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लगभग 528 ईसा पूर्व की आषाढ़ पूर्णिमा। भारत के प्राचीन शहर काशी (वाराणसी) से महज आठ किलोमीटर दूर स्थित ऋषिपतन (आधुनिक सारनाथ) का मृगदाव (हिरणों का जंगल) एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना का साक्षी बनने जा रहा था। उरुवेला (बोधगया) में निरंजना नदी के तट पर बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान (संबोधि) प्राप्त करने के बाद, सिद्धार्थ गौतम अब बुद्ध बन चुके थे। इस आषाढ़ पूर्णिमा की शाम, बुद्ध ने अपने उन पांच पुराने साथियों को अपना पहला उपदेश दिया, जो कभी उन्हें मार्गभ्रष्ट मानकर छोड़ गए थे। बौद्ध परंपरा में इस ऐतिहासिक घटना को धम्मचक्कप्पवत्तन (धर्मचक्रप्रवर्तन) कहा जाता है। यह केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं था, बल्कि यह मानव इतिहास की वह पहली वैचारिक क्रांति थी जिसने ईश्वर, कर्मकांड, अंधविश्वास और जातिगत श्रेष्ठता के बंधनों से मानव चेतना को मुक्त कर विवेक, प्रज्ञा और करुणा का मार्ग दिखाया। संबोधि प्राप्त करने के पश्चात बुद्ध के मन में पहला विचार यह आया कि जो परम सत्य उन्होंने खोजा है, वह अत्यंत सूक्ष्म, गहन और साधारण सांसारिक बुद्धि से परे है। क्या अज्ञानता और तृष्णा में डूबा संसार इसे समझ पाएगा? लेकिन जगत के प्रति अपार करुणा से भरकर उन्होंने निश्चय किया कि वे इस ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाएंगे। बुद्ध ने सोचा कि इस मध्यम मार्ग और आर्य सत्यों का सबसे पहला अधिकारी कौन हो सकता है? सर्वप्रथम उन्हें अपने गुरुओं—आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त का स्मरण आया, परंतु वे दोनों तब तक देहत्याग चुके थे। तत्पश्चात उन्हें उन पाँच भिक्षुओं (पंचवर्गीय भिक्षु) का विचार आया, जिन्होंने उरुवेला के जंगल में उनके साथ वर्षों तक कठोर तपस्या की थी।
पंचवर्गीय भिक्षु कौन थे? कौंडिन्य (अझ्ञासि कौण्डिझ्ञ), भद्दिय, वप्प, महानाम, और अस्सजि। ये वे लोग थे जो सिद्धार्थ के राजप्रासाद छोड़ने के समय से ही उनके साथ थे। परंतु जब सिद्धार्थ ने यह समझा कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना आत्मज्ञान का मार्ग नहीं है और उन्होंने सुजाता के हाथों खीर स्वीकार कर ली, तो इन पाँचों को लगा कि सिद्धार्थ अपने पथ से भ्रष्ट हो गए हैं। वे निराश होकर सिद्धार्थ को छोड़कर काशी के पास सारनाथ (मृगदाव) चले आए थे।
बुद्ध बोधगया से पैदल ही काशी की ओर निकल पड़े। मार्ग में उनकी मुलाकात उपका नामक एक आजीविक साधु से हुई, जिसने उनके चेहरे के अद्भुत तेज को देखकर पूछा कि उनका गुरु कौन है। बुद्ध ने निडरता से उत्तर दिया: मेरा कोई गुरु नहीं है। मैंने स्वयं सत्य को जाना है। मैं अविद्या के अंधकार से ढकी दुनिया में ज्ञान का नगाड़ा (धम्मदुन्दुभि) बजाने काशी जा रहा हूँ।
ऋषिपतन (सारनाथ) में पुनर्मिलन: जब बुद्ध मृगदाव (सारनाथ) पहुँचे, तो दूर से उन्हें आते देखकर उन पाँचों भिक्षुओं ने आपस में एक समझौता किया: देखो, वह भ्रष्ट सिद्धार्थ आ रहा है जिसने तपस्या छोड़कर अन्न ग्रहण कर लिया था। हममें से कोई भी उठकर उसका अभिवादन नहीं करेगा, न ही उसके लिए आसन बिछाएगा। परंतु जैसे-जैसे बुद्ध उनके समीप आते गए, उनकी कांति, शांत स्वभाव और अलौकिक आभामंडल के सामने उन भिक्षुओं का संकल्प ताश के पत्तों की तरह ढह गया: एक भिक्षु ने आगे बढ़कर उनका पात्र और चीवर (वस्त्र) लिया। दूसरे ने आसन बिछाया। तीसरे ने पैर धोने के लिए जल रखा। हालाँकि, उन्होंने बुद्ध को आयुष्मान गौतम कहकर संबोधित किया (जो बराबर वालों के लिए इस्तेमाल होता था)। तब बुद्ध ने बड़े प्रेम से उनसे कहा: भिक्षुओं! बुद्ध को नाम से या आयुष्मान कहकर संबोधित मत करो। तथागत ने अमरत्व (अमृत) प्राप्त कर लिया है। वे सम्यक सम्बुद्ध हैं। आओ, मैं तुम्हें वह धम्म सिखाता हूँ जो तुम्हें दुखों से मुक्त करेगा। भिक्षुओं को पहले विश्वास नहीं हुआ, लेकिन बुद्ध के धैर्य, प्रज्ञा और दृढ़ता ने अंतत: उनके संदेह को मिटा दिया। वे श्रद्धापूर्वक बुद्ध के चरणों में बैठ गए।
प्रथम उपदेश: आषाढ़ पूर्णिमा की उस संध्या को, जब सूर्य अस्त हो रहा था और चंद्रमा उदित हो रहा था, बुद्ध ने अपना ऐतिहासिक उपदेश—धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त दिया। इस उपदेश के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
(क) दो अंतों का त्याग और मज्झिमा पटिपदा (मध्यम मार्ग)। बुद्ध ने अपने उपदेश की शुरूआत ही स्थापित धार्मिक परंपराओं और दर्शनों पर चोट करते हुए की। उन्होंने कहा कि सत्य की खोज करने वाले को दो सिरों (अतियों) से बचना चाहिए:
कामसुखल्लिकानुयोग: इंद्रिय सुखों, भोग-विलास और शारीरिक लिप्तता में डूबे रहना (यह नीच और अर्थहीन है)।
अत्तकिलमथानुयोग: शरीर को अत्यधिक कष्ट देना, कठोर तपस्या करना, भूखे रहना और स्व-उत्पीड़न करना (यह दुखदायी और व्यर्थ है)।
इन दोनों अतियों को नकारते हुए बुद्ध ने मध्यम मार्ग का प्रतिपादन किया, जो प्रज्ञा, शांति, अभिज्ञा और निब्बान (निर्वाण) की ओर ले जाता है। उन्होंने वीणा के तारों का सुंदर उदाहरण दिया—यदि तार बहुत ढीले होंगे तो संगीत नहीं निकलेगा, और यदि बहुत कसे होंगे तो टूट जाएंगे। संगीत तभी निकलता है जब तार मध्य में हों।
(ख) चत्तारि अरिय सच्चानि (चार आर्य सत्य)। बुद्ध का दर्शन केवल काल्पनिक या दार्शनिक बहस नहीं था; यह मानव जीवन के यथार्थ पर आधारित एक व्यावहारिक चिकित्सा शास्त्र था। उन्होंने चार आर्य सत्य बताए:
1. प्रथम आर्य सत्य: दुख है: जन्म, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (बीमारी), मरण, प्रिय का बिछड़ना, अप्रिय का मिलना—सब दुख है। पाँच उपादान स्कंध ही दुख हैं।
2. द्वितीय आर्य सत्य: दुख का कारण है: दुख बिना कारण के नहीं है। इसका मुख्य कारण तण्हा (तृष्णा/इच्छा/आसक्ति) और अविद्या (अज्ञान) है।
3. तृतीय आर्य सत्य: दुख का निवारण संभव है: यदि तृष्णा और अज्ञान का पूरी तरह क्षय कर दिया जाए, तो दुख का अंत (निर्वाण) संभव है।
4. चतुर्थ आर्य सत्य: दुख निरोध का मार्ग है: वह मार्ग जो दुख के अंत की ओर ले जाता है, जिसे अट्ठंगिको मग्गो (अष्टांगिक मार्ग) कहा जाता है।
अरियो अट्ठंगिको मग्गो (अष्टांगिक मार्ग)- दुख से मुक्ति पाने के लिए बुद्ध ने जिस आठ अंगों वाले मार्ग का उपदेश दिया, वह संपूर्ण मानव जीवन को नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से रूपांतरित करने का मार्गदर्शिका है। इसे तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है: प्रज्ञा, शील, समाधि।
सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्यों और कार्य-कारण नियम (प्रतीत्यसमुत्पाद) को सही रूप में समझना।
सम्यक संकल्प: कामवासना, द्वेष और हिंसा से मुक्त होने का संकल्प।
सम्यक वाक्: झूठ, चुगली, कठोर शब्द और व्यर्थ की बकबक न करना।
सम्यक कर्मान्त: हिंसा न करना, चोरी न करना, और व्यभिचार से दूर रहना (अहिंसक आचरण)।
सम्यक आजीव: किसी प्राणी को नुकसान न पहुँचाने वाले व्यापार या पेशे से आजीविका चलाना।
सम्यक व्यायाम: मन में बुरे विचारों को आने न देना, आए विचारों को हटाना और शुभ विचारों को जगाना व बनाए रखना।
सम्यक स्मृति: अपने शरीर, संवेदनाओं, चित्त और धम्म (विचारों) के प्रति निरंतर जागरूक रहना (विपश्यना की नींव)।
सम्यक समाधि: मन को एकाग्र करके ध्यान (झान/ध्यान) की उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करना।
घटना का प्रभाव: उपदेश के समापन पर, पाँचों भिक्षुओं में से सबसे वयोवृद्ध भिक्षु कौंडिन्य को धम्म की निर्मल और स्पष्ट दृष्टि प्राप्त हुई। उन्होंने अनुभव किया: ‘यं किञ्चि समुदयधम्मं सव्वं तं निरोधधम्मं’ (जिस भी वस्तु की उत्पत्ति का कोई कारण है, उस हर वस्तु का विनाश होना भी निश्चित है।) कौंडिन्य के इस बोध को देखकर बुद्ध ने हर्षित होकर कहा—अझ्ञासि वत भो कौण्डिझ्ञ! (ओह! कौंडिन्य ने जान लिया!)। इसी कारण उनका नाम अझ्ञासि कौण्डिझ्ञ पड़ा। अगले कुछ दिनों में, बुद्ध ने इन भिक्षुओं को दूसरा प्रसिद्ध उपदेश अनत्तलक्खण सुत्त (अनात्म लक्षण उपदेश) दिया, जिसमें उन्होंने समझाया कि शरीर, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान—इनमें से कुछ भी मैं या मेरा आत्मा (स्थायी सत्ता) नहीं है। इस ज्ञान को सुनकर पाँचों भिक्षु पूर्णत: तृष्णा-मुक्त होकर अरहंत (पूर्ण बुद्धत्व प्राप्त) बन गए।
त्रिगुण शरण की नींव (बुद्ध, धम्म, संघ)- सारनाथ में ही इतिहास में पहली बार संघ का जन्म हुआ। जब वाराणसी के एक धनवान व्यापारी के पुत्र यस और उनके 54 मित्रों ने बुद्ध का धम्म स्वीकार किया, तो अरहंतों की संख्या 60 हो गई। तभी बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को मानव इतिहास का सबसे पहला लोक-कल्याणकारी संदेश देकर चारों दिशाओं में भेजा: ‘चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजनहिताय बहुजनसुखाय लोकानुकम्पाय अत्थाय हिताय सुखाय देवमनुस्सानं। मा एकेन द्वे अगमित्थ। देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याणं मज्झेकल्याणं परियोसानकल्याणं...’ (हे भिक्षुओं! बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय—दूसरों के हित और सुख के लिए, लोक पर अनुकंपा के लिए भ्रमण करो। दो भिक्षु एक रास्ते पर मत जाओ। उस धम्म का प्रचार करो जो आदि (शुरूआत) में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में भी कल्याणकारी है।)
क्यों ऐतिहासिक था यह उपदेश? सारनाथ का यह प्रथम उपदेश केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक और वैचारिक इतिहास में एक युगान्तकारी मोड़ था। उस दौर में उच्च जाति के पुरोहितों और दार्शनिकों की भाषा संस्कृत थी, जो आम जनता की समझ से बाहर थी। बुद्ध ने कर्मकांडीय संस्कृत को छोड़कर जन-सामान्य की भाषा पालि में अपना संदेश दिया। इससे ज्ञान पर से कुछ मुट्ठी भर लोगों का एकाधिकार खत्म हो गया। बुद्ध ने घोषित किया कि मनुष्य अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्म से श्रेष्ठ या नीच होता है। सारनाथ से शुरू हुए बौद्ध संघ के द्वार राजा से लेकर रंक तक, और ब्राह्मण से लेकर चांडाल तक सभी के लिए समान रूप से खुल गए। बुद्ध ने किसी अदृश्य ईश्वर, आत्मा, बलिप्रथा, या वेद-वाक्यों को अंतिम सत्य मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कार्य-कारण सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि हर घटना के पीछे एक वैज्ञानिक कारण होता है। उन्होंने मनुष्य को स्वयं अपना भाग्यविधाता बनाया: ‘अत्त दीपो भव’ (अपने दीपक स्वयं बनो)।
सारनाथ: आज का सारनाथ उस ऐतिहासिक धम्मचक्रप्रवर्तन का मूक साक्षी है। सम्राट अशोक ने ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में इस घटना की स्मृति को अमर बनाने के लिए सारनाथ में विशाल निर्माण करवाए।
धमेख स्तूप: माना जाता है कि यह विशाल स्तूप ठीक उसी स्थान पर बना है जहाँ बुद्ध ने पाँच भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया था।
अशोक स्तंभ: सम्राट अशोक ने यहाँ एक विशाल एकाश्म (एक ही पत्थर से बना) स्तंभ स्थापित किया था। इसके शीर्ष पर बने चार सिंह और 24 तीलियों वाला धर्मचक्र आज स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रध्वज का केंद्र बिंदु है।
चौखंडी स्तूप: यह वह स्थान है जहाँ बुद्ध की अपने पाँचों पुराने साथियों से पहली भेंट हुई थी।
लगभग 2550 से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी, सारनाथ की उस आषाढ़ पूर्णिमा को दिया गया उपदेश धुंधला नहीं पड़ा है, बल्कि आज की हिंसक, तनावग्रस्त और उपभोक्तावादी दुनिया में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज जब पूरी दुनिया युद्ध, जातीय वैमनस्य, पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव से जूझ रही है, तब बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग और अहिंसा का सिद्धांत ही मानवता को विनाश से बचा सकता है। सारनाथ से चला धर्मचक्र केवल भारत तक सीमित नहीं रहा; यह चीन, जापान, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, तिब्बत और वियतनाम होते हुए पूरे विश्व में फैला। इसने यह साबित कर दिया कि सत्ता और शस्त्र से बड़ा साम्राज्य सत्य, करुणा और सम्यक ज्ञान का होता है। 2500 साल पहले ऋषिपतन के मृगदाव में उठी वह शांत आवाज आज भी मानवता को यही पुकार कर कह रही है—अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ो, वैमनस्य को प्रेम से जीतो, और स्वयं अपने विवेक के प्रकाश में जियो।





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