




2026-08-01 18:30:40
7 अगस्त 1990 का दिन आधुनिक भारत के सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ माना जाता है। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) ने संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार द्वारा मण्डल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा की। इस निर्णय ने भारत के सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। शताब्दियों से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े और उपेक्षित बहुजन समाज के लिए यह निर्णय शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने वाला एक क्रांति-बीज साबित हुआ। भारत का संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 340 के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की पहचान और उनके कल्याण हेतु आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया था। जिसे मण्डल आयोग के नाम से जाना जाता है।
=प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग): 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित किया गया था, परंतु इसकी सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
=द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मण्डल आयोग): 1 जनवरी 1979 को जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन नेता बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। इस आयोग में उनके साथ अन्य सदस्य भी शामिल थे।
मण्डल आयोग की प्रमुख सिफारिशें:
1980 में मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। आयोग ने वैज्ञानिक डेटा, सामाजिक सर्वेक्षणों और साक्षरता-रोजगार के आंकड़ों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
1. आबादी का आकलन: आयोग के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 52% आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की थी।
2. आरक्षण का प्रस्ताव: हालाँकि आबादी 52% थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50% की सीमा को ध्यान में रखते हुए आयोग ने सरकारी नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी वर्ग के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की।
3. अन्य सिफारिशें: इसमें भूमि सुधार, शैक्षणिक प्रोत्साहन और आर्थिक सहायता से जुड़े कई बिंदु भी शामिल थे।
वी.पी. सिंह का निर्णय: 1980 से 1990 तक मण्डल आयोग की रिपोर्ट धूल फांकती रही। कांग्रेस सरकारों के दौरान इसे लागू नहीं किया गया। 1989 के चुनाव में जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चा के चुनावी घोषणापत्र में इसे लागू करने का वादा किया गया था।
7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए संसद में घोषणा की कि सरकार ने मण्डल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है और केंद्र सरकार व उसके उपक्रमों की नौकरियों में ओबीसी समुदाय को 27% आरक्षण दिया जाएगा। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य केवल नौकरी देना नहीं, बल्कि देश की सत्ता और प्रशासनिक तंत्र में उन बहुजन जातियों को हिस्सेदारी देना था जो इतिहास के हर दौर में शासन-प्रशासन से बेदखल रखी गई थीं।
उच्च जातियों का तीव्र विरोध: मण्डल आयोग लागू करने की घोषणा होते ही देश भर में एक अभूतपूर्व सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली। देश के कई हिस्सों, विशेषकर उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों और शहरों में उच्च जातियों के छात्रों और समूहों ने इसका उग्र विरोध किया। विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों और आत्मदाह जैसी दुखद घटनाओं के जरिए इस फैसले को वापस लेने का दबाव बनाया गया। मीडिया के एक बड़े वर्ग ने भी इस फैसले की आलोचना की।
बहुजन राजनीति का उभार: इस फैसले ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के बीच एक नई सामाजिक चेतना जगाई। इसके परिणामस्वरूप उत्तर भारत में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, कांशीराम और रामविलास पासवान जैसे नेताओं के नेतृत्व में बहुजन राजनीति का स्वर्ण काल शुरू हुआ।
कमण्डल राजनीति की शुरूआत: मण्डल आयोग से उपजे बहुजन उभार और पिछड़ों के ध्रुवीकरण का मुकाबला करने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों ने कमण्डल (राम जन्मभूमि आंदोलन) का रास्ता अपनाया, जिससे भारतीय राजनीति मण्डल बनाम कमण्डल के द्वंद्व में बदल गई।
कानूनी चुनौती: मण्डल आयोग के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, जिसे प्रसिद्ध इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के नाम से जाना जाता है। 16 नवंबर 1992 को सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की पीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।
27% आरक्षण को संवैधानिक ठहराया: अदालत ने ओबीसी हेतु सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण को पूरी तरह वैध माना।
50% की सीमा तय की: अदालत ने आदेश दिया कि कुल आरक्षण (एससी, एसटी और ओबीसी मिलाकर) 50% से अधिक नहीं होना चाहिए।
क्रीमी लेयर का सिद्धांत: पिछड़े वर्ग के भीतर जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम हो चुके हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान जोड़ा गया।
प्रशासन में बहुजन भागीदारी: मण्डल आयोग की सिफारिशों का लागू होना केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं था, बल्कि यह भारत का द्वितीय सामाजिक पुनर्जागरण था। इस फैसले से पहले आईएएस, आईपीएस, केंद्रीय सेवाओं और सरकारी विभागों में ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व नाममात्र (लगभग 4-5%) था। 27% आरक्षण के बाद देश के प्रशासनिक ढांचे में करोड़ों पिछड़ों और बहुजनों की भागीदारी संभव हो सकी। मण्डल आंदोलन ने पिछड़े वर्गों को यह अहसास कराया कि वे केवल मतदाता नहीं हैं, बल्कि देश की सत्ता के बराबर के हकदार हैं। इसके बाद भारत में राज्यों से लेकर केंद्र तक ओबीसी वर्ग का राजनीतिक नेतृत्व स्थापित हुआ। यद्यपि शुरूआत में यह केवल नौकरियों के लिए था, परंतु बाद में 2006 (यूपीए सरकार) में इसे केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों (आईआईटीस, आईआईएमस, एआईआईएमएस, केंद्रीय विश्वविद्यालयों) में भी लागू किया गया, जिससे बहुजन छात्र-छात्राओं के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खुले।
निष्कर्ष: 7 अगस्त 1990 को मण्डल आयोग की घोषणा भारत में सामाजिक न्याय के संघर्ष का एक अमर अध्याय है। बाबा साहब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने संविधान में जिस सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का सपना देखा था, मण्डल आयोग ने उस सपने को धरातल पर उतारने का कार्य किया। आज जब भारत विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है, तब देश के सरकारी, प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़ा वर्ग की जो विशाल उपस्थिति दिखाई देती है, उसकी नीव मण्डल आयोग और 1990 के उस ऐतिहासिक फैसले पर ही टिकी है।





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