




2026-03-28 16:19:47
बाबा साहेब अंबेडकर हमेशा से जानते थे कि वो जिस जाति से पैदा हुए है वो जाति बेगारी के लिए है.. शूद्र होने के कारण उन्हें और उनकी जाति को अवहेलना का सामना करना पड़ा था.. इसलिए बचपन से उन्होंने शिक्षा और किताबों में ही अपना जीवन झोंक दिया। वो अपनी पॉकेट मनी से हमेशा किताबे लिया करते थे.. किताबों से उनका प्रेम कैसा लगा होगा कि अमेरिका में पढ़ाई के दौरान बाबा साहब ने अपनी स्कॉलरशिप के पैसे बचा कर करीब करीब 2000 किताबें खरीदी थी। वो करीब 18 घंटे तक पड़ा करते थे। घर में नहीं पढ़ पाते तो लाइब्रेरी जाते थे। मगर उनकी पढ़ने की इस आदत के कारण उनकी पत्नी रमाबाई को कई बार भारी दुखों का सामना भी करना पड़ा था। हैरानी की बात थी कि खुद बाबा साहब इस बात को स्वीकार करते थे कि उन्हें ये तो पता है कि किताबों के साथ कैसे रहना है लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि पत्नी और बच्चों के साथ कैसे रहना है। अपने इस लेख में हम जानेंगे कि ऐसा क्या हुआ था जब रमा बाई ने बाबा साहब को ये सीख दी थी कि उन्हें परिवार के साथ कैसे रहना है।
किताबों के प्रति लगाव
दरअसल एक बार की बात है उस वक्त बाबा साहब अपनी पत्नी रमाबाई और बच्चों के साथ मुम्बई में रहा करते थे.. बाबा साहब को किताबे इतनी पसंद थी कि जब भी उन्हें किसी नई किताब के बारे में पता चलता था तो वो उसे तुरंत ले लेते और भूख प्यास भूल कर उस किताब में रमे रहते थे। ऐसा कई बार हुआ जब बाबा साहब ने सार्वजनिक तौर पर इस बात को स्वीकार किया था कि उन्हें जितना लगाव और अपनापन किताबों से हो जाता है, जितनी जल्दी वो किताबों से मैत्री कर लेते है उतनी जल्द वो किसी इंसान से नहीं कर पाते। बाबा साहब और उनके बेटे की बीच की दूरियां तो किसी से छिपी नही है। मां की अकाल मृत्यु, भाई बहनों को अपने सामने पैसो की तंगी के कारण मरते देखना..कहीं न कही वो अपने पिता के इस किताबी जूनून से तंग जरूर आ गये थे। बाबा साहब के जीवन का एक किस्सा है कि जब बाबा साहब की पत्नी रमा बाई बाबा साहब के पास रात के वक्त खाना लेकर जाती तो वो अक्सर किताबों में मशगूल रहते थेङ्घवो उन्हें कई आवाज लगा कर कहती कि खाना खा लिजिए, लेकिन बाबा साहब कई बार तो सुनी ही नहीं पाते थे। या फिर सुनते भी तो सिर्फ इतना ही कहते कि बस ये पन्ना खत्म कर लेता हूं फिर खाऊंगा। रमा बाई इंतजार करती रहती कि कब बाबा साहब खायेंगे जिनके बाद वो भी खायेंगी.. लेकिन दोनो ही भूखे सो जाते। सुबह जब रमा बाई बाबा साहब को देखने जाती तो खाना यूंही मेज पर ढका रखा रहता है और बाबा साहब वैसे ही सोये हुए रहते है। ऐसा कई बार हुआ तो रमा बाई काफी दुखी रहने लगी। हालांकि बाबा साहब को भले ही पत्नी की आंतरिक स्थिति का अंदाजा न हो लेकिन वो उनके चेहरे की उदासी देख रहे थे। उन्होंने रमा बाई से उदासी का कारण पूछा तो उन्होंने बस इतना ही कहा कि आपकी दुनिया में तो किताबों के अलावा कुछ नहीं है। क्या किताबों से परिवार चलता है.. न तो आप थोड़ा समय बच्चों के साथ बिताते है और न ही परिवार के लिए निकालते है। क्या किताबों से पेट भर जाता है, घर से राशन सब्जी आ जाती है। उस दिन रमा बाई ने अपना सारा दुख उड़ेल कर रख दिया था। बाबा साहब को पहली बार समझ आया कि उनसे कितनी बड़ी भूल हुई है। उन्होंने रमा बाई की सराहना करते हुए कहा कि तुम सही मायने में साध्वी हो..और ये तुम्हारे तप और साधना की ही देन है कि मैं इतना बड़ा बन पाया हूं,,मुझमे समाज से लड़ने की शक्ति है। बदलाव करने की ताकत मुझे तमुसे आती है।
ये सच है कि मैं कभी परिवार और किताबों में सामंजस्य नहीं बिठा पाया, लेकिन मैं आजीवन तुम्हारी तपस्या का ऋणी रहूंगा। बाबा साहब को अंदाजा था कि परिवार की जिम्मेदारियों में कहीं न कहीं उनसे किताबों की दुनिया में रमे रहने के कारण चूक हो गई है। हालांकि रमा बाई और बाबा साहब का साथ ज्यादा समय तक नहीं रहा और साल 1935 में रमाबाई का 39 साल की छोटी सी उम्र में ही निधन हो गया था। बाबा साहब हमेशा रमाबाई की एक साधक की तरह आस्था करते थे और पत्नी के जाने का उन्हें काफी दुख भी हुआ था।
लेकिन जब कमी बाबा साहब के कारण कमाबाई की जिंदगी में आई थी..वो कभी भी पूरी नहीं हो सकी थी.. जिसके कारण उनके इकलौते जीवित बेटे यशवंतराव अंबेडकर उनसे हमेशा नाराज रहे थे और ये नाराजगी बाबा साहब के देहांत तक रही थी..हालांकि बाबा साहब के निधन के बाद उनके बेटे ने ही उनका अंतिम संस्कार किया था..जो उनकी मां रमाबाई के दिये गए संस्कारों को दर्शाते है। रमा बाई के संघंर्षों पर आपका क्या सोचना है..क्या उनके साथ कहीं न कही अन्याय हुआ था..या फिर से केवल वक्त वक्त की बात ही थी। बाबा साहेब ने यह अन्याय जान-बूझकर नहीं किया था। उनमें किताबों के प्रति जुनून अपने अछूत समाज को ब्राह्मणवाद से मुक्ति दिलाने के लिए था।





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