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01 जून 1935 में डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर को बम्बई (मुंबई) के प्रतिष्ठित शासकीय विधि महाविद्यालय का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया था। यह नियुक्ति बाबासाहेब के जीवन, उनके शैक्षणिक करियर और भारत के कानूनी इतिहास में एक अत्यंत गौरवपूर्ण और ऐतिहासिक घटना है। बाबासाहेब की यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक पद नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा थी, जो अछूतों को शिक्षा के अधिकार से भी वंचित रखती थी। गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, बम्बई एशिया के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित विधि महाविद्यालयों में से एक है। इसकी स्थापना 1855 में हुई थी।
बैरिस्टर बाबा साहेब का प्रभाव: बाबासाहेब ने लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स से डी.एस.सी. (डी.एससी.) और ग्रेज इन, लंदन से बैरिस्टर-एट-लॉ की उपाधि प्राप्त की थी। वे बम्बई हाई कोर्ट में वकालत कर रहे थे और उनकी अद्भुत कानूनी विद्वता, तार्किक क्षमता और न्यायशास्त्र पर पकड़ से ब्रिटिश सरकार और कानूनी बिरादरी भली-भाँति परिचित थी।
पदभार ग्रहण: बम्बई सरकार ने उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें 1 जून 1935 को इस कॉलेज के प्रिंसिपल (प्रधानाचार्य) के पद पर नियुक्त किया। वे इस पद पर 1935 से 1937 (लगभग दो वर्ष) तक रहे। इससे पहले वे इसी कॉलेज में 1928 से अंशकालिक प्रोफेसर के रूप में कानून पढ़ा भी चुके थे।
बाबासाहेब केवल एक शिक्षक या वकील नहीं थे, वे एक दूरदर्शी शिक्षाविद थे। प्रिंसिपल का पद संभालते ही उन्होंने कॉलेज की व्यवस्था और कानून की शिक्षा में कई क्रांतिकारी सुधार किए:
पुस्तकालय का आधुनिकीकरण: बाबासाहेब पुस्तकों के परम प्रेमी थे (उनके निजी पुस्तकालय राजगृह में 50,000 से अधिक पुस्तकें थीं)। उन्होंने जीएलसी के पुस्तकालय को व्यवस्थित किया, नई कानूनी पुस्तकें और अंतरराष्ट्रीय जर्नल मंगवाए, जिससे यह भारत के सबसे समृद्ध कानूनी पुस्तकालयों में से एक बन गया।
छात्रों के प्रिय मार्गदर्शक: बाबासाहेब छात्रों को केवल कानून की धाराएं नहीं रटाते थे, बल्कि वे उन्हें न्याय के सामाजिक पक्ष को समझने की प्रेरणा देते थे। उनके व्याख्यानों को सुनने के लिए दूसरे कॉलेजों के छात्र और वकील भी आकर बैठ जाते थे।
अकादमिक अनुशासन: उन्होंने कॉलेज के प्रशासनिक ढांचे को सुधारा, कक्षाओं को नियमित किया और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाए।
1935 का यह कालखंड बाबासाहेब के जीवन में उथल-पुथल और बड़े निर्णयों का दौर था। इसी कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण मील के पत्थर स्थापित किए:
1. व्यक्तिगत त्रासदी और मानसिक तनाव
जब बाबासाहेब को प्रिंसिपल नियुक्त किया गया, उसी के कुछ दिनों बाद 27 मई 1935 को उनकी पत्नी माता रमाबाई का लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया था। बाबासाहेब इस व्यक्तिगत दुख से गहरे सदमे में थे। ऐसे कठिन समय में कॉलेज की जिम्मेदारियों और छात्रों के बीच रहने से उन्हें इस मानसिक तनाव से उबरने में मदद मिली।
2. ऐतिहासिक घोषणाओं की पृष्ठभूमि
इसी कार्यकाल के दौरान, 13 अक्टूबर 1935 को बाबासाहेब ने येवला (नासिक) में अपनी वह ऐतिहासिक प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं हिंदू पैदा हुआ था, लेकिन हिंदू रहकर मरूँगा नहीं।’ एक तरफ वे देश के सबसे बड़े सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, और दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में अपनी शासकीय जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहे थे।
3. भावी संविधान निर्माता की नींव
गवर्नमेंट लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में कानून के सिद्धांतों, संवैधानिक ढांचे और न्यायशास्त्र पर उनका जो निरंतर शोध और अध्यापन चल रहा था, उसने अनजाने में ही उन्हें भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार कर दिया था। यही गहन कानूनी समझ आगे चलकर 1947 में भारत के संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष और भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में काम आई।
1935 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर का गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, बम्बई का प्रिंसिपल बनना यह साबित करता है कि ‘विद्वता और योग्यता किसी जाति की जागीर नहीं होती।’ जिस समाज को सदियों से अक्षरों के ज्ञान से दूर रखा गया, उसी समाज के एक सपूत ने देश के सबसे बड़े वकीलों और जजों को कानून का पाठ पढ़ाया। उनका यह कार्यकाल भारतीय शिक्षा और कानून के इतिहास में हमेशा याद किया जाता है।





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