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3 अक्टूबर 1957 को महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) के गठन की औपचारिक घोषणा की गई। इस दल का गठन बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की उस वैचारिक व राजनीतिक योजना का संस्थागत परिणाम था, जिसके अंतर्गत वे केवल एक जाति विशेष तक सीमित रहने के बजाय एक व्यापक, धर्मनिरपेक्ष और समतावादी लोकतांत्रिक राजनीतिक दल बनाना चाहते थे। डॉ. आंबेडकर ने 1956 में आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (एससीएफ) को समाप्त करके इस नए दल की स्थापना का निर्णय लिया था। यद्यपि 6 दिसंबर 1956 को उनके महापरिनिर्वाण के कारण वे इस दल के विधिवत अधिवेशन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके, परंतु उनके राजनीतिक सहयोगियों ने अक्टूबर 1957 में नागपुर में प्रेसीडियम और खुले अधिवेशन के माध्यम से इस दल को औपचारिक रूप से स्थापित किया। रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के गठन को समझने के लिए डॉ. आंबेडकर द्वारा समय-समय पर स्थापित किए गए राजनीतिक संगठनों के क्रमिक विकास का अध्ययन आवश्यक है:
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (1936): अगस्त 1936 में डॉ. आंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आईएलपी स्वतंत्र मजदूर दल) की स्थापना की। इस दल का उद्देश्य श्रमिकों, भूमिहीनों और किसानों के साझा आर्थिक व नागरिक हितों का प्रतिनिधित्व करना था। 1937 के बंबई प्रांतीय विधानसभा चुनावों में आईएलपी ने कुल 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 14 से 15 सीटों पर विजय प्राप्त की (विभिन्न आधिकारिक व अकादमिक स्रोतों में गणना के आधार पर 14 या 15 सीटों का उल्लेख मिलता है)। इस दल ने यह प्रदर्शित किया कि वंचित और श्रमिक वर्गों का साझा राजनीतिक मंच तैयार किया जा सकता है।
आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (1942): 1940 के दशक में जब भारत की स्वाधीनता और भावी संविधान के संबंध में ब्रिटिश हुकूमत से बातचीत का दौर शुरू हुआ, तब अनुसूचित जातियों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक संरक्षण की आवश्यकता रेखांकित हुई। इसी पृष्ठभूमि में 17 से 20 जुलाई 1942 को नागपुर में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान 19 जुलाई को आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (एससीएफ) की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया गया। मद्रास के वरिष्ठ नेता राव बहादुर एन. शिवराज इसके अध्यक्ष और पी. एन. राजभोज इसके महासचिव चुने गए। एससीएफ ने अनुसूचित जातियों के राजनीतिक अधिकारों, पृथक निर्वाचन और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का कार्य किया।
एक व्यापक राष्ट्रीय दल की आवश्यकता (1950 का दशक): 1952 के प्रथम आम चुनाव के अनुभवों और एससीएफ के सीमित दायरे को देखते हुए डॉ. आंबेडकर एक ऐसे व्यापक राजनीतिक संगठन की आवश्यकता पर विचार कर रहे थे, जो केवल अनुसूचित जातियों के मुद्दों तक सीमित न रहे, बल्कि अन्य वंचित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों को भी राजनीतिक प्रक्रिया में समान भागीदारी दिला सके। वे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित एक लोकतांत्रिक दल की स्थापना करना चाहते थे।
30 सितंबर 1956: नई दिल्ली प्रस्ताव: अपने महापरिनिर्वाण से पूर्व, 30 सितंबर 1956 को डॉ. आंबेडकर ने 26, अलीपुर रोड, नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की केंद्रीय कार्यकारिणी की एक महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता की।
इस बैठक के प्रस्ताव संख्या 2 के अनुसार औपचारिक निर्णय लिया गया कि:
1. शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को भंग किया जाएगा।
2. इसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) नामक नए अखिल भारतीय राजनीतिक दल का गठन किया जाएगा।
3. यह दल संविधान की प्रस्तावना के आदर्शों को समर्पित एक व्यापक राजनीतिक मंच होगा।
13 अक्टूबर 1956 को नागपुर में भी डॉ. आंबेडकर ने संकेत दिया था कि उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है। इस दौरान उन्होंने समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया सहित अन्य नेताओं से पत्राचार व संवाद भी किया था। परंतु 14 अक्टूबर 1956 को ऐतिहासिक बौद्ध धम्म दीक्षा के कुछ ही सप्ताह बाद, 6 दिसंबर 1956 को नई दिल्ली में उनका महापरिनिर्वाण हो गया।
1957 का आम चुनाव और अंतरिम स्थिति: डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के बाद 1957 के आरंभ में देश के दूसरे आम चुनाव आयोजित हुए। चूंकि आरपीआई के गठन की औपचारिक और सांगठनिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी, इसलिए यह चुनाव रिपब्लिकन पार्टी के नाम पर नहीं लड़ा गया। 1957 के आम चुनावों में आंबेडकरवादी राजनीतिक धारा के उम्मीदवार मुख्य रूप से शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (एससीएफ) के नाम पर ही मैदान में उतरे। महाराष्ट्र में संयुक्त महाराष्ट्र समिति के साथ तालमेल तथा अन्य राज्यों में जनाधार के बल पर एससीएफ के उम्मीदवारों ने लोकसभा में कई सीटें जीतीं (जिनमें बॉम्बे राज्य में 5 और मैसूर में 1 सीट प्रमुख रूप से शामिल थी)। चुनाव के उपरांत यही निर्वाचित और संगठनात्मक नेतृत्व आरपीआई के औपचारिक गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय हुआ।
नागपुर प्रेसीडियम और 3 अक्टूबर 1957 का अधिवेशन: आम चुनावों के संपन्न होने के बाद नेतृत्व ने डॉ. आंबेडकर के संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए नागपुर में सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया।
प्रेसीडियम बैठक: 1 अक्टूबर 1957 को नागपुर में पार्टी नेतृत्व और प्रेसीडियम की बैठक हुई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य एससीएफ को औपचारिक रूप से समाप्त करने की प्रक्रिया पूरी करना तथा रिपब्लिकन पार्टी के संविधान और संगठनात्मक संरचना की रूपरेखा तैयार करना था। इस बैठक में राव बहादुर एन. शिवराज, यशवंतराव आंबेडकर (भैयासाहेब), पी. टी. बोराले, ए. जी. पवार, दत्ता कट्टी, दादासाहेब रूपवते, अब्बा पी. टी. मधाले तथा अन्य प्रमुख नेता उपस्थित थे।
खुला अधिवेशन एवं विधिवत गठन: 3 अक्टूबर 1957 को नागपुर में देश भर से आए लगभग 3,000 प्रतिनिधियों और कार्यकतार्ओं की उपस्थिति में रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) के गठन की औपचारिक घोषणा की गई। प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से एससीएफ के विघटन और आरपीआई की स्थापना की पुष्टि की।
सम्मेलन में पार्टी का प्रारंभिक केंद्रीय संगठनात्मक ढाँचा चुना गया:
●राष्ट्रीय अध्यक्ष: राव बहादुर एन. शिवराज
●कार्यकारी अध्यक्ष: बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागड़े
●केंद्रीय समिति के प्रमुख सदस्य: कर्मवीर दादासाहेब बी. के. गायकवाड़, यशवंतराव आंबेडकर, बी. सी. कांबले, आर. डी. भंडारे, हरिदास आवले, ईश्वरबाई, बी. पी. मौर्य आदि।
वैचारिक आधार और राजनीतिक दृष्टि: नागपुर अधिवेशन में स्वीकृत पार्टी के संविधान और डॉ. आंबेडकर के ब्लूप्रिंट के अनुसार आरपीआई की मूल वैचारिक दृष्टि निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित थी:
संवैधानिक मूल्य: पार्टी ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित चार बुनियादी स्तंभों—सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समानता; तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाले बंधुत्व—को अपना मूल आधार घोषित किया।
संसदीय लोकतंत्र में निष्ठा: दल ने स्पष्ट किया कि सामाजिक परिवर्तन और अधिकारों की रक्षा केवल लोकतांत्रिक और संवैधानिक साधनों के माध्यम से ही संभव है।
वंचितों और शोषितों को प्राथमिकता: आर्थिक और सामाजिक नीतियों में समाज के सबसे कमजोर तबकों—भूमिहीन मजदूरों, छोटे किसानों और शोषित वर्गों के हितों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
समान अवसर और शोषण से मुक्ति: दल ने राज्य द्वारा सार्वजनिक शिक्षा, रोजगार के समान अवसर और शोषणकारी व्यवस्थाओं के उन्मूलन के पक्ष में नीतियां बनाने का समर्थन किया।
अपने गठन के आरंभिक दशक में आरपीआई ने संसदीय राजनीति के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक व भूमि आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई:
(क) संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन
मराठी भाषी राज्य के निर्माण के लिए चले संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में आरपीआई के नेताओं ने सक्रिय भागीदारी की और जनभावनाओं का समर्थन किया। 1 मई 1960 को अलग महाराष्ट्र राज्य के गठन में इस लोकतांत्रिक भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
(ख) भूमिहीन सत्याग्रह आंदोलन (1959 एवं 1964)
आरपीआई ने देश के ग्रामीण अंचलों में भूमिहीनों के अधिकारों के लिए कई संगठित आंदोलन किए:
1959 का सत्याग्रह: कर्मवीर दादासाहेब गायकवाड़ के नेतृत्व में महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में बंजर और परती भूमि पर खेती करने वाले भूमिहीनों के अधिकारों के लिए सत्याग्रह चलाया गया, जिसमें हजारों लोगों ने भाग लिया।
6 दिसंबर 1964 का देशव्यापी सत्याग्रह: 6 दिसंबर 1964 से आरपीआई के नेतृत्व में एक व्यापक देशव्यापी भूमिहीन सत्याग्रह शुरू हुआ। बड़ी संख्या में कार्यकतार्ओं ने गिरफ्तारियाँ दीं। इस आंदोलन ने भूमिहीनों, खेतिहर मजदूरों और भूमि-वितरण के प्रश्न को राष्ट्रीय और प्रशासनिक विमर्श के केंद्र में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(ग) उत्तर भारत में सांगठनिक विस्तार
1960 के दशक में पार्टी का प्रभाव उत्तर भारत में भी बढ़ा। उत्तर प्रदेश में बुद्धप्रिय मौर्य (बी. पी. मौर्य) सहित आरपीआई के नेताओं ने वंचित और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच पार्टी का विस्तार किया। 1962 के संसदीय चुनावों में बी. पी. मौर्य रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े उम्मीदवार के रूप में लोकसभा पहुंचे।
1960 के दशक के उत्तरार्ध से आरपीआई को गंभीर आंतरिक अंतर्विरोधों और सांगठनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा:
चुनावी गठबंधनों पर मतभेद: पार्टी के भीतर अन्य राजनीतिक दलों, विशेषकर सत्ताधारी कांग्रेस के साथ चुनावी समझौते और सहयोग की सीमा को लेकर गंभीर वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए। एक वर्ग सीमित समझौतों के पक्ष में था, जबकि दूसरा वर्ग अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने का पक्षधर था।
गुटीय विभाजन: इन मतभेदों के परिणामस्वरूप पार्टी विभिन्न गुटों में बँटने लगी। 1970 के दशक और उसके बाद यह विभाजन और गहरा हुआ, जिससे दल कई अलग-अलग संगठनों (जैसे आरपीआई-खोब्रागड़े, आरपीआई-गायकवाड़, आरपीआई-कांबले आदि) के रूप में कार्य करने लगा।
उत्तरवर्ती आंदोलन: इस बिखराव के बीच 1970 के दशक में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स जैसे युवाओं के विद्रोही आंदोलन का उदय हुआ, तथा बाद के वर्षों में उत्तर भारत में कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन आंदोलन के नए संगठनों का विकास हुआ, जिन्होंने अपने-अपने संदर्भों में आंबेडकरवादी राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष: 3 अक्टूबर 1957 का नागपुर अधिवेशन डॉ. बी. आर. आंबेडकर के उस राजनीतिक दर्शन को संस्थागत रूप देने का ऐतिहासिक प्रयास था, जिसके माध्यम से वे स्वतंत्र भारत में एक व्यापक, समतामूलक और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना चाहते थे। यद्यपि बाद के दशकों में आंतरिक मतभेदों और राजनीतिक विभाजन के कारण पार्टी संगठनात्मक रूप से कमजोर हुई, परंतु आरपीआई का गठन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना रहा। इसने यह स्थापित किया कि समाज के उपेक्षित और वंचित वर्ग संसदीय लोकतंत्र के भीतर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाकर सामाजिक न्याय और समानता के लिए एक साझा मंच पर संगठित हो सकते हैं।





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