




2026-06-21 18:35:22
डॉ. भीमराव आंबेडकर को आमतौर पर स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माता, महान समाज सुधारक और दलितों-शोषितों के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। लेकिन इतिहास के पन्नों में उनकी एक और बेहद शानदार और प्रखर छवि दर्ज है—एक अत्यंत कुशल, दूरदर्शी और संवेदनशील बैरिस्टर (वकील) की। लंदन के प्रसिद्ध ग्रेज इन से कानून की मानद उपाधि लेने वाले बैरिस्टर भीमराव आंबेडकर ने अपने पूरे कानूनी करियर में कभी भी अमीरों के बड़े और मुनाफे वाले मुकदमे लड़ने को प्राथमिकता नहीं दी। इसके विपरीत, उन्होंने अपना कानून ज्ञान उन गरीबों, मजदूरों और वंचितों के लिए हथियार बनाया, जिन्हें व्यवस्था और समाज ने बेसहारा छोड़ दिया था। उनके कानूनी करियर का सबसे चमकदार और ऐतिहासिक अध्याय वह मुकदमा है, जिसमें उन्होंने अपनी विलक्षण तार्किक क्षमता के बल पर 47 गरीब लोगों को सीधे फाँसी के फंदे से खींच लिया था।
यह घटना उस दौर की है जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत थी और जमींदारी प्रथा अपने चरम पर थी। ग्रामीण भारत में गरीब किसानों, खेतिहर मजदूरों और शोषित वर्ग पर सामंतों व ऊंची जातियों के जुल्म आम बात थे। ऐसे ही एक सामाजिक टकराव और संघर्ष के दौरान एक हिंसक घटना घटित हुई, जिसमें कुछ रसूखदार लोगों या ब्रिटिश अधिकारियों की जान चली गई। तत्कालीन दमनकारी व्यवस्था और पुलिस ने आनन-फानन में स्थानीय गरीब मजदूरों और पिछड़ें वर्ग के लोगों को निशाना बनाया। बिना किसी पुख्ता जांच के, केवल संदेह और गवाहों को डरा-धमकाकर 47 गरीब लोगों को मुख्य आरोपी बना दिया गया। स्थानीय सत्र न्यायालय में जब यह मामला चला, तो गरीबों के पास न तो अच्छे वकील करने के पैसे थे और न ही सामंतों के खिलाफ गवाही देने की किसी में हिम्मत थी। नतीजा यह हुआ कि निचली अदालत ने कानून की तमाम बारीकियों को दरकिनार करते हुए सभी 47 आरोपियों को एक साथ फाँसी की सजा सुना दी। एक साथ 47 लोगों को फाँसी की सजा सुनाए जाने से उन गरीब बस्तियों में मातम छा गया। 47 परिवारों का चूल्हा बुझने की कगार पर था। उनके पास ऊपरी अदालत में अपील करने की न तो समझ थी और न ही आर्थिक हैसियत। जब इस दर्दनाक फैसले की खबर मुंबई में डॉ. भीमराव आंबेडकर तक पहुँची, तो उनका संवेदनशील दिल दहल उठा। वे अच्छी तरह जानते थे कि यदि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो न्याय की आड़ में 47 बेकसूरों की सामूहिक हत्या कर दी जाएगी। डॉ. आंबेडकर ने बिना कोई फीस लिए इस बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण केस की पैरवी करने का फैसला किया। जब वे इस केस की अपील लेकर बंबई उच्च न्यायालय पहुंचे, तो कानूनी गलियारों में हलचल मच गई। सरकारी पक्ष के पास असीमित संसाधन थे और निचली अदालत का फैसला उनके पक्ष में था, इसलिए बाबासाहेब के सामने चुनौती पहाड़ जैसी थी।
अदालत में बाबासाहेब की ऐतिहासिक दलीलें: उच्च न्यायालय के खचाखच भरे कोर्ट रूम में जब सुनवाई शुरू हुई, तो डॉ. आंबेडकर ने अदालत के सामने भावुक भाषण देने के बजाय ठोस कानूनी तथ्यों, गवाहों के विरोधाभासों और फोरेंसिक कमियों को ढाल बनाया। उन्होंने एक-एक करके अभियोजन पक्ष के झूठ के पुलिंदे को बिखेरना शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने सभी 47 लोगों को एक ही लाठी से हांकते हुए फाँसी की सजा दे दी थी। बाबासाहेब ने अदालत के सामने तर्क दिया कि आपराधिक कानून में व्यक्तिगत दोष तय होना अनिवार्य है। यदि कहीं कोई भीड़ इकट्ठी हुई थी, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का इरादा हत्या करना ही था। उन्होंने पूछा कि अदालत ने यह कैसे तय किया कि किस व्यक्ति के प्रहार से मृत्यु हुई? बाबासाहेब ने निचली अदालत के रिकॉर्ड्स का गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने उच्च न्यायालय के जजों के सामने साबित कर दिया कि पुलिस द्वारा पेश किए गए चश्मदीद गवाह पूरी तरह से प्रायोजित और झूठे थे। उन्होंने जजों को दिखाया कि कैसे अलग-अलग गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास था, जिससे यह साफ था कि उन्हें डरा-धमकाकर या लालच देकर गवाही दिलवाई गई थी। डॉ. आंबेडकर ने दलील दी कि किसी को फाँसी देने के लिए साक्ष्य संदेह से परे होने चाहिए। केवल घटनास्थल के आस-पास मौजूद होने या शोषकों के खिलाफ गुस्सा होने मात्र से किसी को हत्यारा नहीं माना जा सकता। न्याय का मूल सिद्धांत यह कहता है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं, लेकिन किसी एक भी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। यहाँ तो 47 ऐसे लोगों की जिंदगी का सवाल है जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं और अपनी बेगुनाही साबित करने की क्षमता भी नहीं रखते।
जब जजों को झुकना पड़ा: कई दिनों तक चली तीखी बहस और डॉ. आंबेडकर की कुशाग्र बुद्धिमत्ता व अकाट्य तर्कों के सामने ब्रिटिश जज भी निरुत्तर हो गए। बाबासाहेब ने कानून की किताबों से ऐसे-ऐसे पुराने फैसलों का हवाला दिया कि अदालत के पास निचली अदालत के फैसले को पलटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। बंबई उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी 47 गरीबों की फाँसी की सजा पर तुरंत रोक लगा दी। अदालत ने पाया कि इनमें से अधिकांश लोगों के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे। कई लोगों को पूरी तरह से बरी कर दिया गया और कुछ की सजा को बेहद कम करके उन्हें रिहा करने के आदेश दिए गए। जब यह फैसला आया, तो अदालत परिसर के बाहर खड़े हजारों गरीबों की आंखों से आंसू छलक पड़े। 47 परिवारों को उनके बेटे, पति और पिता वापस मिल चुके थे। यह भारतीय न्यायिक इतिहास में किसी भी भारतीय बैरिस्टर द्वारा जीती गई सबसे बड़ी और अभूतपूर्व जीतों में से एक थी।
इस फैसले ने यह स्थापित किया कि कानून किसी के सामाजिक रुतबे या गरीबी को देखकर काम नहीं कर सकता। अगर सही पैरवी मिले, तो गरीब से गरीब व्यक्ति भी न्याय पा सकता है। बाबासाहेब व्यक्तिगत रूप से भी मृत्युदंड के खिलाफ थे। उनका मानना था कि न्याय का मकसद अपराधी को सुधारना होना चाहिए, न कि उसका जीवन छीनना। इस केस के जरिए उन्होंने दिखा दिया कि कैसे जल्दबाजी में दिए गए फाँसी के फैसले कितने खतरनाक हो सकते हैं। इस ऐतिहासिक जीत ने देश भर के दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे अब असहाय नहीं हैं। उनके पास बाबासाहेब के रूप में एक ऐसा मसीहा है जो कलम और कानून की ताकत से बड़े से बड़े साम्राज्य को झुका सकता है।
आज जब हम डॉ. आंबेडकर के योगदानों का मूल्यांकन करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि संविधान में जो समानता और जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21) उन्होंने जोड़ा, उसे उन्होंने संविधान लिखने से पहले देश की अदालतों में लड़कर और जीतकर दिखाया था। 47 गरीबों को फाँसी के फंदे से बचाने वाला यह ऐतिहासिक मुकदमा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि बाबासाहेब का ज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह जमीन पर तड़पते हुए इंसानों के घावों पर मरहम लगाने की अद्भुत ताकत रखता था। यही कारण है कि वे आज भी करोड़ो दिलों पर राज करते हैं।





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