




2025-11-29 17:42:38
बिहार चुनाव, चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों से आरम्भ हुआ था और उसके पश्चात परिणाम आरोप- प्रत्यारोप से ही समाप्त भी हो चुका हैं। चुनाव आयोग पर विपक्ष ने जो आरोप लगाए वह चुनाव से 6 महीने पहले ही चालू हो चुका था। जिसमें वोट चोरी, वोट कटौती, और पक्षपात जैसे गंभीर आरोप शामिल है। हम इस मुद्दों को अगर विपक्ष का मुद्दा मानकर छोड़ भी दे दो तो पूरे देश ने देखा और इस बात का गवाह है किस प्रकार तत्कालीन बिहार सरकार ने चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा होने की तिथि के बाद भी महिलाओं के खाते में दस- दस हजार रुपए भेजे जाते रहे। आचार संहिता के मुताबिक चुनाव तिथि घोषणा होने के पश्चात तत्कालीन सरकार किसी भी तरह की आर्थिक घोषणा और सहयोग जनता को नहीं दे सकती। 6 अक्टूबर को बिहार चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा की और उसी दिन बिहार सरकार ने महिलाओं के खाते में पहली किस्त दस हजार रुपए डाले थे। इसके बाद उन्होंने दूसरी किस्त 31 अक्टूबर और प्रथम चरण चुनाव के पश्चात 7 नवम्बर को भी महिलाओं के खाते में परस्पर धन राशि भेजी जाती रही। जिसने बिहार चुनाव पर व्यापक प्रभाव डाला और परिणाम सत्ता के हक में जाता रहा.इसी बीच तटीय केंद्र शासित राज्यों में भी स्थानीय चुनाव थे। जिनमे दादर ,नगर हवेली और दमन और दीव में जिला पंचायत तथा नगर निकाय का चुनाव था। जहाँ 122 सीटों में से 91 सीटों पर विपक्ष का पर्चा ही रद्द कर दिया गया और बीजेपी बिना लड़े ही विजयी हो गई। मजे की बात ये कि भाजपा प्रत्याशी का एक भी नामांकन रद्द नहीं हुआ।
वर्तमान भारत में आज जो लोग सत्ता में है वें यह भूल चुके हैं कि उन्हें जो ताकत मिली है वह संविधान की वजह से मिली है, और अंत में उनके अच्छे बुरे निर्णय का न्याय भी यह सविधान ही करेगा. भाजपा सरकार जिस तरह से राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले वहां के नेताओं को अपने तंत्र के माध्यम से डराने और धमकाने का कार्य करती आ रही है (दिल्ली, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, गोवा, कर्नाटक इत्यादि) और सरकारी मशीनरी तथा खजानों का इस्तेमाल करके सत्ता हासिल करने में लगी हुई है यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए चिंता का विषय हैं। आज भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता खुलेआम मुसलमानों को गाली देते नजर आते हैं, उनके धार्मिक आस्थाओं पर ठेस पहुंचाते हुए दिखाई देते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो उन्हें सदन में मुल्ला कहने से भी नहीं हिचकिचाते. उनके बुलडोजर द्वारा मुसलमानो के घर गिराए जाने का मामला जिस तरह से देखने को मिलता है इससे मालूम होता है कि वह खुद को ही सर्वशक्तिमान समझते है। उनके लिए संविधान और कानून जैसी कोई भी चीज मायने नहीं रखती जबकि इस विषय पर कई बार सुप्रीम कोर्ट भी उन्हें फटकार लगा चुकी है।
आज देश के आदिवासी निस्सहाय कलप रहे है। देश में आदिवासियों की जल, जंगल पर सत्ता की हमेशा से नजर रही है। कभी व्यवसाय के लिए तो कभी विकास के नाम हमेशा से इनके क्षेत्रों में अतिक्रमण होते रहे हैं। स्थिति इतनी विकराल हो गई कि इसे नक्सलवाद का रूप लेना पड़ा है। छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता 1959 की धारा 165, 170-इ के अनुसार आदिवासी की जमीन केवल आदिवासी को ही बेची जा सकती है,गैर-आदिवासी को नहीं तो फिर इतने बड़े-बड़े पूंजी पत्तियों के हाथों इतनी बड़ी भूमि क्यों और कैसे बेचीं जा रही है? आज आदिवासियों के लिए लिखने पढ़ने वाले लोगों की संख्या नहीं के बराबर है। सामान्य लोग आदिवासी का मतलब नक्सलवाद समझते हैं। इधर कुछ वर्षों से सरकार और आदिवासियों या यूं कहें कि नक्सलवाद से हर दिन मुठभेड़ देखने को मिल रहा है। बस्तर अब लाल मिट्टी की जगह लाल खून से सना हुआ है।
वर्तमान सरकार ने देश के सभी नागरिकों को कई हिस्सों में बांटकर उन्हें आपस में लड़ा रखा है। बिल्कुल अंग्रेजों की फूट डालो और राज करों की नीति की तरह। देश के मुसलमान देश के सच्चे नागरिक नहीं है, आदिवासी नक्सली है, दलित अयोग्य हैं (आरक्षण के नाम पर गाली) और पिछड़े सत्ता के योग्य नहीं। कानून में तमाम प्रावधान होने के बावजूद भी कानून दलितों, आदिवासियों,पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की रक्षा करने में आज तक विफल रहा हैं। जबकि दलितों और आदिवासियों को समाज के मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उन्हें सरकारी व्यवस्थाओं में आरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था के इतने दशक बावजूद भी हमारा तंत्र आज तक उन्हें अपने मुख्य धारा तक खड़ा करना तो बहुत दूर उन्हें साथ भी नहीं ला सका है। इसका ज्वलंत उदाहरण अभी पिछले दिनों मध्य प्रदेश में 2022 में जजों की भर्ती हेतु परीक्षा के परिणाम से समझ सकते है। जिसका परिणाम इसी महीने घोषित किया गया है। कुल 191 सीटों में 121 पद आदिवासियों हेतु घोषित हुए थे जिनमें से एक पद पर भी आदिवासी का चयन नहीं किया गया। जाहिर हैं सरकार कुछ वर्षों बाद इस पद को सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर देगी जैसा कि वह हमेशा से करती आ रही है (राजनितिक दबाव में फिलहाल इस पर पुनर्विचार किया जा रहा है) आदिवासियों दलितों और पिछड़ों के साथ सरकारी तंत्र हमेशा से यही करता आया है, यही कारण है कि सरकारी सुविधाओं और व्यवस्था में इन समुदायों की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। आजादी के सात दशक बाद भी जब ये आरक्षण की वजह से व्यवस्था में पहुंचे तो उनके समाज में कुछ परिवर्तन देखने को मिलने लगा था जिसे हमारी संकीर्ण मानसिकता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। सोच कर देखिए अगर कानूनन इनको अधिकार और सुविधा नही प्राप्त होती तो इनकी क्या स्थिति होती?
आज शिक्षा पर कोई बात नहीं करना चाहता। स्कूल और कालेजों में कीर्तन भजन हो रहे है। अनुच्छेद 28 का पालन करना तो सरकार जैसे भूल ही गई है। सरकार यह मानने को तैयार नहीं की स्कूल और विद्यालय में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए। आज देश भर के स्कूल और विद्यालय में हिंदू धर्म से जुड़े छोटे-बड़े सभी त्यौहार बड़े धूम से मनाए जाते हैं जिसकी संविधान हमें बिल्कुल आज्ञा नहीं देती। अनुच्छेद 30 की तो बात करना आज देशद्रोह के बराबर बन गया है। अल्पसंख्यकों पर जिस तरह से लगातार हमले किए जा रहे हैं, उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेश को सरकार पूर्ण तरह से उजाड़ने में लगी हुई है। अल्पसंख्यकों में जब पहले मुसलमानों पर उनकी संस्कृति के नाम पर खानपान और भाषाई व्यवहार पर हमले होते थे तो दूसरे अल्पसंख्यक चुपचाप तमाशा देखते थे। वें यह सोच रहे थे की उनके साथ कभी ऐसा नही होगा। आज बौद्ध मठों को जिस प्रकार से निशाना बनाए जाने लगा है, उन्हें जबरन हिंदू बनाए जाने का दबाव दिया जा रहा है और उनके मठों को हिंदू मंदिर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। ईसाइयों को धर्मांतरण के नाम पर जेल मैं ठूसा और पिटा जा रहा है। दूसरी तरफ हिंदुत्व के संगठन घर वापसी के नाम पर उनका धर्मांतरण कर रहे हैं। और जब कोई दूसरा धर्म यह करता पाया जाता है तो उसे अपराधी बनाकर जेल में कैद किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे देश में दो कानून चल रहे है। आज संविधान कुछ नहीं है सत्ता में बैठे लोग जो हुक्म दे रहे हैं वही संविधान है। नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है। एक 28 साल का लड़का देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात कर रहा है और सरकार उसकी खुलेआम मदद कर रही है इससे बड़ा भारतीय कानून के लिए उपहास भला क्या होगा? देश की समस्या ये है की आज तक हमारे संविधान के लायक उसे कोई नेता ही नही मिला, इसीलिए पाखंडी, धूर्त, सामन्ती और पूंजीपति लोग इसका उपहास करते रहते है। डॉ. आंबेडकर ने इसीलिए कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो, उसे चलाने वाले अगर बुरे हों तो वह बुरा ही साबित होगा। देखते है इस देश को उसका सच्चा नेता कब मिलता है?
सामाजिक एवं राजनीतिक विशेषज्ञ





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