की मूल श्रमण और बहुजन संस्कृति कितनी लचीली और मजबूत रही है, जिसने हजारों साल के सामाजिक दमन, छुआछूत और विस्थापन के झंझावातों को झेलने के बाद भी अपनी सांसों को थमने नहीं दिया। चामर भुमिया और प्राचीन यक्ष परंपरा का यह अंतसंर्बंध हमें अपनी वास्तविक सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है—एक ऐसा मार्ग जो किसी भेदभाव पर नहीं, बल्कि प्रकृति की रक्षा, समता, सादगी और सामूहिक लोक-चेतना पर आधारित है। यह अतीत की वह विरासत है जो आज भी ग्रामीण भारत की सीमाओं पर मुस्तैदी से खड़ी होकर हमें हमारे गौरवशाली इतिहास की याद दिला रही है।





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