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1946 का वर्ष भारत के इतिहास में अत्यंत उथल-पुथल, गहन राजनीतिक मंथन और निर्णायक परिवर्तनों का कालखंड था। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश साम्राज्य यह भली-भांति समझ चुका था कि अब भारत पर सीधे शासन करना संभव नहीं रह गया है। सत्ता के शांतिपूर्ण और व्यवस्थित हस्तांतरण के रास्ते खोजने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने मार्च 1946 में तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय दल भारत भेजा, जिसे इतिहास में ‘कैबिनेट मिशन’ कहा जाता है। इसमें लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे। कैबिनेट मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत की अंतरिम सरकार का गठन और भावी संविधान के निर्माण के लिए एक संविधान सभा की रूपरेखा तैयार करना था। जब मई 1946 में कैबिनेट मिशन ने अपनी सिफारिशें सार्वजनिक कीं, तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक विशाल शून्य और गहरा असंतोष उभरकर सामने आया। मिशन ने भारतीय समाज को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों—सामान्य (हिंदू), मुस्लिम और सिख—में विभाजित कर दिया था। इस त्रिस्तरीय वर्गीकरण में देश की कुल आबादी के एक चौथाई से भी अधिक हिस्से, यानी लगभग छह करोड़ शोषितों, अछूतों और वंचितों (अनुसूचित जातियों) के स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को पूरी तरह से नकार दिया गया। उन्हें बिना किसी अलग पहचान और सुरक्षा कवच के सामान्य हिंदू कोटे के भीतर समाहित कर दिया गया। यह निर्णय सामाजिक न्याय और समानता के लिए दशकों से चले आ रहे आंदोलन की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था। इस ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनकी संस्था ‘आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन’ ने जिस राष्ट्रव्यापी जनांदोलन और सत्याग्रह का बिगुल फूंका, उसकी गूंज 12 सितम्बर 1946 को पूरे उपमहाद्वीप में एक प्रचंड हुंकार बनकर गूंजी।
दलित समुदाय का आक्रोश: कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों ने डॉ. आंबेडकर और दलित नेतृत्व के सामने एक गहरा राजनीतिक और अस्तित्वपरक संकट खड़ा कर दिया था। इसके पीछे कई बुनियादी और सैद्धांतिक कारण थे।
●राजनीतिक पहचान का विलोपन: कैबिनेट मिशन ने दलितों को एक अलग राजनीतिक अल्पसंख्यक समुदाय मानने से साफ इनकार कर दिया। ब्रिटिश सरकार, जिसने 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड में दलितों के अलग राजनीतिक दर्जे को स्वीकार किया था, अब पूरी तरह से कांग्रेस के दबाव में आकर इस वर्ग के अधिकारों की अनदेखी की थी।
●संविधान सभा में प्रतिनिधित्व का संकट: मिशन की योजना के अनुसार संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होना था। चूंकि 1937 और 1946 के प्रांतीय चुनावों में संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के चलते अधिकांश आरक्षित सीटों पर कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों की जीत हुई थी, इसलिए यह तय था कि संविधान सभा में केवल पार्टी-समर्थित लोग ही पहुंचेंगे, न कि दलित समाज की सच्ची स्वतंत्र आवाज।
●संवैधानिक सुरक्षोपायों की गैर-मौजूदगी: कैबिनेट मिशन ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की समीक्षा के लिए केवल एक सलाहकार समिति का प्रावधान किया था। डॉ. आंबेडकर का तर्क था कि बिना किसी बाध्यकारी कानूनी अधिकार और अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व के, बहुसंख्यक वर्ग कभी भी ऐतिहासिक रूप से प्रताड़ित समुदाय के साथ न्याय नहीं करेगा।
●अंतरिम सरकार में उपेक्षा: 2 सितम्बर 1946 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो उसमें आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और केवल कांग्रेस समर्थित दलित चेहरों को शामिल किया गया।
डॉ. आंबेडकर ने इसे स्पष्ट रूप से ‘लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यक वर्ग की तानाशाही’ और अछूतों के राजनीतिक अधिकारों की बलि’ करार दिया। कैबिनेट मिशन के रुख को देखते हुए डॉ. आंबेडकर ने दोहरे मोर्चे पर संघर्ष छेड़ा: पहला, ब्रिटिश हुकूमत और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक और बौद्धिक प्रहार; दूसरा, भारतीय सड़कों पर संगठित, अनुशासित और अहिंसक जनक्रांति। जुलाई 1946 में ही अकरउऋ की कार्यसमिति ने बंबई में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों की तीखी आलोचना की गई। डॉ. आंबेडकर ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली, भारत सचिव और विंस्टन चर्चिल को लंबे पत्र और टेलीग्राम भेजे। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि 6 करोड़ दलितों को उनके बुनियादी राजनीतिक और नागरिक अधिकारों से वंचित किया गया, तो भारत में कोई भी संवैधानिक व्यवस्था शांतिपूर्ण ढंग से काम नहीं कर पाएगी। जब कूटनीतिक प्रयासों को ब्रिटिश सरकार की उदासीनता का सामना करना पड़ा, तब उनके पास सड़क पर उतरकर सीधी कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचे। आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन ने विभिन्न राज्यों में स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू किए, जिन्हें अंतत: 12 सितम्बर 1946 को एक देशव्यापी महा-सत्याग्रह का रूप देने का फैसला किया गया।
जब सड़कों पर उतरा जनसैलाब: 12 सितम्बर 1946 का दिन आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे अनुशासित, संगठित और जुझारू जनआंदोलनों में से एक का साक्षी बना। एआईएससीएफ के समता सैनिक दल (दलित स्वयंसेवक संगठन) के नेतृत्व में देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में हजारों की संख्या में दलित स्त्री, पुरुष और युवा सड़कों पर उतर आए। इस सत्याग्रह की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थीं। सत्याग्रहियों के हाथों में काले झंडे थे, जो ब्रिटिश सरकार के विश्वासघात और अंतरिम सरकार की नीतियों के प्रति शोक और आक्रोश का प्रतीक थे। उनके पोस्टरों पर साफ लिखा था: ‘कैबिनेट मिशन वापस जाओ’, ‘हमें हमारे राजनीतिक अधिकार दो’, ‘अछूतों की उपेक्षा बंद करो’।
विधानसभाओं और भवनों का घेराव:
●नागपुर (मध्य प्रांत): नागपुर इस आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा। मध्य प्रांत की विधान परिषद के सामने हजारों कार्यकतार्ओं ने धरना दिया। स्थिति ऐसी बनी कि प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी। दादासाहेब गायकवाड़, बैरिस्टर खोब्रागड़े और स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में लगातार गिरफ्तारियां दी गईं।
●पूना और बंबई (महाराष्ट्र): पूना में काउंसिल हॉल के बाहर ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए। सैकड़ों स्वयंसेवकों ने सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए शांतिपूर्ण तरीके से गिरफ्तारियां दीं। बंबई में मजदूर बस्तियों और कपड़ा मिलों से जुड़े हजारों दलित कामगारों ने काम रोककर रैलियां निकालीं।
●दिल्ली: तत्कालीन वायसराय हाउस और केंद्रीय विधानसभा के बाहर भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। दिल्ली की सड़कों पर उतरकर कार्यकतार्ओं ने ब्रिटिश सत्ता के केंद्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
●कानपुर और लखनऊ (उत्तर प्रदेश): उत्तर भारत में भी इस सत्याग्रह का गहरा असर देखा गया। कानपुर के चमड़ा और कपड़ा उद्योग के हजारों मजदूरों ने हड़ताल की और कलेक्ट्रेट का घेराव किया।
महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी: 12 सितम्बर के सत्याग्रह की एक असाधारण विशेषता दलित महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी थी। वे गोद में छोटे बच्चों को लिए, पुलिस की लाठियों और जेल की सलाखों की परवाह किए बिना सबसे आगे चल रही थीं। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपनी राजनीतिक चेतना का परिचय दिया।
आंदोलन का वैचारिक आधार: डॉ. आंबेडकर इस सत्याग्रह को केवल एक तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देख रहे थे। उनके लिए यह भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की नींव रखने की लड़ाई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि एक स्वतंत्र देश में राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता यदि उसमें सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र न हो। उन्होंने सत्याग्रहियों को संबोधित करते हुए बार-बार कहा था कि दलितों का यह संघर्ष हिंदुओं या मुसलमानों के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस अमानवीय व्यवस्था और भेदभावपूर्ण सोच के खिलाफ है जो करोड़ों इंसानों को सत्ता और अधिकारों से बाहर रखना चाहती है। 12 सितम्बर के सत्याग्रह ने देश के प्रभुत्वशाली वर्गों को यह दिखा दिया कि दलित समाज अब केवल मूक दर्शक नहीं है। वह अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर साम्राज्यवादी हुकूमत और घरेलू सत्ता प्रतिष्ठानों—दोनों को चुनौती देने में सक्षम है।
इस राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह ने प्रांतीय सरकारों और ब्रिटिश प्रशासन को हिलाकर रख दिया। आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर दमनकारी नीतियां अपनाई गईं। नागपुर, पूना, कानपुर और दिल्ली में जेलें सत्याग्रहियों से भर गईं। कई हफ्तों तक चले इस आंदोलन के दौरान लगभग 25,000 से अधिक लोगों ने गिरफ्तारियां दीं। कई स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया और अश्रुगैस के गोले छोड़े गए। लेकिन आंदोलनकारियों ने पूरी तरह अहिंसक रहकर आंदोलन की साख को बनाए रखा। कांग्रेस और ब्रिटिश अधिकारियों को यह एहसास हो गया कि डॉ. आंबेडकर को पूरी तरह अलग-थलग करके देश में एक सर्वमान्य संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश मीडिया, जैसे द टाइम्स और मैनचेस्टर गार्जियन, ने भी भारत में दलितों की उपेक्षा और चल रहे सत्याग्रह को प्रमुखता से कवर किया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार की किरकिरी हुई। 12 सितम्बर 1946 के सत्याग्रह ने भले ही कैबिनेट मिशन की रूपरेखा को रातों-रात न बदला हो, लेकिन इसने भारतीय राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। इस आंदोलन के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणाम अत्यंत दूरगामी साबित हुए।
1. संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर का ऐतिहासिक प्रवेश: सत्याग्रह के दबाव और दलित समाज की लामबंदी के बीच यह साफ हो गया था कि डॉ. आंबेडकर के बिना संविधान सभा अधूरी रहेगी। हालांकि बंबई प्रांत में कांग्रेस के भारी बहुमत के कारण उनके वहां से चुने जाने की संभावना नहीं थी, लेकिन बंगाल के दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल और मुस्लिम लीग के सहयोग से डॉ. आंबेडकर बंगाल प्रांतीय विधानसभा से संविधान सभा के लिए निर्वाचित हुए। यह सत्याग्रह से उत्पन्न राजनीतिक जागृति की ही देन थी।
2. प्रारूप समिति की अध्यक्षता: विभाजन के बाद जब बंगाल का वह हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान में चला गया, तो डॉ. आंबेडकर की संविधान सभा की सदस्यता खतरे में पड़ गई। लेकिन तब तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू, यह समझ चुका था कि संविधान निर्माण की जटिल प्रक्रिया के लिए डॉ. आंबेडकर के कानूनी ज्ञान और बौद्धिक क्षमता का कोई विकल्प नहीं है। उन्हें पुन: बंबई से संविधान सभा में लाया गया और 29 अगस्त 1947 को उन्हें भारतीय संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
3. स्वतंत्र भारत के संविधान में अधिकारों का समावेश: 12 सितम्बर 1946 को जिस उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाई गई थी, उसी का परिणाम था कि जब डॉ. आंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार किया, तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वंचितों के साथ कोई समझौता न हो:
●अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का पूर्ण उन्मूलन और इसे दंडनीय अपराध घोषित करना।
●अनुच्छेद 15 और 16: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध और लोक नियोजन में समान अवसर की गारंटी।
●राजनीतिक और शैक्षणिक आरक्षण: संसद, विधानसभाओं, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए विशेष सुरक्षात्मक प्रावधान और आरक्षण।
●सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: बिना किसी संपत्ति या शिक्षा की शर्त के प्रत्येक नागरिक को एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य का अधिकार प्रदान करना।
12 सितम्बर 1946 का सत्याग्रह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का वह मील का पत्थर था जिसने देश की नियति तय की। यदि उस समय डॉ. आंबेडकर और उनके लाखों समर्थकों ने कैबिनेट मिशन की सिफारिशों के खिलाफ यह समझौताविहीन संघर्ष न किया होता, तो शायद आज का भारतीय संविधान सामाजिक न्याय और समता के उन मजबूत स्तंभों पर खड़ा न होता जिन पर वह आज गर्व करता है। यह आंदोलन इस बात का अमर प्रमाण है कि अधिकार मांगने से नहीं मिलते, बल्कि उन्हें संगठित होकर, अपने आत्मसम्मान को पहचानकर और संवैधानिक साधनों के जरिए संघर्ष करके हासिल करना पड़ता है। 12 सितम्बर 1946 की वह ऐतिहासिक हुंकार आज भी भारतीय लोकतंत्र को यह याद दिलाती है कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की सहमति और भागीदारी के बिना कोई भी राष्ट्र वास्तव में स्वतंत्र और संप्रभु नहीं हो सकता।





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