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पत्थर की मूर्तियों में नहीं, इंसानों में देवत्व खोजो: बाबा साहेब

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2026-03-21 16:08:48

बाबा साहब आंबेडकर की शादी मात्र 15 साल की उम्र में 9 साल की रमा बाई से हुई थी। बाबा साहब आज अगर भारत रत्न कहलाते है तो उसमें उनकी पत्नी जीवन संगिनी रमा बाई का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। स्कॉलरशिप कैंसल होने के बाद जब बाबा साहब मजबूरी ने वापिस लौट आये तो उनकी पत्नी में अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे ताकि बाबा साहब का पढ़ने का सपना पूरा हो सकें। हालांकि बाबा साहब अपना परिवार चलाने के लिए जी तोड़ मेहनत करते थे, लेकिन वो कभी पूरा ही नहीं हो पाता था।

चार संतानों को खो देने का दु:ख: अभाव और लाचारी के कारण बाबा साहब और रमा बाई जी ने अपनी आँखों के सामने अपनी 4 संतानों को खो दिया था, बाबा साहब केवल रमा बाई को करुण विलाप करते देखते रह जाते थे, लेकिन बावजूद इसके रमा बाई ने बाबा साहब को कभी किसी बात के लिए दोषी नहीं माना। उनका स्नेह अपने ईश्वर के प्रति बहुत कभी कम नहीं हुआ, शायद उनकी जगह कोई और होता तो चार संतानों को खोने के बाद ईश्वर से उसका विश्वास उठ जाता लेकिन रमा बाई ने इसके अपने आराध्य विट्ठल देव जी का फैसला माना और उसे स्वीकार भी किया, लेकिन जब शूद्र जाति से होने के कारण रमा बाई को अपने आराध्य के दर्शन नहीं करने दिये तो पहली बार वो बाबा साहब के सामने इसके लिए रो पड़ीं और रमा बाई को रोता देख कर बाबा साहब ने जो कहा उसे सुनकर रमा बाई समझ गई कि आखिर क्यों बाबा साहब हिंदू धर्म से विरक्त होने लगे थे।

क्या हुआ रमा बाई के साथ: दरअसल रमा बाई के बारे में कहा जाता है कि वो बेहद धार्मिक किस्म की महिला थी जिनका बचपन से ही पंढरपुर के विट्ठल पर अटूट विश्वास था, वो हमेशा उनकी पूजा किया करती थी, लेकिन दुख की बात ये थी कि शूद्र होने के कारण सार्वजनिक तौर पर न तो वो उनकी पूजा कर पाती और न ही गांव के मंदिर जा पाती थी, बावजूद इसके वो मानती थी कि उनके पति की सफलता, उनकी सुरक्षा विट्टल की कृपा के कारण ही सकार हुई है, और उन्होंने बाबा साहब की सफलता के लिए विट्ठल से प्रार्थना की थी।

जाति सबसे बड़ी दीवार बन गई

लेकिन जब वो सफल होकर लौटे तो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए रमा बाई पंढरपुर के विट्ठल के मंदिर में उनके दर्शन करने गई थी, लेकिन वहां भी उनकी जाति सबसे बड़ी दीवार बन गई थी उनके और उनके आराध्य के बीच... रमाबाई ने देखा कि केवल एक शूद्र ने एक उंचे कुल के व्यक्ति को गलती से छू क्या लिया था, उसे सभी ने बुरी तरह से पीटा..उसके साथ ऐसा व्यावहार हुआ जैसे उससे बहुत जघन्य अपराध हो गया हो... एक सुशिक्षित व्यक्ति की पत्नी होने के बाद भी उनकी जाति के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश नही करने दिया गया था.. रमाबाई भारी और दुखी मन से आंखो में आंसू लिये वापिस लौट आई, और बाबा साहब के गले लग कर बहुत रोई। बाबा साहब ने सारी बातें सुनी और रमाबाई को विलाप न करने की सलाह दी।

बाबा साहब का प्यार भरा जवाब:

बाबा साहब ने बचपन से देखा था कि रमाबाई की विट्ठल मे कितनी श्रद्धा थी, और वो बड़े मन से मंदिर गई थी, लेकिन उन्हें इस बात का भी अंदाजा था कि वहां क्या हो सकता है, जब रमाबाई ने आकर सारी बाते बताई तो बाबा साहब ने रमा बाई को गले लगा कर कहा कि वो विलाप क्यों कर रही है.. क्या केवल उनके आरादध्य के दर्शन नहीं हुए इसलिए लेकिन जरा सोचो जो भगवान अपने भक्तों को खुद से दर्शन देने लायक भी नहीं है।उनके दर्शक के लिए भी दूसरो की इजाजत लेनी पड़ती है, जो अपने भक्तों की रक्षा तक नहीं कर पा रहे है, उनके साथ न्याय तक नहीं कर पा रहे है, ऐसे भगवान की भला क्या ही पूजा की जाये?

भक्तों को भगवान से दूर होना पड़ता:

हम क्यों ऐसे किसी भी तीर्थ पर जायें, जहां भक्तों को भगवान से दूर होना पड़ता है, जहां उनके भक्त अपमानित हो, और भगवान देखता रहे। बाबा साहब ने रमा बाई को संभालते हुए कहा कि वो किसी तीर्थ पर जाने के बजाय अपना तीर्थ खुद बनायेंगे। जहां वो विठोवा होंगे और रमाबाई उनकी रूक्मिनी होगी। जिसे सुनकर रमाबाई के आंखो में आसूं आ गए थे। रमाबाई हमेशा एक मजबूत स्तंभ की तरह बाबा साहब के साथ खड़ी रही, उन्होंने बाबा साहब का संघर्ष देखा, उनकी सफलता देखी थी। हालांकि टीबी की बीमारी के कारण मात्र 39 साल की उम्र में रमाबाई का 27 मई 1935 को उनका निधन हो गया था, और बाबा साहब अकेले रह गए थे. लेकिन अगर हम आज ये कहे कि बाबा साहब के हिंदू धर्म के प्रति बदलते विचारों को रमा बाई ने बेहद करीब से देखा था। वो उन्हें समझ सकती थी कि आखिर क्यों बाबा साहब हिंदू धर्म से विरक्त हो गये थे और शायद हमेशा की तरह वो भी बाबा साहब के धर्म परिवर्तन का समर्थन जरूर करती.. दोनो का रिश्ता हमेशा आपसी समझ और समर्पण के साथ चला था और शायद इसी लिए आज भी रमाबाई का स्थान बाबा साहब की जिंदगी में सबसे उंचा समझा जाता है।

आज के दलित अम्बेडकरवादियों को इससे सबक लेना चाहिए:

आज भारत के दलित ‘अम्बेडकरवादी’ कम और ‘मनुवादी’ अधिक दिखाई दे रहे हैं चूंकि हर साल कांवड यात्राओं में जाने वालों की संख्या दलित वर्ग से ही ज्यादा लगती है। मंदिरों व कथाओं में पूड़ी सब्जी खाने लिए भी दलित वर्ग के लोग ही सबसे ज्यादा नजर आते हैं। इसे देखकर मुनवादियों को यह समझ में आ जाता है कि दलित वर्ग पूरी तरह से तुम्हारा ही गुणगान करेगा और वोट भी तुम्हें ही देकर मजबूत करेगा। इसके साथ ही संघी-मोदी सरकार दलितों को मुफ्त का राशन व नगद पैसे बांटकर भी उनकी वोटों को खरीद रही है। जिससे भारत का लोकतंत्र हर रोज कमजोर होता जा रहा है। देश का लोकतंत्र कमजोर होना बहुजन समाज के हित में नहीं है। बहुजन समाज के जातीय घटकों में एकता का अभाव है और बहुजन समाज को अपने अंदर की इस सबसे बड़ी कमजोरी को दूर करना होगा। तभी समाज मजबूत होकर आत्मनिर्भर बनेगा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05