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मोदीसंघी सरकार की कार्यशैली की अदृश्यता

लोकपाल की सालाना रिपोर्ट तीन साल से संसद में क्यों पेश नहीं की गई?
News

2026-01-24 15:05:47

नई दिल्ली। मार्च 2024 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस एएम खानविलकर ने जब भारत के लोकपाल के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला तब वो कानूनी रूप से अनिवार्य किया गया एक नियमित दस्तावेज, लोकपाल की वार्षिक रिपोर्ट, देखना चाहते थे। हालांकि यह कभी मिला ही नहीं। 18 नवंबर 2025 की तारीख में लिखे गए एक दुर्लभ नोट से यह खुलासा होता है कि ऐसी कोई फाइल, ड्राफ्ट या नोट नहीं थे जो इस बात की ओर इशारा करे कि, लोकपाल ने साल 2022-23 के लिए कोई वार्षिक रिपोर्ट तैयार की. बावजूद इसके कि हर साल एक वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति, और उनके माध्यम से संसद को भेजना कानूनी तौर पर अनिवार्य है। उक्त नोट के अनुसार, साल 2022-23 के वार्षिक रिपोर्ट की तैयारी से संबंधित ऐसा कोई भी रिकॉर्ड जिसे लोकपाल के पिछले निकाय ने बनाया हो, उपलब्ध नहीं है। खानविलकर इस खाई को पाटने में लग गए. उस नोट के अनुसार, अगले छह महीने में लोकपाल ने पिछले दो साल, यानी 2022-23 और 2023-24 की एक समग्र रिपोर्ट तैयार की. और 2024 के अक्टूबर तक लोकतंत्र का यह प्रहरी सारे जरूरी दस्तावेजों को तैयार करके उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष पेश करने के लिए समय मांग रहा था।

यह कानूनी रूप से एक अनिवार्य कदम है. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अनुच्छेद 48 में यह स्पष्ट लिखा है कि यह लोकपाल का दायित्व है कि लोकपाल के तौर पर उनके द्वारा किए गए कार्यों की रिपोर्ट वे वार्षिक रूप से राष्ट्रपति को सौंपे. और ऐसी किसी रिपोर्ट की प्राप्ति के बाद राष्ट्रपति को चाहिए कि उसकी प्रतिलिपि बनाकर, यदि कोई ऐसा मामला है जहां लोकपाल की सलाह को स्वीकार नहीं किया गया, उन मामलों के संबंध में, उस प्रतिलिपि के साथ एक ज्ञापन में, संसद के दोनों सदनों में इसे स्वीकार न करने के कारणों को स्पष्ट करें। लेकिन इस रिपोर्ट को सौंपने के लिए लोकपाल को राष्ट्रपति से मिलने का समय कभी दिया ही नहीं गया। उस नोट से यह भी खुलासा होता है कि लोकपाल के अधिकारियों ने साल 2024 और 2025 में राष्ट्रपति से मिलने के लिए कम से कम चार औपचारिक पत्र लिखे. इतना ही नहीं, वो राष्ट्रपति कार्यालय को लगातार फोन भी करते रहे, लेकिन मिलने का कोई समय नहीं दिया गया. आंतरिक पत्र कहते हैं कि राष्ट्रपति की व्यस्तता के कारण समय नहीं दिया जा सका। और इसी बीच लोकपाल ने साल 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट भी तैयार कर छपवा ली. 2025 में और भी पत्र भेजे गए. अंतिम पत्र 25 अगस्त की तारीख में भेजा गया, लेकिन उसका भी कोई जवाब नहीं आया। एक महीने के बाद लोकपाल की समस्त पीठ ने अधीर होकर तीन साल की उन वार्षिक रिपोर्ट्स को एक औपचारिक कवर लेटर के साथ डाक के जरिये राष्ट्रपति को भेजने का फैसला किया. 18 नवंबर 2025 की तारीख में दर्ज इस दुर्लभ नोट में, संसद के शीतकालीन सत्र से कुछ हफ्ते पहले, लोकपाल ने कानूनी तौर पर अनिवार्य इस प्रक्रिया में तीन साल की देरी के कारणों के बारे में बताते हुए कहा कि साल 2021-22 से संसद में कोई सालाना रिपोर्ट पेश नहीं की गई है। उस लिखित टिप्पणी के अनुसार चूंकि साल 2022-23, 2023-24 के साथ साल 2024-25 के भी वार्षिक रिपोर्ट को पेश करने के लिए हर संभव प्रयास के बाद भी समय आवंटित नहीं हो पाने के कारण लोकपाल की समस्त पीठ (अध्यक्ष और अन्य छह सदस्य) के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि दोनों ही वार्षिक रिपोर्ट्स (2022-23 और 2023-24 को एक साथ सम्मिलित कर उसके साथ 2024-25) को एक फॉरवार्डिंग लेटर और अध्यक्ष के द्वारा लिखे गए पत्र के साथ राष्ट्रपति के समक्ष पेश किया जाए। राष्ट्रपति कार्यालय ने उस चिट्ठी को स्वीकार किया और, प्राप्त सारे दस्तावेजों को प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत आने वाले कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेज दिया। हालांकि, दिसंबर 2025 में जब संसद का शीतकालीन सत्र बुलाया गया, उन रिपोर्ट्स को तब तक भी वहां नहीं भेजा गया था। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों के ही कार्यालयों से पूछा है कि लोकपाल को रिपोर्ट पेश करने के लिए समय क्यों नहीं दिया गया, वार्षिक रिपोर्ट को संसद में क्यों नहीं भेजा गया, और इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित है भी या नहीं। लोकपाल के कार्यालय से भी साल 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अभाव, राष्ट्रपति द्वारा समय न दिए जाने की स्थिति में डाक द्वारा उन्हें भेजे जाने में हुई देरी, और संसद में रिपोर्ट न भेजे जाने पर उनकी प्रतिक्रिया के बारे में सवाल पूछे। अब तक इनके कोई जवाब प्राप्त नहीं हुए हैं, प्रतिक्रिया मिलने के बाद उसे रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा।

सवालों से बचने की कोशिश

सूचना अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज इस चूक को जवाबदेही से बचने का तरीका कहती हैं. उन्होंने कहा, हमारे लिए सवाल करना बहुत ही जरूरी है कि आखिर ऐसा कैसे होने दिया जा रहा है? लोकपाल भारत के लोगों के प्रति जवाबदेह हैं. उनकी रिपोर्ट्स को हर साल सार्वजनिक किया जाना बहुत ही जरूरी है. यह लालफीताशाही नहीं है, अनिवार्य जरूरत है. ये सब होता देख ऐसा लगता है जैसे सरकार को कानून के पालन की बिल्कुल भी इच्छा और परवाह नहीं है। अंजलि भारद्वाज, जिन्होंने पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों के साथ साथ लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, कहती हैं कि यह सरकार की लापरवाही और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दशार्ता है. राष्ट्रपति लोकपाल से मिलने का समय नहीं दे रही हैं. कार्यकारी प्रमुख होने के नाते उन्हें लोकपाल को समय देना चाहिए। तरुवल्लुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद और कांग्रेस नेता शशिकांत सेंथिल भी अंजलि भारद्वाज की बात का समर्थन करते हैं. राष्ट्रपति का लगभग दो सालों से लोकपाल को समय न देना यह स्पष्ट करता है कि सरकार का रुख क्या है? यह बहुत ही दुखद है कि सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश रिपोर्ट को डाक के माध्यम से भेजने के लिए बाध्य हुए, उनका कहना था। प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत आने वाले कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा और देरी किए जाने के संबंध में अंजलि भारद्वाज कहती हैं, राष्ट्रपति लोकपाल से पहले ही मिल सकती थीं. विभाग शीतकालीन सत्र से पहले ज्ञापन तैयार कर सकता था. देरी की कोई वजह ही नहीं है. मोदी सरकार भ्रष्टाचार के मसले को लेकर गंभीर है ही नहीं, जबकि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के आधार पर ही 2014 में इस सरकार को चुना गया था। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के कार्यों पर अधिकार के 2014 के एक प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, लोकपाल के मामलों में प्रधानमंत्री मोदी ही सर्वेसर्वा हैं. इन मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उन्हें ही है। सेंथिल यह भी कहते हैं, संस्थाओं के साथ किए जा रहे समझौतों में लोकतंत्र में आ रही गिरावट साफ दिखती है. इस मामले में हुई लापरवाही भी इसका एक उदाहरण है. भ्रष्टाचार पर भाजपा का ये रुख इस पतन का जीता-जागता उदाहरण है।

आलोचक इस बात पर जोर देते हैं कि बिना संसद के नियमित निगरानी के लोकपाल अपनी जवाबदेही से बचा रहता है. वार्षिक रिपोर्ट जवाबदेही का प्राथमिक लोकतांत्रिक औजार हैं, विशेषकर लोकपाल जैसी स्वायत्त और शक्तिशाली संस्थाओं के लिए. ये संसदीय निगरानी को सक्षम बनाने के साथ सार्वजनिक रिकॉर्ड भी तैयार करते हैं. ये प्रशासकीय विरोध का भी खुलासा करते हैं. लोकपाल अधिनियम की धारा 48 विशेष तौर पर एक ज्ञापन की मांग करती है, जिसमें इस बात का स्पष्टीकरण हो कि सरकार ने लोकपाल की सलाह को अगर अस्वीकार किया तो क्यों किया? अंजलि भारद्वाज बताती हैं कि नियमानुसार रिपोर्ट के साथ एक ज्ञापन भी देना होता है. उन्होंने कहा, कानून के तहत लोकपाल को इन रिपोर्ट्स को कार्यकारी प्रमुख यानी राष्ट्रपति को सौंपना होता है. इसके बाद कार्यकारी प्रमुख को इस रिपोर्ट की पड़ताल करके, उन सरकारी विभागों के बारे में कारण और स्पष्टीकरण देना होता है, जिन्होंने लोकपाल की सलाह मानने से इनकार किया, और अंत में उसे सार्वजनिक निरीक्षण के लिए संसद में भेज देना होता है। लेकिन वास्तविकता तो ये है कि संसद में इस बारे में शायद ही कोई सवाल, बहस या विमर्श होता है. जबकि संसद के द्वारा इन रिपोर्ट्स की मांग की जानी चाहिए।

ऐसी देर नई नहीं: हालांकि यह देरी पहली बार हुई हो, ऐसा नहीं है. इससे पहले की सभी लोकपाल रिपोर्ट आने में भी काफी देर हुई थी. लोकपाल की पहली वार्षिक रिपोर्ट 2021 में जारी की गई थी, वो भी अब जब सरकार ने राज्यसभा में ये स्वीकार किया कि, लोकपाल के गठन के बाद से तब तक, कोई भी रिपोर्ट जारी नहीं की गई है। सेंथिल आरोप लगाते हैं कि सभी गुम लोकपाल रिपोर्ट, उसी कवायद का हिस्सा हैं जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार संसद को दरकिनार करना चाहती है. लोकपाल एक स्वतंत्र निकाय है, ये किसी के भी अधीन नहीं हो सकता. इसे जनता से सरोकार है. अगर इसकी रिपोर्ट को संसद में पेश नहीं किया जाएगा, तो फिर कहां भेजा जाएगा? पिछली लोकपाल रिपोर्ट में बजट के साथ-साथ शिकायतों के समाधान की विस्तृत जानकारी और समाधान की स्थिति के बारे में भी बताया गया है, जिसमें उन्हें मिली, प्रोसेस की गई और निपटाई गई शिकायतों की कुल संख्या शामिल है. इसमें यह भी बताया गया है कि कितनी लोकपाल जांच के आदेश दिए गए, और कितने सरकारी कर्मचारियों से पूछताछ की गई. सबसे जरूरी बात यह है कि इसमें बताया गया है कि संसद सदस्यों, केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों और सरकारी निकायों के खिलाफ कितनी शिकायतें मिलीं. रिपोर्ट में शिकायतों की प्रकृति जैसे अधिकारियों द्वारा गलत काम या उनका सक्रिय न होना, आपराधिक दुरुपयोग, अनुचित लाभ, रिश्वतखोरी आदि का भी जिक्र है।

काम पर सवाल: एक अन्य पहलू यह भी है कि आलोचकों द्वारा लोकपाल की कार्य प्रणाली को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के पास होने के लगभग छह साल बाद, 2019 में जब से यह प्रभावी हुआ है, भारत के लोकपाल को अपने विशाल जनादेश को अमल में लाकर ठोस परिणाम प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है. जहां इस संस्था को हजारों की तादाद में सरकारी कर्मचारियों के साथ साथ वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप की शिकायतें मिलीं, वहीं इनमें से बहुत सारे आरोपों को प्राथमिक स्तर पर ही कई तकनीकी कारणों, जैसे अधिकार सीमा क्षेत्र, सहायक दस्तावेज की कमी या प्रारूप के आधार पर खारिज कर दिया गया। ाह देखते हुए कि लोकपाल अपने शुरूआती सालों में किसी एक मामले में भी सजा दिलाने या कोई नतीजा पाने में सफल नहीं हुआ है, संसदीय समितियों ने बार-बार इस समस्या को उठाया है।

लोकपाल सिर्फ एक दिखावे भर की एजेंसी है: सेंथिल कहते हैं, भारत में भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों के साथ ऐसा ही बर्ताव होता है. आखिर कौन-सी सरकार ऐसा करती है? वही सरकार जिसके पास छिपाने के लिए बहुत कुछ हो। यह स्वभाविक है।

लोकपाल की भूमिका और उसके प्रभाव को सीमित करने में इसकी संरचनात्मक और संस्थागत बाध्यता को भी एक बड़ा कारण माना जाता है. कई पदों का खाली होना, नियुक्ति में देरी, पूरी प्रक्रिया में कई तरह की अड़चनें और जांच पड़ताल के लिए बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता ने जहां जांच की गति धीमी की है, वहीं वार्षिक रिपोर्ट्स के न आने, या देर से आने ने इसकी कार्य प्रणाली के संसदीय निगरानी को कमजोर किया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं, यह स्पष्ट है कि लोकपाल अधिनियम के 2013 प्रभाव में आने के बाद मोदी सरकार ने इसे निष्क्रिय करने का पूरा प्रयास किया है. इस अधिनियम के पारित होने के बाद अगले पांच सालों तक किसी लोकपाल की नियुक्ति ही नहीं की गई. और जब नियुक्ति हुई भी तब कार्यालय के लिए कोई जगह उपलब्ध नहीं कराई गई. और उन्होंने एक फाइव स्टार होटल से काम करने का रास्ता निकाला. और अब वे अपनी बुनियादी वैधानिक जिम्मेदारियां भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं. वार्षिक रिपोर्ट का न होना दिखाता है कि लोकपाल ने अपना बुनियादी काम भी नहीं किया है। अब तक पूर्व लोकपाल पिनाकी चंद्र घोष के द्वारा साल 2019-2020, 2020-2021 और 2021-2022 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के समक्ष तब तक तीन वार्षिक रिपोर्ट बनाई और प्रस्तुत की जा चुकी हैं. 27 मई 2022 में उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद 2024 तक किसी भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं की गई थी. 10 मार्च 2024 को जस्टिस खानविलकर ने अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला। लोकपाल के रूप में खानविलकर की विश्वसनीयता को लेकर प्रशांत भूषण ने सवाल खड़े करते हैं, जस्टिस खानविलकर ने बहुत सारे फैसले सरकार के पक्ष में दिए हैं. 2019 में जहूर अहमद शाह वताली के केस में फैसला देते हुए उन्होंने यूएपीए के मुकदमों में जमानत की शर्तों को और सख्त कर दिया. एक अन्य फैसले में उन्होंने पीएमएलए के मुकदमों में कठोर प्रावधानों को बरकरार रखा था। प्रशांत भूषण ये सवाल भी करते हैं, लोकपाल उन रिपोर्ट्स को पहले ही डाक से क्यों नहीं भेज पाए? कानून के द्वारा तय की गई यह उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। वे आगे आरोप लगाते हैं, खानविलकर वही कर रहे हैं जो सरकार उनसे करवाना चाहती है, और वो यह है कि खानविलकर कुछ भी न करें. लोकपाल को किसी भी रिपोर्ट को लेकर कोई चिंता नहीं है. अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना उसे और दूसरे विभागों के कंधे पर डालकर ये करदाताओं के पैसे से तनख़्वाह और अन्य भत्तों के फायदे उठा रहे हैं। प्रशांत भूषण कहते हैं कि असल में लोकपाल को जवाबदेह बनाने के लिए एक और लोकपाल की जरूरत है। मोदी सरकार कीमानसिकता में संघी तत्व: संघी मानसिकता के व्यक्ति छिपकर जमीन की सतह से नीचे रहकर अपने अंदर छिपे षड्यंत्रों के अनुसार कार्य करते हैं। मोदी सरकार में संघी तत्व गहरायी तक है, इस लिए यह सरकार किसी भी लोकतांन्त्रिक व संवैधानिक संस्थाओं की परवाह नहीं करती। इस सरकार में जो मोदी कहें, वही कानून है और वही संविधान है। मोदी किसी के प्रति जबावदेही नहीं, यही संघी विधान है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

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