




2026-06-21 19:14:31
बहुजन समाज का मलतब है दलित, शोषित, वंचित, अत्यंत पिछड़ी जातियाँ व धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका नागरिक और उसकी चेतना होती है, भारत जैसे विविधता से भरे देश में, जहां सदियों से समाज में असमानता की गहरी खाई रही है, वहाँ हाशिये पर पड़े ऐसे समाज को बहुजन समाज से संदर्भित किया जा सकता है। बहुजन समाज का राजनैतिक और सामाजिक उत्थान भारतीय लोकतंत्र की एक ऐतिहासिक यात्रा है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, ज्योतिराव फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, संत गाडगे, नारायण गुरु, पेरियार, और मान्यवर साहेब कांशीराम जैसे महापुरुषों ने इस समाज को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया और सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया। लेकिन आज 21वीं सदी के दौर में जब हम चारों तरफ देखते हैं, तो एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि क्या बहुजन समाज अपने बुनियादी मुद्दों पर केन्द्रित है या वह अंजाने में उन बहसों का हिस्सा बन रहा है जो उसके अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई को कमजोर करते हैं?
आज मुख्यधारा की राजनीति ‘हिंदू-मुसलमान’ के कृत्रिम और प्रायोजित मुद्दों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है। समाज में यह प्रक्रिया स्वत: ही घटित नहीं हो रही है यह मनुवादी-संघियों के षड्यंत्र के तहत प्रायोजित करके न दिखने वाला कार्यक्रम है जो जनता के मन और मस्तिस्क में उनकी बिना जानकारी के घुसेड़ा जा रहा है। इस प्रक्रिया से समाज में बड़े पैमाने पर जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की गति तेज हो रही है और इसे प्रायोजित करने वाले मनुवादी संघी लोगों को इस प्रक्रिया से अपेक्षित लाभ भी मिल रहा है। यह ध्रुवीकरण न केवल देश के सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुंचाता हैं, बल्कि बहुजन समाज के वास्तविक एजेंडे को भी मुख्यधारा से पूरी तरह गायब कर देता है। अब समय आ गया है जब समाज को गहराई से आत्मनिरीक्षण, विचार-विमर्श और चिंतन करना होगा कि उसकी असली जरूरतें, असली मुद्दे क्या हैं और उसका कीमती वोट किसे और क्यों जाना चाहिए?
ध्रुवीकरण की राजनीति: जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं राजनीतिक परिदृश्य पर भावनात्मक और धार्मिक मुद्दों की बाढ़ आ जाती है। टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया के एल्गोरिदम तक, हर जगह एक खास नरेटिव सैट किया जाता है, बहुजन समाज के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि यह कोई आकस्मिक और प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक सोची समझी षड्यंत्रकारी राजनीति है। संघी-मनुवादी लोग अतीत से ही इस रणनीति में माहिर है जब देश में मुगलों का शासन था तब यही लोग मुगलों की गुलामी कर रहे थे और उससे भरपूर फायदा उठा रहे थे। फायदे के साथ-साथ ये मनुवादी-संघी मानसिकता के लोग मुगल शासकों से अपनी बहन-बेटियों के रिश्ते करके उनसे संबंध भी बना रहे थे। यह सब तथ्यात्मक इतिहास है जिसे नकारा नहीं जा सकता। मुगल शासन के बाद देश पर ब्रिटिश हुकूमत का शासन आया तब भी यही लोग ब्रिटिश हुकूमत की चमचागिरि करके उनकी गुलामी कर रहे थे और देश की खुफिया जानकरी ब्रिटिश शासन को मुहैया करा रहे थे। संघी-मनुवादियों की वास्तविक रणनीति को देखकर यह लगता है कि इन्होंने कभी भी देशहित में काम नहीं किया। इन्होंने हमेशा अपने मनुवादी और ब्राह्मणवादी स्वार्थ के लिए काम किया। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी जब समाज के सभी समुदायों के लोग आजादी की लड़ाई मिलकर लड़ रहे थे तब भी ये लोग अंग्रेजों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की मुकबरी करके उनकी सटीक जानकारी अंग्रेजी शासन को दे रहे थे। ऐतिहासिक रूप से इनका हमेशा सिर्फ एक ही एजेंडा रहा है कि देश को चाहे कितना भी नुकसान हो जाये इनको सत्ता की मलाई चाटने को मिलती रहे। मनुवादी-संघियों की मानसिकता हमेशा देश और मानवता विरोधी रही है। ये ब्राह्मणवाद के वर्चस्व की बात करते हैं आम जनता से इन्हें कोई लेना देना नहीं होता। ये हमेशा समाज में तोड़-फोड़ की राजनीति व जाति और धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करके सत्ता को हड़पने की साजिश रचते रहते हैं।
मुद्दों का भटकाव: मनुवादी संघी लोग समाज से जुड़े मुद्दों की राजनीति कभी नहीं करते, वे हमेशा समाज को मुद्दों से भटकाकर छलावामयी राजनीति की तरफ धकेलते हैं और समाज के असली मुद्दे इसी रस्साकशी में गायब हो जाते हैं। जब राजनीति धर्म, मंदिर-मस्जिद और सांप्रदायिक तनाव के इर्द-गिर्द घूमती है तो शिक्षा, स्वस्थ्य, रोजगार, भूमि सुधार और जातिगत भेदभाव जैसे बुनियादी मुद्दों पर कोई बात नहीं करता। मनुवादी-संघियों में महारथ है चूंकि वे शासक वर्ग का अंग है इसलिए अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए धार्मिक उन्माद को ढाल बना लेते हैं। पिछले 12 वर्षों से देश में संघी मनुवादी वर्चस्व चल रहा है, मोदी की हर नीति और घोषणाएँ उसके झुठ और विफलताओं को बयां करते हैं। पिछले 12 वर्षों के दौरान मोदी-संघी वर्चस्व ने इस देश को विकास के हर क्षेत्र में रसातल पर पहुंचा दिया है। पड़ोसी देश भी भारत की तुलना में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। मोदी के अंधभक्त झूठे प्रचार के दम पर मोदी को विश्व गुरु बनाने की चेष्टा कर रहे है, जो पूर्णतया निरर्थक और बेमानी है। मोदी किसी भी क्षेत्र में दमदार व्यक्तित्व के व्यक्ति नहीं है। वे एक नौटंकीबाज, छलावामयी प्रवृति और झूठ बोलने के क्षेत्र में माहिर हंै। शायद इसी के कारण देश का मनुवादी संघी समुदाय उसको अपने अंतिम लक्ष्य के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी: संविधान ने बहुजन समाज को जो अधिकार दिये हैं जैसे आरक्षण, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा, उनपर तार्किक चर्चा करने की बजाय समाज को दो बड़े धार्मिक खेमों में बाँट दिया जाता है जिसका नतीजा यह होता है कि शोषित वर्ग अपने असली शोषक को पहचान नहीं पाता और वह अपने शोषक को ही अपना नेता समझने लगता है। मनुवादी संघियों का मूल चरित्र यह है कि बहुजन समाज का नुकसान कराने के लिए बहुजन समाज से छाँटे गए मानसिक गुलामों को ही प्रतिनिधित्व सौंपो और उन्हीं से बहुजन समाज का अधिक से अधिक नुकसान कराओ। उदाहरण के तौर पर देश की संसद में एससी/एसटी वर्ग से 131 सांसद चुनकर आए हैं जिनमें अधिकांशतया मनुवादी भाजपा संघी संस्कृति से ही जीतकर आए हैं जो संसद में बैठकर लगातार ब्राह्मणवाद और संघी रणनीति को मजबूत कर रहे हैं। वर्तमान समय में देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी है जिन्हें उस समाज की भी चिंता नहीं जिस समाज से वे आती है, बल्कि वे मनुवादी छलावे में फँसकर मंदिर-मंदिर घूम रही है। मंदिरों से बहुजन समाज (एससी/एसटी) का क्या भला होने वाला है और क्या भला आजतक हुआ है ये सबको मालूम है? इनसे पहले रामनाथ कोविद जी भी मनुवादी संस्कृति को ही मजबूत कर रहे थे, उन्होंने भी संविधान में बहुजन समाज को दिये गए अधिकारों के बारे में न कोई बात की और न चिंता जाहीर की, वे भी मंदिर-मंदिर घूमकर मनुवादी संस्कृति को ही मजबूत कर रहे थे।
वोट बैंक का भावनात्मक इस्तेमाल: भावनात्मक मुद्दों पर वोट देने का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक दल जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि अलगी बार फिर किसी अन्य भावनात्मक मुद्दे को हवा देकर वोट हासिल किया जा सकता है। जब तक भारत का नागरिक राजनीतिक रूप से सचेत और जागरूक नहीं होगा तब तक चालाक प्रवृति के ब्राह्मणवादी संघी लोग आपकी भावनाओं का इस्तेमाल करके सत्ता हासिल करते रहेंगे और आपका समाज वहीं का वहीं खड़ा रह जाएगा। यह कितनी विचित्र बात है कि भारत का आम नागरिक अपने आपको हिंदू समझकर भावनात्मक तरीके से उन्मादित हो जाता है जबकि उसे यही पता नहीं है कि भारत का बहुजन समाज का कोई भी व्यक्ति हिंदू नहीं है वह एक अति विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा है। इस तथ्य को बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 1930-31 में हुई गोलमेज सभा के दौरान पूर्णरूप से स्पष्ट कर दिया था। परंतु बाबा साहेब की यह तथ्यामक बात बहुजन समाज के व्यक्तियों को न आजतक समझ में आई है और न समझ में आने वाली है। चूंकि वे मानसिक रुप से मनुवादी संस्कृति के गहराई तक गुलाम बन चुके हैं।
बहुजन समाज के असली मुद्दे: बहुजन समाज को किसी भी राजनैतिक बहकावे में आने से पहले अपने घर, अपनी बस्ती और अपने बच्चों के भविष्य की ओर देखना होगा। समाज को एकता के साथ संगठित होकर समाज से जुड़े मुद्दों पर गभीर मंथन और जन आंदोलन खड़ा करने की आवश्यकता है:
गुणवत्ता पूर्ण सस्ती शिक्षा: बाबा साहेब ने कहा था, ‘शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा।’ लेकिन आज मनुवादी संघी शासन में शिक्षा का जिस तेजी से निजीकरण किया जा रहा है, उसने बहुजन समाज के गरीब बच्चों को शिक्षा की रेस (दौड़) से बाहर कर दिया है। सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की स्थिति जर-जर की जा रही है, हर सरकारी संस्थान और विश्वविद्यालयों में संघी वर्चस्व वाले मानसिकता के व्यक्ति को बैठा दिया गया है जिनके द्वारा इन सभी शिक्षण संस्थाओं को कमजोर और दिशाहीन बनाया जा रहा है। समाज को सोचना होगा कि बिना बेहतरीन और सस्ती शिक्षा के उनकी आने वाली पीढ़ियाँ ब्राह्मणवादी संघियों का कैसा मुकाबला करेंगी? इस समस्या पर बहुजन समाज के किसी भी व्यक्ति का न ध्यान है और न इसका मुकाबला करने के लिए उनके पास कोई रणनीति है। मोदी संघी शासन ने अपने 12 वर्षों में 93 हजार सरकारी स्कूल बंद कर दिये हैं। जिसका सीधा सा अर्थ है कि सरकारी स्कूलों में ही बहुजन समाज के बच्चे शिक्षा के लिए जाते थे अब सरकारी स्कूल बंद करने से सरकारी स्कूलों की दूरी 2-4 किलोंमीटर तक बढ़ चुकी है जो बहुजन समाज को छिपे ढंग से शिक्षा से वंचित करने का छिपा षड्यंत्र है।
रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता: वर्तमान मनुवादी संघी सरकार लगातार सरकारी नौकरियाँ कम कर रही है, जिससे आरक्षण का दायरा और उसका लाभ भी सिकुड़ रहा है। ऐसे में बहुजन समाज के युवाओं को ऐसी स्थिति को समझकर केवल नौकरियों के भरोसे रहने के बजाय अपने बिजनेस, स्टार्टअप, डिजिटल स्किल्स और आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में आगे बढ़ना होगा। बहुजन समाज को अपने दम पर आर्थिक रूप से इतना सक्षम बना होगा कि हम नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने वाले बन सके। बहुजन समाज को अपने गली-मौहल्ले और बस्तियों में अपनी दुकाने और बाजार खोलने होंगे और साथ में यह संकल्प भी लेना होगा कि वे सभी अपने समाज की दुकानों से ही रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीदेंगे और समाज को अपने बैंकों का भी निर्माण करना होगा, ब्राह्मण-बनियों के बैंकों में पैसा जमा करने से परहेज करना होगा।
सामाजिक सुरक्षा और मान-सम्मान: देश के ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों में आज भी जातिगत उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार और हाथ से मैला उठाने जैसी कुप्रथाओं मौजूद है। समाज इन समस्याओं का समाधान अपने आपको किसी धार्मिक नफरत का हिस्सा बनाने से नहीं कर सकता, बल्कि संवैधानिक और कानूनी जागरूकता बढ़ाने तथा आपस में भाईचारा मजबूत करने से होगा।
सामाजिक और राजनैतिक संगठनों की जिम्मेदारी और जवाबदेही: किसी भी समाज को दिशा दिखाने और उसकी चेतना को जीवित रखने का काम उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन करते हैं। लेकिन वर्तमान में बहुजन आंदोलनों से जुड़े कई संगठनों में एक अजीब सा बिखराव और भटकाव देखने को मिल रहा है। बहुजन समाज के कथित सामाजिक संगठन केवल बरसाती मेंढक की तरह चुनावी मौसम में ही सक्रिय होते हैं, जो कुछ व्यक्तिगत स्वार्थों और पदों की वेदी पर समाज के सामूहिक हितों की बलि चढ़ा देते हैं। उदाहरण के तौर पर पुरानी संसद के प्रांगण से बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा को छलावामयी तरीके से संघी रणनीति के तहत हटाया गया। इस मुद्दे को लेकर बहुजन समाज में काफी रोष उमड़ा और जनता ने इस संघर्ष से जुड़े नेताओं को अपना हर प्रकार का समर्थन भी दिया था लेकिन जिन सामाजिक संगठनों के नेताओं के हाथों में यह संघर्ष शुरू हुआ था, उन्होंने इस संघर्ष को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के तहत अपने मनुवादी संघी आकाओं को बेंच दिया। सामाजिक संगठनों की ऐसी कार्यशैली से समाज का भरोसा टूटता है और समाज के संगठन कमजोर होते हैं। सामाजिक संगठनों के संचालकों को ऐसी हरकतों से बाज आना चाहिए। अगर उन्हें अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए समाज की शक्ति का इस्तेमाल करना हो तो हमारा निवेदन है सामाजिक संगठनों से न जुड़े और समाज को धोखा न दें।
जमीनी स्तर पर सक्रियता: संगठनों का काम सिर्फ रैलियाँ करना या मंचों से सिर्फ भावुक भाषण देना नहीं होना चाहिए। उन्हें गांवों और मौहल्लों में जाकर लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं जैसे राशन, शिक्षा, स्वस्थ्य, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के समाधान के लिए काम करना होगा।
वैचारिक और बौद्धिक प्रशिक्षण: समाज के युवाओं को अपने महापुरुषों की सही और वैज्ञानिक विचारधारा से अवगत कराना होगा। उन्हें यह सीखना होगा कि फुले-अम्बेडकर का रास्ता किसी से नफरत करने का नहीं, बल्कि तर्क, विज्ञान, मानवता और समता का रास्ता था।
वैकल्पिक संस्थानों का निर्माण: हमें मनुवादी संघियों की सरकारों के भरोसे रहने के साथ-साथ अपने स्तर पर भी पुस्तकालय, कोचिंग सेंटर, छोटे उद्योग स्थापित करने होंगे। ताकि समाज के कमजोर बच्चों को शैक्षिक और आर्थिक संबल मिल सके।
जागरूक मतदाता बनें: लोकतंत्र में वोट का अधिकार एक ऐसा अचूक हथियार है जो बिना किसी खून खराबे के पूरी व्यवस्था को बदल सकता है। यह वोट किसी नेता या राजनीतिक दल पर कोई एहसान नहीं है बल्कि यह आपके और आपके बच्चों के आने वाले 5 वर्षों का भविष्य तय करने वाला सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसलिए वोट देते समय आपकी बौद्धिक चेतना का स्तर सर्वोच्च होना चाहिए।
धार्मिक और भावनात्मक नारों को नकारे: जो भी पार्टी या नेता आपके पास वोट मांगने आए और केवल हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, जातिगत नफरत या सांप्रदायिक मुद्दों की बातें करे, उससे सीधे और तीखे सवाल पूछे कि पिछले 5 वर्षों में आपने हमारे बच्चों के लिए क्या किया? युवाओं के रोजगार के लिए आपके पास क्या रोडमैप है? स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आपके आप क्या योजना है? नफरत फैलाने से देश कितना संगठित और मजबूत हुआ है आपके पास उसका तथ्यात्मक आंकड़ा क्या है?
काम और योग्यता के आधार पर मूल्यांकन: वोट हमेशा प्रत्याशी की व्यक्तिगत योग्यता, उसकी साफ-सुथरी छवि जनहित के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को देखकर ही अपना वोट दें।
बिकने से बचे: चुनाव के समय बांटी जाने वाली शराब, पैसे, साड़ियाँ या अन्य छोटे मौटे उपहारों के बदले अपना और बच्चों का 5 साल का भविष्य और आत्मसामान दांव पर न लगाएं। बिकाऊ मतदाता किसी भी मजबूत शासक या पारदर्शी व्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकता।
बहुजन समाज का इतिहास केवल उत्पीड़न का इतिहास नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गौरवशाली संघर्ष और पुनर्जागरण का इतिहास है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो मानवीय व संवैधानिक अधिकार हमें आज प्राप्त है, वे किसी भी राजनैतिक दल ने हमें तोहफे में नहीं दिये हैं; बल्कि वे हमारे महापुरुषों के अथक संघर्षों और कुर्बानियों के बाद हासिल हुए हैं। यदि आज हम ‘हिंदू-मुसलमान’ के कृत्रिम और थोपे गए विवादों में उलझकर अपनी ऊर्जा, समय और बौद्धिक क्षमता को नष्ट करेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक कमजोर, असुरक्षित और दिशाहीन समाज सौंपकर जाएंगे। समाज के पढ़े-लिखे तबके, शिक्षकों, कर्मकारियों, लेखकों और युवाओं की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे मनुवादी संघियों के नरेटिव में न फंसे, वे उनके द्वारा छलावामयी नरेटिव को बदलें। धार्मिक उन्माद और ध्रुवीकरण की राजनीति को सिरे से खारिज करें। बहुजन समाज से आग्रह है कि वे एक ऐसे समाज के निर्माण की और कदम बढ़ाए जो शिक्षित हो, संगठित हो, और अपने अधिकारों और आत्मसामान के लिए पूरी तरह से सचेत हो। जब बहुजन समाज जागरूक होकर विकास, शिक्षा और रोजगार पर वोट देना शुरू कर देगा तो नफरत की राजनीति करने वाले दल खुद-ब-खुद अप्रासांगिक हो जाएँगे। यही बहुजन समाज के महापुरुषों के सपनों का भारत होगा।





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