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वर्ष 1917 का समय भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और सामाजिक चेतना के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। यह वही वर्ष था जब बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति पर अमेरिका के प्रतिष्ठित कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा पीएच.डी. की उच्च उपाधियां प्राप्त कर डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भारत वापस लौटे थे। भारत वापसी का यह क्षण केवल एक मेधावी छात्र का स्वदेश लौटना मात्र नहीं था, बल्कि यह भारत के सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक धरातल पर एक युगांतरकारी क्रांति का बीजारोपण था। सदियों से अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और सामाजिक विषमता की जंजीरों में जकड़े हुए करोड़ों शोषितों, पीड़ितों और वंचितों के लिए डॉ. आंबेडकर का यह प्रत्यावर्तन एक नए प्रभात की किरण जैसा था।
डॉ. आंबेडकर का विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करना उस दौर में किसी चमत्कार से कम नहीं था। महार जाति में जन्मे भीमराव को बचपन से ही कदम-कदम पर जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद अपनी कुशाग्र बुद्धि, लगन और बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ के सहयोग से वे वर्ष 1913 में उच्च शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क (अमेरिका) स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनका प्रवेश एक वैचारिक और मानसिक क्रांति का दौर था। वहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने एंशिएंट इंडियन कॉमर्स पर अपना एम.ए. का शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया और द नेशनल डिविडेंड आॅफ इंडिया: ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी विषय पर अपना शोध पूरा कर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। अमेरिका के स्वतंत्र और लोकतांत्रिक वातावरण ने उन्हें यह महसूस कराया कि जाति और जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को नीचा समझना कृत्रिम और अमानवीय है। वहाँ उन्हें एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में सम्मान मिला, जिसने उनके भीतर सामाजिक समरसता और मानव अधिकारों की अलख जगाई। अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1916 में लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस (लंदन) चले गए। हालांकि, बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति की अवधि समाप्त होने के कारण उन्हें जून 1917 में बीच में ही पढ़ाई छोड़कर भारत लौटना पड़ा (जिसे उन्होंने बाद में 1921-23 में वापस जाकर पूरा किया)।
कठोर यथार्थ का सामना
जब 21 अगस्त 1917 को डॉ. आंबेडकर मुंबई (तब बंबई) के बंदरगाह पर उतरे, तो उनके पास दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की सर्वोच्च डिग्रियां थीं। वे उस समय के भारत के सबसे शिक्षित विद्वानों में से एक थे। लेकिन स्वदेश लौटते ही भारतीय समाज की कड़वी और अमानवीय हकीकत ने उनका स्वागत किया। बड़ौदा राज्य की शर्त के अनुसार, उन्हें बड़ौदा रियासत में सैन्य सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। एक अति-शिक्षित और उच्च पदस्थ अधिकारी होने के बावजूद बड़ौदा पहुँचते ही उन्हें जातिवादी मानसिकता के नग्न रूप का सामना करना पड़ा। उच्च जाति के हिंदुओं ने उन्हें अपने होटलों या धर्मशालाओं में जगह देने से मना कर दिया। अंतत: उन्हें एक पारसी सराय में अपनी पहचान छिपाकर शरण लेनी पड़ी, जहाँ से भी बाद में पारसी समुदाय के लोगों ने लाठियां लेकर उन्हें बाहर निकाल दिया। दफ्तर में उनके मातहत काम करने वाले चपरासी भी, जो उनसे निम्न पद पर थे, उन्हें फाइलें और दस्तावेज हाथ में देने के बजाय उनकी मेज पर फेंक कर देते थे, ताकि उनका स्पर्श न हो जाए। कार्यालय में उनके लिए पीने के पानी का अलग मटका रखा गया था, और दफ्तर के फर्श पर बिछी चटाइयों को उनके आने पर हटा लिया जाता था। यह अनुभव डॉ. आंबेडकर के लिए अत्यंत पीड़ादायक था। अमेरिका में जिस प्रतिभा को सिर आंखों पर बिठाया गया था, उसी प्रतिभा को अपने ही देश में केवल जाति के कारण यह अपमान सहना पड़ा। इस घटना ने उनके दिलो-दिमाग में यह बात सदा के लिए बिठा दी कि केवल उच्च शिक्षा या पद प्राप्त कर लेने से भारत में दलितों को सम्मान नहीं मिल सकता, जब तक कि जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता की इस सड़ चुकी नीव को न उखाड़ फेंका जाए। 1917 में भारत लौटने के बाद के वर्षों में बाबा साहब ने समझ लिया कि उन्हें अपनी विद्वता का उपयोग केवल व्यक्तिगत जीवन को संवारने में नहीं, बल्कि अपने पूरे समाज को गुलामी से मुक्त कराने में करना होगा।
साउथबोरो कमेटी के समक्ष गवाही (1919): भारत लौटने के बाद जब ब्रिटिश सरकार ने मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत मताधिकार और प्रतिनिधियों पर विचार करने के लिए साउथबोरो समिति का गठन किया, तो डॉ. आंबेडकर ने उसके समक्ष ऐतिहासिक गवाही दी। उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग पहली बार पुरजोर तरीके से रखी।
मूकनायक का प्रकाशन (1920): 31 जनवरी 1920 को उन्होंने मूकनायक नाम से एक पाक्षिक समाचार पत्र की शुरूआत की। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने बेजुबान, शोषित और मूक समाज को अपनी आवाज दी और अस्पृश्यता के खिलाफ तीखे प्रहार किए।
बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924): 1917 में बोए गए संघर्ष के बीज 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा के गठन के रूप में सामने आए, जिसका मूल मंत्र था—‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।’
डॉ. आंबेडकर की 1917 की भारत वापसी भारतीय इतिहास की उन गिनी-चुनी घटनाओं में से एक है, जिसने आने वाले दशक में पूरे देश की सामाजिक-राजनीतिक दिशा बदल दी। इससे पहले दलितों के सुधार की बातें उच्च वर्ग के समाज सुधारक (जैसे ज्योतिबा फुले के बाद के दौर में) अपने-अपने स्तर पर कर रहे थे, लेकिन 1917 में दलित समाज को अपना स्वयं का एक अत्यंत बुद्धिमान, साहसी और दूरदर्शी नेतृत्व मिला। डॉ. आंबेडकर ने उच्च शिक्षा के बल पर यह दिखाया कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल दया या भिक्षा से नहीं, बल्कि कानून, अधिकारों और संविधान के माध्यम से लड़ी जाएगी। उनकी वापसी के बाद ही अस्पृश्यता का मुद्दा केवल धार्मिक या सामाजिक बुराई न रहकर एक प्रमुख राजनीतिक और मानवाधिकार का विषय बना।
1917 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर का एम.ए. और पीएच.डी. लेकर भारत लौटना एक नए युग का आरंभ था। बड़ौदा में सहे गए जातीय अपमान ने उनके भीतर आक्रोश की ज्वाला भड़काई, जिसने उन्हें भारत के करोड़ों शोषितों का मुक्तिदाता बना दिया। उनके ज्ञान, दूरदर्शिता और संघर्ष का ही परिणाम था कि आगे चलकर उन्होंने महाड़ सत्याग्रह, नासिक कालाराम मंदिर प्रवेश, गोलमेज सम्मेलन और अंतत: स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियों को अंजाम दिया। आज जब हम आधुनिक, लोकतांत्रिक और समतामूलक भारत की बात करते हैं, तो 1917 की वह ऐतिहासिक घटना स्वर्ण अक्षरों में याद की जाती है, जब ज्ञान का एक सूर्य विदेशों से सीखकर भारत की धरती पर अपनी किरणों से अंधकार मिटाने उतरा था।





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