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एक कुनबी जब तलवार उठा लेता था, तो वह मराठा बन जाता था और एक मराठा जब वापस हल थाम लेता था, तो वह कुनबी हो जाता था। भारत के इतिहास में कुछ ही समुदाय ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से न केवल बंजर धरती का सीना चीरकर सोना उगाया, बल्कि समय आने पर अपनी तलवार की धार से बड़े-बड़े साम्राज्यों के सिंहासन हिला दिए। कुनबी (मराठा) समाज एक ऐसा ही गौरवशाली, जुझारू और ऐतिहासिक समुदाय है। भूमिपुत्र (धरती के बेटे) से लेकर क्षत्रिय (योद्धा और शासक) तक का इनका सफर भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य इतिहास की रीढ़ रहा है। प्राय: दक्कन और मध्य भारत के इतिहास में कुनबी और मराठा शब्दों को एक-दूसरे का पूरक माना जाता रहा है। इतिहासकार और समाजशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि यह समाज मूलत: एक कृषि-योद्धा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। शांति के समय हल थामना और युद्ध के समय तलवार उठाना इस समाज की मूल पहचान रही है।
कुनबी और मराठा शब्द की व्युत्पत्ति
कुनबी शब्द की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों के विभिन्न मत हैं, लेकिन सबसे प्रामाणिक मत यह है कि यह संस्कृत के शब्द कुटुम्बिन से विकसित हुआ है, जिसका अर्थ होता है एक परिवार का मुखिया या खेती-बाड़ी करने वाला गृहस्थ। प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए यह शब्द कुनबी या कुलवाड़ी बना। ऐतिहासिक रूप से, दक्कन की सामाजिक संरचना में मराठा और कुनबी के बीच एक सतत और लचीला संबंध रहा है:
सैन्य-कृषक सातत्य: जो कुनबी परिवार कृषि कार्य में लगे रहे, वे कुनबी कहलाए। लेकिन जब इन्हीं परिवारों के युवाओं ने अपनी वीरता के बल पर सेना में ऊंचे पद (जैसे पाटिल, देशमुख, सरदेसाई) हासिल किए और जागीरें प्राप्त कीं, तो वे मराठा के रूप में प्रतिष्ठित हुए। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. इरावती कर्वे और रिचर्ड ईटन जैसे विद्वानों के अनुसार, मराठा और कुनबी समाज के बीच कोई सख्त विभाजन रेखा नहीं थी। यह एक गतिशील व्यवस्था थी जहाँ योग्यता और सैन्य कौशल के बल पर सामाजिक प्रतिष्ठा बदलती रहती थी।
प्राचीन और मध्यकालीन पृष्ठभूमि
छत्रपति शिवाजी महाराज के उदय से सदियों पहले भी इस समाज के पूर्वज दक्कन के विभिन्न राजवंशों की सेनाओं के मुख्य आधार थे। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक दक्कन पर शासन करने वाले सातवाहन, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजाओं की सेना में स्थानीय कृषक-योद्धा ही शामिल थे। इन्हें ही बाद में महारठ्ठी या मराठा कहा गया। देवगिरी के यादवों के शासनकाल में कुनबी-मराठा सरदारों को प्रशासनिक और सैन्य अनुभव मिला। जब दक्कन में बहमनी सल्तनत और बाद में पांच दक्कन सल्तनतें (बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा आदि) स्थापित हुईं, तब इन सुल्तानों को भी शासन चलाने के लिए स्थानीय मराठा-कुनबी सरदारों (जैसे भोंसले, जाधव, निंबालकर, मोरे, घोरपड़े) पर निर्भर रहना पड़ा। इन्हें देशमुख और पाटिल जैसे वतन (भूमि अधिकार) दिए गए, जिससे इनका क्षेत्रीय प्रभाव बेहद मजबूत हो गया। कुनबी (मराठा) इतिहास का सबसे दीप्तिमान अध्याय 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में लिखा गया। शिवाजी महाराज ने यह भांप लिया था कि दक्कन के विदेशी सुल्तानों के अधीन जागीरदारी के लिए आपस में लड़ना आत्मघाती है। उन्होंने हिंदवी स्वराज्य (स्वदेशी शासन) का नारा दिया।
मराठा तितुका मेळवावा, महाराष्ट्र धर्म वाढवावा।
(अथार्त: सभी मराठों/महाराष्ट्रीयन लोगों को एकजुट करो और महाराष्ट्र धर्म यानी न्याय व लोक-कल्याण के मार्ग को आगे बढ़ाओ।)
मावला सैनिकों का शौर्य: शिवाजी महाराज की सेना की सबसे बड़ी ताकत मावला सैनिक थे। ये मावला कोई पेशेवर सैनिक नहीं थे, बल्कि सह्याद्रि की पहाड़ियों में रहने वाले साधारण कुनबी किसान और चरवाहे थे। शिवाजी महाराज ने उनके भीतर स्वाभिमान की लौ जगाई और उन्हें गुरिल्ला युद्ध (गनिमी कावा) की कला में निपुण किया। सह्याद्रि के कठिन भूगोल, पहाड़ों और घने जंगलों का उपयोग करते हुए मुगलों और बीजापुर की विशाल सेनाओं को धूल चटाने में कुनबी सैनिकों की शारीरिक सहनशीलता और फुर्ती सबसे बड़ा हथियार बनी।
सामंतवाद का अंत: शिवाजी महाराज ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए पारंपरिक जमींदारों (देशमुखों) की ताकत को सीमित किया और सीधे किसानों (कुनबी) के हितों की रक्षा की। उन्होंने राजस्व प्रणाली को सुधारा, जिससे आम किसान खुद को स्वराज्य का रक्षक मानने लगा। 18वीं शताब्दी में छत्रपति शाहूजी महाराज और पेशवाओं के काल में मराठा साम्राज्य का विस्तार केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर में अटक (वर्तमान पाकिस्तान) से लेकर पूर्व में कटक (ओडिशा) तक फैल गया। इस साम्राज्य के विस्तार को जिन सेनापतियों और राजवंशों ने संभव बनाया, उनमें से अधिकांश का मूल कुनबी-मराठा पृष्ठभूमि से था।
वारकरी आंदोलन: कुनबी (मराठा) समाज का इतिहास केवल युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक है। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी संप्रदाय को मजबूत करने में इस समाज का अतुलनीय योगदान रहा है। 17वीं सदी के सबसे महान संत-कवि तुकाराम महाराज स्वयं मोरे (कुनबी) परिवार से थे। उन्होंने अपनी सरल, तार्किक और मर्मभेदी अभंग वाणी से समाज में फैले पाखंड, अंधविश्वास और जातिगत ऊंच-नीच पर कड़ा प्रहार किया। उनके विचारों ने ही शिवाजी महाराज के स्वराज्य के लिए नैतिक और वैचारिक भूमि तैयार की थी। वारकरी आंदोलन ने समाज के सभी वर्गों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया, जिससे ऊंच-नीच की भावना कम हुई और समाज संगठित हुआ। आज भी आषाढ़ी एकादशी पर पंढरपुर जाने वाली डिंडियों (यात्राओं) में कुनबी-मराठा समाज की सहभागिता इसकी गहरी सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाती है।
ब्रिटिश काल: 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन के बाद जब अंग्रेजों का शासन स्थापित हुआ, तब कुनबी समाज को दोहरे संकट का सामना करना पड़ा। एक तरफ उनकी सैन्य शक्ति छीन ली गई, और दूसरी तरफ अंग्रेजों की दमनकारी रैयतवाड़ी राजस्व व्यवस्था के कारण वे कर्ज के जाल में फंस गए। साल 1875 में पुणे और अहमदनगर के कुनबी किसानों ने सूदखोरों और ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह कर दिया, जिसे इतिहास में दक्कन के दंगे कहा जाता है। किसानों ने सूदखोरों के बही-खाते जला दिए। इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर दिया और उन्हें किसानों की सुरक्षा के लिए डेक्कन एग्रीकल्चरिस्ट्स रिलीफ एक्ट (1879) पास करना पड़ा।
बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय के अग्रदूत
19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरूआत में इस समाज ने भारत को दो ऐसे महापुरुष दिए जिन्होंने देश में सामाजिक न्याय और आधुनिक शिक्षा की नींव रखी। महात्मा ज्योतिराव फुले (जो स्वयं माली-ओबीसी समाज से थे) ने अपनी अमर कृति शेतक्याचा आसूड (किसान का कोड़ा - 1883) में तत्कालीन कुनबी किसानों की दयनीय स्थिति, उनके अज्ञान और पुरोहित वर्ग व ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए जा रहे उनके शोषण का अत्यंत मार्मिक और सजीव चित्रण किया। उन्होंने सत्यशोधक समाज के माध्यम से कुनबी-मराठा समाज को शिक्षित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। वहीं कोल्हापुर रियासत के शासक राजर्षि शाहूजी महाराज (भोंसले वंश) कुनबी-मराठा इतिहास के सबसे प्रगतिशील नायकों में से एक हैं। उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा और प्रशासन पर केवल कुछ चुनिंदा वर्गों का एकाधिकार है। शाहूजी महाराज ने अपनी रियासत में पिछड़े वर्गों (जिसमें कुनबी, धनगर, मुस्लिम और अछूत समाज शामिल थे) के लिए 50% आरक्षण लागू किया। यह आधुनिक भारत के इतिहास में पहला आधिकारिक आरक्षण था। उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर की मेधा को पहचाना, उनकी उच्च शिक्षा में मदद की और उनके मूकनायक समाचार पत्र को वित्तीय सहायता दी। 1920 के मानगांव परिषद में शाहूजी महाराज ने घोषणा की थी कि ‘आपको डॉ. आंबेडकर के रूप में आपका सच्चा नेता मिल गया है।’
समाज की सामाजिक संरचना और परंपराएं
इस समाज की अपनी विशिष्ट सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्थाएं हैं, जो इसके गौरव और अनुशासन को बनाए रखती हैं। समाज की प्रशासनिक और सैन्य वंशावली को 96 प्रमुख कुलों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक कुल का अपना एक विशिष्ट देवक (टोटेम या पवित्र प्रतीक, जैसे कोई वृक्ष, पक्षी या हथियार) होता है, जिसका विवाह और मांगलिक कार्यों में विशेष महत्व होता है। चूंकि यह समाज मूलत: कृषि से जुड़ा है, इसलिए बैलों और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मनाया जाने वाला पोला या बैलपोला इनका सबसे प्रमुख और आत्मीय त्योहार है। कुश्ती और पारंपरिक लाठी-काठी के खेल इस समाज के युवाओं की जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं। कोल्हापुर आज भी भारतीय कुश्ती का मक्का माना जाता है, जिसे समृद्ध करने में इसी समाज का सबसे बड़ा योगदान है। स्वतंत्रता के बाद, भारत के भाषाई पुनर्गठन के तहत 1960 में संयुक्त महाराष्ट्र के निर्माण में कुनबी-मराठा समाज ने अग्रणी भूमिका निभाई। यशवंतराव चव्हाण (महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री) के नेतृत्व में इस समाज ने राज्य के विकास का रोडमैप तैयार किया।
आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव
महाराष्ट्र में चीनी मिलों, सहकारी बैंकों और सूती वस्त्र मिलों का एक विशाल नेटवर्क स्थापित करने में कुनबी-मराठा नेताओं ने सफलता हासिल की। इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी। महाराष्ट्र की राजनीति में इस समाज का हमेशा से गहरा प्रभाव रहा है। राज्य के अधिकांश मुख्यमंत्री और ग्रामीण क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि इसी समाज से आते रहे हैं। हालांकि राजनीतिक रूप से यह समाज सुदृढ़ दिखता है, लेकिन जमीनी स्तर पर एक बड़ा विरोधाभास है। पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ समृद्ध घरानों को छोड़ दिया जाए, तो मराठवाड़ा, विदर्भ और कोंकण क्षेत्र का आम कुनबी-मराठा किसान आज भी खेती के संकट, कर्ज और सूखे से जूझ रहा है। इसी आर्थिक असमानता और शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण हाल के वर्षों में पूरे महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन ने जोर पकड़ा है। समाज की मांग है कि जो मराठा परिवार ऐतिहासिक रूप से कृषि कार्य (कुनबी) से जुड़े रहे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, उन्हें कुनबी का प्रमाण पत्र देकर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत आरक्षण का लाभ दिया जाए, ताकि युवा पीढ़ी को शिक्षा और नौकरियों में समान अवसर मिल सकें।
कुनबी (मराठा) जाति का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कोई भी समाज केवल जन्म से नहीं, बल्कि अपने पुरुषार्थ, त्याग और जन-कल्याण की भावना से महान बनता है। सह्याद्रि की कंदराओं से लेकर दिल्ली के लाल किले तक भगवा ध्वज फहराने वाले इस समाज ने हमेशा देश की सीमाओं और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। आज इस गौरवशाली समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोते हुए आधुनिक युग की आवश्यकताओं—जैसे उच्च तकनीकी शिक्षा, उद्यमिता और वैज्ञानिक खेती—को अपनाने की है। इतिहास गवाह है कि जब-जब इस समाज ने अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाया है, तब-तब एक नए युग का सूत्रपात हुआ है। छत्रपति शिवाजी महाराज और राजर्षि शाहूजी महाराज के समतावादी और न्यायपूर्ण विचारों पर चलकर ही यह समाज अपने भविष्य को और अधिक उज्ज्वल बना सकता है।





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