




2026-03-14 17:04:57
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां पर प्रत्येक व्यस्क नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनता है और सरकार बनाने के लिए जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सरकार का निर्माण करते हैं। लोकतंत्र का अर्थ है-जनता का शासन, जनता के लिए। भारतीय संविधान में जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिनिधि का चुनाव आमतौर पर पाँच वर्ष की समयावधि पर होता है, परंतु कभी-कभी जरूरत पड़ने पर मध्यावती चुनाव भी कराने पड़ते हैं।
बहुजन समाज अपना मत किसे दे? मतदान का अधिकार देश के नागरिकों को आसानी से प्राप्त नहीं हुआ। जब देश की संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हो रही थी, तो देश के कई लोगों का ऐसा मत था कि मतदान का अधिकार केवल ‘स्नातक’ तक शिक्षित व्यक्तियों को ही दिया जाए; कुछेक अन्य का मत था कि मतदान का अधिकार ‘आयकर’ देने वाले व्यक्तियों को ही दिया जाये; कुछ अन्य का ये भी मत था कि मतदान का अधिकार ‘संपत्ति’ के आधार पर दिया जाये। सोचो अगर इस तरह की धारणा के आधार पर मतदान का अधिकार मिलता तो बहुजन समाज का मतदाता आज कहाँ खड़ा होता?
संविधान सभा के अध्यक्ष बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने उपरोक्त मतों पर संविधान सभा के सदस्यों के सामने तथ्यात्मक और तार्किक तरीके से जवाब दिया और उन्हें समझाया कि अगर हम मतदान करने का अधिकार शिक्षित वर्ग, टैक्स दाता और संपत्ति दाता को देते हैं, तो देश की आधी से अधिक जनता (बहुजन समाज) मतदान के अधिकार से बाहर हो जाएगी और फिर लोकतन्त्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। बहुजन समाज (एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग की अत्यंत पिछड़ी जातियाँ) मतदान देने के अधिकार से वंचित हो जाएगी, और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था विफल हो जाएगी। इसलिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने बौद्धिक तर्कों से संविधान सभा के सदस्यों को सहमत कराया कि मतदान देने का अधिकार देश के प्रत्येक व्यस्क नागरिक को होना चाहिए। जिसमें किसी के साथ जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव न किया जाए। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तावित प्रावधान को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से पारित किया, जो आज भारत के संविधान में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। जिसके तहत भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित हो रही है।
फर्जी लोकतंत्र को फांसीवादी सत्ता से करो मुक्त: वर्तमान लोकतंत्र आज फांसीवादी विचारधारा को देश में मजबूत कर रहा है, जिसके कारण बहुजन समाज के लिए आज न रोजगार है, न उत्कृष्ट श्रेणी की शिक्षा है, और न ही स्वास्थ्य के अच्छे संसाधन है। बहुजन समाज को आज सबसे पहले जरूरत है कि वे अपने समाज को एकत्र करे, संगठित करे और अपने महापुरुषों के बताए गए मार्ग को आत्मसात करके उसके अनुसार आचरण कराने का संकल्प ले। आज बहुजन समाज के नेताओं को इस बात की ज्यादा आवश्यकता है कि वे ब्राह्मणवादी नीतियों के शिकार न हो, उनके षड्यंत्र को समझे, चुनाव छोटा हो या बड़ा, सभी में कथित सवर्ण समाज के लठैत प्रतिनिधियों को वोट न देने का संकल्प लें। अगर बहुजन समाज मनुवादी और फांसीवादी विचारधारा से मुक्त होना चाहता है तो सबसे पहले बहुजन समाज की जनता द्वारा मनुवादी-फांसीवादी सत्ता को इस देश से मुक्त करना होगा।
जनता को काम चाहिए घोखली घोषणाएँ नहीं: मनुवादी संघी सरकारों में घोषणाओं की अधिक भरमार है, काम नदारद है, महंगाई चरम पर है, बेरोजगारी सभी सीमाएं पार कर चुकी है, मनुवादी संघी सरकारें अपने अंधभक्तों द्वारा मचाए गए शोर से सभी की आवाज दबा देना चाहते हैं, लोकतंत्र में ऐसी सरकार देश को नहीं चाहिए।
बुलडोजर सरकार नहीं, समावेशी सरकार चाहिए: भारत के उच्च और उच्चतम न्यायालय बार-बार यह कह चुके हैं कि किसी का घर बिना पर्याप्त समय का नोटिस दिये बुलडोजर से ध्वस्त नहीं करना चाहिए। लेकिन न्यायपालिका के निर्देशों के बावजूद भी मनुवादी संघी मानसिकता की सरकारें न्यायिक आदेशों का पालन न करके इन सभी संवैधानिक अदालतों का अपमान कर रही है। देश की जनता न्यायपालिका से पूछना चाहती है कि यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जो मनुवादी आक्रोश और उत्पात सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को दिखाने की कोशिश की गयी है, उसे शायद संघी मानसिकता की सरकारों का ही समर्थन था, उच्चतम न्यायालय ने उस पर तुरंत स्वत: संज्ञान लेते हुए रोक लगाने की घोषणा कर दी थी। उच्चतम न्यायालय से इस देश की जनता न्याय के दृष्टिकोण से जानना चाहती है कि हाल ही में उत्तम नगर दिल्ली में जो घटना घाटी उसे लेकर दिल्ली की सत्ता में बैठी रेखा गुप्ता की संघी सरकार ने उसे हवा देकर शहर भर में आग लगाने का काम किया। वह सब संवैधानिक अदालतों को दिखाई नहीं देता और सरकारों की ऐसी हरकतों पर वह स्वत: संज्ञान लें और शहर में आग लगाने वाले संघी नेताओं के खिलाफ सक्त से सक्त कार्यवाही करके उन्हें जेल में डाले। वैसे तो देश की जनता भी जानती है कि न्यायालयों में बैठे न्यायाधीश भी संघी मानसिकता से ही संक्रमित हंै, उनसे न्याय की आशा करना बेमानी ही होगा। परंतु फिर भी बहुजन समाज का संवैधानिक न्यायालयों से आग्रह है कि वे जनता के अधिकारों की रक्षा करें और संघी-मनुवादी मवालियों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही करें।
बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों से निवेदन है कि वे जातिवादी मानसिकता को त्यागकर अपना अमूल्य वोट उस व्यक्ति को दे, जो मन और मस्तिष्क से ईमानदार हो, जातिवादी न हो, ब्राह्मणवादी न हो, जो समता, मानवता, बंधुत्व में विश्वास रखता हो, उसके मन और मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव न हो, साथ ही वह व्यक्ति उत्कृष्ट श्रेणी का ईमानदार व स्पष्टवादी हो। जो बहुजन समाज के महानायकों जैसे बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, संत कबीर, संत रविदास, पेरियार, मान्यवर साहेब कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधारा में अटूट विश्वास रखता हो। वैश्य समाज का कोई भी व्यक्ति अच्छा शासक नहीं बन सकता जो आज सभी को दिख रहा है।





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