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मल्लाह / माझी / केवट जाति का इतिहास

News

2024-01-12 19:28:54

बनारस नाम सुनते ही गंगा के किनारे घाटों का कई चित्र दिमाग में उभर आता है। बनारस के घाटों की कल्पना के बिना नहीं की जा सकती, वैसे ही घाटों के किनारे बंधी नाव के बिना घाटों की कल्पना नहीं कर सकते हैं। इन नावों से ही लोगों को एक तट से दूसरे तट पहुंचाया जाता है। इन नावों को जो चलाते हैं वे कौन हैं, वे कब से यह काम कर रहे हैं, मजबूत, साहसी, मस्तमौला ये नाविक अपना पूरा जीवन इन नावों के साथ बिता देते हैं। प्राचीन समय में जब परिवहन का कोई साधन नही था नावों की ही सहायता से दूर तक यात्रा संभव हो पाती थी। नाव केवल यात्रा करने के लिए नहीं बल्कि व्यापार और सैन्य सेवाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कल्पना कीजिए कि कोलंबस और वास्कोडिगामा के पास नाव नहीं होती तो क्या होता? तो भारत का दुनिया के दूसरे हिस्से से कभी परिचय नहीं हो पाता। पूरी दुनिया में कई प्रतापी राजा हुए जिन्होंने अपने साम्राज्य को दूर-दूर तक फैलाया बिना जो बिना नावों के असंभव था। एक देश से दूसरे देश तक व्यापार नावों से ही संभव हो पाया। हम कह सकते हैं नावों के बिना मानव और समाज का इतना जल्दी विकास नहीं हो पाता। पूर्व के समाज मे नाव तो खुद चलेगी नहीं इसे चलाने वाला भी तो कोई होना चाहिए। जो साहसी, निडर और कुशल गोताखोर हो वही यह काम कर सकता है। दुनियाभर के इन नाविकों को हम मल्लाह, केवट एवं माझी जैसे नामों से जानते हैं। मल्लाह कोई जाति नहीं बल्कि उन लोगों का समुह है जो नाव चलाने का काम करते हैं। हजारों सालों से नाव चलाना वंशानुगत हो जाने के कारण भारत में मल्लाह जाति बन गई। मल्लाहों को सम्मानित करने के बजाय हम उन्हें छोटी जाति कहकर अपने देश का मजाक बनाते हैं। भले ही आज समाज विकसित हो गया है, यातायात के कई साधन आज उपलब्ध हैं, पर सभ्यता के निर्माण में क्या मल्लाहों के योगदान को भुलाया जा सकता हंै? ये लोग विश्वास करते हैं कि इनके पूर्वज पहले गंगा के तटों पर या वाराणसी अथवा इलाहाबाद में रहते थे। बाद में यह जाति मध्य प्रदेश के शहडोल, रीवा, सतना, पन्ना, छतरपुर और टीकमगढ़ जिÞलों में आकर बस गये। सन 1981 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में माझी समुदाय की कुल जनसंख्या 11,074 है। इनके बोलचाल की भाषा बुन्देली है। ये देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं। ये सर्वाहारी होते हैं तथा मछली, बकरा एवं सुअर का गोश्त खाते हैं। इनका मुख्य भोजन चावल, गेंहु, दाल सरसों तिली महुआ के तेल से बनता है। इनके गोत्र कश्यप, सनवानी, चौधरी, तेलियागाथ, कोलगाथ हैं। मल्लाह भारतवर्ष की यह एक आदिकालीन मछुआरा जाति है। मल्लाह जाति मूल रूप से आज हिन्दू धर्म से सम्बंधित है। यह शिकारी जाति है। यह जाति प्राचीनकाल से जल जंगल और जमीन पर आश्रित है। चूँकि यह जाति मुख्यत: जल से सम्बंधित व्यवसाय कर अपना जीवनयापन करते हैं, इस लिए मल्लाह, ‘मछुआरा’, केवटबिन्द, निषाद आदि नाम से जाना जाता है।

मल्लाह जाति के सरनेम

मल्लाह जाति के लोग अलग-अलग सरनेम /उपनाम लगाते हैं इनमें प्रमुख है मल्लाह, केवट राज, निषाद राज, बिंद, धीवर, साहनी, चौधरी, इत्यादी। उत्तर प्रदेश के लोग निषाद उपनाम का उपयोग ज्यादा करते हैं बिहार में साहनी, निषाद दोनों उपनामों का प्रयोग करते हैं, पंजाब चंडीगढ़, हरियाणा, लुधियाना राजस्थान आदि जगहों पर चौधरी उपनामों से जाने-जाते हैं। छत्तीसगढ़ में इन्हें निषाद, जलछत्री और पार्कर भी कहा जाता है। वहीं असम में इन्हें पहले ‘हलवा केओत’ के नाम से जाना जाता था, लेकिन आजकल वहां इस जाति के लोग खुद को केवट कहते हैं।

कैसे हुई मल्लाह शब्द की उत्पति?

मल्लाह, निषाद शब्द की तुलना में काफी आधुनिक शब्द है। यह एक अरबी शब्द ‘मल्लाह’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘एक पक्षी की तरह अपने पंख को हिलाना’ हालांकि प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम क्रुक के अनुसार यह शब्द विशुद्ध रूप से एक व्यावसायिक शब्द है जिसका उपयोग मुख्य रूप से नौका विहार और मछली पकड़ने के जल केंद्रित व्यवसाय से जुड़े बड़े समुदाय के लिए किया जाता था। अरबी भाषा कि उत्पति लगभग 1500-2000 साल पुराना है तो हम मल्लाह शब्द के उत्पति का यही काल मान सकते हैं। ऐसा संभव है कि अरबी लोगों के दुनिया के दूसरे हिस्से से मेलजोल के कारण ही नाव चलाने वाले लोगों को मल्लाह कहकर बुलाया जाने लगा होगा। ये अलग बात है कि ज्यादातर मल्लाह लोग अपने पुश्तैनी काम को छोड़ चुके हैं। मल्लाह लोग आज हर क्षेत्र जैसे शिक्षा, राजनीति, व्यवसाय में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ये उत्तर भारत, पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर भारत और पाकिस्तान में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। मछुआरा (मछली मारने वाले) वर्ग से मिलती जुलती कुछ जातियां (उपजातियां) है जैसे केवट, चांय, बिंद, जलिया कैबर्ता, ढीमर, माझी इत्यादि। मछुआरों कि ये उपजातियां अब पूरे देश में अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं।

मल्लाह लोगों का शुरूआती जीवनयापन

ऐसा नहीं था की मल्लाह शुरू से ही नाव चलाया करते थे वे लोग नदी के किनारे रहते थे। रेत पर उगने वाले फलों और सब्जियों जैसे तरबुज, ककड़ी, कद्दू इत्यादि की खेती करते थे। इनमें से कुछ लोग मछलियां भी पकड़ते थे और इसलिए इनके पास नाव होता था। वे कभी-कभी कुछ लोगों को नदी भी पार करा दिया करते थे। प्राचीन जमाने में परिवहन साधन की कमी के कारण नाव चलाना उनके लिए काफी फायदे का सौदा बन गया होगा और इस तरह से वे नाविक बन गए। ये कोई अपरिचित जाति नहीं है बल्कि यह परंपरागत रूप से बहादुर जाति है।

डोली उठाने और बुनकरी का काम

नदी के किनारे रहने वाले यह लोग शादियों में डोली उठाने का भी काम भी करते थे उस समय अक्सर डोली लूट ली जाती थी। डोली उठाने के लिए उन्हें कहा जाता था शारीरिक जो सारे रूप से मजबूत और साहसी होते थे। मल्लाहों ने इस काम को बखूबी से किया। 1871 के आसपास दूसरे परिवहनों के आ जाने से और नदियों से जुड़े काम से पैसे कमाने के संसाधनो में कमी हो जाने से मल्लाहों ने बुनकरों का काम भी करना शुरू किया।

बिहार में जुब्बा सहनी इस जाति के आदर्श नायक माने जाते हैं, जिन्होंने संयुक्त बिहार के उत्तर बिहार में अंग्रेजों और सामंतों के खिलाफ बिरसा मुंडा जैसे उलगुलान किया। इसके बावजूद इतिहास के पन्नों में बतौर जाति कुछ खास उल्लेखित नहीं है। यह बात अलग है कि यदि इस जाति के लोगों को अतीत के पन्नों पर लिखने की आजादी होती तो ये अपने बारे में जरूर लिखते। मल्लाहो ने नदियों और समंदरों पर विजय पाई। इन्होंने ही मानव सभ्यता को पूरी दुनिया में विस्तारित किया। लेकिन ये समुदाय संगठित नहीं हैं, क्योंकि इनकी पहचान एक जैसी नहीं है।

बिहार सरकार द्वारा हाल में जारी जाति आधारित गणना रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में मल्लाह जाति के लोगों की आबादी 34 लाख 10 हजार 93 (2.36085 प्रतिशत), केवट जाति की आबादी 9 लाख 37 हजार 861 (0.717 प्रतिशत), कैवर्त जाति की आबादी 2 लाख 65 हजार 943 (0 2034 प्रतिशत) के अलावा बिंद जाति के लोगों की आबादी 12 लाख 85 हजार 358 (0.9833 प्रतिशत) है। इस प्रकार यदि हम इस जाति समूह की संयुक्त आबादी को देखें तो यह योग 58 लाख 99 हजार 255 है। करीब तेरह करोड़ आबादी वाले बिहार में केवट समुदाय की जातियों की कुल आबादी एक बड़ी संख्या है। लेकिन उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी एकदम न्यून है। बिहार सरकार ने मल्लाह, निषाद और नोनिया जाति को अनुसूचित जन जाति में शामिल करने का नीतिगत फैसला कर लिया है। मल्लाह, निषाद (बिंद, बेलदार, चांई, तियर, खुलवट, सुरिहया, गोढी, वनपर व केवट) व नोनिया जाति को इनके आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक व रोजगर में पिछड़ेपन को देखते हुए बिहार की अनुसूचित जन जाति की सूची में शामिल करने की अनुशंसा केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया है।

ये जातियां बेशक अति पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं, लेकिन हकीकत यही है कि ये न केवल सरकारी नौकरियों में बल्कि सियासत में भी हाशिए की शिकार हैं। जबकि इस समूह की कुल आबादी से बहुत कम आबादी वाली राजपूत जाति (कुल आबादी 45 लाख 10 हजार 733) और भूमिहार जाति (कुल आबादी 37 लाख 75 हजार 885) राजनीति में निर्णायक जातियां रही हैं। आज भी आलम यह है कि नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में केवल नाम गिनाने को केवट/मल्लाह जाति के सदस्य शामिल हैं। प्रसिद्ध नृवंशविज्ञानी, रसेल और हिरलाल (भारत के केंद्रीय प्रांतों के जनजाति और जाति, 1916) के अनुसार केवट एक मिश्रित जाति हैं और वे रेखांकित करते हैं और इनका संबंध आर्यों से कभी नहीं रहा। ये तो यहां के मूलनिवासी रहे हैं। एचएच रिज्ले ने अपनी किताब ‘बंगाल के जनजाति और जाति’ (1891) में इसे रेखांकित किया है कि इनका आदिवासियों से रक्त संबंध रहा है। लेकिन मौजूदा दौर में वास्तविकता यह है कि अलग-अलग राज्यों में ये अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं।

अब इस जनजातीय संस्कृति वाले जाति समूह का ब्राह्मणीकरण करने में वर्चस्ववादियों को सफलता मिल चुकी है। इस जाति के अधिसंख्य लोग खुद को आदिवासी नहीं मानते। कहीं-कहीं आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग करते हैं, लेकिन दलित कहलाना पसंद नहीं करते। उत्तर प्रदेश और बिहार में तो इन्हें राम से, त्रिपुरा में शैव परंपरा से जोड़ दिया गया है। जबकि असम में इन्हें वैष्णव संत शंकरादेव का अनुयायी बता दिया है।

वीरेन्द्र मांझी, Uttar Pradesh
छोटी छोटी गलती बहुत है उसे सही करने की जरूरत है
2025-11-04 17:35:35
 
 
Vikram Nishad Raj, Bihar
Nishad जात है और भारतीय संस्कृति पर आधारित हैं और बात पर सहमत हो रहा हो लेकिन इस टी एस पी चिदंबरम पर भी सवाल खड़े कर देने से ही शुरू किया तो वो भी मेरे लिए भी तैयार किया था और भारतीय संस्कृति और बात को स्वीकार नहीं हो पाया जाता था और भारतीय टीम दक्षि
2025-11-04 17:35:26
 
 
निर्मला माझी, Madhya Pradesh
माझी जनजाति एक आदिकालीन मानव सभ्यता की प्राचीनतम सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा कर देखा जाए प्राचीन जनजाति इनका योगदान इतिहास में व्यापार में आर्थिक सामाजिक राजनीतिक रूप में बेखुदी रूप से निभाया है डॉटर साहनी अनुसंधान ने अपने रिसर्च अनुसंधान का
2025-11-04 17:35:17
 
 
Vikash Nishad, Uttar Pradesh
मल्लाह जाति के लोग अच्छा सोभाव के होते हैं अगर आप इनका आदर करेंगे तो आपका साथ जिन्दगी भर याद रखते है ऐ लोग किसी प्रकार का दूसरे जाति के लोग से विरोध नही करते निषाद समाज के साथ जो दुष्टता कर्ता है उसे हम कठोर दंडित करते हैं जो की उसे याद रहे
2025-11-04 17:34:43
 
 
Uu, Delhi
Urhauququw
2025-11-04 17:34:40
 
 
Arjunnishadraj, Punjab
1111111111222222222233333333334444444444555555555566666666667777777777777778888998888888888899999999999998855444880000000888857777799999999666666666666555554444444444455580000000099999
2025-11-04 17:34:33
 
 
Abhishek Kumar vind, Uttar Pradesh
My category is best
2025-11-04 17:34:25
 
 
Rabindra sahani, Bihar
Good
2025-11-04 17:34:17
 
 
Manoj kumar mukhiya, Bihar
Sache he
2025-11-04 17:34:05
 
 
Amit batham, Madhya Pradesh
Jay kewat raj jay Nishad raj
2025-11-04 17:33:56
 
 
Annu kashyap, Uttar Pradesh
250
2025-11-04 17:32:26
 
 
Annu, Uttar Pradesh
20
2025-11-04 17:32:24
 
 
Annu kashyap, Uttar Pradesh
Please send short vedio voice over option
2025-11-04 17:32:20
 
 
Omprakash S Bone, Maharashtra
मुझे इनकी वंशावली का आलेख चाहिए
2025-11-04 17:32:12
 
 
Hemant kewat, Rajasthan
Daima kis parkar ki ki jati me aate hai
2025-11-04 17:32:09
 
 
Ram nishad, Chattisgarh
Nishad raj
2025-11-04 17:31:47
 
 
Hiren jolchatry, Assam
Jolchatry mera surname hai kya koi mera surname ka koi hai please comment
2025-11-04 17:31:31
 
 
Rajeev kumar, Uttar Pradesh
Name rajeev kumar kashyap distic pilibhit
2025-11-04 17:31:27
 
 
Rajee, Uttar Pradesh
Rajeev Kumar kashayp distic pilibhit is parti me agr ak smnnta he to Mera spot he
2025-11-04 17:31:25
 
 
RAMOJ NISHAD, Bihar
NISHAD Raj
2025-11-04 17:31:09
 
 
Imran, Uttar Pradesh
Mallah jaati ka name itihaas mai hona chahiyeAnd government services milni chahiye
2025-11-24 16:29:11
 
 
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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05