




2026-06-01 15:57:51
नागपुर की अखिल भारतीय बहिष्कृत परिषद (30 मई-1 जून 1920) भारत के दलित आंदोलन और सामाजिक क्रांति के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। कोल्हापुर के दूरदर्शी शासक राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज की अध्यक्षता और डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के मुख्य आतिथ्य व नेतृत्व में संपन्न हुआ यह सम्मेलन शोषितों की मुक्ति का वास्तविक शंखनाद था। यह वही ऐतिहासिक मंच था जहाँ शाहूजी महाराज ने खुले दिल से बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर को दलित समाज का सच्चा और भावी नेता घोषित किया था। 1920 के दौर में भारत का स्वतंत्रता आंदोलन तो तेजी पकड़ रहा था, लेकिन करोड़ों अछूतों, वंचितों और बहुजनों की सामाजिक आजादी और राजनीतिक अधिकारों की बात हाशिए पर थी। दलित समाज के भीतर अपने नेतृत्व को लेकर उथल-पुथल मची हुई थी। इस शून्यता को भरने और शोषितों को एक नई दिशा देने के लिए नागपुर में इस विशाल अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस परिषद का मुख्य उद्देश्य अछूतों को राजनीतिक रूप से जागरूक करना, उनके अधिकारों की मांग को ब्रिटिश सरकार के सामने मजबूती से रखना और समाज के भीतर फैले बिखराव को खत्म करना था। सम्मेलन के अध्यक्ष पद को सुशोभित करते हुए कोल्हापुर के राजा, राजर्षि शाहूजी महाराज ने एक अत्यंत क्रांतिकारी भाषण दिया। उन्होंने तत्कालीन स्थापित सवर्ण नेताओं (विशेषकर लोकमान्य तिलक और कांग्रेस के अन्य नेताओं) की संकीर्ण मानसिकता पर कड़ा प्रहार किया।
बाबासाहेब को नेता घोषित करना
शाहूजी महाराज ने अपने भाषण में उपस्थित विशाल जनसमुदाय की ओर इशारा करते हुए एक ऐसी बात कही जो भविष्य की भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी भविष्यवाणी साबित हुई। उन्होंने कहा: भाइयों, आपको अपना सच्चा नेता मिल गया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ही आपके सच्चे नेता हैं। वे केवल आपके नेता नहीं हैं, बल्कि वे पूरे भारत के शोषितों के उद्धारक बनेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन डॉ. आंबेडकर की कीर्ति और नेतृत्व पूरे विश्व में चमकेगा। शाहूजी महाराज एक राजा थे, लेकिन उन्होंने जातिवाद की बेड़ियों को तोड़कर बाबासाहेब की विद्वता और निष्ठा को पहचाना। उन्होंने न केवल बाबासाहेब का समर्थन किया, बल्कि उनके मूकनायक (समाचार पत्र) और उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय मदद भी दी थी।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का नेतृत्व और वैचारिक रुख
इस सम्मेलन में 29 वर्षीय युवा डॉ. भीमराव आंबेडकर मुख्य सूत्रधार थे। यहाँ बाबासाहेब ने अछूतों के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों का जो खाका खींचा, उसने आगे चलकर गोलमेज सम्मेलन और पून समझौते का आधार तैयार किया।
स्वतंत्र प्रतिनिधित्व की मांग: बाबासाहेब ने जोर देकर कहा कि सवर्ण नेता कभी भी अछूतों के वास्तविक दुखों और उनकी समस्याओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। इसलिए, अछूतों को विधान परिषदों और सरकारी नौकरियों में स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
आत्म-निर्भरता का संदेश: उन्होंने समाज से आह्वान किया कि वे अपनी मुक्ति के लिए किसी अवतार या सवर्ण सुधारकों के भरोसे न रहें। उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।
द्वि-स्तरीय गुलामी का पदार्फाश: बाबासाहेब ने स्पष्ट किया कि भारतीय अछूत दोहरी गुलामी में जी रहे हैं—एक ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी और दूसरी हिंदू सामाजिक व्यवस्था (जातिवाद) की गुलामी। हमें इन दोनों बैरियों से एक साथ लड़ना है।
सम्मेलन में पारित प्रस्ताव
तीन दिनों तक चले इस गहन मंथन के बाद परिषद में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए, जिन्होंने भविष्य के दलित आंदोलन की दिशा तय की:
पृथक निर्वाचन और प्रतिनिधित्व: अछूतों के लिए जनसंख्या के अनुपात में राजनीतिक संस्थाओं और स्थानीय निकायों में सीटें आरक्षित की जाएं।
अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा: वंचित वर्ग के बच्चों के लिए प्राथमिक और उच्च शिक्षा मुफ्त और अनिवार्य की जाए।
मजदूरी और मानवाधिकार: अछूतों से कराई जाने वाली बेगार (बिना पैसे के जबरन काम कराना) को अवैध घोषित किया जाए और उन्हें सम्मानजनक मजदूरी मिले।
सैन्य और पुलिस भर्ती: ब्रिटिश सेना और पुलिस विभागों में अछूत जातियों (जैसे महार, चमार आदि) की भर्ती पर लगी रोक को तुरंत हटाया जाए।
1920 का यह नागपुर सम्मेलन केवल एक राजनीतिक जलसा नहीं था, बल्कि यह नेतृत्व के हस्तांतरण का प्रतीक था। इससे पहले तक अछूतों के उद्धार का दावा सवर्ण सुधारक (जैसे महात्मा ज्योतिराव फुले के बाद कुछ अन्य संगठन) करते थे, लेकिन इस परिषद ने यह स्थापित कर दिया कि शोषितों का उद्धार केवल शोषित नेतृत्व ही कर सकता है। शाहूजी महाराज के संरक्षण और बाबासाहेब के प्रखर राष्ट्रव्यापी नेतृत्व की शुरूआत इसी ऐतिहासिक मोड़ से हुई, जिसने आगे चलकर भारत को एक समतावादी संविधान और करोड़ों वंचितों को स्वाभिमान से जीने का अधिकार दिया। देश के करोड़ों वंचितों को आज इसे आत्मसात करके, आचरण सुधारकर एकता के भाव के साथ समर्थ बनाना होगा।





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