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जाति लंबे समय से भारतीय समाज का मूल आधार रही है। इसके अलावा, भारत में आधुनिकता और पूंजीवाद का आगमन उपनिवेशवाद के साये में हुआ। इन दोनों कारणों से भारत का परीक्षा से जुड़ा अनुभव अन्य देशों से अलग और विशिष्ट रहा है। जाहिर है कि जातिगत समाज योग्यतावादी समाज का विलोम है क्योंकि जाति-व्यवस्था में व्यक्ति की समाजिक हैसियत जन्मजात होती है। लेकिन औपनिवेशिक भारत में भारतीयों को वे अवसर उपलब्ध नहीं थे जो अंग्रेजों को थे, इसलिए यहां जाति-आधारित समाज और योग्यतावाद के बीच अपेक्षित टकराव नहीं हुआ। देश पर अंग्रेजों के शासन के चलते यह संभावित टकराव टल गया। मगर उच्च जातीय अभिजात वर्ग और अंग्रेजों के बीच टकराव ने भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की मांग को जन्म दिया। स्वतंत्रता के ठीक पहले के कुछ दशकों में भारतीयों के लिए अवसरों में बढ़ोत्तरी हुई, मगर इसका लाभ केवल कुछ ही जातियों के लोग उठा सके। इसका कारण था साक्षरता की निम्न दर, खासकर अंग्रेजी के ज्ञान का अभाव।
रईसों के अभियान को एक राष्ट्रीय आंदोलन में तब्दील करने के लिए, और आधुनिकता के प्रति अपनी घोषित प्रतिबद्धता को साबित करने के लिए, भारतीय राष्ट्रवाद के लिए यह जरूरी हो गया कि वह जाति के मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। ऐसे में हमारे नए संविधान में एक दोहरी रणनीति अपनाई गई। एक ओर जिन समुदायों पर प्रत्यक्ष बहिष्करण का सबसे अधिक असर रहा अर्थात अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए जाति-आधारित आरक्षण का प्रावधान किया गया। वहीं दूसरी तरफ अन्य सभी जातियों से यह मौन वायदा किया गया कि उनकी जातीय अस्मिता को औपचारिक तौर पर भुला दिया जाएगा, और उन्हें विशुद्ध, जाति-अस्मिता-रहित नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाएगा। मगर चूंकि जातिगत उपलब्धियों और जाति-जनित संसाधनों को ज्यों-का-त्यों चलने दिया गया, इसका व्यवहारिक नतीजा यह था कि कथित उच्च जातियां, विशेषकर हिंदू उच्च जातियां, अपने उन विशेषाधिकारों का उपभोग करती रह सकतीं थीं, जो वे करती आईं थीं।
इस पृष्ठभूमि के साथ जब हम परीक्षा पर लौटते हैं तो पाते हैं कि जब भी कोई देश या समाज अपने स्तरीकृत व गैरबराबरी भरे अतीत से निकलकर एक आधुनिक समता-मूलक एवं योग्यतावादी वर्तमान में प्रवेश करना चाहता है तो उसे परीक्षा के संस्थान का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन ऐसी स्थिति में परीक्षा को दोहरी भूमिका निभानी पड़ती है। भारत में भी ऐसा ही हुआ। एक ओर परीक्षा की संस्था को यह दिखाना था (और कुछ हद सुनिश्चित भी करना था) कि योग्यता ही समाज में आगे बढ़ने का आधार है। दूसरी ओर, उसे दबे-छिपे ढंग से यह भी सुनिश्चित करना था कि पुराने जन्म-आधारित विशेषाधिकार बने रहें, लेकिन योग्यता-आधारित विशेषाधिकार का जामा पहन कर। स्वतंत्रता के शुरूआती सालों में दोनों उद्देश्यों को एक साथ पूरा करना काफी आसान था। कारण यह कि नौकरशाही और आधुनिक पेशों में प्रवेश पाने के लिए जिन परीक्षाओं में भाग लेना होता था, उनके लिए पात्र मुख्यत: वही लोग थे, जिन्हें पहले से विशेषाधिकार हासिल थे, यानी सवर्ण शहरी मध्यवर्ग। भारतीय शिक्षा आयोग (1964-66), जो कोठारी आयोग के नाम से प्रसिद्ध है, के अनुसार, हाई स्कूल से उच्चतर शिक्षा में 18-23 वर्ष आयु समूह (सभी स्तरों, विषयों और लिंगों के मामले में) का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 1950-51 में 0.7 प्रतिशत था, जो 1965-66 में बढ़कर 2.1 प्रतिशत हो गया। 1970-71 में वह 2-3 प्रतिशत और 1980-81 में 4-5 प्रतिशत था। इस प्रकार, दस साल में इसमें केवल एक प्रतिशत की बढोत्तरी हुई। यहां तक कि 21वीं सदी की शुरूआत में भी जीईआर दो अंकों में प्रवेश नहीं कर सका था और 8-9.5 प्रतिशत के बीच बना रहा। इस छोटे-से उच्च शिक्षित तबके में किन जातियों और वर्गों के लोग रहे होंगे, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। एक बात और। इस दौर में देश में लगातार वृहद् विकास परियोजनाएं लागू की जाती रहीं, जिनसे रोजगार के अवसर पैदा हुए और नौजवानों को चिंता और तनाव से नहीं गुजरना पड़ा। हां, 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरूआत में शिक्षित बेरोजगारों के मसले को लेकर कुछ बेचैनी और आशंकाएं सामने आईं। यही विद्यार्थी असंतोष का दौर भी था। मगर कुल मिलाकर शिक्षित वर्ग के छोटे आकार के कारण सार्वजनिक परीक्षाओं पर अधिक सामाजिक दबाव नहीं था। अधिकांश उम्मीदवार पुराने श्रेष्ठी वर्ग से हुआ करते थे और परीक्षाएं पास करने वालों को ठीक-ठाक काम मिल ही जाता था। मगर 1970 और 1980 के दशक में श्रेष्ठी वर्ग में आंतरिक प्रतियोगिता बढ़ने लगी। इससे परीक्षा, योग्यतावाद के एक औजार के रूप में और भी प्रतिष्ठित हुई, क्योंकि कुलीन उम्मीदवारों को भी परीक्षाएं पास करने के लिए कड़ी मेहनत और अनुशासित ढंग से पढ़ना पड़ा। लेकिन उन दिनों यह साफ-साफ दिखलाई नहीं पड़ रहा था कि, दरअसल, परीक्षाएं केवल एक विशिष्ट सामाजिक समूह को ही आगे बढ़ने में मदद कर रहीं थीं। फिर आया मंडल युग अर्थात 1990 का दशक जिसने सब कुछ उलट-पलट कर रख दिया। 2000 के दशक में जीईआर में तेजी से वृद्धि हुई और 2010 के दशक में वृद्धि दर और बढ़ गई। इसने नए तनावों को जन्म दिया। यही वह दौर भी था जब भारत सरकार ने ऐसी नवउदारवादी नीतियां अपनाईं, जिनसे अर्थ-व्यवस्था में सरकार की भूमिका सिकुड़ने लगी। शिक्षा में सार्वजनिक निवेश घटा और सरकारी रोजगार के अवसरों में कमी आई। नई सदी में जीईआर में वृद्धि के पीछे निजी शिक्षण संस्थाओं का विस्तार था। मगर इसके साथ ही निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन (यानी नई नौकरियों का उद्भव) कम होने लगा। 1990 के दशक के आईटी क्षेत्र में सीमित उछाल को छोड़ कर)। 2020 का दशक आते-आते, गिग-व्यवस्था रोजगार के क्षेत्र में पूरी तरह छा गई। रोजगारी असुरक्षा अब केवल निम्न तबके तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ऊपर से नीचे तक के सभी नौकरीपेशा इस डर के साये में जी रहे हैं कि उनकी नौकरी कभी भी जा सकती है। इसके कारण सार्वजनिक प्रवेश परीक्षाओं पर दवाब कई गुना बढ़ गया है और दिन-ब-दिन फलता-फूलता कोचिंग उद्योग इसे और बढ़ा रहा है। नौकरियां हासिल करने के लिए मैदान में उतरने वाले गंभीर प्रतियोगियों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अब वे पुराने श्रेष्ठ वर्ग तक सीमित नहीं हैं। अब इनमें कुछ जातियों और वर्गों के ऐसे तबके भी शामिल हो गए हैं जिनकी परीक्षाओं में सफलता की संभावना न्यूनतम हुआ करती थी। अपने समुदायों की कुल आबादी में उनका अनुपात भले ही कम हो, लेकिन उनकी संख्या अच्छी खासी है। लेकिन जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह है कि आज हमारी वित्तीयकृत और अति-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बिना रोजगार का सृजन किए मुनाफा कमाने में सक्षम है। इससे व्यावसायिक व उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरियों के बीच लंबे समय से चला आ रहा अंतसंर्बंध लगभग टूट गया है। इसके फलस्वरूप परीक्षाओं पर दबाव में जबरदस्त वृद्धि हुई है और इसी का सीधा नतीजा है बार-बार पेपर लीक और अन्य गड़बड़ियों की घटनाएं। यह सही है कि प्रश्नपत्र केवल वही लोग खरीद सकते हैं जो प्रभावशाली हैं व जिनके पास संसाधन हैं। मगर खरीदारों की सामाजिक पहचान के बारे में हम केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं। यह संभव है कि कोचिंग की उपलब्धता के कारण स्थापित श्रेष्ठ वर्ग के लिए केवल अपनी बेहतर सामाजिक पूंजी के बल पर परीक्षाओं में सफलता हासिल करना मुश्किल हो गया हो और इसलिए अब वे प्रश्नपत्र खरीद कर अपनी सफलता सुनिश्चित कर रहे हैं। यह भी संभव है हालांकि इसकी संभावना कम है कि श्रेष्ठ वर्ग का हिस्सा बनने को आतुर तबका यह कर रहा हो। लेकिन यह तो पक्का है कि प्रश्नपत्रों की लीक केवल उस वर्ग की समस्या है जिसे सामान्य श्रेणी के भ्रामक नाम से जाना जाता है। पेपर लीक के लिए आरक्षण को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और उनका कुप्रबंधन, योग्यता की विचारधारा की धज्जियां उड़ाता है, उसे तितर-बितर करता है। इसी प्रहार के साझा दर्द व आक्रोश ने तथाकथित जेन-जी विरोध आंदोलन को जन्म दिया है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जेन-जी के आंदोलन को जो जबरदस्त प्रचार मिला और समाज में उसे जो सहानुभूति हासिल हुई, उसका कारण यह था कि इस आंदोलन के केंद्र में उच्च स्तर की परीक्षाएं थीं, जिनमें मध्यम और धनिक वर्गों की रूचि रहती है। आॅल इंडिया सर्वे आॅफ हायर एजुकेशन (एआईएसएचई 2023-24) की सबसे ताजा रपट के अनुसार 18-23 वर्ष आयु वर्ग में जीईआर 30 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह है कि इस आयु वर्ग के 70 प्रतिशत युवा अब भी उच्च शिक्षा से बाहर हैं। स्कूली शिक्षा से संबंधित यूडीआईएसई+ 2024 डेटा बताता है कि स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों में से केवल 47 फीसद कक्षा 11-12वीं तक पहुंच पाते हैं। इसका मतलब यह है कि जो बच्चे स्कूलों में दाखिला लेते हैं, उनमें से आधे से ज्यादा हाईस्कूल तक भी नहीं पहुंच पाते।
असमान भारतीय समाज में अवसरों का नियमन
भारत अर्थात इंडिया का सबसे पवित्र संस्थान न तो गाय है, और न ही अयोध्या का नवनिर्मित मंदिर। हमारा परम पवित्र संस्थान तो परीक्षा ही है। मगर देश की परीक्षाओं का बार-बार दूषित किया जाना हमारे लिए अस है। प्रवेश परीक्षाओं पर केंद्रित युवाओं के जबरदस्त राष्ट्रव्यापी आंदोलन ने वह हासिल किया जो किसानों का लंबा आंदोलन भी हासिल नहीं कर सका। युवा आंदोलन ने स्वाधीन भारत की सबसे कम जवाबदेह सरकार को अपनी जवाबदेही स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया। परीक्षा की पवित्रता जहां हमें उसके बाहरी ढांचे की पूजा करने को प्रेरित करती है, वहीं हमें उसकी मूल अवधारणा और उसके औचित्य की पड़ताल करने से रोकती है। हालिया विरोध प्रदर्शनों का जोर परीक्षा-संस्थान के सतही पक्षों पर था जैसे उनका ईमानदार संचालन, सुविचारित व्यवस्था, और इन महकमों के संचालकों की जवाबदेही। ऐसी पड़ताल हमें बहुत पहले ही कर देनी चाहिए थी, फिर भी देर आयद दुरूस्त आयद। आंदोलन-जनित जांच-सुधार स्वागतयोग्य है, विशेषकर सरकारी आकाओं से जवाब-तलब किया जाना। जेन-जी विरोध प्रदर्शनों में जो व्यथा दिखी वह उपासकों की उपासना के अवसर से वंचित किए जाने की व्यथा ही थी। लेकिन इसके बावजूद युवा प्रदर्शनकारियों के अपूर्व साहस, धैर्य और सत्ता को धत्ता बताने के अद्भुत अंदाज ने जनमानस का मन जीतकर नई संभावनाओं का द्वार खोला है। इस या उस परीक्षा को क्रैक करने की बजाए आंदोलनकारियों ने परीक्षा की पूरी संस्था को ही क्रैक कर दिया है। नतीजतन इस नए माहौल में हम इस संस्थान की जांच-पड़ताल एक ऐसे परिप्रेक्ष्य से कर सकते हैं, जो न नास्तिक है और न आस्तिक। आज हम परीक्षा के प्रति नास्तिक रवैया नहीं अपना सकते क्योंकि यह एक अपरिहार्य संस्था बन चुकी है। खासकर भारत जैसे देश में परीक्षा का कोई विकल्प नहीं है। इसके अलावा हमारे पास कोई किफायती यानी कम लागत, श्रम और समय लगाकर हजारों-लाखों प्रत्याशियों का आकलन कर सकने वाला समाज-स्वीकृत तरीका नहीं है। इतिहास गवाह है कि आधुनिक समाज में परीक्षा से छुटकारा पाना नामुमकिन है। मगर हमें परीक्षा की संस्था का सिर्फ इसलिए अंधभक्त नहीं बन जाना चाहिए क्योंकि वह अपरिहार्य है, उसके बिना काम नहीं चल सकता। परीक्षा की संस्था की निरपेक्ष व्याख्या से हमें पता चलेगा कि उसके अदृश्य वैचारिक प्रभाव क्या होते हैं। इससे हम इस संस्था का उपयोग करते समय अधिक सचेत और सावधान रह सकेंगे।





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