




2026-03-07 15:33:40
भारत एक लोकतांत्रिक (Democratic Country) देश है, जहां पर व्यस्क नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनता है और सरकार बनाने के लिए जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सरकार निर्माण में शामिल होते हैं। लोकतंत्र का अर्थ है-जनता का शासन, जनता के लिए। भारतीय संविधान में जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं। चुनाव आमतौर पर पाँच वर्ष की समयावधि में होता है, परंतु कभी-कभी जरूरत पड़ने पर मध्यावधि चुनाव भी कराने पड़ते हैं। भारतीय संविधान (Indian Constitution) में चुनाव संबन्धित अनुच्छेद-324, 325 और 326 है। अनुच्छेद 324 के मुताबिक यह अनुच्छेद वोट के अधिकार की व्याख्या नहीं करता, लेकिन यह निर्वाचन आयोग को चुनाव के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है। निष्पक्ष मतदान का अधिकार तभी सुरक्षित रहता है जब चुनाव कराने वाली संस्था स्वतंत्र हो। इसी परिपेक्ष्य में संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था के रूप में प्रतिपादित किया है। जिसका तात्पर्य यह है की चुनाव आयोग पूर्ण रूप से स्वतंत्र है और वह किसी सरकार या अन्य संस्था के अधीन काम नहीं करता है। उसे स्वयं ही निष्पक्ष और न्यायिक दृष्टि से संसद और विधान सभाओं का चुनाव कराने का दायित्व सौंपा गया है।
अनुच्छेद 325 सुनिश्चित करता है कि मतदान के अधिकार में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो-
●➤इसके तहत किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर निर्वाचक नामावली में शामिल होने से वंचित नहीं किया जा सकता।
●➤न ही कोई व्यक्ति इन आधारों पर किसी विशेष नामावली में शामिल होने का दावा कर सकता है।
अनुच्छेद 326 भारतीय लोकतन्त्र का आधार है, यह व्यस्क मताधिकार के सिद्धान्त को स्थापित करता है-
●➤इसके अनुसार लोक सभा और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए चुनाव व्यस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।
●➤भारत का हर नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, उसे मत देने का अधिकार है।
●➤पहले यह आयु 21 वर्ष थी जिसे 61वें संविधान संशोधन (1988 के जरिये) घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।
●➤किसी व्यक्ति को केवल अनिवास, चित्तविकृति, अपराध या भ्रष्ट आचरण के आधार पर ही मत देने से रोका जा सकता है।
आमतौर पर लोगों में यह भ्रम रहता है कि क्या मत देने का अधिकार, मौलिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों के अनुसार यह एक संवैधानिक अधिकार है।
इसका मतलब है कि संविधान ने आपको यह हक दिया है, लेकिन इसे कानून (जैसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951) के द्वारा रेगुलेट किया जा सकता है।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बहुजन समाज अपना मत किसे दे? मतदान का अधिकार देश के नागरिकों को आसानी से प्राप्त नहीं हुआ। जब देश की संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हो रही थी, तो सभा के कई लोगों का ऐसा मत था कि मतदान का अधिकार केवल स्नातक तक शिक्षित व्यक्तियों को ही मतदान का अधिकार दिया जाए; अन्य कुछेक का मत था कि मतदान का अधिकार सिर्फ आयकर देने वाले व्यक्तियों को ही दिया जाये; कुछ अन्य का ये भी मत था कि मतदान का अधिकार केवल नागरिकों के पास संपत्ति के अधिपत्य पर दिया जाये।
संविधान सभा के अध्यक्ष बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने उपरोक्त मतों पर संविधान सभा के सदस्यों के सामने तथ्यात्मक और तार्किक तरीके से जवाब दिया और उन्हें समझाया कि अगर हम मतदान करने का अधिकार शिक्षित वर्ग, टैक्स दाता और संपत्ति दाता को देते हैं, तो देश की आधी से अधिक जनता मतदान के अधिकार से बाहर हो जाएगी और फिर लोकतन्त्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। विशेषकर एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग की अत्यंत पिछड़ी जातियाँ मतदान देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगी और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था विफल हो जाएगी। इसलिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने बौद्धिक तर्कों के आधार पर संविधान सभा के सदस्यों को इस बात पर सहमत कराया कि मतदान देने का अधिकार देश के हर व्यस्क नागरिक को होना चाहिए। जिसमें किसी के साथ जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव न किया जाए। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तावित प्रावधान को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से पारित किया, जो आज भारत के संविधान में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। जिसके तहत भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था संचालित हो रही है।
किस प्रत्याशी को अपना मत दे बहुजन समाज: बहुजन समाज का अर्थ है एससी, एसटी, ओबीसी (अत्यंत पिछड़ी जातियाँ) एवं अल्पसंख्यक समुदाय। यह वह समुदाय है जो आमतौर पर सभी नागरिक हक-अधिकारों से वंचित रहता है और उसे कदम-कदम पर प्रताड़ित भी किया जाता है। पिछडी जातियों के समुदाय में उन जातियों को जो विशेषकर सामंतवादी विचारधारा की हैं, कृषि योग भूमि पर अधिकार रखती है, तथा साथ में, मनुवादी मानसिकता के कर्णधारों की लठैत बनकर ब्राह्मणवाद की रक्षा भी करती हैं, उन्हें बहुजन समाज की परिधि में नहीं रखा गया है। चूंकि ये ही जातीय घटक जैसे जाट, गुर्जर, कुर्मी, यादव, मराठा इत्यादि लोग ही अधिकांशत: बहुजन समाज की कमजोर जातियों का उत्पीड़न और शोषण करती है। हालांकि ये सभी जातियाँ चातुर्वर्णीय के ब्राह्मणी वर्गीकरण के अनुसार शूद्र वर्ण में ही गिनी जाती है। लेकिन इनमें कम समझ और ज्ञान की कमतरता के कारण ये अपने ही वर्ग की कमजोर व उपेक्षित जातीय घटकों के व्यक्तियों के ऊपर अनावश्यक उत्पीड़न और शोषण की घटनाओं को अंजाम देती है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए बहुजन समाज के जागरूक, सजग व प्रबुद्ध व्यक्तियों का मत है कि शोषक वर्ग के प्रत्याशियों को बहुजन समाज के व्यक्ति अपना मत न दें, और जितना हो सके सभी चुनावों में इन मानसिकता के व्यक्तियों को हराए जाये।
बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों से निवेदन है कि वे जातिवादी मानसिकता को त्यागकर अपना अमूल्य वोट उस व्यक्ति को दे, जो मन और मस्तिष्क से ईमानदार हो, जातिवादी न हो, ब्राह्मणवादी न हो, जो समता, मानवता, बंधुत्व व न्याय में विश्वास रखता हो, उसके मन और मस्तिष्क में किसी भी प्रकार का धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव न हो साथ ही वह व्यक्ति उत्कृष्ट श्रेणी का ईमानदार व स्पष्टवादी भी हो। जो बहुजन समाज के महानायकों जैसे बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, संत कबीर, संत रविदास, पेरियार, मान्यवर साहेब कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधारा में अटूट विश्वास रखता हो।





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